विनीता परमार की रचनाएँ

डिस्पोजेबल

एक गति जो लयबद्ध है,
जिसमें ताल है,पृथ्वी की गति
चांद की गति, वायुयान की गति
इन गतियों के बीच एक ऐसी गति जो हर तार और लय से परे है,
उसकी गति ने इसकी जरूरत ही न समझी, गति की तीव्रता में भुला दिया
अपने उत्स को और भुलाया मातृत्व और पितृत्व को
उसकी गति ने जनम दिया सरोगेट मदर की संस्कृति को,
इस गति ने संयुक्त से एकल बनाया फिर जीवन के हर कर्म को डिस्पोजेबल बनाया
खाना डिस्पोजेबल,पीना डिस्पोजेबल,सोना डिस्पोजेबल,
सम्वेदना डिस्पोजेबल,हर एक रिश्ता डिस्पोजेबल,
जीवन की हर धारणा डिस्पोजेबल,
प्रकृति की गति प्रतिरोधित करती लगती है गति की ये अबाधता!
और अब भय है,उसके त्रिशंकु हो जाने की इस उपयोगवदिता और बाज़ारवदिता के बीच।

कितने ताल?

बावडी,सर,तालाब,पोखर, ताल, झील,
कितने नाम है मेरे
कभी मेरे नाम से शहरो के नाम होते थे
नाम जिन्दा है लेकिन मैं कहा हूँ?
कही रानी विक्टोरिया के लाए फूलों ने ढक लिया,
तो कही इंसानो ढक दिया
मैं कहाँ हूँ?
मेंरे किनारे आम,पीपल,जामुन होते थे
इंतज़ार उस पथिक का होता था
जो प्यास बुझाता था
आज मैं सरकार के अभियान में हूँ या शोध का विषय
कभी बच्चे बैनर तले नारा लगाते है
और जलपान का खाली पैकेट मुझ में डाल जाते है,
कभी मैं राही का विश्वास थी
तो कभी सुकुन की कुंजी थी
अब तो इंतज़ार उस चक्र का है
जो मुझे इंसानी चक्रव्यूह से बाहर निकालेगा
आएगा वो पथिक बुझायेगा प्यास अपनी
एतवार है उस राही पे आयेगा इक दिन…

तृण हरियाली

शोध के रूप में, कुछ बीज डाले
प्रयोग के लिये, अपने ही बीजों में
डाला कुछ में शाकनाशी और कुछ में पानी
दो खरपात उगे,खूब फले फूले
अनुसंधान की सामग्री
फिर उस पर छिड़काव
रोम रोम में जहर डाला
पत्ते फूल सब गिरने लगे
तुम हमें तृण हरियाली समझते रहे
मेंरी नसों का हरा हरा कतरा बिख़रता रहा
मेंरी शाख सूखने लगी
तभी आँसुओं की बारिश ने
विष को धो डाला
नई पत्तियाँ निकलने लगी
मैं सिर्फ खरपात नही
औषध गुण मेरे भर देते
जख्मों के घाव
मानस के हृदय में करते रागों का संचार
तुम कब समझोगे मेंरे रसों का भाव
बस अब ना समझो शोध का प्रश्न
कर लो मुझे आत्मसात
मिट्टी के साथ नई ऊर्वरा
कर देगी सब हरा भरा…

आज का संवाद 

डाल से गिरे सूखे पत्ते
हवा के झोंके से ऐसे उड़े
जैसे इनकी क्या बिसात
स्फुरण से उगे नन्हे पौधे ने
सूखी पतियों को बुलाया
कर लो मेंरा आलिंगन
मेरी जड़ो को कर दो उर्वरा
बनूँ मैं भी एक वृक्ष करूँ मैं सर्वत्र हरा भरा
सूखती शाख को देखकर
लकड़हारे ने कहा तू तो अब जल जायेगी
वो बोली छोड़ दे मुझे मैं भी हूँ प्रकृति की सौगात
बन जाऊगी किसी गिलहरी का घर
जिसका फले फूलेगा परिवार
देख रहा हूँ हर रूप में है संचार
बस आत्मा का संवाद
जिसमें कोई घबराहट नही
कोई बेचैनी नही
जो हो रहा सब ठीक है।

तुम्हारा पूर्वज

मैं हूँ तुम्हारा पूर्वज
कही बर्फ से ढका तो कही हरियाली से
कही शुष्क तो कही लाल या काली
हिमालय,अरावली,सत्पुड़ा,शिवालिक
कितने नाम है मेंरे
मैं अविचल खडा रहता हूँ
तुम्हारी चलने की रफ्तार ने
मुझे छलनी करना शुरु कर दिया
कही गुफा तो कही सुरंग
कोई मुझे चीर कर रास्ता बना रहा
तो कोई घेरकर तालाब
अब मैं शायद बूढा हो गया हूँ
मेंरे लायक कोई आश्रम नही जहा
तू मुझे भी रख देता
पुरानी चीज तुम्हे पसंद नही
किसी जगह रखने की तुम्हारी आदत हो गई है
अब इस पाषान हृदय को
किसी संरक्षक की जरूरत नही
मेंरी मौत का इंतज़ार है तुम्हे
मर जाऊगा मैं अपने आप
मरने दो मुझे प्रकृति की मौत
मर के मिट्टी ही बनेगी
जीने दो अपने इस अभिभावक को

घंटी 

ये घंटी भी अजीब है,
जन्म के साथ थालियों की घंटी
उठने के लिये अलार्म की घंटी
दरवाजे पर दस्तक की घंटी
फोन की घंटी
स्कूल की घंटी
छुट्टी की घंटी
मंदिर की घंटी
शवयात्रा की घंटी
सबकी आवाज़ तो एक है
फिर एक संगीत तो दूसरा शोर
एक के बजते ही लब और डब झंकृत हो जाता है
दूसरी नसों में रक्त संचार रोक देती है
और मेंरा मन कभी इन घंटियों की आवाज़ को चुभन समझता है
कभी ऐसी घंटी बजाने की
कोशिश करता है
जिससे ओम,आमेन और आमीन निकल जाये।

सूखी हरियाली

गहरी नींद से उठकर
गहरा हरा रंग डाला
तो ये ज़ख्म भी हरे हो गये|
अब कुछ हरा- भरा नही रहा
बुलबुले सी जिन्द्गी से
जाने कब हरियाली निकल गई
इसका पता ही ना चला
हरी काइ के उपर आत्मा फिसलती रही
हरे दूब का मरहम भी
ना ये घाव भर पाया
अब ना कोई मानस दिखता है जो
गहरे रंग को और चटक बना दे
इस सूखी हरियाली में स्फुरन ला दे

होमोसेपियंस का सफ़र

तय करते करते पहुँच गया
मैं कंक्रीट के जंगल में
जहाँ शेर और सियार की तरह
खून के प्यासे बैठे है,
यहा मैं अपनी पिछली यादों में जीता हूँ,
सपने में देखता हूँ मिट्टी से लिपा मकान
बावड़ी के किनारे जामुन कुतरती गिलहरी
मैं खेतों के मेड़ के किनारे खड़े
सोचने लगा कहाँ गये वो हरे टिड्डे
जिसे मैं राम जी की चिड़िया कहा करता था।
छप्पड़ की ओरी से
गिरते पानी की बूँदों से बनते छोटे गड्ढे को देखकर
सोचता था धरती की गर्भ को
शीतल करेगा ये पानी।
अब ये पानी किधर जाता है,
पत्थरों को चीरने की जदोजहद में नाले सड़कों को लीलते है,
मैं इस कशमकश में
अपनी डोन्नगी को बिन पत्तवार पाता हूँ।
रात्री के अन्धेरे में,शून्य की नाद में
सारे साजों की ध्वनि के बीच
अपनी हृदय तरंग को सुनता हूँ
सुनाइ पड़ रही है भावहीन निनाद।

मेरी ख़ुशी

प्यार है मुझे उससे
वो कौन है?
है एक जिसे हमदर्द बनाना
चाहता हूँ,
कहा रहती है वो?
पता नही?
पर कभी कभी मेंरे पास भी रहती है।
कैसी है वो?
उसे देखा नही बस
महसूस किया है
कमबख्त जिन्द्गी का अहसास कराती है,
जब भी करीब होती है
अपनेपन की याद दिलाती है
उसके होने की समझ में ही जी लेने में मजा है,
है मेरी वो खुशी
आती है और चली जाती है।

मेरे पन्ने

कल मैं सिर्फ हँसना जानता था
धीरे धीरे कुछ बनने लगा,
इस बनने में पन्ने बदलते गये,
कल कुछ और सोचता था
आज समझ बदल गई
समय चलता गया
हमें बदलता गया
जिन्दगी के पिछले पन्ने धुन्धले होते गये
फिर भी हम उन्हें नही भूले,
आगे के पन्ने वक्त देते नही
हमें पिछले पन्नों से सुकून मिलता है,
आज के पन्नों में
मन हल्का हल्का होता ही नही

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