विपिन चौधरी की रचनाएँ

उन ख़ाली दिनों के ना

जीवन की धीमी रफ़्तार गिरफ़्त में नहीं आ सकी थी
नामालूम सी गतिविधियाँ
बेबस परेशानियाँ ख़ुद हो गई थीं हलकान
मन के घुड़सवारों को नहीं मिला था ठीक से दाना-पानी
उन्हीं मन्द दिनों ने बैरागी बनने की प्रबल इच्छा जगाई
उदास दिनों में मन
ख़ुद-ब-ख़ुद हिमालय का मानचित्र उकेरने लगा


बेरौनक, साफ़ अहाते में बिना दुशाले के निकल आते
उन दिनों हम।
पिता के संरक्षण, माँ की ममता से महरूम
दिन, अपने हाल पर जीने के अनाथ से
प्रेम की नरमाई और असमंजस से कहीं
बिखरे-छितरे दूर तक पसरे से वे दिन

औने-पौने दिनों की फफून्दी से परे
रोज़ की गुत्थम-गुत्था
उधेड़-बुन से अलग
साफ़-सुथरे सुलझे
अलगनी पर टँगे

कपड़ों जैसे दिन फैले वे ख़ाली दिन

उन दिनों के सिरों पर टँगी रातों को सपने भी भूल गए थे अपनी राह
दुनिया और सपनों की साँझी रणनीति का पता उन्हीं दिनों चला
दुनियादारी की तरफ पीठ मोड़ कर जा बैठे, उन दिनों हम
सपनों और दुनियादारी के बीच था मगर कोई गुप्त समझौता

हर दस्तक को अनसुना करते
एकान्त हठयोगी से तने रहते
चिन्ताओं का कर दिया था हमने पिण्डदान
मेज़पोश-सी सीधी बिछी हुई प्रतीक्षा से समुचित दूरी बना
पी लेते हम ढलती गुलाबी शाम को भरपेट
सफ़ेद चादर के चारों कोनों को मज़बूती से गाँठ बाँध कर रहते सोए

पाषाण युग की निर्ममता पर साध निशाना
उन दिनों उड़ाया अपने पालतू सपनों को हमने बारी-बारी
यह देखने के लिए कि उनके नसीब में हैं कितना बड़ा आसमाँ
टपकता था इन सपनों का लहू
हमारी रूह के साफ़-सुथरे आँगन में
इनके फलित न होने का मलाल,
मलाल बन कर ही रह गया
जाते समय अपने पदचिन्ह छोड गए थे मगर ये ढीठ सपने

कुछ चुनने की बारी आई तब
कतारबद्ध दिनों की कभी न छोटी पड़ने वाली शृंखला में
हमने चुना इन्हीं बेजोड़ ख़ाली दिनों को
अब तक जिनका एक टुकड़ा भी हमने नहीं चबाया था
सर पर गमछा बाँधे वे दिन
गिलहरी की चपलता से देखते ही गुज़र जाते
गैस की गन्ध,
धमनियों मे उतरती और हम इन दिनों रहा करते निश्चिन्त
कोई और दिन होते तो मारे डर के
हमारी गठरी बँध गई होती
दिन थे मगर ये नायाब
इनके नज़दीक जा बैठने का सुख भी होता था अनचखा और सौंधा
दिनों के दर्ज करने की कवायद में
हमारे खाते में शोर मचाएँगे
यही प्यारे दिन

लोकतन्त्र का मान

कम्बल से एक आँख बाहर निकाल कर हम बाशिन्दों ने
इन सफ़ेद पाजामाधारी मदारियों के जमघट का तमाशा ख़ूब देखा
सावधानी से छोटे-छोटे क़दमो से ये नट उछल-कूद का अद्भुत तमाशा दिखाते
इनके मज़ेदार तमाशे का लुत्फ़ उठाकर घर की राह पकड़ते
यह सिलसिला पूरे पाँच साल तक चलता

इसी बीच कुछ कमाल के जादूगरों से हमारा साक्षात्कार हुआ
पचपन मे पढ़े मुहावरों को सिद्ध होते हुए हमने इन्हीं से सीखा
इन जादूगरों को टेढ़ी उँगली से घी निकालना आता है
पलक झपकते ही मेज़ के नीचे से अदला-बदली करना इनकें बाएँ हाथ का खेल है
पल भर में ये लोग आँखे फेरना जानते है
इनकी झोली मे ढेरों रँग मौजूद हैं
हर बार नए रँग की चमड़ी ओढ़े हुए मिलते ये जादूगर
भीतर से लीपा-पोती कर पाक-साफ़ हो बाहर खुले आँगन मे निकल आते
चेहरा आम आदमी का चस्पा कर
ख़ास बनने की फ़िराक में लगे रहते
आँखों के काम
कानों से करने की कोशिश करते
झूठ को सच की चाशनी में डुबा कर चहकते
आज़ादी को धोते, बिछाते, निचोड़कर उसके चारों कोनों को दाँतों में दबा
ऊँची तान ले सो जाते

हम उनके जगने का इन्तज़ार करते भारी आँखों से ताकते
एक टाँग पर खड़े रहते
धीरे-धीरे फिर हम इनके राज़दार हो चले
और न चाहते हुए भी कसूरवार बन गए
इस बीच हमारे कई यार-दोस्त इनकी बनाई योजनाओं के तले ढहे, दबे, और कुचले गए

इधर हम अपने हिडिम्बा प्रयासों में ही उलझे रहे
आख़िरी सल्तनत की क़सम खाते हुऐ हमनें यह स्वीकार किया
कि हमें भी लालच इसी लाल कुर्सी का था
पर यह सब हमनें लोकतन्त्र का मान रखते हुए किया
हमें गुनाहगार हरगिज़ न समझा जाए।

प्रथम पुरूष यानी सिर्फ ‘मैं’

जीवन की तमाम ठोकरें
‘प्रथम पुरूष’ के आवृत में रहकर खाने के बावजूद
इससे बाहर निकलने की ज़हमत हमने कभी नहीं उठाई
निपट नौसिखिए की तरह प्रेम मे डूबे
रिश्तों की नुकीले शाखाओं के घायल हुए
सब कुछ देखते रहे दरीचों से
परखने की कोशिश करते रहे पर प्रथम पुरुष की चौहद्दी से एक बार भी ओझल नहीं हुए
घोर स्वार्थी बन नज़रे जमाए रखीं
ख़ुद पर ही

अपने आप को मर्यादा पुरूषोतम बनने का उद्‍घोष यहीं से जारी हुआ
प्रथम पुरूष की इस बानी में कुछ बेवकूफ़ लोगों को मोहित करने में हुए कामयाब
दोस्त बनकर पीठ पर वार करना
बाहर-भीतर, भीतर-बाहर आने-जाने में
कितनी मुस्तैदी होनी चाहिए
सीखा यहींं से

कई ख़ानों मे अपना किया बँटवारा
कब दुबके रहना
कब दिखानी है अपनी मक्कारी
कब करने हैं अपने दाँत और नाख़ून तेज़
कब साधु का बाना ओढ़ घर के अन्धेरे कोने में लेनी है शरण
कैसे करनी है एक साथ डाकूपन की खुजली और ओम शान्ति का जाप

घण्टा और घड़ियाल दोनों को कब और किसके कानों के पर्दों पर दस्तक की तरह बजाना है
कब बेहद मामूली बन कर दिखाई देना है
यह लम्बा-चौडा गणित प्रथम पुरुष के बाने मे रहकर ही अर्जित किया
यहाँ प्रथम पुरुष के आवरण मे कई सुविधाएँ एक साथ भोगने का कुटिल सुख था तभी
कई नेक आत्माओ के समझाने के बावजूद
अन्ततः हमने प्रथम पुरूष के घेरे में ही जीना स्वीकार किया

सिम्फ़नी 

क्या कहा
इस घोर कोलाहल के बीच स्वर संगति
किस मुँगेरीलाल से यह सपना उधार ले आए हो
अब ज़रा ठहर कर सुनो
तीन ताल में जीने को अभ्यस्त हम
सात सुरों की बात कम ही समझ पाते हैं

भीम पलासी यहाँ काफी ऊपर का मामला है
जो हमारे सिर को बिना छुऐ गुज़र जाता है
जब हम अपने होशोहवास से बाहर होते है
तो कई बेसुरे हमारे संगी-साथी होते हैं
जिनके बीच सुरों का काम घटता जाता है

शोभा गुरट, किशोरी अमोनकर, मधुप मुदगल की
बेमिसाल रचना हमें स्पन्दित न कर दे तो
जीना मरना बेकार है
इस पर विश्वास जताने वालो से हम समय रहते दूरी बना लेते हैं

हवा के ज़रिए जीवन में कँपकँपाहट ने कब प्रवेश किया
जीवन का कौन से भाग ऊपर-नीचें डोला
कौन सा भाग बिलकुल गहरी तली में बैठ गया
यह मालूम कब कर सके हम

आशु-रचना हमनें ही ईज़ाद की
लोकगीतों को पुराणों के चंगुल से हम ही लोगों ने आज़ाद किया
फिर भी संगीत से कोसो दूर ही रहे
किसी प्रस्तावना के लम्बे या छोटे से अन्तराल
के बीच एक भी सुर उतर सका
तुरही, बीन, तम्बूरे, जलतरँग से हमारा रोज़-रोज़
का सरोकारी नाता नहीं रहा था कभी

बस हमारे प्यार के पास सँगीत समझने की कुछ शक्ति थी
वह भी हमसे दूर चली गई
जब
हमनें सँगीत का अर्थ मन से नहीं कानों से लेना शुरू कर लिया और
विज्ञान की दिशा को हमनें एक दिशा में भेज दिया
मन को किसी दूसरी दिशा में
यह जानते हुए कि हर दिशा एक दूसरे से ठीक समान्तर है

ऐसे में स्वर-लहरियों की उठान के बीच
आधे-अधूरेपन से जीने वाले हम,
किसी सिम्फ़नी से संगत नहीं मिला पाते
स्वर की संगती हमसे नहीं बन पाती
हर क़दम पर हम पिछड जाते है
संगीत की मादकता के लिए
एक पुल पर कोमलता से चलना होता है
हम हर पुल की नींव को ढहाते चलने वाले
किसी शाप की शक़्ल में त्रस्त, लोथडे से, अभिशप्त।

लापता मन 

मन बहुत दूर तक उसके साथ चलता गया
फिर भूल गया
वापसी का रास्ता
 
अपने मन को यूँ
खुला रखने के लिए मुझे
आज तक मिलते हैं
ढेरों उलाहने
 
देखती हूँ जब उन प्रेमिल आँखों में
जिनमें दिखाई देता है
मेरे मन का वह बालसुलभ रूप
चल दिया था जब वह
बिना चप्पल पहने, पैदल ही
उसके क़दमों पर क़दम टिकाता हुआ
 
अपने भीतर के उस बेशक़ीमती हिस्से के लापता होने पर भी मैंने
कभी उसे ग़ुमशुदा नहीं माना
और न माना शिकारी उसे
बुना था जिसने कभी
इसी मन ख़ातिर
बेहद लुभावना जाल
 
फ़िलहाल मन
अभी भी लापता है
और शिकारी
ठीक मेरे बग़ल में

बंजर धरती /

ज़मीन के इस टुकड़े पर
अबकी बार
किसान नहीं रोपेगा
बाजरा, जवार, चावल और मूँग
न रबी की फ़सलें
यहाँ अपनी जड़ें पकड़ेंगी
 
इस बरस यह भूखण्ड
अपनी मनमर्ज़ी के लिए मुक्त है
अब यहाँ केचुएँ ज़मीन की कितनी ही परतों को खोद सकते हैं
और ज़मीन अपने सीने पर उन खरपतवारों को उगते
देख सकती है
जिन्हें हर बरस
किसान और उसका परिवार
दम लगाते हुए जड़ समेत उखाड़ देता है
 
इस बार यह ज़मीन
रोपेगी अपने मन की वह फ़सल
जिसकी चाहना को उसने अपने
गर्भ में कभी
अँकुरित किया था

हर सच दुख है

दिखाई देने वाली
हर सच्चाई
दुख है
  
जितने सच उतने ही दुख
 
गाँव से भाग
बम्बई की बदनाम बस्ती में पनाह लिए
एक छोटा बच्चा
नँगे पाँव बारिश में
चाय भरे गिलासों की ट्रे लिए जा रहा है
 
एकमात्र यही बिंम्ब ही
एकसाथ कितने दुखों को लेकर आया है
बदनाम बस्ती की झरोखोनुमा खिड़कियों वाली चालो से झाँकती
अर्धनग्न युवतियों के दुख
आवारा लड़कों द्वारा सताने के दुख के अलावा
सुबह लड़के के हाथों
गिलास टूट जाने के कारण
पगार से पैसा काट लिए जाने का दुख
 
चाय में गिलासों में गिरता
बारिश का गन्दला पानी
भी तो दुख ही है
 
लड़के के तलवे में अभी कुछ चुभने का सच भी
दुख के बिम्ब से बाहर नहीं
जिसे वह बहती सड़क के चलते
ट्रे नीचे रख,
निकाल भी नहीं सकता
पड़ोस की मंज़िल के सबसे ऊपरी माले से एक भड़वे ने लड़के को
भद्दी गाली दी है
नीचे खड़े दुकानदार ने उसे लड़खड़ाते देख
यह कह
उसके सिर पर चपत लगाई है,
“साले चाय में बारिश का पानी डाल कर पिलाएगा”
 
अब सच्चाई के इतने दुखों के वर्णन
का भार
नहीं ढो सकेगी
यह इकलौती कविता

उदासी

 

शान्त जीवन में उतरना
उसे भाता है
उतरी वह बहुत हौले से
और बनी रही यहीं
 
अब उसे कहीं नहीं जाना
कोई हड़बड़ी नहीं उसे
 
अब उससे बोलना-बतलाना है बहुत आसान
हो सकता है कल को वह बने
मेरी सबसे अच्छी सखी
 
ख़ुश हूँ कि इस बार पहले की तरह
स्वप्न में नहीं
उतरी है वह जीवन के ठीक बीचोंबीच
 
लाख चाहने पर भी
नहीं कह सकती उसे लौट जाने को
 
उदासी ने भी
कहाँ पूछा था
उतरने से पहले
मेरे पार्श्व में

प्रतिच्छाया

सफ़ेद चादर नीन्द की
उस पर झरते
हरे पत्तों से सपने
  
सपने मुझे
जीवन की आख़िरी तह तक
पहचानते हैं
जानते हैं वे
मेरी गुज़री उम्र के सभी
कच्चे-पक्के क़िस्से
 
बेर के लदे घने पेड़ को झकझोर कर
आँचल में बेरों को भर लेने के सपने
कई बार दिखाती है नीन्द
 
सपनों में
मेरी सीली आँखे,
नीन्द ने,
ली मेरी तरुणाई से
 
प्रेम में रपटने का क़िस्सा
सपनों ने दोहराया इतनी बार
कि अब वह
नींव का पत्थर बन चुका है
 
जीवन से कितने बिम्ब सींच लिए
नीन्द ने
और गूँथ लिया
उन्हें सपनों में
 
एक उम्र गुज़ार कर
मैंने भी जैसे सीखा है
नीन्द को
सफ़ेद चादर
और सपनों को
हरे पत्तों का
बिम्ब प्रदान करना

रीतन

बह जाता है
कितना ओज
उस चेहरे को निहारने में
एकटक
  
भीतर से भरा इनसान
कितना कुछ छोड़ आता है
उस दूसरे ठिकाने पर
 
खोजने लगता है फिर
उसी छोड़े हुए को
अपने सिरहाने
नहीं है जहाँ कुछ भी
आंसुओं की नमी के अलावा
 
हाँ, बचा हुआ है शायद वहाँ
भी थोड़ा
और अधिक ख़ालीपन
 
ख़ाली होना
इस विधि से
हर बार
और कहना ख़ुद से,
‘आजिज़ आई इस प्रेम से’
 
ख़ालीपन को भरते जाना
उदास नग़्मों से
और भी ख़ाली होने के लिए
 
काश जानती पहले
प्रेम रखता है अपने गर्भ में ऐसे कई सन्ताप
तब भी क्या रोक पाती
देखना
उस नायाब चेहरे को
यूँ
एकटक

टाण्ड पर चरखा

पुरानी चीज़ों ने समेट लिया अपना दाना-पानी
घूमना बन्द कर बना ली हम से दूरी
उनसे स्नेह बना रहा तब रही वे हाथों की दूरी पर
हाथों से छूटते ही सीधे गर्त की दिशा में चली
उनसे सिर्फ़ यादों को माँझने का काम ही लिया जा सका

इस ख़याल को और पुख़्ता बनाया,
अन्धेरे ओबरे में रखे
आँखों से दस ऊँगल की ऊँचाई पर रखे उस चरखे ने
ढेर सारे लकड़ी के पायों,जेली और घर की दूसरी ग़ैरज़रूरी हो चुकी चीज़ों के साथ

न जाने कैसा बदला लिया था हमने
पुरानी बेकाम की चीज़ों को
धूल के हवाले करके
बिना बदले का अहसास दिलवाए
आत्मा के हर कोण पर यादों की फाँसें चुभाकर
वे चीज़े भी लेती रही हमसे बदला

ज़्यादा दिनों तक जो चीज़ें हमारे जहन में अटकी रहीं
 जो धीरे-धीरे ना बुझने वाली प्यास में तबदील हो ही जाती हैं

तो चरखे की आँख में पानी था, जाले और ढेर सारी मकड़ियाँ
मगर अब भी वह बहुत कुछ याद दिला सकता था
उसने दिलाया भी,

गावँ के घर का लम्बा-चौड़ा आँगन, बीस बीघा खेत, झाड़ियाँ, बटोडे,
चक्की, बिलोना, आधा चाँद, लुका-छिपी,
मँगलू कुम्हार के हाथों बनी बाजरे की खिचड़ी जिससे बचपन का सबसे घना हिस्सा आबाद था
सूरज के देर से छिपने और जल्दी ढल जाने वाले और कभी उदास न होने वाले दिन
हँसी ठट्ठे के वे रँग जो अब तक नहीं छूट पाए है
जीवन के पक्केपन से हमारी यारी-दोस्ती नहीं हुई थी तब
उन दिनों हमारी नाक इतनी लम्बी नहीं थी जो गोबर की महक से टेढ़ी हो जाए
तब गाय और बछड़े का रिश्ते का नन्हा अंकुर कहीं भीतर पनप जाया करता था
जो दूध दुहते वक़्त और भी मुखर हो उठता था
उस आकर्षण में बँधे हम देर तक बछड़े को अपनी माँ का दूध पीने देते
और घरवालों की डाँट खाते, यह हर रोज़ का क्रम था
पँचायत की ज़मीन पर लगे बेरी के पेड़ों पर उछल-कूद दोहरा-तिहरा मज़ा दिया करती थी

आज की तरह चरखा हमें
चौंकाता नहीं था
मन हरा कर देता था
उस हरेपन की हरितिमा के घेरे में चक्की पर गेहूँ पीसती माँ और भी नज़दीक आ जाती थी
कढ़ावनी से मक्खन निकालती बुआ से लस्सी ले कर हम खेत-खलिहानों की ओर निकल पड़ते थे
पाईथागोरस की थ्योरम और ई० ऐम० सी० सकेवर का फ़ॉर्मूला याद करते-करते हम
अपने रिश्तेदारों की कूटनीतियाँ स्वाहा कर देते थे

चरखे के साथ ही माँ के वे दिन भी याद आए
जब वह अपने दुख को इतनी मुस्तैदी से रूई में लपेट कर सूत की शक़्ल दे दिया करती थी
कि हम लाख कोशिशों के बाद भी उसकी आँखो से आँसू का एक भी कतरा नहीं ढूँढ़ पाते थे
अब तो वह दुख तो इतना आगे निकल गया है कि उसे पहचान पाना मुमकिन नहीं
मुमकिन है तो बस जीवन और बीते वक़्त की जुगलबन्दी की वे यादें

चाह कर भी बचपन और आज की उम्र का फ़ासला गुल्ली डण्डे से पूरा नहीं किया जा सकता
ना ही चरखे को वही पुराना स्थान दिया जा सकता है
हमारी चेतना के ढेर सारे धागे चरखे से जुड़े होने के बावजूद
उसे नीचे उतारने के ख़याल से ही यह सोच कर कँपकँपाते हैं
कि कहाँ रखेगे इस चरखे को
पाँचवे माले के सौ गज के फ़्लैट में
नहीं कतई असम्भव नहीं

फिर से चरखा यहीं छूट जाता है
फिर कोई हम-सा ही अभागा
इस चरखे के ज़रिए यादों की धूल साफ़ करेगा
पर इसमें सन्देह है कि यादों की धार आज-सी ही तेज़ रह पाएगी।

रंगो की तयशुदा परिभाषा के विरुद्ध 

पीले रंग को ख़ुशी की प्रतिध्वनि के रूप में सुना था
पर क़दम- क़दम पर जीवन का अवसाद
पीले रँग का सहारा लेकर ही आँखों में उतारा
किसी के बारहा याद के पीलेपन ने आत्मा तक को
स्याह कर दिया
हर पुरानी चीज़ जो ख़ुशी का बायस बन गई थी
वह ही जब समय के साथ क़दमताल करती हुई पीली पड़ने लगी तो
यह फ़लसफ़ा भी हाथ से छूट गया

तब लगा की हर चीज़ को एक टैग लगा कर कोने में रख दिया जाता है
जो बिना किसी विशेषण के अधूरी मान ली जाती है
अपनी ही कालिमा से लिप्त अधूरा इनसान भी
बिना विशेषण के सामने की किसी अधूरी वस्तु के सामने आकर पलट आता है

नीले रँग की कहानी भी इसी तरह ही रही
इस रँग ने मुझे देर तक ख़ूब छला
मुझे अपने साथ लेकर
यह एक बार
पानी की ओर मुड़ा
दूसरी बार आकाश की ओर
और तीसरी बार मुझे अपने भीतर समटने की तैयारी में साँस लेता हुआ
दिखाई दिया

लाल रँग अपनी पवित्रता को साथ लेकर
इतिहास की लालिमा की तरह लपका फिर वापिस लौटा
लहूलुहान होकर

कुछ ही दूरी पर खड़ा केसरी रँग प्रत्यँचा पर चढ़ा
काँपा, कभी बेहिचक हो
माथे पर बिन्दु-सा सिमट गया
यह ठीक है कि भूरे रँग से मुझे कभी शिकायत नहीं रही
यही मेरे सबसे नज़दीक की
मिटटी में गुँधा हुआ है
अनुभव की रोशनाई में,
मैंने इसे धीमी आँच में देर तक पकाया
यह भूरा रँग कुछ-कुछ मेरी भूख से वाबस्ता रखता है शायद
तभी जैसी ही मेरे भीतर की हाँठी रीतने लगती है उसी समय मैं
दुनियादारी से बन्धन ढीले करके इसे पकाने में जुट जाती हूँ

बिस्मिल का गोल चेहरा और ख़ुदा की विभाजक अदाएँ 

रामप्रसाद और
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ में
ज़्यादा नहीं तो
इतना अन्तर तो है ही
कि मन्दिरों में माथा टेकने
और रेल-डकैती के बीच विभाजन किया जा सके

सान्ध्यकालीन वन्दना के मन्त्र उच्चारण
की मंगल ध्वनियों के बीच से
खड़खड़ाती हुई रेलगाड़ी
  
आप कुछ समझे कि नहीं

साफ़ स्लेट पर
सीधे-सीधे ‘बिस्मिल’ लिखने का साहस ख़ुदा भी
नहीं कर सकता था
तब उसे
धरती के बन्दों को धोखा देने का तुच्छ काम किया

ऐसी आडी-तिरछी गलतियाँ प्रभु
जान-बूझ कर करता आया था
ताकि उसकी जवाबदेही पर कोई आँच ना आए

समय आज भी गवाही दे सकता है कि
‘बागी’ पान सिंह तोमर बनाने के लिए
ख़ुदा को
‘खिलाडी पान सिंह’ का सहारा लेना पड़ा था

 जबकि उसे सबकी तयशुदा तकदीर अच्छे से मालूम है
वह जानता है कि रामप्रसाद की
‘सरफ़रोशी की तमन्नाओं’
को ग्रहण लगने से बचाने के लिए
मौलानाओं और पण्डितों से टकराना होगा
फ़कीरों की टोली से भिडना पड़ेगा

इसी तरह रामप्रसाद के हाथों
नम्बर आठ की रेलगाडी को काकोरी में लूटना ज़रूरी हो जाता है
क्योंकि रामप्रसाद बिस्मिल
‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत है’
के जुमले में
विश्वास करने वाली टोली में शामिल है

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
ख़ुदा की इस रियायत का इस्तेमाल
करते हुए अपनी तक़दीर को
फाँसी के फन्दे पर टिका कर
अट्टहास लगाता है
  
और ख़ुदा के संरक्षण में पले दूसरी तरह के लोग
बसन्ती चोले के तिलिस्म में अटके रह जाते हैं

वे ख़ुदा पर सन्देह नहीं कर सकते थे
सो इन दस्तावेज़ी घटनाओं को
चन्द सिरफिरो की नादान गुस्ताखियाँ समझ
कर वे अपनी-अपनी राह पकड़ने का
सस्ता और आसान काम करते आए हैं

हमारा डम्मी

किसी अलमस्त बेहोशी में हम नेक काम कर दिया करते हैं गाय को आटा
या काले कुते को दो सूखी-बासी रोटी डालने का बेजोड़ काम इसी तरह
धूप मे पेन बेचती लडकी से १० रुपए का पेन ख़रीद कर
हम समाज के प्रति अपना उतरदायित्व निभाते आए थे

हम अपने आप मे कम अजूबे नहीं हैं
पर एक सामान्य आदमी की काया की सीमा मे बँधे
हम बौने हो गए हैं
दुनिया का बड़ा से बड़ा अजायबखाना हमे जगह दे कर धन्य हो जाता

हमें दुनिया की राहों पर खुला छोड़ दिया गया
किसी चमत्कारिक काम को अंजाम देने के लिए
पर हम हारे हुए शतरंज के खिलाड़ी ही साबित हुए
सुबह नहा-धो कर तरोताज़ा हो दफ़्तर जाते
शाम को मँह लटकाए महंगाई को ग़ाली देते हुए
गाल बजाते हुए घर लौट आते

हमारे इस संकीर्ण टाइम-टेबल से ख़ुदा सबक ले तो बेहतर हो
सम्भव है कि वह मनुष्य पर एकतरफ़ा तरस खाते हुए
आगे से मनुष्यता के लिए निर्धारित समय-सारिणी भी भेजे
हम बँधी-बँधाई रूढ़िगत चीज़ों के घोर आदि हैं

यह अलग बात है कि हमे होश आने से पहले बेड़ियों मे बाँध दिया गया था
हम दुबारा इस्तेमाल न आ सकने वाली प्लास्टिक की थैली की तरह थे
हमारे बन्धुओं की योग्यता को सींच कर ऊँचे लोगों ने अपने-अपने घड़े भर लिए
पर हम मिटटी के माधो ही बने रहे

हमारा “यूज एंड थ्रो” के संशाधन में सिमट
कूड़े के ढेर पर फैंका जाना लगभग तय था
हम बेमौत मारे जाने वाले थे
फिर भी हम थे
और थे
और हैं
और रहेंगे
अपनी अरबों-खरबों की जनसँख्या में महफूज़

अपनी एकता के बलिहारी 

तुम्हारी भूख और मेरी प्यास एक नहीं थी
फिर भी एक ही सिक्के की उलट-पलट थे हम
चाहे किसी भी कोण से दिखें
हमें एक जैसा ही दिखना था

भिन्डी, तोरी, प्याज़, मोटर-कार, चप्पल उसी सहज भाव से ख़रीदने थे
जिस सहज भाव से हम मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के दरों पर सजदा करते आए थे
हमे स्वतन्त्र देश के ग़ुलाम नागरिकों की तरह झूठी एकता मे बँधे नज़र आना था
वैमनस्य के सूक्ष्मतर कीटाणुओं को अपने भीतर किसी सुरक्षित तल मे छुपाते हुए

हमारे जबडे को इस कदर बन्द कर दिया गया कि हम
इधर-उधर मुँह न मार सके
उस पर सड़ी-गली धारणाएँ हमारे भीतर उड़ेल दी गईं
ताकि हर वक़्त हम सिर हिलाते हुए जुगाली करते रहें

यही हाल हमारे रिश्तों का था
हमारे ऊपर एक औरत को बिठा दिया गया था
जो हमें घर-गृहस्थी के कायदे-क़ानून सिखाती थी
और जो पुरुष था वह
अपने पुरुषत्व से ही इतना परेशान था
कि यही परेशानी उसके आस-पास को जला डालती थी

हम सबके घर-बार थे
फिर भी हमे बाहर का रास्ता अज़ीज़ था
जब हम घर में होते तो
बाहर की रंगरेजी ख़ुशियाँ खिडकियों, रोशनदानो से छन-छन कर आती थी
और जब हम उनकी उत्पति के नज़दीक जाते तो वे मायावी चीज़े
बिना विस्फोट के अन्तर्ध्यान हो जाती

कई बार अपने-आप की चौकीदारी करते-करते
परेशान और बेकाबू हो
दूसरे घरों के दरवाज़े खटखटाते हुए पाए गए
जिन पर हमारा अधिकार नहीं था उन्हे अपने अधिकार के घेरे में लाने
के जोख़िम में हमने अपना ख़ून-पसीना एक कर दिया
पर बात तब भी नहीं बनती दिखाई पडी
तब हम बनैले पशु में तब्दील हो गए

दिन-रात हम अपने आप से लड़ते जाते
और लहूलुहान होते जाते
भारी तादाद में असलहा-.बारूद इकट्ठा हो चला था हमारे भीतर
उसकी कालिमा की प्रतिछाया को हर रोज़ हम अपने आईने में स्पष्ट देखते

अपने हमशक़्ल को हम हमेशा अपने बगल में दबाए रहते
यह ऐसा सुविधा का रास्ता था जो किसी क़िताब मे दर्ज होने से छूट गया था
इस आविष्कार पर हमारा अपना पेटेण्ट था
आवश्यकता आविष्कार की जननी है
तो हमें आवश्यकता की इसी शह पर
अपने लिए इस आविष्कार को अंजाम दिया

जिसने कल अदालत मे झूठा बयान दिया
और कल जो नायक से खलनायक बना था
वह भी किसी हमशक़्ल का ही कारनामा था
नकली हमशक़्ल आदमी तो बार मे नशे में टुन्न रह ऐश काटता और
जो ख़ालिस था वह अपनी टूटी रबर की चप्पल से साइकिल पर पैडल मार
कोसों मील का सफ़र तय कर
कारख़ाने की ९ से ५ की समय-सारिणी मे खटता आया था ।

 

एक साथ तीनों 

प्रेम
आत्मा का झीना वस्त्र है
ख़ुशबू
हवा का मीठा परिचय है
सिरफिरी कन्या-सी हवा
सिर के काढ़े हुये बालो को
मोरपंखी मुकुट बना कर खिलखिलाती है
जीवन
वह बैचनी है
जो दोपहर के भोजन के बाद
एक मीठे पान की तलाश में भटक रही है
प्रेम, ख़ुशबू और जीवन
तीनों एक साथ
पार्क की बैंच पर एक साथ बैठते हैं
तो एक लापता दुनिया का पता मिलता है

पुकार 

दूर से आती एक पुकार
बिना किसी काट-छाँट के मेरे पास पहुँचती है
दोनों हाथों से उसे थामते हुए
सफ़ेद-मुलायम खरगोश-सा भान होता है
इस बेशक़ीमती पुकार के लिए मेरे पास
कोमल सिरहाने की टेक है
और एक मधुर ग़ज़ल
दूर से आई हुई इस पुकार को
प्रेम की पहली नज़र की
तरह देख रही हूँ

फिर से मिलने के लिए

उसने बाज़ दफ़ा कहा
अब हम नहीं मिलेंगे
हम दुबारा मिले
फिर कभी न मिलने की
हिम्मत जुटाते हुए
यह
पुराने जीवन को
नए सिरे से जीने जैसा था
जीवन में हर बार एक नई गाँठ बाँध
उसे खोल देना
ख़ुद के एक वाजिब हिस्से को जानबूझ कर गुमा देना
फिर उसे ढूँढ़ने की जुगत लगाना
यही दुनिया है
प्रेम की
उसकी पैरेहन की
उसकी छोटी ख़ुशियाँ
और बड़े दुखों की

एकान्त 

एकान्त मेरा पल्लू पकड़ कर
इस कमरे में जम गया है
अब यहीं पर बैठे-बैठे ही
मुझे देखना होगा
कोहरे से लदी-फदी उदास सर्द शामों का ऊँचा शामियाना
दिन की फड़कती नब्ज़
को अपनी पलकों से थामना होगा
आलथी-पालथी बैठे हुए
कल्पनाओं के तीरों को
यहाँ-वहाँ छोड़ना होगा
मछली की तरह खुली आँखों
से रात के सारे पहरों को पार करना होगा
तारों की आपसी टकराहटों को
उसी चुप्पी की गरिमा से महसूसना होगा
अपने भीतर की अरबों-खरबों
कोशिकाओं के बँटवारे को महसूस करती हूँ
जैसे
चुपचाप अकेले-एकान्त में

 

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