विपिन सुनेजा शायक़ की रचनाएँ

झड़ गए पत्ते सभी

झड़ गये पत्ते सभी फिर भी हवा चलती रही
पात्र ख़ुद तो चल बसे उनकी कथा चलती रही

मंज़िलों से और आगे भी थी मंज़िल एक और
रास्ते सब रुक गये तो इक दिशा चलती रही

जिस तरह से भी हुआ तय हो गया मेरा सफ़र
इक जगह बैठा रहा मैं और धरा चलती रही

बच नहीं सकता था मैं, था रोग मेरा लाइलाज
सबको यह मालूम था फिर भी दवा चलती रही

कोई पर्वत ही न था जो रोक लेता रास्ता
रेत प्यासी मर गयी, ऊपर घटा चलती रही

एक मुट्ठी कामना की, एक चुटकी आस की
हम ग़रीबों की यूँ ही आजीविका चलती रही

इक घर बना लेते जहाँ

इक घर बना लेते जहाँ, ऐसा नगर कोई न था
हम उम्र भर चलते रहे और हमसफ़र कोई न था

हमको सदा उस पार से आवाज़ सी आती रही
जब फ़ासिले तय कर लिए देखा उधर कोई न था

पत्थर को माना देवता लेकिन वो पत्थर ही रहा
हम गिड़गिड़ाते ही रहे उस पर असर कोई न था

ख़ुशफ़हमियों में हमने कितना वक़्त ज़ाया कर दिया
ज़िन्दा रहे किसके लिए अपना अगर कोई न था

हमको हमारे बाद कोई याद करता किसलिए
कुछ शे’र कहने के सिवा हममें हुनर कोई न था

कहानियाँ जब नयी लिखो

कहानियाँ जब नयी लिखो तो
कहीं मेरा भी बयान लिखना

बग़ावतों में था मैं भी शामिल
मुझे भी थोड़ा महान लिखना

हुआ हूं पिंजरे में बन्द लेकिन
मेरा सफ़र तो रुका नहीं है

मैं अपने पर फड़फड़ा रहा हूं
इसी को मेरी उड़ान लिखना

चले हुए रास्तों पे चल कर
पहुंच भी जाऊं तो क्या करूँगा

कठिन सही, पर है लक्ष्य मेरा,
नया कोई संविधान लिखना

मैं जानता हूँ ये सारे टीले,
ये सारे पर्वत मेरे लिए हैं

बस इतना करना कि मेरे रस्ते
के अंत में इक ढलान लिखना

जो मेरे हाथों पे लिख चुके हो
मैं उसके बारे में तो कहूँ क्या

न देना माथे को कोई रेखा,
कभी न इस पर थकान लिखना

दिल धड़कते हैं अभी

दिल धड़कते हैं अभी पर भावनाएँ मर गयीं
वेदनाएँ बढ़ गयीं, संवेदनाएँ मर गयीं

देह की चादर को ताने सो रही हर आत्मा
ज्ञान बेसुध सा पड़ा है, चेतनाएँ मर गयीं

एक भी नायक नज़र आता नहीं इस भीड़ में
क्रान्ति होने की सभी संभावनाएँ मर गयीं

जंगलों पर दिन-दहाड़े चल रहीं कुल्हाड़ियाँ
सिंह बैठे हैं दुबक कर, गर्जनाएँ मर गयीं

कामना उनको ही पाने की न जब पूरी हुई
अब नहीं कुछ माँगना, सब कामनाएँ मर गयीं

कहीं चाँद जाल में फँस गया

कहीं चाँद जाल में फँस गया,
कहीं चाँदनी हुई बंदिनी
कोई भोर का तो पता करो
कि रुकी-रुकी सी है यामिनी

न किसी की आँख में नींद है
न किसी के दिल में उमीद है
यहाँ हर कोई है डरा हुआ
ये है रात या है पिशाचिनी

किसी शाप का है असर कि कुछ
न सुनाई दे न दिखाई दे
कहीं भूख से शिशु रो रहा
कहीं बिक रही कोई कामिनी

न तो चूड़ियों में उमंग है
न सिंदूर में कोई रंग है
न वो प्रेम है न वो रूप है
न सुहाग है न सुहागिनी

वो मधुर-मधुर से जो गीत थे
कहीं शोर में सभी खो गए
न वो स्वर रहे न वो साज़ हैं
न वो राग है न वो रागिनी

यहाँ सभी है डरे-डरे से

यहाँ सभी हैं डरे- डरे से
दिये हों जैसे बुझे-बुझे से

सफ़र अभी तो शुरू हुआ है
हैं क्यों मुसाफ़िर थके-थके से

बहार आने की है निशानी
हैं घाव मेरे हरे-हरे से

तुम आ रहे हो ये तय था लेकिन
ख़याल आए बुरे- बुरे से

उन्हीं के मैले हैं मन ज़ियादा
हैं जिन के चेहरे धुले-धुले से

वो चल दिए ख़त्म कर के रिश्ते
खड़े रहे हम ठगे-ठगे से

देखने में तो लुभाती है 

देखने में तो लुभाती है बनावट कितनी
किसको मालूम कि अन्दर है मिलावट कितनी

भुरभुरा खोखला है जिस को भी छू कर देखो
पहले हर चीज़ में होती थी कसावट कितनी

बढ़ती जाती है मकानों की ऊँचाई हर रोज़
यह न पूछो है मकीनों में गिरावट कितनी

काम तो कोई भी हालाँकि नहीं करने को
रात -दिन जिस्म में रहती है थकावट कितनी

मेरी हालत पे बहुत आप हँसा करते थे
देखिए है मेरी अर्थी में सजावट कितनी

बोलियाँ ही चुप रहीं तो 

बोलियाँ ही चुप रहीं तो चुप्पियाँ बोलेंगी क्या
खिंच गयी जिनकी ज़बां मजबूरियाँ बोलेंगी क्या

ख़ून होता देखने वाले ही जब बोले नहीं
लाख चीरो लाख जाँचो, अर्थियाँ बोलेंगी क्या

तुम कहाँ इन्साफ़ की उम्मीद ले कर आ गये
आदमी तो बोलते भी, कुर्सियाँ बोलेंगी क्या

किस समय पर्दा उठेगा, नाच होगा कौन सा
पूछना बेकार है, कठपुतलियाँ बोलेंगी क्या

मंच पर आओ सभी के सामने सच बोल दो
अब भी कुछ लोगों को भ्रम है लड़कियाँ बोलेंगी क्या

हमें उम्र भर इश्क़ करना

हमें उम्र भर इश्क़ करना न आया
किसी की अदाओं पे मरना न आया

कटा आए सर ही तुम्हारी गली में
कभी सर झुका कर गुज़रना न आया

तुम्हारी तरह हम कभी हो न पाए
हमें बात करके मुकरना न आया

मुक़द्दर को हमने कभी कुछ न समझा
मुक़द्दर से तकरार करना न आया

हमें तेज़ चलने की आदत नहीं थी
ज़रा देर तुमको ठहरना न आया

मैं ख़ुशबू हूं लेकिन गुलों में हूं पिन्हाँ
हवाओं में मुझको बिखरना न आया

हुआ शौक़ हम को बिगड़ने का “शायक़”
बिगड़ तो गए फिर सँवरना न आया

घाव ऐसे मिले हैं

घाव ऐसे मिले हैं मौसम से
और गहरा गये हैं मरहम से

आग बरसा रहा है फिर सावन
चल पड़ीं फिर हवाएँ पच्छम से

ख़ूब नुस्ख़ा बता गये तुम भी
रोग बढ़ने लगा है संयम से

मैंने जीवन को देर से जाना
मैं भी कुछ कम नहीं हूँ गौतम से

मेरी आँखों में मिल गयी आख़िर
जो नदी खो गयी थी संगम से

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