विवेक चतुर्वेदी की रचनाएँ

डोरी पर घर

आँगन में बंधी डोरी पर
सूख रहे हैं कपड़े
पुरुष की कमीज और पतलून
फैलाई गई है पूरी चैड़ाई में
सलवटों में सिमटकर
टंगी है औरत की साड़ी
लड़की के कुर्ते को
किनारे कर
चढ़ गई है लड़के की जींस
झुक गई है जिससे पूरी डोरी
उस बांस पर
जिससे बांधी गई है डोरी
लहरा रहे हैं पुरुष अंतःवस्त्र
पर दिखाई नहीं देते
महिला अंतःवस्त्र
वो जरूर छुपाए गए होंगे
तौलियों में।

पृथ्वी के साथ भी.

पुरुषों से भरा वह टेम्पो रुका
और कोने की खाली जगह में
सकुचा कर बैठ गई है एक स्त्री
सहसा… थम गऐ हैं
पुरुषों के बेलगाम बोल
सुथर गई है देहभाषा
एक अनकही सुगंध का सूत
रफू कर रहा है पाशविकता के छेद
अनुभूति दूब सी हरी हो चली है
कुछ ऐसा ही तो हुआ होगा
शुरु शुरु में
दहकती पृथ्वी के साथ भी।।

स्त्रियाँ घर लौटती हैं

स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
उड़ती हुई आकुल वेग से
काली चिड़ियों की पांत की तरह।

स्त्रियों का घर लौटना
पुरुषों का घर लौटना नहीं है,
पुरुष लौटते हैं बैठक में, फिर गुसलखाने में
फिर नींद के कमरे में
स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
वो एक साथ, आँगन से
चौके तक लौट आती है।

स्त्री बच्चे की भूख में
रोटी बनकर लौटती है
स्त्री लौटती है दाल-भात में,
टूटी खाट में,
जतन से लगाई मसहरी में,
वो आँगन की तुलसी और कनेर में लौट आती है।

स्त्री है… जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती
पत्नी, बहन, माँ या बेटी की तरह लौटती है
स्त्री है… जो बस रात की
नींद में नहीं लौट सकती
उसे सुबह की चिंताओं में भी
लौटना होता है।
स्त्री, चिड़िया सी लौटती है
और थोडी मिट्टी
रोज पंजों में भर लाती है
और छोड़ देती हैं आँगन में,
घर भी, एक बच्चा है स्त्री के लिए
जो रोज थोड़ा और बड़ा होता है।

लौटती है स्त्री, तो घास आँगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी,
कबेलू छप्पर के हो जाते हैं ज़रा और लाल
दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
महज स्त्री का घर लौटना नहीं है
धरती का अपनी धुरी पर लौटना है।।

स्त्री विमर्श 

मंच पर आभासी था
स्त्री विमर्श
वो वास्तविक था नेपथ्य में

विद्रूप हँसी की डोर से
खींचे जा रहे
लिप्सा और जुगुप्सा के
पर्दों के बीच
अतृप्त वासनाओं से
धूसर ग्रीन रूम के
उस विमर्श में थे
स्त्री के स्तन ही स्तन
फूले और माँसल
ओंठ थे,जाँघे थीं,नितम्ब थे
न था मस्तिष्क, न ह्रदय
न कविता लिखने को हाथ
न कंचनजंघा पर
चढने को पैर

वहाँ अदीब थे,आला हुक्मरान…थिंकर…
यूनिवर्सिटी के उस्ताद थे
पर सब थे बदजबान लौंडे
नंगे होने की उनमें गजब की होड़ थी
शराब में घोला जा
रहा था भीतर का कलुष
गर्म धुँए में तानी जा रही थी
स्त्री की देह…
वहाँ चर्चा बहुत वैश्विक थी
बड़ा था उसका फलक
उसमें खींची जा रही थी स्त्री
पहली और तीसरी दुनिया के देशों से
न्यूयॉर्क और पेरिस
नेपाल और भूटान
इजराइल और जापान

उस रात विमर्श में
स्त्री बस नग्न लेटी रही
न उसने धान कूटा
न पिलाया बच्चे को दूध
न वो ट्राम पकड़ने दौड़ी
न उसने हिलाया परखनली को
न सेंकी रोटी

रात तीसरे पहर उन सबने
अलगनी पर टँगे
अपने मुखौटे पहने
और चल दिए
वहाँ छूट गई
स्त्री सुबह तक
अपनी इयत्ता ढूँढती रही।।

ताले… रास्ता देखते हैं

चाबियों को याद करते हैं ताले
दरवाज़ों पर लटके हुए…
चाबियाँ घूम आती हैं
मोहल्ला, शहर या कभी-कभी पूरा देस
बीतता है दिन, हफ्ता, महीना या बरस
और ताले रास्ता देखते है।

कभी नहीं भी लौट पाती
कोई चाबी
वो जेब या बटुए के
चोर रास्तों से
निकल भागती है
रास्ते में गिर,
धूल में खो जाती है
या बस जाती है
अनजान जगहों पर।

तब कोई दूसरी चाबी
भेजी जाती है ताले के पास
उसी रूप की
पर ताले अपनी चाबी की
अस्ति (being) को पहचानते हैं

ताले धमकाए जाते हैं,
झिंझोड़े जाते हैं,
हुमसाए जाते हैं औजारों से,
वे मंजूर करते हैं मार खाना
दरकना फिर टूट जाना
पर दूसरी चाबी से नहीं खुलते।

लटके हुए तालों को कभी
बीत जाते हैं बरसों बरस
और वे पथरा जाते हैं
जब उनकी चाबी
आती है लौटकर
पहचान जाते हैं वे
खुलने के लिए भीतर से
कसमसाते हैं
पर नहीं खुल पाते,
फिर भीगते हैं बहुत देर
स्नेह की बूंदों में
और सहसा खुलते जाते हैं
उनके भीतरी किवाड़
चाबी रेंगती है उनकी देह में
और ताले खिलखिला उठते हैं।

ताले चाबियों के साथ
रहना चाहते हैं
वो हाथों से,
दरवाजे की कुंडी पकड़
लटके नहीं रहना चाहते
वे अकेलेपन और ऊब की दुनिया के बाहर
खुलना चाहते हैं
चाबियों को याद करते हैं ताले
वे रास्ता देखते हैं।

मीठी नीम

एक गंध ऐसी होती है
जो अंतर में बस जाती है
गुलाब सी नहीं
चंदन सी नहीं
ये तो हैं बहुत अभिजात
मीठी नीम सी होती है
तुम … ऐसी ही एक गंध हो।

स्कूल का री-यूनियन

वो सब लौटकर
अपने शहर आए, अपने स्कूल।
आए… फिर से बस गए मोहल्लों में
वो सब आए पोंछने
अपनी यादों की
सिलेट में जमी धूल
उनमें से एक लड़की
अपने पुराने घर पहुँची
जहाँ अब ध्वज की तरह
नहीं लहरा रहा था
उस के पिता का नाम
और कांक्रीट से बदल गया था
घर का नक्श
पर नहीं बदली थी अभी
मिट्टी के आँगन की तासीर
आँगन में चलते लड़की
सहसा रूक गई उस जगह
जहाँ बहुत बरस पहले
दफनाई गई थी
उसकी पालतु बिल्ली
उसे बरबस याद आए वो आँसू
जो ठंड की एक सुबह
बिल्ली को मरा देख निकले थे
उसने उन आँसुओं का जल किया
और सूखती तुलसी पर ढार दिया

उनमें से एक लड़का
सड़क पर पुरानी साइकिल ढूँढता रहा
जिसकी चेन वो चढाता था
वो साइकिल उसके बसंत की थी
उसे याद आया
चेन चढाकर हाथों में ग्रीस लगाए
वो आँखो से ही अच्छा… कहता था
और बिना कुछ कहे ही
उसका बसंत
बहुत दूर चला जाता था
उसने दूर जाते बसंत को याद किया
और सड़क पार करते
छोटे बच्चों के हाथ थाम लिये

वो सब आए और
उन्होंने चौक कर देखीं अट्टालिकाएँ
जो घरों की जगह
उग आँई थीं
उन्होंने शहर से गुजरती नदी को
सूखते देखा और उफ कहा
उन्होंने एक पुराना बरगद
अब भी हरा देखा और खुश हुए
उन्हें पुराना देव प्रतिमाओं को
देखकर विस्मय हुआ
कि बस इनके चेहरे हैं जो नहीं बदले
जिनके घरौंदे बचे थे अब भी
उनने पुरानी खिड़कियाँ और छज्जे देखे
उनको… किसी का इंतजार याद आया
उनकी आँख की कोरें भीग आईं
पर वो मुस्कुराऐ..
वो सब अपने स्कूल भी गए
और बूढ़े हो चले अपने
उस्तादों की झुर्रियों को छुआ
मर चुके चौकीदार को पूछा
और उसकी बेवा को इनाम बख्शा
वो सब चौराहों पर गए
भले बदलीं हों पर
उनने सब गलियाँ पहचानीं
वो गाते रहे,वो हँसे, वो रोए भी
उन्होंने बचपन का शहर देखा
उन्होंने फिर से आसमान में तारे देखे
और फिर
इतने सालों तक ओढ़े
नाम और पहचान को
मँहगे सूटकेसों में बंद किया
बेतरह… नंगे पैर धूल के मैदानों में भागे
अचानक उन्हें मालूम हुआ कि
आदमी पेड़ है
अपनी… जड़ों में रहता है।।

सुनो बाबू.

जो ये बूढ़ा मजदूर
तोड़ रहा दीवार
देखता हूँ
सुलगा रहा है तुम्हारी ही तरह बीड़ी
चमकते लौ में मूँछ के बाल
वैसी ही तो घनी झुर्रियाँ
पोपला मुँह

तुम्हारी ही तरह उसने
भीतरी भरोसे से देखा
जरा ठहरकर
और तोड़ कर रख दिया
हठी कांक्रीट

दोपहर…तुम्हारी ही तरह
देर तक हाथ से
मसलता रहा रोटी
पानी चुल्लु से पिया

धीर दिया तुम्हारी ही तरह
कि मैं हूँ तो सिरजेगा
सब काम ठीक…

अनायास मन पहुंच गया
उस कोठरी में
जहाँ तुम लेटे थे
मूँज की खाट में आखिरी रात
अँधेरे में गुम हो रही थी सांस
खिड़की से झाँक रही थी
एक काली बिल्ली

खड़े थे सब बोझिल सर झुकाए…
घुटी चुप चीर निकल पड़ी थी मेरी हूक
तो आँख खोल तुम कह उठे थे डपटकर
रोता क्यों है बे…मैं नहीं जाऊंगा कँही
और मूँद ली थी आँख…

बाबू…लगा आज
तुमने ठीक ही तो कहा था…
सुनो बाबू…

पिता की याद

भूखे होने पर भी
रात के खाने में
कितनी बार,
कटोरदान में आखिरी बची
एक रोटी
नहीं खाते थे पिता…
उस आखिरी रोटी को
कनखियों से देखते
और छोड़ देते हममें से
किसी के लिए
उस रोटी की अधूरी भूख
लेकर जिए पिता
वो भूख
अम्मा…तुझ पर
और हम पर कर्ज है।

अम्मा… पिता कभी न लाए
कनफूल तेरे लिए
न फुलगेंदा न गजरा
न कभी तुझे ले गए
मेला मदार
न पढ़ी कभी कोई गजल
पर चुपचाप अम्मा
तेरे जागने से पहले
भर लाते कुएँ से पानी
बुहार देते आँगन
काम में झुंझलाई अम्मा
तू जान भी न पाती
कि तूने नहीं दी
बुहारी आज।

पिता थोड़ी सी लाल मुरुम
रोज लाते
बिछाते घर के आस-पास
बनाते क्यारी
अँकुआते अम्मा…
तेरी पसंद के फूल।

पिता निपट प्रेम जीते रहे
बरसों बरस
पिता को जान ही
हमें मालूम हुआ
कि प्रेम ही है
परम मुक्ति का घोष
और यह अनायास उठता है
मुंडेर पर पीपल की तरह।

भोर…होने को है

एक उनींदी रात में
नन्ही बेटी के ठंडे पैर
अपने हाथों में रखकर
ऊष्म करता हूँ
और मेरी जीवन ऊर्जा
न जाने कैसे
विराट हो जाती है

मैं अनुभव करता हूँ
कि भोर मेरे ये हाथ
फैल जाएँगे
मै सूर्य से ऊष्मा लेकर पृथ्वी तक पहुँचाउंगा
पृथ्वी हो जाएगी एक छोटा अंडा
और मेरे हाथ
शतुरमुर्ग के परों से विशाल…
मैं सेऊँगा पृथ्वी को
और गोल पृथ्वी से निकल आएंगी असंख्य छोटी पृथ्वियाँ

पृथ्वियाँ … जिनमें हैं बस
जंगल,नदी,पहाड़ और चिड़ियाएँ
है आदमी भी,पर बस
अमलतास के फूल की तरह
कहीं कहीं
दानवीय मशीनें नहीं,
न कोई शस्त्र
पूरी पृथ्वी एक सी हरी
न भय,न भूख
न दिल्ली, न लाहौर
न चन्द्रमा पर जाने की हूक

औरत भी सोनजुही के फूल सी खिली
गहाती गेहूँ
धूप के आँगन में
नेह की आँच से सेंकती रोटी
खुले स्तनों से निश्चिंत
पिलाती बच्चे को दूध

बेटी के ठंडे पैरों को
मेरे हाथ की ऊष्मा
मिलने से वो सो चुकी है
और उसके सपनों के
हरे मैदान की बागुड़ को
फाँद कर
छोटी छोटी पृथ्वियाँ
दाखिल हो रही हैं खेलने
हालांकि आकाशगंगा में
घूमते कुछ नए हत्यारे
नन्ही पृथ्वियों को
घूरते आ खड़े हुए हैं
पर बेखबर नन्हीं पृथ्वियाँ
रंगीन फूल वाली
फ्राक पहने सितोलिया
खेल रही हैं
नन्ही बेटी इन्हें देखकर नींद में
मुस्कुरा रही है
भोर… होने को है ।।

दुनिया के लिए जरूरी है

बहुत सी खूबसूरत बातें
मिटती जा रही हैं दुनिया से
जैसे गौरैया
जैसे कुनकुनी धूप
जैसे बचपन
जैसे तारे
और जैसे एक आदमी, जो केवल आदमियत की जायदाद
के साथ जिंदा है।

और कुछ गैरजरूरी लोग न्योत लिए गए हैं
जीवन के ज्योनार में
जो बिछ गई पंगतों को कुचलते
पत्तलों को खींचते
भूख भूख चीखते
पूरी धरती को जीम रहे हैं।

सुनो … दुनिया के लिए जरूरी नहीं है मिसाइल
जरूरी नहीं है अंतरिक्ष की खूंटी पर
अपने अहम को टांगने के लिए भेजे गए उपग्रह
जरूरी नहीं हैं दानवों से चीखती मशीनें
हां … क्यों जरूरी है मंगल पर पानी की खोज ?

जरूरी है तो आदमी … नंगा और आदिम
हाड़-मांस का
रोने-धोने का
योग-वियोग का
शोक-अशोक का
एक निरा आदमी
जो धरती के नक्शे से गायब होता
जा रहा है
उसकी जगह उपज आई हैं
बहुत सी दूसरी प्रजातियां उसके जैसी
पर उनमें आदमी के बीज तो बिलकुल नहीं हैं।
इस दुनिया के लिए जरूरी हैं
पानी, पहाड़ और जंगल
जरूरी है हवा और उसमें नमी
कुनकुनी धूप, बचपन और
तारे … बहुत सारे … ।।

देखो… नर्मदा को देखो

अपनी कुशकाय देह से
पथरीली भूमि पर लेटी हुई है तपस्विनी
माँस, जो जल है क्षीण हुआ है
प्रस्तर खण्ड, जो अस्थियां हैं
दीख पड़ने लगी हैं

देह में विचरते मनुजों पशुओं को
अर्द्धउन्मीलित नेत्रों के
वात्सल्य से देखती है नर्मदा
नर्मदाष्टक और स्तुति पाठ के
घोर कोलाहल से
भग्न हो रहा है उसका ध्यान
उन्मादी आस्तिकों की पूजन समिधा में
उलझ गयी है केश राशि
अगर-धूम्र से म्लान हुआ जाता है शांत मुख

सीपियां, शंख, रेत जो मज्जाएँ हैं
खोद डाली गयी हैं
कोशिकाएं, मीन-कच्छप
दानवी यंत्रों से भयग्रस्त हो विदा हुई हैं

देवी की साधना के साक्षी होने
सुदूर देश से आते थे जो विहग
अब पथ भटक गये हैं

कूलों पर तपनिष्ठ वृक्ष
थे जो संरक्षक मुनि
अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए हैं
सूख रहे हैं
काष्ठागार में उनके शव

शांत तटों को अपनी उपस्थिति से
आक्रांत करते मठों से निस्तारित कलुष
कृष्णवर्णी कर रहा है नर्मदा की त्वचा
स्रोतस्विनी की गर्भ नाल से जुड़कर
बसे ग्राम नगरों के समवेत पातकों से
अंर्तधान होने को है यह यति
देखो … नर्मदा को देखो।।

Share