विशाखा विधु की रचनाएँ

तेरी बस्ती का मंज़र देखती हूँ 

तेरी बस्ती का मंजर देखती हूँ
तबाही आज घर-घर देखती हूँ।

बज़ाहिर मोम का पैकर है लेकिन
वो अंदर से है पत्थर देखती हूँ।

सितारे तोड़ना मुश्किल है लेकिन
मैं तितली को पकड़कर देखती हूँ।

जमाना याद रक्खेगा हमेशा
वतन पे आज मरकर देखती हूँ।

सितमगर का कसीदा लिख रहे हैं
यहां ऐसे सुखनवर देखती हूँ।

ओ टूटी नैय्या के मांझी

ओ टूटी नैय्या के माझी

मुझको नदिया पार करा दे
आज मिलने का वचन दिया है
मुझको मोहन से मिलवा दे
ओ टूटी नैय्या के माझी …..।

मै इस नदिया से कह दूंगी
थोडा हल्के बह लेगी ये
तू इस नैय्या से कह देना
जरा थपेड़े सह लेगी ये
फिर मन में आस जगाकर
तू नैय्या पार लगा दे
ओ टूटी नैय्या के माझी …।

आख़िरी ख़त

इक दिन
लिखूंगी मैं
मेरा आखिरी ख़त
जिसमें होगीं
कुछ माफ़ी
जो दे ना सकूंगी
मैं जीते जी
और हाँ
होगी इक इच्छा
कि..
तुम थाम लो आकर
मेरी ठंडी हथेली
और थामे ही रखो
उस लम्हे तक
जब तक मिट न जाए
मेरा ये मलाल
कि ..
तुमने भी
कह दिया था
कि छोड़ दिया है हाथ मेरा..
दे जाऊँगी वो सारी दुआएं
विरसे में
जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हें लगेंगी…।

तुम्हारे आने के बाद

ये बेगानापन
ये बेरुखी
ये साजिशें
ये तल्खियाँ
तुम ही रखो मन में
हमारे मन में
जगह बची ही कहाँ!
तुम्हारे आने के बाद …।

हे कृष्ण तुम सच में बदल गये 

हे कृष्ण!
तुम सच में बदल गये
नारीत्व का दोहन
देख लो तुम।

नहीं मिलने वाली
अब के तुमको
कोख कोई
देखना तुम
नहीं करने वाली
लाड़ तुमको
यशोदा कोई
देखना तुम
नहीं बनने वाली
कोई द्रौपदी
सखी तुम्हारी
देखना तुम
नहीं बंधेगी राखी
नहीं होगी
सुभद्रा कोई अब
देखना तुम
क्योंकि
तुम अब सिर्फ
देखते हो
निर्भया का कुचला जाना
और..
उस राक्षस का छूट जाना।

मैं बदल गई

मुझको पता है
तुम बहुत रोये थे
जब तुमको लगा
‘मैं बदल गई’
और पता है
मै कितना रोई
कि..
तुमको लगा
‘मैं बदल गई’….।

एक दिन कहा था उसने

सुना है उसका वादा है
क़यामत के रोज लौट आने का
हमेशा के लिए बंद होती
इन आँखों में समा जाने का
आयेगा तो पास मेरे पायेगा
महकते एहसास जो उसी की देन हैं
और थामे याद की चिंगारी
मिलेगी एक उम्मीद
और हाँ!
याद के धुएँ में
ये आँखें लाल नहीं सिर्फ गुलाबी होंगी
क्योंकि
गुलाबी रंग फबता है मुझ पर
एक दिन कहा था उसने…।

एक उम्मीद

एक उम्मीद है
एक चाय पीऊँगी कभी
तुम्हारे साथ
आराम कुर्सी पे झूलते
काँपते हाथों से
पकडाना कोई मुलायम सा बिस्कुट
और ..
एक मुस्कान दोनो के होठों पे।

आज फिर वही शॉल 

आज फिर वही शॉल
ओढ़े बैठी हूँ
जिसके किनारे से
पूछे थे तूने
अपने झूठे हाथ
और
याद है
लटकाए फिर रहा था
गले में तू मेरे इसी शॉल को
मेरी सारी ममता पर
हक़ का दावा करते
दूसरी बार भी…।

कान्हा आज तुम बहुत याद आए

कान्हा आज बहुत याद आए।
द्वापर में छोडा मथुरा गये
फिर आज रहे कर्तव्य निभाए
कान्हा आज बहुत याद आए।

तुम झलके नवनीत के भीतर
तुम ही दमके मिश्री के अन्दर
छाछ में भी गये मुस्काए
कान्हा आज बहुत याद आए।

युग बदला हम अब भी न बदले
है सच कि ममत्व कभी न बदले
समय भले कितना आजमाए
कान्हा आज बहुत याद आए।

कुछ भी तो नही मेरा क्या है
तुम पर हक तो देवकी का है
हर कोई मुझे ये समझाये
कान्हा आज बहुत याद आए।

तरक्की

लगता है खूब तरक्की पर हैं जनाब…
नई गाड़ी,नया घर
कई-कई नौकर -चाकर !!
मैडम जी भी
नई सी हो गयी हैं
ब्यूटी-पार्लर जाकर
पुराने सामान फेंक रही हैं
नये-नये मंगवाकर !
बस पुराने तो
बाबु जी और अम्मा बचे हैं
क्या रख पायेगा संगवाकर !

मेरे राम

मेरे राम..
अब बरस तो गये हो
पर ये जानते हो क्या
मेरे राम तुम !!!!!
तुमने जला दिया
मेरी नस्लों को मरने से पहले ही
ये फफोले…
तन पे नहीं मन पे पड़े
और सरकार नमक छिड़क रही
चंद सिक्कों का इन पे
इन फफोलों से पीड़ा नहीं
भूख फूटती है
बेटी के ब्याह की फिक्र फूटती है
जो आँखों से रिसती नहीं
बस आँखों में दिखती है
फिर इक क्षण आता है
मन होता है
कि… दिखा आऊं
अपना हाल तुम्हें
और इसी सोच में
इक रस्सी जो तुम तक जाए
उसके फंदे से लटक जाता हूँ
पीछे छोड जाता हूँ
कुछ अधूरी उम्मीदें
सिसकता बचपन
बेसहारा बुढ़ापा
कितना मुआवजा…
कितनी रकम ….
कर पायेगी भरपाई इनकी
ये तय करके
अब तुम ही बता दो ना मेरे राम…….।

लौट आ

पता है
कितनी थक गई हूँ
लौट आ
होंठों की मुस्कान भी नहीं छिपा पाती
मेरे माथे पर पड़ी सलवटें
तेरी फिक्र में….।
जैसे जाकर
लौटा नहीं रथ
ब्रज की धरा पर…।
जैसे छूट गयी
हरियल की लकड़ी
जैसे न आये हो राम
शबरी का सा इन्तज़ार
लौट आ..
बस लौट आ।

भूख

कूड़े के ढेर से
खाना बीनते
बच्चे को देखकर
मेरे मन से ‘छी ‘ तो निकला
परन्तु…. धिक्कार से भरा!
निश्चित ही मानवता के लिए
और…
खुद के मानव होने पर,
उसकी भूख ने व्याकुल कर दिया
मेरे मन को
सिहर उठी
यूँ तो जब भी घर में रोटी बनती
व्यर्थ ना जाने देती एक भी टुकड़ा
पर अब सोचती हूँ
इन व्यर्थ टुकड़ों ने ही कितनो का पेट भरा
व्यर्थ कहाँ हैं ये!!!!
अर्थ निकला इनका भी
जो है
मानवता के पतन को दर्शाता
वो पेट की भूख और…. ये कूड़े का ढेर
मानव और पशु के भेद को मिटाता
कुत्ते, गाय, सुअर और मानव
सभी एक जगह
और सभी का उदेश्य भी मात्र एक ही
“भूख मिटाना”
और सबको मिल भी जाता
धन्य है वो कूड़े का ढेर
धन्य है तू भाग्य-विधाता
एक बहुत बड़ा सत्य ये
मैंने जाना आज
कि ……
इस धरा पर नाममात्र भी व्यर्थ ना जाता।

Share