विश्वप्रकाश ‘कुसुम’ की रचनाएँ

आलू-गोभी!

दावत ने है मन ललचाया!
क्या लोगे तुम आलू-गोभी?
क्या खाओगे आलू-गोभी?
गोभी का है स्वाद बढ़ाया!
सबकी यही पुकार-आलू-गोभी
सब करते तकरार-आलू-गोभी!

जैसी गोभी वैसे आलू,
आलू का बन गया कचालू!
‘गोभी-गोभी’ हैं चिल्लाते,
गोभी की हैं धूम मचाते!
गोभी जैसे हो रसगुल्ला,
नरम-नरम खाते अबदुल्ला!

नहीं चाहिए हमें मिठाई,
आलू-गोभी दे दो भाई।

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