वीनस केसरी की रचनाएँ

इन्तिहा-ए-ज़ुल्म ये है, इन्तिहा कोई नहीं

इन्तिहा-ए-ज़ुल्म ये है, इन्तिहा कोई नहीं!
घुट गई है हर सदा या बोलता कोई नहीं?

बाद-ए- मुद्दत आइना देखा तो उसमें मैं न था,
जो दिखा, बोला वो मुझसे मैं तेरा कोई नहीं।

हर कोई अच्छे दिनों के ख़ाब में डूबा तो है,
पर बुरे दिन के मुक़ाबिल ख़ुद खड़ा कोई नहीं।

हम अगर चुप हैं तो हम भी बुज़दिलों में हैं शुमार,
हम अगर बोलें तो हम सा बेहया कोई नहीं।

बरगला रक्खा है हमने खुद को उस सच्चाई से,
अस्ल में दुनिया का जिससे वास्ता कोई नहीं

अपनी बाबत क्या है उनकी राय, फरमाते हैं जो,
राहजन चारों तरफ हैं रहनुमा कोई नहीं।

पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम

पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम।
आईना हैं, खुद में अब पत्थर भरे बैठे हैं हम।

हम अकेले ही सफ़र में चल पड़ें तो फ़िक्र क्या,
अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम।

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम।

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम।

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम।

सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है

सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है
वो बस मीठा ही मीठा बोलता है

समय के सुर में बोलेगा वो इक दिन
अभी तो उसका लहजा बोलता है

ये उसकी तिश्नगी है या तिज़ारत
वो मुझ जैसे को दरिया बोलता है

वो सब कुछ जानता है और फिर भी
अँधेरे को उजाला बोलता है

पुरानी बात है, सब जानते हैं
नया मुर्गा ही ज्यादा बोलता है

उसे खुद ही नहीं मालूम होता
नशे में मुझसे क्या क्या बोलता है

मेरी माँ आजकल खुश हैं इसी मे
अदब वालों में बेटा बोलता है

उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना

उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना।
झूठ को लेकिन दिखा सकता है ख़ंजर आइना।

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है,
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना।

गमज़दा हैं, खौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ,
कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना।

आइनों ने खुदकुशी कर ली ये चर्चा आम है,
जब ये जाना था की बन बैठे हैं पत्थर, आइना।

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया,
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना।

अपना अपना हौसला है, अपना अपना फ़ैसला,
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना।

आप खुश हैं, कि तिलमिलाए हम

आप खुश हैं, कि तिलमिलाए हम।
आपके कुछ तो काम आए हम।

खुद गलत, आपको ही माना सहीह,
जाने क्यों आपको न भाए हम।

आपके फैसले गलत कब थे,
और फिर, सब सगे, पराए हम।

दोस्तों ने भी कुछ कमी न रखी,
और खुद के भी हैं सताए हम।

हम पे इल्ज़ाम था मुहब्बत का,
पर खड़े क्यों थे सर झुकाए हम।

इल्मो-फन का लगा है इक बाज़ार,
लौटते हैं लुटे लुटाए हम।

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम।

नाम कम है, जियादा हैं बदनाम,
शाइरी तुझसे बाज़ आए हम।

पसे-आईना कोई है ‘वीनस’,
जिसको अब तक समझ न पाए हम।

खूब भटका है दर-ब-दर कोई

खूब भटका है दर-ब-दर कोई।
ले के लौटा है तब हुनर कोई।

अब पशेमां नहीं बशर कोई।
ख़ाक होगी नई सहर कोई।

हिचकियाँ बन्द ही नहीं होतीं,
सोचता होगा किस कदर कोई।

गमज़दा देखकर परिंदों को,
खुश कहाँ रह सका शज़र कोई।

धुंध ने ऐसी साजिशें रच दीं,
फिर न खिल पाई दोपहर कोई।

कोई खुशियों में खुश नहीं होता,
गम से रहता है बेखबर कोई।

पाँव को मंजिलों की कैद न दे,
बख्श दे मुझको फिर सफर कोई।

गम कि कुछ इन्तेहा नहीं होती,
फेर लेता है जब नज़र कोई।

सामने है तवील तन्हा सफर
मुन्तजिर है न मुन्तज़र कोई

बेहयाई की हद भी है ‘वीनस’,
तुझपे होता नहीं असर कोई।

अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये

अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये
शीशे के घर में लग रहे लोहे के फाटक देखिये

जो ढो चुके हैं इल्म की गठरी, अदब की बोरियां
वह आ रहे हैं मंच पर बन कर विदूषक देखिये

जिनके सहारे जीत ली हारी हुई सब बाजियां
उस सत्य के बदले हुए प्रारूप भ्रामक देखिये

जब आप नें रोका नहीं खुद को पतन की राह पर
तो इस गिरावट के नतीजे भी भयानक देखिये

इक उम्र जो गंदी सियासत से लड़ा, लड़ता रहा
वह पा के गद्दी खुद बना है क्रूर शासक देखिये

किसने कहा था क्या विमोचन के समय, सब याद है
पर खा रही हैं वह किताबें, कब से दीमक देखिये

जनता के सेवक थे जो कल तक, आज राजा हो गए
अब उनकी ताकत देखिये उनके समर्थक देखिये

वो मेरी शख्सियत पर छा गया तो

वो मेरी शख्सियत पर छा गया तो।
ये सपना है, मगर जो सच हुआ तो।

दिखा है झूठ में कुछ फ़ाइदा तो।
मगर मैं खुद से ही टकरा गया तो।

मुझे सच से मुहब्बत है, ये सच है,
पर उनका झूठ भी अच्छा लगा तो।

शराफत का तकाज़ा तो यही है,
रहें चुप सुन लिया कुछ अनकहा तो।

करूँगा मन्अ कैसे फिर उसे मैं,
दिया अपना जो उसने वास्ता तो।

रहीम इस बार तो ‘कुट्टी’ न होना,
अगर मैं राम से ‘मिल्ली’ हुआ तो।

रकीबों में वो गिनता है मुझे और,
गले भी लग गया मुझसे मिला तो।

वो रहमत कर रहे हैं सिर्फ मुझ पर,
कहीं दिल कहर ढाने का हुआ तो।

हमें बस शायरी का शौक है, पर,
यही इक शौक भारी पड़ गया तो।

वो मानेगा मेरी बातें, ये सच है,
करेगा दिल की ही ज़िद पर अड़ा तो।

जरूरत से जियादः टोकते हैं,
कोई दिखला गया गर आईना तो।

बने हो यूँ तो आतिशदान ‘वीनस’,
डरे भी हो धुँआ उठने लगा तो।

जाल सय्याद फिर से बिछाने लगे

जाल सय्याद फिर से बिछाने लगे
क्या परिंदे यहाँ आने जाने लगे

खेत के पार जब कारखाने लगे
गाँव के सारे बच्चे कमाने लगे

फिर से दहला गए शहर को चंद लोग
हुक्मरां फिर कबूतर उड़ाने लगे

वो जो इस पर अड़े थे कि सच ही कहो
मैंने सच कह दिया, तिलमिलाने लगे

वक्त की पोटली से हैं लम्हात गुम
होश अब भी तो मेरा ठिकाने लगे

चंद खुशियाँ जो मेहमां हुईं मेरे घर
रंजो गम कैसा तेवर दिखाने लगे

मेरे अशआर में जाने क्या बात थी
लोग तडपे, मगर मुस्कुराने लगे

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या

ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या
कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है
काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को
लूट लेंगे ये सायबान भी क्या

इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या

अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये बयान भी क्या

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या

ये कैसी पहचान बनाए बैठे हैं

ये कैसी पहचान बनाए बैठे हैं
गूंगे को सुल्तान बनाए बैठे हैं

मैडम बोलीं आज बनाएँगे सब घर
बच्चे हिन्दुस्तान बनाए बैठे हैं

आईनों पर क्या गुजरी, क्यों सब के सब,
पत्थर को भगवान बनाए बैठे हैं

धूप का चर्चा फिर संसद में गूंजा है
हम सब रौशनदान बनाए बैठे हैं

जंग न होगी तो होगा नुक्सान बहुत
हम कितना सामान बनाए बैठे हैं

वो चाहें तो कर लें खुद को और कठिन
हम खुद को आसान बनाए बैठे हैं

पल में तोला पल में माशा हैं कुछ लोग
महफ़िल को हैरान बनाए बैठे हैं

आप को सोचें दिल को फिर गुलज़ार करें
क्यों खुद को वीरान बनाए बैठे हैं

प्यास के मारों के संग ऐसा कोई धोका न हो

प्यास के मारों के संग ऐसा कोई धोका न हो
आपकी आँखों के जो दर्या था अब सहरा न हो

उनकी दिलजोई की खातिर मैं खिलौना हूँ जिसे
तोड़ दे कोई अगर तो कुछ उन्हें परवा न हो

आपका दिल है तो जैसा चाहिए कीजै सुलूक
परा ज़रा यह देखिए इसमें कोई रहता न हो

पत्थरों की ज़ात पर मैं कर रहा हूँ एतबार
अब मेरे जैसा भी कोई अक्ल का अँधा न हो

ज़िंदगी से खेलने वालों जरा यह कीजिए
ढूढिए ऐसा कोई जो आखिरश हारा न हो

चुप तो बैठे हैं हम मुरव्वत में

चुप तो बैठे हैं हम मुरव्वत में
जाएगी जान क्या शराफत में

किसको मालूम था कि ये होगा
खाएँगे चोट यूँ मुहब्बत में

पीटते हैं हम अपनी छाती क्यों
क्यों पड़े हैं हम उनकी आदत में

खून उगलूँ तो उनको चैन आए
आप पड़िए तो पड़िए हैरत में

बेहया हैं, सो साँसें लेते हैं
मर ही जाते तुम ऐसी सूरत में

अब नहीं आ रहा उधर से जवाब
लुत्फ़ अब आएगा शिकायत में

नाम उन तक पहुँच गया मेरा
अब तो रक्खा ही क्या है शुहरत में

ख़ाब में भी न सोच सकते थे
लिख के भेजा है उसने जो खत में

मैंने रोका था, ख़ाक माने आप
और पड़िए हमारी सुहबत में

जेह्न से वो नहीं उतरता है
हर घड़ी अब रहूँ इबादत में

ठोकरें खाऊंगा …बहुत अच्छा!
और क्या क्या लिखा है किस्मत में?

वो एक बार तबीअत से आजमाए मुझे

वो एक बार तबीअत से आजमाए मुझे
पुकारता भी रहे और नज़र न आए मुझे

मेरी अना के मुक़ाबिल नज़र जो आए मुझे
मैं डर रहा हूँ कहीं वो न हार जाए मुझे

मुझे समझने का दावा अगर है सच्चा तो
मैं उसको चाहता हूँ, अब ‘वही’ बताए मुझे

मनाने रूठने के खेल में तो तय ये था
मैं रूठ जाऊं, वो हर हाल में मनाए मुझे

वो मुफ्त में मुझे हासिल नहीं है, तो वो भी
मुहब्बतों के हवाले से ही कमाए मुझे

मैं सुब्हो शाम पढ़े हूँ उसे फ़साने सा
वो हर वरक पे मनाज़िर नए दिखाए मुझे

दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं

दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं
फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं

किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का
अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं

आरियाँ खुश थीं कि बस दो –चार दिन की बात है
सूखते पीपल पे फिर से पत्तियाँ आने लगीं

उम्र फिर गुज़रेगी शायद राम की वनवास में
दासियों के फेर में फिर रानियाँ आने लगीं

बीच दरिया में न जाने सानिहा क्या हो गया
साहिलों पर खुदकुशी को मछलियाँ आने लगीं

है हवस का दौर यह, इंसानियत है शर्मसार
आज हैवानों की ज़द में बच्चियाँ आने लगीं

यूँ शहादत पर सियासत का नया फैशन दिखा
शोक जतलाने को नीली बत्तियाँ आने लगीं

हमने सच को सच कहा था, और फिर ये भी हुआ
बौखला कर कुछ लबों पर गालियाँ आने लगीं

शाहज़ादों को स्वयंवर जीतने की क्या गरज़
जब अँधेरे मुंह महल में दासियाँ आने लगीं

आज कह के कल मुकर जाने को सब तय्यार हैं
शाइरों में भी सियासी खूबियाँ आने लगीं

उसने अपने ख़्वाब के किस्से सुनाये थे हमें
और हमारे ख़्वाब में भी तितलियाँ आने लगीं

परेशां है समंदर तिश्नगी से

परेशां है समंदर तिश्नगी से
मिलेगा क्या मगर इसको नदी से

अमीरे शहर उसका ख़ाब देखे
कमाया है जो हमने मुफलिसी से

पुराना मस्अला ये तीरगी का
कभी क्या हल भी होगा रोशनी से

यहीं तो खुद से खा जाता हूँ धोका
निभाना चाहता हूँ मैं सभी से

नदी वाला तिलिस्मी ख़्वाब टूटा
भरा बैठा हूँ अब मैं तिश्नगी से

भुला बैठे जो रस्ता उस गली का
गुज़रना हो गया किस किस गली से

खुशामद भर है जो महबूब की तो
मुझे आजिज समझिए शाइरी से

पुराना है मेरा लहज़ा यकीनन
मगर बरता है किस शाइस्तगी से

मुलाकातें हमारी, तिश्नगी से

मुलाकातें हमारी, तिश्नगी से
किसी दिन मर न जाएँ हम खुशी से

महब्बत यूँ मुझे है बतकही से
निभाए जा रहा हूँ खामुशी से

उन्हें कुछ काम शायद आ पड़ा है
तभी मिलते हैं मुझसे खुशदिली से

उजाला बांटने वालों के सदके
हमारी निभ रही है तीरगी से

ये कैसी बेखुदी है जिसमे मुझको
मिलाया जा रहा हैं अब मुझी से

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से

खबर से जी नहीं भरता हमारा
मजा आता है केवल सनसनी से

अना के वास्ते खुद से लड़ा मैं
तअल्लुक तोड़ बैठा हूँ सभी से

ये बेदारी, ये बेचैनी का आलम
मैं आजिज आ गया हूँ शाइरी से

जो ये जानूं, मुख़्तसर हक आप पर मेरा भी है

जो ये जानूं, मुख़्तसर हक आप पर मेरा भी है।
तब तो समझूं, मुन्तज़िर हूँ, मुन्तज़र मेरा भी है।

जिससे सब घबरा रहे हैं वो ही डर मेरा भी है।
शहर में दंगे की ज़द में एक घर मेरा भी है।

घरघराती आरियों में दब गई थी हर सदा,
कुछ कबूतर कह रहे थे,,, पर शज़र मेरा भी है।

आखिरश नंगी हकीकत से हुआ है सामना,
आइना खुश था कि पत्थर पे असर मेरा भी है।

आसमां वालों! मिलेगा जा-ब-जा तुमको जवाब,
तुम से टकराना पड़ा तो, बालोपर मेरा भी है।

इश्क में हद से गुज़र जाने को वो तय्यार हैं,
और ऐसा ही इरादा अब इधर मेरा भी है।

वक्त तो ये चाहता था, झुक के मैं उससे कहूँ,
“आसमां इक चाहिए मुझको कि सर मेरा भी है।”

रहगुज़र मंजिल हुई, अब मंजिलें हैं रहगुज़र,
वो जो सबका राहबर है राहबर मेरा भी है।

खुद को समझे बिन किसी को क्या समझ पाऊंगा मैं,
इसलिए अब खुद से खुद का इक सफ़र मेरा भी है।

रात गर हूँ

रात गर हूँ,
फिर सहर हूँ

हसरतों की,
रहगुज़र हूँ

मैं ही तेरा,
मुन्तज़र हूँ

सच कहा था,
दर -ब- दर हूँ

संग वालों,
फल शज़र हूँ

खुल के कह-सुन,
मोतबर हूँ

खुद में उलझा,
राहबर हूँ

हर समंदर पार करने का हुनर रखता है वो

हर समंदर पार करने का हुनर रखता है वो
फिर भी सहरा पर सफ़ीने का सफ़र रखता है वो

बादलों पर खाहिशों का एक घर रखता है वो,
और अपनी जेब में तितली के पर रखता है वो

हमसफ़र वो, रहगुज़र वो, कारवाँ, मंजिल वही,
और खुद में जाने कितने राहबर रखता है वो

चिलचिलाती धूप हो तो लगता है वो छाँव सा,
धुंध हो तो धूप वाली दोपहर रखता है वो

उससे मिल कर मेरे मन की तीरगी मिटती रही,
हर तिमिर पर सद्विचारों की सहर रखता है वो

जानता हूँ कह नहीं पाया कभी मैं हाले दिल,
पर मुझे मालूम है सारी खबर रखता है वो

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