वीरेंद्र गोयल की रचनाएँ

नाव में नदी

स्मृतियाँ लौटती हैं
बार-बार मृतकों की तरह
इस जमी बर्फ का क्या करें?
रोना हँसने जैसा लगे
हँसना रोने जैसा लगे
कब तक देखते रहेंगे
बहाते रहेंगे आँसू?
क्यों लौट जाना चाहते हैं
स्मृतियों के संसार में?
क्यों नहीं छोड़ना चाहते
बहती नदी में नाव?
हर बार चप्पू चलाये
क्या कहीं पहुँच पाये?
बस एक जिद है
इस पहेली को हल करने की
बार-बार एक्सरे देखता है
बीमारी कहाँ पकड़ में आती है
भावनाएँ तो भाप बन जाती हैं
बंजर धरती, खारा पानी
तुम फसल की आस लगाये हो
बहने दो,
बहने दो,
नाव को नदी में बहने दो
जहाँ भी, जैसे भी
बहती है बहने दो
अपने सामर्थ्य को
अपने पास ही रहने दो
नाव कहाँ सागर बन पायेगी
नदी जो उसमें समायेगी
एक कण,
जीवन क्षण-क्षण
जुगनू की रोशनी-सा
कितनी पीछे जा पाओगे
कितनी पीछे जा पाओगे
पृथ्वी गोल है
लौटोगे वहीं
जब तक परिक्रमा-पथ में हो
स्मृतियों में हो
निकल जाओ
छिटक जाओ
नष्ट कर दो सभी स्मृतियाँ
स्वतंत्र होने के लिए
मध्यम मार्ग कोई नहीं
जो घर फूँके आपना
चले कबीर के साथ।

तुम्हें याद करते हुए

ड्राइंगरूम,
पीछे का कमरा,
आगे का कमरा,
ऊपर, नीचे
कहाँ गये पिता?
पिता कहाँ गये?
एक बीमार बूढ़ा आदमी
कहाँ तक जा सकता है
बाहर पान की दुकान भी खाली
कहाँ बंद हुआ था
अभी तक धूम्रपान
वैधानिक चेतावनी के बावजूद
खिंचवायी थी फोटो
सिगरेट पीते हुए
बड़ी शान से
हर फिक्र को फिर भी
धुएँ में कहाँ उड़ा पाये
सहेजी हुई हैं अभी तक
अंधकार में स्मृतियाँ
तैयार तो था सामान
घर छोड़कर जाने के लिए
क्या कोई ले जा पाया है
कुछ साथ अपने
सबसे ऊपर की छत तक
चढ़ गया हाँफते-हाँफते
बैठे थे पिता
अपनी पुरानी कुर्सी पर
खरीदी थी जो सबसे पहले
घर बसाने के बाद
आज कुर्सी की तरह
निहारते उन सबको
छोड़ जाना होगा जिनको
जाने कब लौटकर आना हो
ना आना हो
किस समय, काल और पथ में
निश्चित है एक दिन मौत का
ईंट-पत्थरों का या देह का
आखिरी बार भर लें
अपने अंदर सब-कुछ
फिर जाने कब तक
कुछ देख नहीं पायेगा
अटकी है एक बूँद आत्मा
आँखों की कोरों में
गिरी कि अब गिरी
और धूल में मिली।

कब तक प्रार्थना

उमड़-घुमड़कर बहना ही चाहता है
टूटना ही चाहता है दरिया, आँसुओं का
कैसे अनदेखे करूँ
मदद के लिए उठे हाथ
कैसे बना रहूँ पत्थरदिल
लौट जाती हैं टकराकर सदाएँ
बाधा है समाज
दीवार है कानून
न मिआ सकते हैं
न तोड़ सकते हैं
कमजोर हाथ थोड़ा-सा हिला सकते हैं
उतना हिलाना उठाता नहीं तूफान
कि बना दे राह कठिनाई में
दीदार हो ममता का
छलककर रह जाता है हर बार दरिया
टूटेगा तो बाढ़ आयेगी
विनाश साथ लायेगी
जितनी देर सह लेता है अन्याय कोई
जितनी देर बर्दाश्त कर लेता है अत्याचार कोई
उतनी देर तक ही
बचा हुआ है ये समाज
बचा हुआ है वो खुद
परिवर्तन से
लौट जाते हैं फूल बीज में
बीज कहीं गहरे, धरती में
लौट जाती हैं ऋतुएँ
नरक-सा सन्नाटा
पसर जाता है चारांे ओर
बस अपना ही हृदय निचोड़ता है
खून अपना ही पीता है
रोशनी एक तीलीभर भी
अंधकार मिटा देती है
पर कौन जलायेगा?
किसके पास है आग
कि बाँटता फिरे द्वार-द्वार
मसीहाओं ने छोड़ दिया है आना
चमत्कार नहीं होते अब
खो गया है विश्वास कि इंसान है
बजा चुके बहुत घंटियाँ,
कर चुके बहुत आरती,
फल, फूल, चँवर नाकाफी हैं
उन कानों तक पहुँचने के लिए
इसलिए बमों का धमाका है
पहनाओ गोलियों, हथगोलों के हार
बिछाओ बारूदी सुरंगों का गलीचा लाल
जिंदाबाद, तुम्हारे चीथड़ों की,
जिंदाबाद, तुम्हारी थेगलियों की,
तुम्हारे मुँह से झरतीं,
छिपकलियों, मेंढकों की
कुछ भी तो लपका नहीं जा सकता
कोई दिलासा नहीं,
कोई आशा नहीं
बस खड़ा है तुम्हारे सामने
उम्मीद में सिर झुकाये
हाथों को माथे पर लगाये
कि कर दोगे अब तो मुक्त
इस दासता से,
कर दोगे मुक्त इस सजा से,
इस मोह-माया से,
इस गलीज जीवन से,
पर तुम तो बैठे हो
पत्थर की मूरत जैसे
समय आयेगा तो जागोगे
समय आयेगा तो उच्चारोगे
समय आयेगा तो होगा वो मुक्त
गिरेगा पककर
समय आयेगा तो सड़ेगा
फिर इस प्रार्थना का क्या?
क्यों हर बार
ये टकराकर लौट आती है?
प्रार्थी को उसकी ही प्रतिध्वनि सुनाती है
आखिर कब तक चलती रहेगी प्रार्थना
या हो जायेंगे बुत
योंही तुम्हारे द्वार खड़े-खड़े।

बेसुरा बेस्वाद

लौटती हूँ जब भी
एक कोल्हू को छोड़कर
दूसरे कोल्हू में
अकसर झेलती हूँ प्रश्न
कहो, कैसी रही यात्रा?
धरा घूमती है अपने पथ पर
क्यो कोई यात्रा होती है?
क्या महसूसती है मौसम?
या नजर का फरेब है
वही रोज की सीढ़ियाँ
वही उड़ते पन्ने
धूप सेंकते ठिठुरते चेहरे
खोमचों पर खड़ी मक्खियाँ
शाम ढलते ही
चल देते हैं बैग, स्कूटर, गाड़ियाँ
कोई हँसी नहीं
कोई आह्लाद नहीं
पक चुकी हैं संवेदनाएँ
इन बेसुरे दिनों से
थक चुकी हैं भावनाएँ
इन बेस्वाद रातों से
क्या परिपक्व होना होता है
मृत्यु के लिए?
फिर बनना बीज
बनना वृक्ष दोबारा
यही है बस यात्रा
जाना और लौटना
लौट के फिर जाना
कोई विश्राम नहीं
ये घड़ी की टिक-टिक कब रुकेगी?
ये धरा अपने पथ से कब गिरेगी?
ताकि कोई और नया आलाप हो
ताकि असाध्य वीणा सध सके।

चिरनिद्रा

दोपहर को अलसाते हुए
खुशी देता है सोना
रात्रि को थकाते हुए
खुशी देता है सोना
रोशनियों के पंडाल में
खुशी देता है सोना
आँखों में झिलमिलाते हुए
खुशी देता है सोना
हाथ में पहने सोने को
रगड़-रगड़कर चमकाते हुए
खुशी देता है सोना
अपनी हैसियत
सामने वाले को जताते हुए
खुशी देता है सोना
अनिद्रा के कैदी को
खुशी देता है सोना
थक चुके हो जब
चलकर जीवनभर
हाथ उठे हों दुआ में
खुशी देता है सोना

धरती कैसे हाँफ रही है

तोड़ते रहे उद्दण्डता से
वृक्ष, झाडियाँ, पौधे
कितना चिल्लाते होंगे दर्द से
अपनी गर्दन पर जरा-सा बोझ
पिलपिला देता है
धरा तो कितना ही उठाती है
जरा-सी चीर-फाड़ करवानी हो
तो पहले बेहोश होता है
पर बाहोश खोदता है, काटता है
कभी सुन नहीं पाया
दर्द से भरी चिल्लाहटें
कभी महसूस नहीं कर पाया
बोझ से काँपतीं लहरें
कैसे हाँफ-हाँफ के चलती है
धरा क्या शिकायत करती है
सोचो, तुम धरा हो
सोचो, कोई तुम्हारे ऊपर
गंदगी फेंक रहा है
किसी ने टनांे कूड़ा
तुम्हारे ऊपर डाल दिया है
सोचो, कोई तुम्हारा गला काट रहा है
सोचो, कोई तुम्हारी छाती फाड़ रहा है
सोचो, कोई तुम्हारे ऊपर बोझ लाद रहा है
कितनी अट्टालिकायें, टॉवर, मशीनें, पुल
कहाँ तक चल पाओगे,
कितनी दूर तक
धड़धड़ातीं रेलगाडियाँ
चीखते-चिल्लाते विमान
ये लगातार बढ़ती जनसंख्या
कितना ढो पाओगे
सोचो, तुम्हारी शिराओं में
कोई बारूदी सुरंग लगा दे
चेरनेबिल से लेकर हिरोशिमा और नागासाकी तक
कहाँ-कहाँ नहीं फैलाया जहर
किस-किस की नहीं कीं दूषित साँसें
इतना कचरा लेकर
क्या बारिश दे सकते हो?
क्या बसंत दे सकते हो?
कया कोई फूल बना सकते हो?
क्या कोई फूल खिला सकते हैं?
सोचो, इतना अपमानित होकर
क्या धारण कर सकते हो?
सोचो इतने परमाणु आघात सहकर
इतने विश्वयुद्ध झेलकर
फिर से खड़े हो सकते हो?
कहाँ से लाओगे इतनी सहनशीलता?
जरा-जरा-सी बात पर भड़क जाते हो
बंदूकें निकालते हो
गोलियाँ चलाते हो
बर्दाश्त नहीं तुम्हें
गैर धर्म, गैर आचार-विचार
अपनी विचारधारा फैलाने को
छल-बल-आतंक अपनाते हो
धरा क्या कहती है?
देगी जगह किसी एक जाति को
किसी एक धर्म को, विचार को
अगर नहीं हो सकते धरा
तो बने रहो जरा
यानी मक्खी, मच्छर
क्षणभर का जीवन
इतने में आसमान को सीढ़ी न लगाओ
बहुत ऊँचा उड़ने को अपने पंख न फैलाओ
बहुत दूर जा सकते हो खयालो में
पर सामना करो यथार्थ के सवालों से
कोशिश करो बनने की इनसाँ
ना कि हैवाँ
बरतो कम-से-कम पानी, हवा और धरा
क्योंकि तुम कुछ भी बना नहीं सकते
खा-पी तो सकते हो कमा नहीं सकते
जितना भोगोगे कम
उतने हलके हो जाओगे
अफसोस न होगा अपने आने का
दुख न होगा अपने जाने का
ले चलेंगी हवाएँ हौले-से दुलारतीं
नदियाँ भी ले चलेंगी धीरे-से सँभालती।

सदियों से

धरा-सी विशाल कोख
नदियों, महासागरों से ज्यादा दूध
और प्रेम फैला हुआ
पाताल से आकाश तक
ब्रह्माण्ड से भी ज्यादा ममता
फिर भी औरतें रोती हैं
पोंछती हैं दूसरों के आँसू
कितने झीने हैं दुख
शायद हवा से भी ज्यादा
साँस लेने भर से ही जाते हैं हिल
करने लगते हैं घाव
रिसने लगता है आँसुओं-सा सफेद लहू
बदलता रहता है सागरों में
और महासागर, आँसुओं में
बढ़ गया है जल का तल
सदियों से रो रही हैं औरतें

बेसलान के बच्चे

बहता रहा खुले हाथों से पानी
और अनियंत्रित मूत्र
बह जाए या पी ले
नकाब के पीछे उदास चेहरा
झूलता संधि-रेखा पर
कूदे या न कूदे
हिरोशिमा! तुम दुख का शाश्वत प्रतीक हो
नागासाकी! तुम दुख की अमर कहानी हो
कार्यवाही अधिकृत या अनधिकृत
लाशों का ढेर तो लगाती है
जलाओ या दफनाओ
धरा का बोझ तो बढ़ाती है
चीखते-चिल्लाते बैठ गये हैं सुर
आँसू बदल गये फूलों में
रँग लिया सुर्ख खून का
जो सबसे ज्यादा प्यारा है
उस पर वार करो
क्या उचित है?
अपने से हुए अन्याय के बदले में
दूसरे निर्दोषों से बदला लेना
बारूदी सुरंगें
गोलियाँ, हथगोले
बम, तोपें
रौंदते धरा की छाती
थर्राते इस ग्रह का दिल
पर्वत विशाल
पेड़, पहाड़, मछलियाँ
परिन्दे, कीट, पतंगे
जानवर सूँघते गंध बारूदी
लौट जाना चाहते हैं अजन्मे होकर
क्या इसी दिन के लिए
क्या इसी क्षण के लिए
सींचा था बीज
फूल खिलाने को
जहरीली हवाओं ने
झुलसा दिया है बचपन
जीने से पहले मरण
खिलने से पहले क्षरण
कौन जात है तेरी?
कैसा धर्म?
किसका धर्म?
किसके लिए धर्म?
नकाब के पीछे उदास चेहरा
झूलता है संधि-रेखा पर
कूदे या न कूदे
क्या खुद कुछ खोया है?
तो दूसरों को भी मर जाना चाहिए
मिलेगी तभी शांति
होगी तभी नफरत ठंडी
क्या पाओगे यहाँ-वहाँ युद्ध करवाकर?
कितने मुल्क आज भी बेहाल हैं
खड़ा किया था जो भस्मासुर
वही तुम्हें निगलने को तैयार है
कठपुतलियाँ हो गईं आजाद
हक जता रही हैं
खुद को नचाने के जुर्म में
अपने मालिक को सता रही हैं
इन सबके बीच
बच्चे और स्त्रियाँ
बंधक बनाये जा रहे हैं
मारे जा रहे हैं,
बेघर, अनाथ हो रहे हैं
कौन देगा उनको प्यार?
कौन देगा उनको घर-बार?
नकाब के पीछे उदास चेहरा
झूलता है संधि-रेखा पर
कूदे या न कूदे
एक दीयासलाई
आग का एक कण
काल का एक क्षण
स्लेट पर लिखी इबारत जैसे
जीवन को मिटा देता है
साम्राज्यवाद या आतंकवाद
दो पहलू हैं एक ही सिक्के के
भाषा है अलग
एक दायरे में
एक दायरे से बाहर
ठहराते एक-दूसरे को गलत
उनका क्या करें
जो इधर भी नहीं
उनका क्या करें
जो उधर भी नहीं
बीच में कोई जगह नहीं बची
चिल्लाओ,
जोर से चिल्लाओ
गला खोलकर चिल्लाओ
कम-से-कम बह निकलेगा दुख
बनेंगे आँसू सुर्ख फूल लाल रक्त से
लौटोगे जब भी
स्मृतियों में सुनोगे धमाके
बंद हो जायेंगे सब ठहाके
कुछ भी ऐसा होने से
जीवन बदल जाता है
आदमी तो आदमी
पत्थर भी पिघल जाता है
नकाब के पीछे उदास चेहरा
कूद चुका है कगार के दूसरी तरफ
अब लौटकर नहीं आयेंगी स्मृतियाँ
अब लौटकर नहीं आयेंगी चीख
अब लौटकर नहीं आयेंगे बच्चे।

एम टीवी

शास्त्रीय नृत्य की अदाएँ
विदेशी संगीत के साथ
कमीज के बटन खुले
बाल उलझे-पुलझे
शरीर पर चित्रकारी
कम-से-कम कपड़े
कैट वॉक करती हुई
गुजरती रहती है
कारों में, बाजारों में
एक-दूसरे की बाँहों में,
निगाहों में
धीमे-धीमे तैरते-से
गुरुत्वाकर्षणविहीन स्पेस में
सिसकियाँ भरते हुए
उड़ते हैं,
अवतरित होते हैं
पृथ्वी पर कहीं भी
एफिल टॉवर पर,
सन-फ्रांसिस्को के पुल पर,
ग्रेट कैनियान की पहाड़ी पर,
किसी भी खूबसूरत टापू पर,
क्रूज में,
बर्फीले पहाड़ों पर,
नदी में एक नाव पर,
अचानक बजने लगते हैं वाद्ययंत्र
खयाल सिर्फ मिलन का
रीत या विपरीत से
और कोई चाहत नहीं
सिवाय लौटने के कुम्भीपाक में
लोग भूखे मरें तो मरें
गरीबी से मरें तो मरें
उनकी बला से
उनकी गाड़ियों की कतार
टूटने में नहीं आती
उनके बँगलों पर भीड़
छँटने में नहीं आती।

नाद के समुद्र में

ये जरूरी नहीं
कि हर बार
तुम्हारी ध्वनि-तरंगो की ओर
कदम बढ़ा दूँ
ये भी जरूरी नहीं
कि ऊँचे भवनों,
शोर की मीनारों को भेदकर आती
तरंगो को ग्रहण करता रहूँ
एक अनाम पीड़ा
बजती रहती है भीतर निरंतर
बहाकर ले जाने के लिए
नाद में समुद्र में
तरंगों को थपथपाना
लगता है लोरी-सा
उनींदा-सा बहता जाता हूँ
खुलने पर आँख
खुद को तुम्हारे पास पाता हूँ
ये जरूरी नहीं
कि पहुँच जाऊँ समूचा
चलने की जगह पर भी
बचा रहता है कुछ
दबोच रखा है जो
किसी ने मुट्ठी में
वहाँ से यहाँ तक
एक तार-सा खिंच जाता है
जिसे हर कोई छू देता है
ये आलाप
कौन भरता है बार-बार
ये कौन-सा राग है
जो बार-बार
अधूरा छूट जाता है।

स्त्री

मछलियाँ
आँसू पीती हैं
फिर भी सागर का
खारापन कम नहीं होता
अनंतकाल से
मछुआरे
वंशी डाले बैठे हैं
कालातीत समय से
मछुआरे
जाल लिए फिरते हैं
विरह में फिर भी
मछलियाँ आँसू पीती हैं।

कितनी बार

जब से टूटे हैं स्वप्न
चूर-चूर हुईं इच्छाएँ
छोड़ दिया है कहीं भी जाना
लौट आई है यथार्थ में
जाना है मूल्य अपने होने का
आखिर कब तक
उसे भेड़-बकरी की तरह
परखा जायेगा
बातें बड़ी क्रांतिकारी
लेकिन अनंत रूढ़िवादी
वो समझते नहीं मूल्य जीवन का/सपनांे का
कीमती है वही जो बाहर फैला है
मुँह से निकले शब्द की
कोई कीमत नहीं
फिसलते हैं बार-बार वादों से
लटकने के लिए नित नये बहाने
ऐसे बाजार में
एक सीधी-सादी लड़की
क्या कर सकती है
कि नकार दे ये समाज
और डूब जाये अपने घेरे में
क्योंकि कोई हाथ नहीं पकड़ता
बुन ले एकान्तिक जाल
जहाँ ध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ बन जाती हैं
क्योंकि गुजरा जाता है जीवन
और कोई आवाज नहीं दे रहा
दुख बार-बार
समुद्र की लहरों की तरह
जीवन को पछाड़ता है
वो जब भी हाथ बढ़ाती है
तट पर पहुँचने से पहले ही
निराशा की लहर
उसे लौटा ले जाती है
कितनी बार
किस-किस को
सौंपे अपना सब-कुछ
कुछ दूर
और कुछ देर तक
साथ चलने के लिए।

मेरी मरजी

केटुकी में जाऊँ
या मैकडोनाल्ड में जाऊँ
बिग बर्गर मँगवाऊँ
या हैम को खा जाऊँ
मल्टिनेशनल लाऊँ
या स्वदेशी बढ़वाऊँ
मेरी मरजी

बी जे पी में जाऊँ
या कांग्रेस में जाऊँ
दलबदलू कहलाऊँ
या देशभक्त बन जा ऊँ
मेरी मरजी

जनता को लुभाऊँ
फिर बाद में ठुकराऊँ
वोट डलवाऊँ
या बूथ कैप्चर करवाऊँ
मेरी मरजी।

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