वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ की रचनाएँ

भूल कर भेदभाव की बातें

भूल कर भेदभाव की बातें
आ करें कुछ लगाव की बातें

जाने क्या हो गया है लोगों को
हर समय बस दुराव की बातें

सैकड़ों बार पार की है नदी
वा रे काग़ज़ की नाव की बातें

है जो उपलब्ध उसकी बात करो
कष्ट देंगी अभाव की बातें

दो क़दम क़ाफ़िला चला भी नहीं
लो अभी से पड़ाव की बातें

तोड़ डाला है अल्प-वर्षा ने
नदियाँ भूलीं बहाव की बातें

मेरे नासूर दरकिनार हुए
छा गईं उनके घाव की बातें

ऐ ‘अकेला’ वो मोम के पुतले
कर रहे हैं अलाव की बातें

पहले तेरी जेब टटोली जाएगी

पहले तेरी जेब टटोली जाएगी
फिर यारी की भाषा बोली जाएगी

तेरी तह ली जाएगी तत्परता से
ख़ुद के मन की गाँठ न खोली जाएगी

नैतिकता की मैली होती ये चादर
दौलत के साबुन से धो ली जाएगी

टूटी इक उम्मीद पे ये मातम कैसा
फिर कोई उम्मीद संजो ली जाएगी

कौन तुम्हारा दुख, अपना दुख समझेगा
दिखलाने को आँख भिगो ली जाएगी

कह दे, कह दे, फिर मुस्काकर कह दे तू
“तेरे ही घर मेरी डोली जाएगी”

झूठी शान ‘अकेला’ कितने दिन की है
एक ही बारिश में रंगोली जाएगी

कहाँ ख़ुश देख पाती है किसी को भी कभी दुनिया

कहाँ ख़ुश देख पाती है किसी को भी कभी दुनिया
सुकूँ में देखकर हमको न कर ले ख़ुदकुशी दुनिया

ख़ता मुझसे जो हो जाए, नज़रअंदाज़ कर देना
कभी मत रूठ जाना तुम, तुम्हीं से है मेरी दुनिया

अरे नादाँ, बस अपने काम से ही काम रक्खा कर
तुझे क्या लेना-देना है बुरी हो या भली दुनिया

मिला है राम को वनवास, यीशू को मिली सूली
हुई है आज तक किसकी सगी ये मतलबी दुनिया

समय का फेर है सब, इसको ही तक़दीर कहते हैं
हुआ आबाद कोई तो किसी की लुट गई दुनिया

जो पैसा हो तो सब अपने, न हो तो सब पराए हैं
ज़रा सी उम्र में ही मैंने यारो देख ली दुनिया

न हँसने दे, न रोने दे, न जीने दे, न मरने दे
करें तो क्या करें क्या चाहती है सरफिरी दुनिया

‘अकेला’ छोड़ दे हक़ बात पे अड़ने की ये आदत
सर आँखों पर बिठा लेगी तुझे भी आज की दुनिया

झूठ पर कुछ लगाम है कि नहीं

झूठ पर कुछ लगाम है कि नहीं
सच का कोई मक़ाम है कि नहीं

आ रहे हैं बहुत से ‘पंडित’ भी
जाम का इन्तज़ाम है कि नहीं

इसकी उसकी बुराईयाँ हर पल
तुमको कुछ काम-धाम है कि नहीं

सुब्ह पर हक़ जताने वाले बता
मेरे हिस्से में शाम है कि नहीं

रोना रोते हो किस ग़रीबी का
घर में सब तामझाम है कि नहीं

इतना मिलना भी कम नहीं यारो
हो गई राम-राम है कि नहीं

हाथ का मैल ही सही पैसा
सारी दुनिया ग़ुलाम है कि नहीं

इक नए ही लिबास में है ग़ज़ल
ये ‘अकेला’ का काम है कि नहीं

वक़्त ढल पाया नहीं है शाम का

वक़्त ढल पाया नहीं है शाम का
चल पड़ा है सिलसिला आराम का

काम का आगाज़ हो पाया नहीं
ख़ौफ़ ले डूबा बुरे अंजाम का

प्यास दो ही घूँट में बुझ जाएगी
सारा दरिया है मेरे किस काम का

मयकशों की लिस्ट में मेरा शुमार
नाम तक लेता नहीं मैं जाम का

है नज़र बेताब क़ासिद के लिए
मुन्तज़िर हूँ मैं तेरे पैग़ाम का

सोशलिस्टों की मशक्कत रायगाँ
फ़र्क़ मिट पाया न ख़ासो-आम का

ऐ ‘अकेला’ काम का कुछ भी नहीं
अब तो जो भी है वो है बस नाम का

दूर से ही हाथ जोड़े हमने ऐसे ज्ञान से

दूर से ही हाथ जोड़े हमने ऐसे ज्ञान से
जो किसी व्यक्तित्व का मापन करे परिधान से

डगमगाते हैं हवा के मंद झोंकों पर ही वो
किस तरह विश्वास हो टकराएँगे तूफ़ान से

देखकर चेहरा कठिन है आदमी पहचानना
है कहानी क्या, पता चलता नहीं उन्वान से

मूँद लीं आँखें हमी ने उनको कुछ लज्जा नहीं
बीच चौराहे पे वो नंगे खड़े हैं शान से

जो तुम्हें औरों को देना था वो क्या तुम दे चुके
हाँ में हो उत्तर तो फिर कुछ माँगना भगवान से

इतना धन मत जोड़ ले हो परिचितों से शत्रुता
जान का ख़तरा रहेगा खुद की ही संतान से

तितलियों को काग़ज़ी फूलों ने सम्मोहित किया
ऐ ‘अकेला’ फूल असली रह गए हैरान से

काम है जिनका रस्ते-रस्ते बम रखना

काम है जिनका रस्ते-रस्ते बम रखना
उनके आगे पायल की छम-छम रखना

जो मैं बोलूँ आम तो वो बोले इमली
मुश्किल है उससे रिश्ता क़ायम रखना

दौलत के अंधों से उल्फ़त की बातें
दहके अंगारों पर क्या शबनम रखना

इक रूपये की तीन अठन्नी माँगेगी
इस दुनिया से लेना-देना कम रखना

सच्चाई की रखवाली को निकले हो
सीने पर गोली खाने का दम रखना

शासन ही बतलाए-क्यों आवश्यक है
पीतल की अँगूठी में नीलम रखना

देखो यार, मुझे घर जल्दी जाना है
जाम में मेरे आज ज़रा सी कम रखना

बोले बग़ैर हिज्र का क़िस्सा सुना गया

बोले बग़ैर हिज्र का क़िस्सा सुना गया
सब दिल का हाल आपका चेहरा सुना गया

इस दौर में किसी को किसी का नहीं लिहाज़
बातें हज़ार अपना ही बेटा सुना गया

भूखे भले ही मरते, न करते उधारियाँ
सौ गालियाँ सवेरे से बनिया सुना गया

वो नाग है कि फन ही उठाता नहीं ज़रा
धुन बीन की हरेक सँपेरा सुना गया

दिल का सुकून छीनने आया था नामुराद
दिलचस्प एक क़िस्सा अधूरा सुना गया

उस रब के फै़सले का मुझे इन्तज़ार है
मुन्सिफ़ तो अपना फ़ैसला कब का सुना गया

क्यों मोम हो गई हैं ये पत्थर की मूरतें
क्या इनको अपना दर्द ‘अकेला’ सुना गया

पूछो मत क्या हाल-चाल हैं

पूछो मत क्या हाल-चाल हैं
पंछी एक हज़ार जाल हैं

पथरीली बंजर ज़मीन है
बेधारे सारे कुदाल हैं

ऊँघे हैं गणितज्ञ नींद में
अनसुलझे सारे सवाल हैं

जिसकी हाँ में हाँ न मिलाओ
उसके ही अब नेत्र लाल हैं

होगी प्रगति पुस्तकालय की
मूषक जी अब ग्रंथपाल हैं

मंज़िल तक वो क्या पहुँचेंगे
जो दो पग चल कर निढाल हैं

जस की तस है जंग ‘अकेला’
हाथों-हाथों रेतमाल हैं

दिन बीता लो आई रात

दिन बीता लो आई रात
जीवन की सच्चाई रात

अक्सर नापा करती है
आँखों की गहराई रात

सारी रात पे भारी है
शेष बची चौथाई रात

मेरे दिन के बदले फिर
लो उसने लौटाई रात

नखरे सुब्ह के देखे हैं
कब हमसे शरमाई रात

बिस्तर-बिस्तर लेटी है
कितनी है हरजाई रात

सोए नहीं ‘अकेला’ तुम
फिर किस तरह बिताई रात

अरे नादान क्यों उलझा है तू चूल्हे बदलने में

अरे नादान क्यों उलझा है तू चूल्हे बदलने में
ये गीली लकड़ियाँ हैं क्यों धुआँ देंगी न जलने में

तुम अपने झूठ को कितने दिनों आबाद रक्खोगे
समय लगता नहीं है बर्फ़ के ढेले पिघलने में

हमारे लड़खड़ाने पर हँसो मत ऐ जहाँ वालो
बहुत अभ्यस्त हैं हम लोग गिर-गिर के सम्हलने में

तुम अपना उल्लू सीधा कर चुके हम कुछ नहीं बोले
तुम्हारा मुँह बना है क्यों हमारी दाल गलने में

ज़रा सा रेंगने में हाँफते हो, बैठ जाते हो
मुसीबत ही मुसीबत है तुम्हारे साथ चलने में

न जाने ज़िन्दगी के नाज़-नखरे कैसे झेलोगे
तुम्हारा हौसला है पस्त बच्चे के मचलने में

गुरूर इस रात का भी टूटने पर आ गया देखो
ज़रा सी देर है अब तो ‘अकेला’ दिन निकलने में

रूठा हुआ है मुझसे इस बात पर ज़माना

रूठा हुआ है मुझसे इस बात पर ज़माना
शामिल नहीं है मेरी फ़ितरत में सर झुकाना

मुझे मौत से डरा मत, कई बार मर चुका हूँ
किसी मौत से नहीं कम कोई ख़्वाब टूट जाना

हमको तो दिख रहे हैं हालात साजिशों के
पत्थर जता रहे हैं शीशे से दोस्ताना

तुझे याद करते रहना भाता है दिल को वरना
तुझको भुला भी देते गर चाहते भुलाना

आए थे बनके मेहमाँ जाने का नाम भूले
भाया ग़मों को बेहद मेरा ग़रीबख़ाना

दर्दों की धूप आखि़र अब क्या बिगाड़ लेगी
हमको तो मिल गया है ग़ज़लों का शामियाना

ग़फ़लत हमें ‘अकेला’ फिर पड़ गई है महँगी
हम जब तलक पहुँचते ‘बस’ हो गई रवाना

न जाने क्यों तेरी यारी में उलझे

न जाने क्यों तेरी यारी में उलझे
ग़मों की हम ख़रीदारी में उलझे

मरीज़ों का है अब भगवान मालिक
कि चारागर ही बीमारी में उलझे

पढ़ें क्या, तय नहीं कर पा रहे हैं
क़िताबों वाली अलमारी में उलझे

अभी हैं इम्तहानों के बहुत दिन
अभी से कौन तैयारी में उलझे

अकल आने लगी है अब ठिकाने
कि आटा, दाल, तरकारी में उलझे

हिमाक़त की ज़रूरत थी जहाँ पर
वहाँ नाहक़ समझदारी में उलझे

तुम्हें भी शायरी आने लगेगी
बशर्ते दिल न मक्कारी में उलझे

कौन कहता है कि हम मर जाएँगे

कौन कहता है कि हम मर जाएँगे
ज़ख़्म गहरे ही सही भर जाएँगे

स्वर्ग में भी होगी कुछ उनकी जुगाड़
पाप कर कर के भी वो तर जाएँगे

मानता हूँ हैं ये नालायक़ बहुत
अपने ही बच्चे हैं किस पर जाएँगे

प्रश्न करके इस क़दर तू खु़श न हो
सर से ऊपर सारे उत्तर जाएँगे

कट गई है ज़िन्दगी ये सोचते
आने वाले दिन तो बेहतर जाएँगे

घोषणाएँ कुछ नई नारे नए
और क्या मंत्री जी देकर जाएँगे

आदमी पर है कोई दानव सवार
किस तरह ये ख़ूनी मंज़र जाएँगे

ये ‘अकेला’ की ग़ज़ल के शेर हैं
तीर जैसे दिल के अंदर जाएँगे

आज कल तो रास्ता अँधे भी दिखलाने लगे

आज कल तो रास्ता अँधे भी दिखलाने लगे
लो अँधेरे रौशनी का मर्म समझाने लगे

मंदिरो-मस्जिद में हर दिन भीड़ बढ़ती जा रही
इम्तिहानों के दिवस नज़दीक जो आने लगे

मेरे बेटे नौकरी तुझको तो मिलने से रही
खोल गुमटी पान की बाबू जी समझाने लगे

हैं विवश हम आप पर विश्वास करने के लिए
व्यर्थ ही क़समों पे क़समें आप क्यों खाने लगे

कैसे समझाएँ परिंदों को शिकारी हम नहीं
दान के दाने भी वो खाने से कतराने लगे

ये न भूलो, हमने ही तुमको बग़ल में दी जगह
यार तुम तो बैठते ही हमको धकियाने लगे

ऐ ‘अकेला’ अब तो बेशर्मी की भी हद हो गई
जन्म के झूठे हमें सच्चाई सिखलाने लगे

फिर बढ़ाना द्वार पे पाबंदियाँ

फिर बढ़ाना द्वार पे पाबंदियाँ
पहले बनवा लो ये टूटी खिड़कियाँ

दौड़ने के गुर सिखाए किसलिए
पाँव में गर डालनी थीं बेड़ियाँ

वक़्त पर बिजली तो अक्सर ही गई
काम आईं घासलेटी डिब्बियाँ

देखकर मुझको ख़ुशी के मूड में
चढ़ गईं ज़ालिम समय की त्यौरियाँ

प्रार्थना करिए दरख़्तों के लिए
हैं सक्रिय छैनी, हथौड़े, आरियाँ

यार तू भी दूध का धोया कहाँ
हैं अगर मुझमें बहुत सी ख़ामियाँ

इस महीने सारा वेतन खा गए
बच्चों के बस्ते, किताबें, कॉपियाँ

बिन तुम्हारे ज़िन्दगी बीती है यूँ
ज्यौं फटे कंबल में बीतें सर्दियाँ

मुझको आज मिली सच्चाई

मुझको आज मिली सच्चाई
सहमी-सहमी और घबराई

भूल गया मुझको वो ऐसे
जैसे भूले लोग भलाई

ताक़ पे जो ईमान रखे हैं
छान रहे वो दूध मलाई

मैले गमछों की पीड़ाएँ
क्या समझेगी उजली टाई

राहे उल्फ़त सँकरा परबत
और बिछी है उस पर काई

सुनकर वो मेरी सब उलझन
बोला मैं चलता हूँ भाई

दुख जीवन में गेंद के जितना
सुख इतना जैसे हो राई

हाले दिल मत पूछ ‘अकेला’
कुआँ सामने, पीछे खाई

तबीयत हमारी है भारी सुबह से

तबीयत हमारी है भारी सुबह से
कि याद आ गई है तुम्हारी सुबह से

न थी घर में चीनी तो कल ही बताती
करेगा न बनिया उधारी सुबह से

बता दे कि हम ख़ुद ही सोए थे भूखे
खड़ा अपने द्वारे भिखारी सुबह से

न उसकी हमारी अदावत पे जाओ
हुआ रात झगड़ा, तो यारी सुबह से

हुआ अपशगुन ये कि इक नेता जी पे
नज़र पड़ गई है हमारी सुबह से

परिन्दों की दहशत है वाजिब ‘अकेला’
खडे हर तरफ़ हैं शिकारी सुबह से

कब होती है कोई आहट

कब होती है कोई आहट
चुपके से आता है संकट

अक्सर जल बिखरा रहता है
तेरी आँखें हैं या पनघट

तेरे बिन मैं तड़प रहा हूँ
होगी तुझको भी अकुलाहट

कैसे आए नींद कि दिल में
है उसकी यादों की खटपट

कहते थे मैं नौसीखा हूँ
पूरी बोतल पी ली गट-गट

एक ज़रा सा दिल बेचारा
और ज़माने भर के झंझट

क्यों करते हो फ़िक्र ‘अकेला’
वक़्त भी आख़िर लेगा करवट

कोई मंज़र नज़र को भाता नहीं

कोई मंज़र नज़र को भाता नहीं
तेरा चेहरा भी याद आता नहीं

क्या हसीं ख़्वाब बीच में टूटा
काश कुछ देर तू जगाता नहीं

कितना काँटों से डर गया है वो
हाथ फूलों को अब लगाता नहीं

एक ये भी है चाँद में ख़ूबी
दाग़ चेहरे के वो छिपाता नहीं

रिश्ते आते कहाँ हैं उसके लिए
लड़का अच्छा है पर कमाता नहीं

कुछ तो होगा मेरे ख़ुदा तुझमें
मैं कहीं भी तो सर झुकाता नहीं

मयकशी कब की छोड़ बैठा हूँ
पीने-पाने से दर्द जाता नहीं

बात ‘अकेला’ की और है वरना
दर्द में कोई मुस्कुराता नहीं

अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं

अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं
न जाने लोग भी क्या क्या अदाकारी दिखाते हैं

यक़ीनन उनका जी भरने लगा है मेज़बानी से
वो कुछ दिन से हमें जाती हुई लारी दिखाते हैं

उलझना है हमें बंजर ज़मीनों की हक़ीक़त से
उन्हें क्या, वो तो बस काग़ज़ पे फुलवारी दिखाते हैं

मदद करने से पहले तुम हक़ीक़त भी परख लेना
यहाँ पर आदतन कुछ लोग लाचारी दिखाते हैं

डराना चाहते हैं वो हमें भी धमकियाँ देकर
बड़े नादान हैं पानी को चिन्गारी दिखाते हैं

दरख़्तों की हिफ़ाज़त करने वालो डर नहीं जाना
दिखाने दो, अगर कुछ सरफिरे आरी दिखाते हैं

हिमाक़त क़ाबिले-तारीफ़ है उनकी ‘अकेला’जी
हमीं से काम है हमको ही रंगदारी दिखाते हैं

महकते गुलशनों में तितलियाँ आती ही आती हैं

महकते गुलशनों में तितलियाँ आती ही आती हैं
अगर दिल साफ़ रक्खो नेकियाँ आती ही आती हैं

मैं उससे कम ही मिलता हूँ, सुना है मैंने लोगों से
ज़ियादा मेल हो तो दूरियाँ आती ही आती हैं

सुबह से मनचले यूँ ही तो मडराते नहीं रहते
ये पनघट है यहाँ पनहारियाँ आती ही आती हैं

मैं कहता हूँ सियासत में तू क़िस्मत आज़मा ही ले
तुझे दुनिया की सब मक्कारियाँ आती ही आती हैं

कुसूर उसका नहीं, गर वो ख़ुदा ख़ुद को समझता है
जो दौलत हो तो ये ख़ुशफ़हमियाँ आती ही आती हैं

जुनूने-इश्क़, दर्दे-दिल का कैसा ये गिला पगले
जवानी में तो ये बीमारियाँ आती ही आती हैं

अगर बत्तीस हो सीना, पुलिस के काम का है तू
ज़माने भर की तुझको गालियाँ आती ही आती हैं

‘अकेला’ हक़बयानी ने सड़क पर ला दिया तो क्या
भले कामों में कुछ दुश्वारियाँ आती ही आती हैं

आराम के, सुकून के राहत के चार दिन

आराम के, सुकून के राहत के चार दिन
या रब अता हों तेरी इनायत के चार दिन

अब ये न पूछ कैसे कटे हैं तेरे बग़ैर
कट ही गए हैं तेरी ज़रूरत के चार दिन

पगले तू ज़िन्दगी के किसी काम का नहीं
भारी पड़े हैं तुझको मुसीबत के चार दिन

मर्ज़ी किसी से वक़्त ने पूछी कहाँ कभी
किसको मिले हैं अपनी तबीयत के चार दिन

मुजरिम समझ के दे दे सज़ा या बरी ही कर
बहला न मुझको देके ज़मानत के चार दिन

दर्दों का दौर ख़त्म भी होगा, यक़ीन रख
होते कहाँ हैं एक सी सूरत के चार दिन

ये तो बता ‘अकेला’ जो गुज़रे सुकून से
ख़्वाबों के थे या थे वो हक़ीक़त के चार दिन

सूर्य से भी पार पाना चाहता है

सूर्य से भी पार पाना चाहता है
इक दिया विस्तार पाना चाहता है

देखिए, इस फूल की ज़िद देखिए तो
पत्थरों से प्यार पाना चाहता है

किस क़दर है सुस्त सरकारी मुलाज़िम
रोज़ ही इतवार पाना चाहता है

अम्न की चाहत यहाँ है हर किसी को
हर कोई तलवार पाना चाहता है

इक सपन साकार हो जाए, बहुत है
हर सपन साकार पाना चाहता है

फूलबाई कब, कहाँ, कैसे लुटी थी
ये ख़बर अख़बार पाना चाहता है

मैं तेरी ख़ातिर उपस्थित हो गया हूँ
और क्या उपहार पाना चाहता है

जिसका मिल पाना असम्भव है ‘अकेला’
दिल वही हर बार पाना चाहता है

फिर पुरानी राह पर आना पड़ेगा

फिर पुरानी राह पर आना पड़ेगा
उसको हिन्दी में ही समझाना पड़ेगा

गर्म है पॉकिट तुम्हारी बच के जाना
लुट न जाना राह में थाना पड़ेगा

कोयलो, फ़रमान जारी हो गया है
साथ कौवों के तुम्हें गाना पड़ेगा

इस मुहल्ले में मकाँ मुझको दिला दे
इस जगह से पास मयख़ाना पड़ेगा

किसको फु़रसत है हुनर देखे तुम्हारा
तुमको ख़ुद मैदान में आना पड़ेगा

आईनो, ख़ुद को ज़रा मज़बूत कर लो
पत्थरों से तुमको टकराना पड़ेगा

ऐ ‘अकेला’ होगी बहुतों से बुराई
पर लबों पे सच हमें लाना पड़ेगा

इस तरह से बात मनवाने का चक्कर छोड़ दे

इस तरह से बात मनवाने का चक्कर छोड़ दे
देख तू सीधी तरह से मेरा कालर छोड़ दे

झूठ, मक्कारी तजें नेता जी मुमकिन ही कहाँ
नाचना, गाना-बजाना कैसे किन्नर छोड़ दे

अपने होठों से ज़रा छू ले मेरे प्याले के होंठ
चाय कुछ फीकी-सी है थोड़ी-सी शक्कर छोड़ दे

न्याय की ख़ातिर वो अपना सर कटा भी ले मगर
घर की ज़िम्मेदारियों को किसके सर पर छोड़ दे

इम्तहानों के ये दिन और इश्क़ है सर पर सवार
ये न हो कि मेरे चक्कर में वो पेपर छोड़ दे

नींद माना है अधूरी शब मगर पूरी हुई
काम पर निकले हैं पंछी तू भी बिस्तर छोड़ दे

कुछ समझ में ही नहीं आता तो अक्कल मत लड़ा
ऐसे हालातों में सब उस रब के ऊपर छोड़ दे

ऐ ‘अकेला’ दुनियाभर से मोल मत ले दुश्मनी
हक़बयानी छोड़ दे, ये तीखे तेवर छोड़ दे

सोच की सीमाओं के बाहर मिले

सोच की सीमाओं के बाहर मिले
प्रश्न थे कुछ और कुछ उत्तर मिले

किसकी हिम्मत खोलता अपनी जुबाँ
उनके आगे सब झुकाए सर मिले

घर बुलाया था बड़े आदर के साथ
लो महाशय ख़ुद नहीं घर पर मिले

बेचने को ख़ुद को तत्पर हैं सभी
जब जिसे, जैसा, जहाँ अवसर मिले

हमको ऐ जनतंत्र तेरे नाम पर
उस्तरे थामे हुए बंदर मिले

हर ख़ुशी ने औपचारिक भेंट की
दर्द सब हमसे बहुत खुलकर मिले

उम्र भर वो पेड़ फल देता रहा
फिर भी दुनिया से उसे पत्थर मिले

ऐ ‘अकेला’ न्याय ज़िन्दा है कहाँ
घर बनाने वाले ही बेघर मिले

गुज़रेंगे इस चमन से तूफ़ान और कितने

गुज़रेंगे इस चमन से तूफ़ान और कितने
रूठे रहेंगे हमसे भगवान और कितने

अब हाल पर हमारे तुम हमको छोड़ भी दो
लेते फिरें तुम्हारे अहसान और कितने

नेता, वकील, पंडित, मुल्ला, समाज सेवक
बदलेगा रूप आखि़र शैतान और कितने

हमें तोड़ने की ख़ातिर, हमें लूटने की ख़ातिर
हमसे करेंगे आखि़र पहचान और कितने

आँसू, अभाव, विपदा, आहें, घुटन, हताशा
बदलेगी दिल की पुस्तक उन्वान और कितने

जो सुख नहीं रहे तो दुख भी नहीं रहेंगे
किसी एक घर रूकेंगे मेहमान और कितने

दिन की तरह कोई दिन निकले भी अब ‘अकेला’
होंगे तिमिर के बंदी दिनमान और कितने

उमीदों के कई रंगीं फ़साने ढूँढ़ लेते हैं

उमीदों के कई रंगीं फ़साने ढूँढ़ लेते हैं
जिन्हें जीना है जीने के बहाने ढूँढ़ लेते हैं

न सूझे है कहाँ जाकर छुपूँ कैसे बचूँ इनसे
ये बैरी ग़म मेरे सारे ठिकाने ढूंढ़ लेते हैं

हम उनसे दोस्ती का इक बहाना ढूंढ़ते जब तक
वो तब तक दुश्मनी के सौ बहाने ढूंढ़ लेते हैं

ख़फ़ा है हमसे ये दुनिया हमारा है क़ुसूर इतना
समझदारी से हम कुछ पल सुहाने ढूंढ़ लेते हैं

मेरी बातों का अक्सर मान जाते हैं बुरा यूँ ही
वो जाने क्या मेरे लफ़्ज़ों के माने ढूंढ़ लेते हैं

किसी से उनको क्या मतलब, मगर हाँ वक्त पड़ने पर
ज़माने भर से अपने दोस्ताने ढूँढ़ लेते हैं

करो मत फ़िक्र, वो दो वक्त की रोटी जुटा लेगा
परिन्दे भी ‘अकेला’ चार दाने ढूँढ़ लेते हैं

हमने कर ली सफ़र की तैयारी

हमने कर ली सफ़र की तैयारी
ये न पूछो किधर की तैयारी

बिछ गए हैं उधर ही अंगारे
हमने की है जिधर की तैयारी

एक गाड़ी थी वो भी छूट गई
खा गई हमसफ़र की तैयारी

टूटे दिल को ज़रा तो जुड़ने दो
करना फिर तुम क़हर की तैयारी

मछलियाँ किस तरह यक़ीं कर लें
होगी हित में ‘मगर’ की तैयारी

यार मेरे मुझे तो ले डूबी
कुछ इधर कुछ उधर की तैयारी

ऐ ‘अकेला’ वो फिर नहीं आए
की गई दुनिया भर की तैयारी

ये वक्त मेहमान के आने का वक्त है

ये वक्त मेहमान के आने का वक्त है
ख़ाली न बैठ घर को सजाने का वक्त है

इक चोट ले के बैठा रहेगा तू कब तलक
उठ हौसलों से हाथ मिलाने का वक्त है

कुछ दिन से उनकी नज़रे-इनायत इधर भी है
लगता है अपना ठीक ठिकाने का वक्त है

भड़को न यूँ कि बात बिगड़ जाएगी अभी
जैसे बने ये बात बनाने का वक्त है

हर आदमी लगा है तरक्क़ी की दौड़ में
अब किसके पास मिलने मिलाने का वक्त है

घंटों संवर न यूँ भी बहुत देर हो गई
टोकेंगे लोग-ये कोई आने का वक्त है

किसको ‘अकेला’ शेरो-सुख़न की रही तलब
मंचों पे अब लतीफ़े सुनाने का वक्त है

कभी कुछ ग़म भी हो हरदम ख़ुशी अच्छी नहीं होती

कभी कुछ ग़म भी हो हरदम ख़ुशी अच्छी नहीं होती
हमेशा एक जैसी ज़िन्दगी अच्छी नहीं होती

उसे पाकर तुम अपने आप को भी भूल बैठे हो
किसी पर इतनी भी दीवानगी अच्छी नहीं होती

कभी भी दोस्ती के हक़ में सोचा ही नहीं तुमने
किसे समझा रहे हो दुश्मनी अच्छी नहीं होती

उदासी आपके चेहरे की छा जाती है शेरों पर
ज़रा तो मुस्कुरा दो, शायरी अच्छी नहीं होती

मुकम्मल प्यास तो जागे यहीं फूटेंगे सौ झरने
अधूरी है, अधूरी तिश्नगी अच्छी नहीं होती

तुम्हारे ख़त पे ख़त आते हैं पर मैं आ नहीं सकता
बस इतने के लिए ही नौकरी अच्छी नहीं होती

भटकता है कहाँ हरदम ‘अकेला’ छोड़कर मुझको
मेरे दिल इस क़दर आवारगी अच्छी नहीं होती

बहुत से मामलों में तंगदिल होना ही अच्छा है
‘अकेला’ हर कहीं दरियादिली अच्छी नहीं होती

बंजर धरती कैसे हरी भरी होगी

बंजर धरती कैसे हरी भरी होगी
चमन पल्लवित-पुष्पित होंगे तो कैसे
यहाँ हाथ पर हाथ धरे सब बैठे हैं
सुखद स्वप्नफल अर्जित होंगे तो कैसे

क़िस्मत का रोना रोने से क्या होगा
पलकों पर आँसू ढोने से क्या होगा
अपना आज व्यवस्थित कर लो अच्छा है
कल के हित चिंतित होने से क्या होगा
बीते दुखद प्रसंग न हो पाये विस्मृत
सुख जीवन में प्रकटित होंगे तो कैसे
बंजर धरती…………………………………………..

आत्मकथ्य ऊँचे हैं बोनी करनी है
ऐसे में कुछ हालत कहाँ सुधरनी है
प्रभु को है परहेज़ चरण-रज देने में
कहिए फिर किस तरह अहिल्या तरनी है
चलनी में जल भरने का प्रहसन जारी
ये दुखड़े प्रतिबंधित होंगे तो कैसे
बंजर धरती……………………………………………

कितनी आशाएँ निबटी हैं सस्ते में
सभी योजनाएँ हैं ठंडे बस्ते में
हमको तो निर्विघ्न मार्ग भी खलता है
क्या होगा अनगिन रोड़े हैं रस्ते में
चिंतन, मनन, अध्ययन में रूचि नहीं रही
फिर हम ज्ञानी पंडित होंगे तो कैसे
बंजर धरती……………………………………………..

सम्मुख जो संकट हैं उन पर चुप हैं सब
सम्भावित ख़तरों पर चर्चाएँ जब तब
नौकाओं के छिद्रों को पुरवाना था
फिर पतवारें नयी ख़रीदीं, क्या मतलब
हम औघड़दानी उपजाते भस्मासुर
दुर्दिन भला पराजित होंगे तो कैसे
बंजर धरती……………………………………………..

सर्वश्रेष्ठता के मद में हम फूले हैं
भूलों का विश्लेषण करना भूले हैं
औरों को नीचा दिखलाने में माहिर
ख़ुद की निंदाओं पर आगबबूले हैं
आग लगा पानी को दौड़ा करते हम
जग में महिमा मंडित होंगे तो कैसे
बंजर धरती……………………………………….

गति जीवन है चक्र समय का थमता क्या?
ठहरावों से है जीवन की समता क्या?
राहों पर सुख-साधन-चिंतन अनुचित है
यात्रा में दुर्गमता और सुगमता क्या ?
चलने की क्षमताएँ गिरवी रख दी हैं
गंतव्यों से परिचित होंगे तो कैसे
बंजर धरती…………………………………………

सिकुड़नें मुख मंडलों पर शत्रुभय की !

सिकुड़ने मुख मंडलों पर शत्रुभय की
है असंगत घोषणा अपनी विजय की

श्रृंखला विश्वासघातों की बड़ी है
मित्रता अक्सर बहुत मंहगी पड़ी है
सत्यता का नग्न तन सहमा खड़ा है
हाथ में थामे समय लम्बी छड़ी है
आपकी अति नम्रता करती सशंकित
बोलते हैं ठग सधी भाषा विनय की
सिकुड़ने मुखमंडलों…………………………

थे सुनिश्चित ये अप्रिय अध्याय काले
आस्तीनों में विषैले सर्प पाले
छोड़कर हमने खुले सारे ख़ज़ाने
रिक्त कक्षों पर जड़े हैं खूब ताले
हो गयीं कैसी परिस्थितियाँ विनिर्मित
हम नहीं पहचान कर पाये समय की
सिकुड़ने मुखमंडलों…………………………..

आ गयी कितनी शिथिलता आचरण में
लक्ष्मण हैं सम्मिलित सीताहरण में
रामजी का राज आएगा कहाँ से
व्यस्त हैं सब रावणों के अनुकरण में
बुद्धि के उत्कर्ष की गाथा निराली
हो गयीं विद्रूप अनुकृतियाँ हृदय की
सिकुड़ने मुखमंडलों……………………………

सीखकर पाखण्ड आद्योपांत हमने
चुन लिए सुविधाजनक सिद्धान्त हमने
मानसिक संकीर्णताएँ हैं यथावत
क्या हुआ जो रट लिए वेदांत हमने
कौन है इसके लिए दोषी बताओ
सृष्टि यदि गिनने लगी घड़ियाँ प्रलय की
सिकुड़ने मुखमंडलों………………

वन जाने को राम नहीं तैयार, पढ़ा अख़बार !

वन जाने को राम नहीं तैयार, पढ़ा अख़बार !
दशरथ जी को दे दी है फटकार, पढ़ा अख़बार !

इस युग में अचनों-वचनों का कोई मोल नहीं
हरिश्चन्द्र है कौन बात में किसकी झोल नहीं
अपने कहे हुए से इंसाँ टलता है फौरन
वादा हुआ बरफ़ का ढेला गलता है फौरन
झूठ के बल पर क़ायम है संसार, पढ़ा अख़बार !
वन जाने………………………………………………………………

कृष्ण-कंस में नहीं रही है अब कोई अनबन
अति चिंतित वसुदेव-देवकी टूट गया है मन
राम और रावण में सांठ-गांठ की चर्चाएँ
असंतुष्ट हैं संत कि खंडित होंगी आशाएँ
है खटाई में सच्चों का उद्धार, पढ़ा अख़बार !
वन जाने…………………………………………………………….

भीष्म पितामह नित्य प्रतिज्ञाएँ करते हैं भंग
धर्मराज अक्सर दिखाई देते अधर्म के संग
विदुर नीति को त्याग सदा चलते अनीति की चाल
कर्ण महादानी हड़पा करते औरों का माल
नये रूप में उतरे हैं अवतार, पढ़ा अख़बार !
वन जाने……………………………………………………………..

धीरज रखिए भीम मचाते हैं क्यों व्यर्थ बवाल
पांचाली को चीर-हरण को कोई नहीं मलाल
पाँचों पाण्डव एक नहीं, कैसे ठानेंगे युद्ध
दुर्योधन से अधिक युधिष्ठिर अर्जुन से हैं क्रुद्ध
पूर्ण सुरक्षित है कौरव सरकार, पढ़ा अख़बार !
वन जाने……………………………………………………………….

सिद्धान्तों का केवल भाषण में होता है काम
तन जाती है छतरी थोड़ा भी लगता यदि घाम
नैतिकता दौलत के आगे भरती है पानी
आदर्शों की ऐन वक्त पर मर जाती नानी
ब्रह्मलोक तक पसरा भ्रष्टाचार, पढ़ा अख़बार !
बन जाने………………………………………………………………..

हर तरफ़ तक़रार ही तक़रार

हर तरफ़ तकरार ही तकरार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

सब्र की सीमा निरन्तर संकुचन पर है
अब त्वरित आवेश पूरे बांकपन पर है
हैं बिखरते-टूटते परिवार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

बोल मीठे जप रहे पाखंड की माला
कटु वचन का फैलता जाता मकड़जाला
चल पड़ा किस ओर यह संसार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

खो गया सद्भाव उन्नति के उपायों में
रह गया क्या भेद अपनों में, परायों में
स्वार्थों पर मित्रता का भार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

बचपने ने स्नेह की आकांक्षा खोई
क्यों उचित सम्मान के हित प्रौढ़ता रोई
ध्वंस के दृढ़ हो रहे आधार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

इस तरह कलुषित किये अंतःकरण किसने
कर लिया संवेदनाओं का हरण किसने
है बड़ी घातक समय की मार
ढूंढ़ कर लाओ ज़रा सा प्यार

तुमने ठीक मिटाया मुझको

तुमने ठीक मिटाया मुझको मेरा नव-निर्माण हो गया
एक संकुचित पुस्तक था मैं देखो आज पुराण हो गया

अच्छा हुआ मिटे भ्रम सारे, मैं तुमको पहचान गया हूँ
जग से जुड़ी आस्थाओं का सब खोटापन जान गया हूँ
हुआ यथार्थ-बोध जीवित, इक स्वप्न भले निष्प्राण हो गया
तुमने ठीक मिटाया………………………..

कब तक मोम समान तन लिए मैं इस तपती भू पर रहता
प्रस्तर सा मन लेकर कैसे मैं इस जग सरिता संग बहता
प्रेम-पीर ने मोम किया मन, तन मेरा पाषाण हो गया
तुमने ठीक मिटाया………………………….

तुमने पीड़ा से मिलवाकर मुझे नए आयाम दिये हैं
ग़ज़लें, मुक्तक, गीत सुपावन और छंद अभिराम दिये हैं
सब कहते बरबाद हुआ हूँ मैं कहता कल्याण हो गया
तुमने ठीक मिटाया………………………….

पटरी से उतरी है जीवन की रेल

पटरी से उतरी है जीवन की रेल
ख़त्म हुआ खेल, समझ ख़त्म हुआ खेल

हुए हम अहिंसा पर ऐसे मेहरबान
कायरता बन बैठी अपनी पहचान
जड़ गया जो कोई कभी चनकट दो चार
सहज भाव से हमने स्वीकारे यार
ख़ुश हुए कबाड़े में बन्दूकें डाल
कोई भी कह जाता-खींचेंगे खाल
क्या अचरज अगर हमें धमकाए वो
हाथ में जो थामे है टुटल्ली गुलेल
पटरी से उतरी है …………………………

बतलाते फिरते जो सब में ही खोट
चड्डी पर पहने हैं चमकीला कोट
कैसा चिंतन उनका कैसा है ज्ञान
मुंह को खोले रक्खो, बंद रखो कान
फैले हैं उनके अनुयायी चहुं ओर
रजनी को कहते हैं सुखदायी भोर
हैं ऐसे ऊँट पे वो शौक से सवार
नाक में नहीं जिसके देखिए नकेल
पटरी से उतरी है …………………………

व्यवस्थाएँ अपनी हैं जग में बेजोड़
सब कुछ है इनमें बस व्यवस्था को छोड़
संस्थाएँ काग़ज़ पर चलती हैं मौन
बीते हैं बरसों पर जान सका कौन
आँखों देखी कहता सुन लीजे आप
अमृत की होलसेल करते हैं साँप
जिनमें अनुपस्थित थे उनमें हम पास
जो पेपर दिए हुए उनमें ही फेल
पटरी से उतरी है …………………………

संसद में है कक्षा दो जैसा शोर
एक दूसरे को सब बतलाते चोर
खींचातानी में ही बीत रहे वर्ष
चुपके-चुपके चलता स्वार्थ का विमर्श
नैतिकता की किसको है यहाँ फिकर
जीवित मस्तिष्क, गयीं आत्माएँ मर
सत्य पे ग़रूर तुम्हें पागल हो क्या
सत्य के दिये में अब कहाँ बचा तेल
पटरी से उतरी है …………………………

कौन ये अलाप रहा उन्नति का राग
बंद करो भड़क रही सीने में आग
भूखे सो जाते हैं कितने ही लोग
बेकारी का कितने झेल रहे रोग
टूटी सब उम्मीदें, टूटे हैं मन
जीवन से उकताया दिखता जन-जन
कैसा सींचा तुमने अपना ये बाग़
सूखे सब पौधे, मुरझाई हर बेल
पटरी से उतरी है ………………………

खा जाएगा गच्चा प्यारे ख़ुद को ज़रा सम्हाल

खा जाएगा गच्चा प्यारे ख़ुद को ज़रा सम्हाल
काला नहीं दाल में भाई काली पूरी दाल
ठन ठन गोपाल
लड़ना ही था तो लड़ लेते काहे भागे थाने
मुंशी और दरोग़ा ने मिलकर रसगुल्ले छाने
दोनों की जेबों के मुर्ग़े अच्छे हुए हलाल
ठन ठन गोपाल
खा जाएगा गच्चा ………………
काम कराना है तो थोड़ा खर्चा-पानी कर दे
चपरासी के हाथों में भी जाकर सौ का धर दे
वरना फ़ाइल दफ़्तर में घूमेंगी सालों-साल
ठन ठन गोपाल
खा जाएगा गच्चा ………………….
क्या अपनापन कैसी यारी कैसी रिश्तेदारी
चाँदी की जूती दुनिया में पड़ती सब पे भारी
पान खिलाओ तो मुंह लाल वरना आँखें लाल
ठन ठन गोपाल
खा जाएगा गच्चा ………………….

नेताजी ने करूणा का नाटक खेला क्या धाँसू
सच्चे आँसू जैसे ही थे वो घड़ियाली आँसू
दर्जन भर से ज़्यादा गीले कर डाले रूमाल
ठन ठन गोपाल
खा जाएगा गच्चा ……………………
सबको लगा यहाँ पर यारो हाई जंप का चश्का
दरवाजे़ पर खड़ा भिखारी माँग रहा है दस का
अब क्या होगा पूछ रहा है विक्रम से बेताल
ठन ठन गोपाल
खा जाएगा गच्चा ……………………

अपनी आपत्तियों को न करना मुखर मौन धारे रहो

अपनी आपत्तियों को न करना मुखर मौन धारे रहो
व्यर्थ में दुश्मनी सबसे लेते हो क्यो सबके प्यारे रहो

बाँध कर गठरी रख दो कबाड़े में तुम अपनी प्रतिभाओं की
लूट में सम्मिलित हो सको तो करो आस सुविधाओं की
वरना जैसे भी हो काट दो ज़िन्दगी मन को मारे रहो
अपनी आपत्तियों को …………………………………………………….

हाँ में हाँ जो मिलाए वही है सबल, हाँ वही है सफल
झूठी तारीफ़ करना ही है मंत्र उन्नति का मित्रो प्रबल
सीख लो मंत्र यह संकटों से स्वयं को उबारे रहो
अपनी आपत्तियों को ……………………………………………………

धक्का-मुक्की का है ये ज़माना ज़रा सावधानी रखो
कौन धकियाए क्या है ठिकाना ज़रा सावधानी रखो
पाओ मौक़ा जहाँ यार धँस लो स्वयं को पसारे रहो
अपनी आपत्तियों को ……………………………………………………

दृढ़ रख संकल्पों को अपने

दृढ़ रख संकल्पों को अपने
सच में परिणत होंगे सपने

इतनी जल्दी हार न मानो
इस जीवन को भार न मानो
निष्फल हुए प्रयासों को ही
विधि का अन्तिम सार न मानो
भागीरथी प्रयत्नों को तुम
और अभी आगे बढ़ने दो
दुखते पाँवों को ये सबसे
दुर्गम घाटी तो चढ़ने दो
निश्चित मानो नाम तुम्हारा
मंज़िल स्वयं लगेगी जपने
दृढ़ रख संकल्पों ……………

यदि मन हारा समझो हारे
मन के जीते जीत है प्यारे
धारण धैर्य करो तो थोड़ा
हो जाएंगे वारे-न्यारे
रजनी को ढलना ही होगा
होगी सुखद सुबह की दस्तक
कितने दिनों रहेगा कोई
आखि़र पीड़ाओं का बंधक
सुदिनों की जागृति फिर होगी
दुर्दिन पुनः लगेंगे झपने
दृढ़ रख संकल्पों …………….

कोई साथ नहीं देता है
दुख में हाथ नहीं देता है
किंकर्तव्य-विमूढ़ों को वर
कोई नाथ नहीं देता है
पक्का अगर इरादा हो तो
आशंकाएँ धुल जाती हैं
साधें एकलव्य सी हों तो
सारी राहें खुल जाती हैं
कुंदन सा दमकेगा जीवन
संघर्षों में देना तपने
दृढ़ रख संकल्पों …………….

कब चलता है काम समय से कट के !

कब चलता है काम समय से कट के
सीखो नई सदी के लटके झटके

पोथन्नों पर पोथन्ने पढ़ कर किसने क्या पाया
सारी सुख सुविधाएँ त्यागीं, नाहक समय गँवाया
कॉलिज टॉप हुआ वो लड़का ट्वेन्टी क्वेशचन रट के
सीखो नई सदी…………………………………………

दो धन दो को चार सिद्ध करते रह गए अभागे
सात पे नौ उनहत्तर जिनने बाँचा वो हैं आगे
विद्या नई, पुरानी विद्याओं से है कुछ हट के
सीखो नई सदी………………………………………..

घोर असंगत है अब संगत सच्चे इंसानों की
दसों उंगलियाँ घी में रहती हैं बेईमानों की
देव खड़े ललचाएँ अमरित असुर गटागट गटके
सीखो नई सदी………………………………………..

कथनी-करनी में समानता का मत ढोंग रचाना
ख़ुद रहना सिद्धान्तहीन सबको आदर्श रटाना
उन्नति का जब मिले सुअवसर लाभ उठाना डटके
सीखो नई सदी………………………………………..

रावण, कंस और दुर्योधन की धुकती है इक्कर
हार गए हैं राम, कृष्ण, अर्जुन ले ले कर टक्कर
अब किसमें दम है जो फोड़े पापों के ये मटके
सीखो नई सदी………………………………………..

कर्तव्यों की नौका बातों से खेता है

कर्तव्यों की नौका बातों से खेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है

दुनिया नाहक ही करती है बदनामी
संतन को, सज्जन को कहती खल-कामी
तू अपने मतलब के क़िस्से गढ़ लेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है
कर्तव्यों की नौका …………………………

जब से नख-दंत झड़े बदली है बोली
नाहर जी बाँटें परमारथ की गोली
कहते जग-सरिता मे रेता ही रेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है
कर्तव्यों की नौका …………………………

रण टाला दुश्मन के सम्मुख नत होकर
प्राणों की रक्षा की स्वाभिमान खोकर
देखो तो अख़बारों में वही विजेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है
कर्तव्यों की नौका …………………………

शेखर को मुन्नन से लड़वाया किसने
नोने के घर डाका पड़वाया किसने
सब है मालूम हमें तू कैसा नेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है
कर्तव्यों की नौका …………………………

बोला था तुझसे रहना है चौकन्ना
रस्ते भर चूसता रहा पगले गन्ना
पीछे से लात पड़ी तक जाकर चेता है
मामा के आगे ममियारे की देता है
कर्तव्यों की नौका …………………………

ऐसी करतूतों पर मेरी इस जिह्वा से गाली ही छूट गई

ऐसी करतूतों पर मेरी इस जिह्वा से गाली ही छूट गई
देखो तो मरियल सा साँप भी न मर पाया लाठी भी टूट गई

दावे सब टाँय टाँय फिस्स हुए
खूब खिलाए तुमने माल पुए
लतियाया कर्तव्यों को जी भर
स्वारथ के श्रद्धा से पाँव छुए

ये कैसी जनसेवा जो भोली जनता की मिट्टी ही कूट गई
ऐसी करतूतों पर ….

बस ऊपर ही ऊपर उजले हैं
गहरे दिखते थे पर उथले हैं
इनसे क्या उम्मीदें बाँधे हो
सब के सब स्वारथ के पुतले हैं

कोई रैना आकर भर दुपहर दिवसों का उजियारा लूट गई
ऐसी करतूतों पर ….

अर्थ नियोजन फोकट में जाते
अंधों का पीसा कुत्ते खाते
ऊपर से रूपया जो चलता है
नीचे तक दस पैसे आ पाते

नल के नीचे रक्खे हो ऐसी गगरी जो पेंदी से फूट गई
ऐसी करतूतों पर ….

मुरझाई थी जो बगिया देखो तो अब तक खिली कहाँ

मुरझाई थी जो बगिया देखो तो अब तक खिली कहाँ
चले गए अंग्रेज़ मगर आज़ादी हमको मिली कहाँ

हुए स्वशासित मत बोलो, बोलो हम हुए स्वशोषित हैं
पहले ग़ैरों से थे अब अपनों से हुए प्रताड़ित हैं
निराशाओं के बंदीगृह से छूटी ज़िन्दादिली कहाँ
मुरझाई थी जो बगिया….

हम पर भूख-ग़रीबी का मज़बूत अभी भी पहरा है
पहले शासन अँधा था अब गूंगा, लंगड़ा, बहरा है
फटी कमीज़ बसंता की देखो तो अब तक सिली कहाँ
मुरझाई थी जो बगिया….

ये कैसी आज़ादी, कैसे ये सत्ता-परिवर्तन हैं
मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटे सुख-साधन हैं
वो सामंती वटवृक्षी जड़ देखो अब तक हिली कहाँ
मुरझाई थी जो बगिया…

शांति हो, सदभावना हो भाईचारा हो !

शांति हो, सदभावना हो भाईचारा हो
हे प्रभो, मेरे वतन में यह दुबारा हो

द्वेष के दलदल से बाहर कर हमें भगवन
हर कलह की कालिमा निर्मल हों सबके मन
फिर धरा पर वो सुधामय प्रेमधारा हो
हे प्रभो, मेरे वतन में यह दुबारा हो
शांति हो….

दूध की नदियाँ भले ही ना बहें फिर से
स्वर्ण-महलों में भले हम ना रहें फिर से
पर कोई भूखा न हो, ना ही उघारा हो
हे प्रभो, मेरे वतन में यह दुबारा हो
शांति हो….

बुद्धि दे इतनी असत्-सत् जान जाएँ हम
और बल इतना कि शोषित हो न पाएँ हम
प्राण से बढ़कर हमें कर्तव्य प्यारा हो
हे प्रभो, मेरे वतन में यह दुबारा हो
शांति हो….

मेरे पास रखा ही क्या था

मेरे पास रखा ही क्या था
क्यों तुम मेरे पास ठहरते

तुमको महलों की चाहत थी
मेरा टूटा-फूटा घर था
तुम फूलों पर चलने वाले
मेरा काँटों भरा सफ़र था
ऐसे में ओ मेरे हमदम
कैसे ना तुम राह बदलते
मेरे पास रखा…

सबकी तरह तुम्हें भी भाती
थी केवल दीनार की भाषा
कब तक आख़िर बाँधे रखती
तुमको मेरे प्यार की भाषा
कैसे भाव तिजारत वाले
रिश्तों के साँचों में ढलते
मेरे पास रखा…

समझ गया सब, नहीं ज़रूरत
मुझको कुछ भी समझाने की
किसको चाहत नहीं जहाँ में
अच्छे से अच्छा पाने की
मुझसे अच्छा मिला कोई तो
क्यों तुम रूख़ उस ओर न करते
मेरे पास रखा…

तुम्हें भूल जाने का निश्चय
झूठा है, कब सच होना है
आँखें दो दिन को रोई हैं
मन को जीवन भर रोना है
क़िस्मत ने क्या दिन दिखलाए
सूखे स्वप्न फूलते-फलते
मेरे पास रखा…

भले ही तुमको जी भर मैंने कोसा है, प्रभो !

भले ही तुमको जी भर मैंने कोसा है, प्रभो !
तुम्हारे न्याय पर पूरा भरोसा है, प्रभो !

सम्हाला होश जब से ये न जाना है ख़ुशी क्या
निरन्तर आह भरना बस यही है ज़िन्दगी क्या
हुए सब स्वप्न खंडित मृत हुईं आशाएँ सारी
मिला है छल हमेशा आस्था हर बार हारी
कि हर पल ही तो मैंने मन मसोसा है, प्रभो !
तुम्हारे न्याय पर…

गिने जाते नहीं दिल पर लगे हैं घाव इतने
मुझ ही पर आज़माएगी मुसीबत दाँव कितने
जिया जाता नहीं है अब तो दम घुटने लगा है
मेरी साँसों का राही रोज़ ही लुटने लगा है
कि मेरे हक़ में तुमने क्या परोसा है, प्रभो !
तुम्हारे न्याय पर…

तुम्हारे राज्य में क्यों देखा-देखी हो रही है
बिलख कर न्याय की देवी वो देखो रो रही है
हँसें कुछ लोग बाक़ी सबके चेहरों पर उदासी
कि अब ये ज़िन्दगी लगने लगी है बद्दुआ-सी
किसी का सुख किसी ने क्यों ढकोसा है, प्रभो !
तुम्हारे न्याय पर…

अगणित तलवारों पर अकेला ही भारी हूँ

अगणित तलवारों पर अकेला ही भारी हूँ
भाषा का योद्धा मैं क़लम-शस्त्रधारी हूँ

ये मत समझे कोई शब्दों का छल हूँ मैं
जीवन के कड़वे अध्यायों का हल हूँ मैं
निर्बल-असहायों का गहराता बल हूँ मैं
मानस को निर्मल करने वाला जल हूँ मैं
सूर और तुलसी हैं मेरे संबंधीजन
वाल्मीकि-वंशज, कबिरा का अवतारी हूँ
अगणित तलवारों पर…

दिग्भ्रमित समाजों के सारे भ्रम तोड़ूँगा
एक भी विसंगति को जीवित कब छोड़ूँगा
न्यायों के छिन्न-भिन्न सूत्रों को जोड़ूँगा
शोषण का बूँद-बूँद रक्त मैं निचोड़ूँगा
शुभ कृत्यों पर हावी होते दुष्कृत्यों को
शब्दों से रोकूँगा, करता तैयारी हूँ
अगणित तलवारों पर…

ज़हरीले आकर्षण नयनों में पलते हैं
देखूँगा ये कैसे मानव को छलते हैं
सूर्य सभ्यताओं के उगते और ढलते हैं
मेरे संकेतों पर युग रूकते-चलते हैं
मानवता की रक्षा-हित निर्मित दुर्गों का
मैं भी इस छोटा-सा कर्मठ प्रतिहारी हूँ
अगणित तलवारों पर…

लक्ष्य तो कठिन है पर जैसे हो पाना है
भटकी इस जगती को रस्ते पर लाना है
रावणों के मानस को राममय बनाना है
एक नई रामायण फिर मुझको गाना है
माँ सरस्वती मुझ पर भी कृपा किए रहना
आपकी चरण-रज का मैं भी अधिकारी हूँ
अगणित तलवारों पर…

दुख के अँधियारों में मैंने काटा जीवन
लगता है मुट्ठी, दो मुट्ठी आटा जीवन
देने का तत्पर है प्रतिपल घाटा जीवन
जैसा है सबकी सेवा हित बाँटा जीवन
संघर्षों की दुर्गम घाटियाँ नियति में हैं
हार नहीं मानूँगा, धैर्य का पुजारी हूँ
अगणित तलवारों पर…

Share