वीरेन डंगवाल की रचनाएँ

अकेला तू तभी

तू तभी अकेला है जो बात न ये समझे

हैं लोग करोडों इसी देश में तुझ जैसे

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे

दाना पानी देती है वह कल्याणी है

गुटरू-गूँ कबूतरों की, नारियल का जल

पहिये की गति, कपास के ह्रदय का पानी है

तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने

पीडा की कठिन अर्गला को तोडें कैसे!

आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे

आँखें मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो.

दो रात और तीन दिन का सफ़र तय करके
छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह
रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रँक खोलो
अपनी गन्दी जर्सी उतार कर कलफ़दार वर्दी पहन लो
रम की बोतलों को हिफ़ाज़त से रख लो रामसिंह, वक़्त ख़राब है ;
खुश हो, तनो, बस, घर में बैठो, घर चलो।

तुम्हारी याददाश्त बढ़िया है रामसिंह
पहाड़ होते थे अच्छे मौक़े के मुताबिक
कत्थई-सफ़ेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ़
ख़ुशी होती थी
तुम कनटोप पहन कर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में, गड़ी हई दौलत की तरह रक्खा गुड़ होता था
हवा में मशक्कत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे फ़ौजियों की तरह
नींद में सुबकते घरों पर गिरा करती थी चट्टानें
तुम्हारा बाप
मरा करता था लाम पर अँगरेज़ बहादुर की ख़िदमत करता
माँ सारी रात रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने
घरों के भीतर तक घुस आया करता था बाघ
भूत होते थे
सीले हुए कमरों में
बिल्ली की तरह कलपती हई माँ होती थी, बिल्ली की तरह
पिता लाम पर कटा करते थे
ख़िदमत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे सिपाहियों की तरह ;
सड़क होती थी अपरिचित जगहों के कौतुक तुम तक लाती हई
मोटर में बैठ कर घर से भागा करते थे रामसिंह
बीहड़ प्रदेश की तरफ़ ।

तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह ?
तुम बन्दूक के घोड़े पर रखी किसकी उँगली हो ?
किसका उठा हुआ हाथ ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफ़ीस दस्ताना ?
ज़िन्दा चीज़ में उतरती हुई किसके चाकू की धार ?
कौन हैं वे, कौन
जो हर समय आदमी का एक नया इलाज ढूँढ़ते रहते हैं ?
जो रोज़ रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं
वो माहिर लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं ।

पहले वे तुम्हें क़ायदे से बन्दूक पकड़ना सिखाते हैं
फिर एक पुतले के सामने खड़ा करते हैं
यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला
इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
उसके बाद वे तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह बदमाश पुतले
इन्हें गोली मार दो, इन्हें संगीन भोंक दो, इन्हें… इन्हें… इन्हें…
वे तुम पर खुश होते हैं — तुम्हें बख़्शीश देते हैं
तुम्हारे सीने पर कपड़े के रंगीन फूल बाँधते हैं
तुम्हें तीन जोड़ा वर्दी, चमकदार जूते
और उन्हें चमकाने की पॉलिश देते हैं
खेलने के लिए बन्दूक और नंगीं तस्वीरें
खाने के लिए भरपेट खाना, सस्ती शराब
वे तुम्हें गौरव देते हैं और इसके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हई
लडकियों से बचपन में सीखे गए गीत ले लेते हैं

सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढ़िया है ।

बहुत घुमावदार है आगे का रास्ता
इस पर तुम्हें चक्कर आएँगे रामसिंह मगर तुम्हें चलना ही है
क्योंकि ऐन इस पहाड़ की पसली पर
अटका है तुम्हारा गाँव

इसलिए चलो, अब ज़रा अपने बूटों के तस्में तो कस लो
कन्धे से लटका ट्राँजिस्टर बुझा दो तो ख़बरें आने से पहले
हाँ, अब चलो गाड़ी में बैठ जाओ, डरो नहीं
गुस्सा नहीं करो, तनो

ठीक है अब ज़रा आँखें बन्द करो रामसिंह
और अपनी पत्थर की छत से
ओस के टपकने की आवाज़ को याद करो
सूर्य के पत्ते की तरह काँपना
हवा में आसमान का फड़फड़ाना
गायों का रम्भाते हुए भागना
बर्फ़ के ख़िलाफ़ लोगों और पेड़ों का इकठ्ठा होना
अच्छी ख़बर की तरह वसन्त का आना
आदमी का हर पल, हर पल मौसम और पहाड़ों से लड़ना
कभी न भरने वाले ज़ख़्म की तरह पेट
देवदार पर लगे ख़ुशबूदार शहद के छत्ते
पहला वर्णाक्षर लिख लेने का रोमांच
और अपनी माँ की कल्पना याद करो
याद करो कि वह किसका ख़ून होता है
जो उतर आता है तुम्हारी आँखों में
गोली चलने से पहले हर बार ?

कहाँ की होती है वह मिटटी
जो हर रोज़ साफ़ करने के बावजूद
तुम्हारे बूटों के तलवों में चिपक जाती है ?

कौन होते हैं वे लोग जो जब मरते हैं
तो उस वक्त भी नफ़रत से आँख उठाकर तुम्हें देखते हैं ?

आँखें मून्दने से पहले याद करो रामसिंह और चलो ।

इतने भले नहीं बन जाना

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना

इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो

काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी

इन्द्र

इन्द्र के हाथ लम्बे हैं

उसकी उंगलियों में हैं मोटी-मोटी

पन्ने की अंगूठियाँ और मिज़राब

बादलों-सा हल्का उसका परिधान है

वह समुद्रों को उठाकर बजाता है सितार की तरह

मन्द गर्जन से भरा वह दिगन्त-व्यापी स्वर

उफ़!

वहाँ पानी है

सातों समुद्रों और निखिल नदियों का पानी है वहाँ

और यहाँ हमारे कंठ स्वरहीन और सूखे हैं।

उधो, मोहि ब्रज

गोड़ रहीं माई ओ मउसी ऊ देखौ
आपन-आपन बालू के खेत
कहां को बिलाये ओ बेटवा बताओ
सिगरे बस रेत ही रेत।
अनवरसीटी हिरानी हे भइया
हेराना सटेसन परयाग
जाने केधर गै ऊ सिविल लैनवा
किन बैरन लगाई ई आग।

वो जोशभरे नारे वह गुत्थमगुत्था बहसों की
वे अध्यापक कितने उदात्त और वत्सल
वह कहवाघर!
जिसकी ख़ुशबू बेचैन बुलाया करती थी
हम कंगलों को

दोसे महान
जीवन में पहली बार चखा जो हैम्बरगर।
छंगू पनवाड़ी शानदार
अद्भुत उधार।
दोस्त निश्छल। विद्वेषहीन
जिनकी विस्तीर्ण भुजाओं में था विश्व सकल
सकल प्रेम
ज्ञान सकल।
अधपकी निमौली जैसा सुन्दर वह हरा-पीला
चिपचिपा प्यार
वे पेड़ नीम के ठण्डे
चित्ताकर्षक पपड़ीवाले काले तनों पर
गोंद में सटी चली जाती मोटी वाली चींटियों की क़तार
काफ़ी ऊपर तक
इन्हीं तनों से टिका देते थे हम
बिना स्टैण्ड वाली अपनी किराये की साइकिल।
सड़कें वे नदियों जैसी शान्त और मन्थर
अमरूदों की उत्तेजक लालसा भरी गन्ध
धीमे-धीमे से डग भरता हुआ अक्टूबर
गोया फ़िराक़।
कम्पनीबाग़ के भीने-पीले वे ग़ुलाब
जिन पर तिरछी आ जाया करती थी बहार
वह लोकनाथ की गली गाढ़ लस्सी वाली
वे तुर्श समोसे मिर्ची का मीठा अचार
सब याद बेतरह आते हैं जब मैं जाता जाता जाता हूँ।

अब बगुले हैं या पण्डे हैं या कउए हैं या हैं वकील
या नर्सिंग होम, नये युग की बेहूदा पर मुश्किल दलील
नर्म भोले मृगछौनों के आखेटोत्सुक लूमड़ सियार
खग कूजन भी हो रहा लीन!
अब बोल यार बस बहुत हुआ
कुछ तो ख़ुद को झकझोर यार!

कुर्ते पर पहिने जीन्स जभी से तुम भइया
हम समझ लिये
अब बखत तुम्हारा ठीक नहीं।

कटरी की रूकुमिनी

( यह कविता रूकुमिनी और उसकी माँ की खंडित कथा है, जिसके ताप को देश पिछले कुछ दिनों से महसूस करना सीख रहा है। उम्मीदन रूकुमिनी की कथा अब यहाँ से आगे नए मोड़ लेगी।)

कटरी की रूकुमिनी और उसकी माता की खण्डित गद्यकथा
(क्षुधार राज्ये पृथ्वी गद्यमय — सुकान्त भट्टाचार्य)

मैं थक गया हूँ

फुसफुसाता है भोर का तारा
मैं थक गया हूँ चमकते-चमकते इस फीके पड़ते
आकाश के अकेलेपन में
गंगा के ख़ुश्‍क कछार में उड़ती है रेत
गहरे काही रंग वाले चिकने तरबूजों की लदनी ढोकर
शहर की तरफ चलते चले जाते हैं हुचकते हुए ऊँट
अपनी घण्टियाँ बजाते प्रात की सुशीतल हवा में

जेठ विलाप के रतजगों का महीना है
घण्टियों के लिए गाँव के लोगों का प्रेम
बड़ा विस्‍मित करने वाला है
और घुँघरूओं के लिए भी

रंगी डोर से बँधी घण्टियाँ
बैलों-गायों-बकरियों के गले में
और कोई-कोई बच्‍चा तो कई बार
बत्‍तख की लम्‍बी गर्दन को भी
इकलौते निर्भार घुँघरू से सजा देता है

यह दरअसल उनका प्रेम है
उनकी आत्‍मा का संगीत
जो इन घण्टियों में बजता है

यह जानकारी केवल मर्मज्ञों के लिए
साधारण जन तो इसे जानते ही हैं ।

दरअसल मैंने तो पकड़ा ही एक अलग रास्‍ता
वह छोटा नहीं था न आसान
फ़कत फ़ितूर जैसा एक पक्‍का यक़ीन
एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने

जब मैं उतरा गंगा की बीहड़ कटरी में
तो पालेज में हमेशा की तरह उगा रहे थे
कश्‍यप-धीमर-निषाद-मल्‍लाह
तरबूज और खरबूजे
खीरे-ककड़ी-लौकी-तुरई और टिण्‍डे

‘खटक-धड़-धड़’ की लचकदार आवाज़ के साथ
पुल पार करती
रेलगाड़ी की खिड़की से आपने भी देखा होगा कई बार
क्षीण धारा की बगल में
सफ़ेद बालू के चकत्‍तेदार विस्‍तार में फैला
यह नरम-हरा-कच्‍चा संसार

शामों को
मढ़ैया की छत की फूस से उठता धुआँ
और और भी छोटे-छोटे दीखते नँग-धड़ँग श्‍यामल
बच्‍चे —

कितनी हूक उठाता
और सम्‍मोहक लगता है
दूर देश जाते यात्री को यह दृश्‍य

ऐसी ही एक मढ़ैया में रहती है
चौदह पार की रूकुमिनी
अपनी विधवा माँ के साथ

बड़ा भाई जेल में है
एक पीपा कच्‍ची खेंचने के जुर्म में
छोटे की सड़ी हुई लाश दो बरस पहले
कटरी की उस घनी, ब्‍लेड-सी धारदार
पतेल घास के बीच मिली थी
जिसमें गुजरते हुए ढोरों की भी टाँगें चिर जाती है

लड़के का अपहरण कर लिया था
गंगा पार के कलुआ गिरोह ने
दस हजार की फिरौती के लिए
जिसे अदा नहीं किया जा सका

मिन्‍नत-चिरौरी सब बेकार गई

अब माँ भी बालू में लाहन दाब कर
कच्‍ची खींचने की उस्‍ताद हो चुकी है
कटरी के और भी तमाम मढ़ैयावासियों की तरह

कटरी के छोर पर बसे
बभिया नामक जिस गाँव की परिधि में आती है
रूकुमिनी की मढ़ैया
सोमवती, पत्‍नी रामखिलौना
उसकी सद्यःनिर्वाचित ग्रामप्रधान है
‘प्रधानपति’ — यह नया शब्‍द है
हमारे परिपक्‍व हो चले लोकतांत्रि‍क शब्‍दकोश का

रामखिलौना ने
बन्‍दूक और बिरादरी के बूते पर
बभिया में पता नहीं कब से दनदना रही
ठाकुरों की सिट्टी-पिट्टी को गुम किया है
कच्‍ची के कुटीर उद्योग को संगठित करके
उसने बिरादरी के फटेहाल उद्यमियों को
जो लाभ पहुँचाए हैं
उनकी भी घर-घर प्रशंसा होती है
इस सब से उसका मान काफ़ी बढ़ा है
रूकुमिनी की माँ को वह चाची कहता है
हरे खीरे जैसी बढ़ती बेटी को भरपूर ताककर भी
जिस हया से वह अपनी निगाह फेर लेता है
उससे उसकी सच्‍चरित्रता पर
माँ का कृतज्ञ विश्‍वास और भी दृढ़ हो जाता है

रूकुमिनी ठहरी सिर्फ़ चौदह पार की
‘भाई’ कहकर रामखिलौना से लिपट जाने का
जी होता है उसका
पर फिर पता नहीं क्‍या सोचकर ठिठक जाती है

मैंने रूकुमिनी की आवाज़ सुनी है
जो अपनी माँ को पुकारती बच्‍चों जैसी कभी
कभी उस युवा तोते जैसी
जो पिंजरे के भीतर भी
जोश के साथ सुबह का स्‍वागत करता है

कभी सिर्फ़ एक अस्‍फुट क्षीण कराह

मैने देखा है कई बार उसके द्वार
अधेड़ थानाध्‍यक्ष को
इलाके के उस स्‍वनामधन्‍य युवा
स्‍मैक-तस्‍कर वकील के साथ
जिसकी जीप पर इच्‍छानुसार ‘विधायक प्रतिनिधि’
अथवा ‘प्रेस’ की तख़्ती लगी रही है

यही रसूख होगा या बूढ़ी माँ की गालियों और कोसनों का धारा-प्रवाह
जिसकी वज़ह से
कटरी का लफ़ंगा स्‍मैक नशेड़ी समुदाय
इस मढ़ैया को दूर से ही ताका करता है
भय और हसरत से

एवम् प्रकार
रूकुमिनी समझ चुकी है बिना जाने
अपने समाज के कई जटिल और वीभत्‍स रहस्‍य
अपने निकट भविष्‍य में ही चीथड़ा होने वाले
जीवन और शरीर के माध्‍यम से
गो कि उसे शब्‍द ‘समाज’ का मानी भी पता नहीं

सोचो तो,
सड़ते हुए, जल में मलाई-सा उतराने को उद्यत
काई की हरी-सुनहरी परत सरीखा ये भविष्‍य भी
क्‍या तमाशा है

और स्‍त्री का शरीर !
तुम जानते नहीं, पर जब-जब तुम उसे छूते हो
चाहे किसी भाव से
तब उस में से ले जाते हो तुम

उसकी आत्‍मा का कोई अंश
जिसके खालीपन में पटकती है वह अपना शीश

यह इस सड़ते हुए जल की बात है
जिसकी बगल से गुज़रता है मेरा अलग रास्‍ता

रूकुमिनी का हाल जो हो
इस उमर में भी उसकी माँ की सपने देखने की आदत
नहीं गई
कभी उसे दीखता है
लाठी से गंगा के छिछले पेटे को ठेलता
नाव पर शाम को घर लौटता
चौदह बरस पहले मरा अपना आदमी नरेसा
जिसकी बाँहें जैसे लोहे की थी,
कभी पतेल लाँघ कर भागता चला आता बेटा दीखता है
भूख-भूख चिल्‍लाता
उसकी जगह-जगह कटी किशोर
खाल से रक्‍त बह रहा है

कभी दीखती है दरवाज़े पर लगी एक बरात
और आलता लगी रूकुमिनी की एड़ियाँ

सपने देखने की बूढ़ी की आदत नहीं गई

उसकी तमन्‍ना ही रह गई
एक गाय पाले, उसकी सेवा करे, उसका दूध पिए
और बेटी को पिलाए
पर सेवा उसे बेटी की करनी पड़ती है

काष्‍ठ के अधिष्‍ठान खोजती वह माता
हर समय कटरी के धारदार घास भरे
ख़ुश्‍क रेतीले जंगल में
उसका दिल कैसे उपले की तरह सुलगता रहता है
इसे वही जानती है
या फिर वे अदेखे सुदूर भले लोग
जिन्‍हें वह जानती नहीं
मगर जिनकी आँखों में अब भी उमड़ते हैं नम बादल
हृदयस्‍थ सूर्य के ताप से प्रेरित
उन्‍हें तो रात भी विनम्र होकर रोशनी दिखाती है,
पिटा हुआ वाक्‍य लगे फिर भी, फिर भी
मनुष्‍यता उन्‍हीं की प्रतीक्षा का खामोश गीत गाती है
मुँह-अँधेरे जाँता पीसते हुए

इसीलिए एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने
फ़ितूर सरीखा एक पक्‍का यक़ीन
इसीलिए भोर का थका हुआ तारा
दिगंत-व्‍यापी प्रकाश में डूब जाने को बेताब

कवि

१.

मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का उष्म ताप
मैं हूँ वसन्त में सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूंगफली को छाँट कर
चबाता फ़ुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज़ हूँ

उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ

इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज है
एक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप हो कर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर

एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा ।

२.

मैं हूँ रेत की अस्फुट फुसफुसाहट
बनती हुई इमारत से आती ईंटों की खरी आवाज़

मैं पपीते का बीज हूँ
अपने से भी कई गुना मोटे पपीतों को
अपने भीतर छुपाए
नाजुक ख़याल की तरह

हज़ार जुल्मों से सताए मेरे लोगो !
मैं तुम्हारी बद्दुआ हूँ
सघन अंधेरे में तनिक दूर पर झिलमिलाती
तुम्हारी लालसा

गूदड़ कपड़ों का ढेर हूँ मैं
मुझे छाँटो
तुम्हें भी प्यारा लगने लगूँगा मैं एक दिन
उस लालटेन की तरह
जिसकी रोशनी में
मन लगाकर पढ़ रहा है
तुम्हारा बेटा ।

कुछ कद्दू चमकाए मैंने

कुछ कद्दू चमकाए मैंने
कुछ रास्तों को गुलज़ार किया
कुछ कविता-टविता लिख दीं तो
हफ़्ते भर ख़ुद को प्यार किया

अब हुई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ
हाँ जीं हाँ वही कनफटा हूँ, हेठा हूँ
टेलीफ़ोन की बग़ल में लेटा हूँ
रोता हूँ धोता हूँ रोता-रोता धोता हूँ
तुम्हारे कपड़ों से ख़ून के निशाँ धोता हूँ

जो न होना था वही सब हुवाँ-हुवाँ
अलबत्ता उधर गहरा खड्ड था इधर सूखा कुआँ
हरदोई मे जीन्स पहनी बेटी को देख
प्रमुदित हुई कमला बुआ

तब रमीज़ कुरैशी का हाल ये था
कि बम फोड़ा जेल गया
वियतनाम विजय की ख़ुशी में
कचहरी पर अकेले ही नारे लगाए
चाय की दुकान खोली
जनता पार्टी में गया वहाँ भी भूखा मरा
बिलाया जाने कहॉ
उसके कई साथी इन दिनों टीवी पर चमकते हैं
मगर दिल हमारे उसी के लिए सुलगते हैं

हाँ जीं कामरेड कज्जी मज़े में हैं
पहनने लगे है इधर अच्छी काट के कपडे
राजा और प्रजा दोनों की भाषा जानते हैं
और दोनों का ही प्रयोग करते हैं अवसरानुसार
काल और स्थान के साथ उनके संकलन त्रय के दो उदहारण
उनकी ही भाषा में :
” रहे न कोई तलब कोई तिश्नगी बाकी
बढ़ा के हाथ दे दो बूँद भर हमे साकी ”
“मजे का बखत है तो इसमे हैरानी क्या है
हमें भी कल्लैन दो मज्जा परेसानी क्या है “

अनिद्रा की रेत पर तड़ पड़ तड़पती रात
रह गई है रह गई है अभी कहने से
सबसे ज़रूरी बात।

कैसी ज़िन्दगी जिए

एक दिन चलते-चलते
यों ही ढुलक जाएगी गरदन
सबसे ज़्यादा दुःख
सिर्फ चश्मे को होगा,
खो जाएगा उसका चेहरा
अपनी कमानियों से ब्रह्माण्ड को जैसे-तैसे थामे
वह भी चिपटा रहेगा मगर

कैसी ज़िन्दगी जिए
अपने ही में गुत्थी रहे
कभी बन्द हुए कभी खुले
कभी तमतमाए और दहाड़ने लगे
कभी म्याउँ बोले
कभी हँसे, दुत्कारी हुई ख़ुशामदी हँसी
अक्सर रहे ख़ामोश ही
अपने बैठने के लिए जगह तलाशते घबराए हुए

अकेले
एक ठसाठस भरे दृश्यागार में
देखने गए थे
पर सोचते ही रहे कि दिखे भी
कैसी निकम्मीं ज़िन्दगी जिए।

हवा तो खैर भरी ही है कुलीन केशों की गन्ध से
इस ऊष्म वसन्त में
मगर कहाँ जागता है एक भी शुभ विचार
खरखराते पत्तों में कोंपलों की ओट में
पूछते हैं पिछले दंगों में क़त्ल कर डाले गए लोग
अब तक जारी इस पशुता का अर्थ
कुछ भी नहीं किया गया
थोड़ा बहुत लज्जित होने के सिवा

प्यार एक खोई हुई ज़रूरी चिट्ठी
जिसे ढूँढ़ते हुए उधेड़ दिया पूरा घर
फुरसत के दुर्लभ दिन में
विस्मृति क्षुब्धता का जघन्यतम हथियार
मूठ तक हृदय में धँसा हुआ
पछतावा!

ख़ुद को ढूँढना

एक शीतोष्ण हँसी में
जो आती गोया
पहाड़ों के पार से
सीधे कानों फिर इन शब्दों में

ढूँढना ख़ुद को
ख़ुद की परछाई में
एक न लिए गए चुम्बन में
अपराध की तरह ढूँढ़ना

चुपचाप गुज़रो इधर से
यहाँ आँखों में मोटा काजल
और बेंदी पहनी सधवाएँ
धो रही हैं
रेत से अपने गाढ़े चिपचिपे केश
वर्षा की प्रतीक्षा में

गप्प-सबद

आंधी में उड़ियो न सखी, मत आंधी में उड़ियो।
ओ३म लिखा स्कूटर दौड़ा राम लिखा कर कार
लेकिन पप्पी दी गड्डी पर न्यौछावर संसार
उन्हीं का होना है संसार
बस न तू आंधी में उड़ियो

धक्-धक्-धक्-धक् काँपे हियरा थर-थर-थर-थर पैर
अलादीन को बेढब सूझी बेमौसम यह सैर
बिना चप्पू-लंगर यह सैर
ज़रा आंधी में मत उड़ियो

खाना खा लेटी ही थी झांसी की रानी थोड़ा
वहीं खाट के पास बंधा था उस का मश्की घोड़ा
बड़ी देर से मक्खी उसको एक कर रही तंग
खिसियाई रानी ने जब देखे उस के ढंग
चीखी, ‘नुचवा दूंगी मैं तेरे ये चारों पंख
तुड़ा दूँगी मैं आठों पैर
अरी, फिर आंधी में उड़ियो।’

देस बिराना हुआ मगर इस में ही रहना है
कहीं ना छोड़ के जान है, इसे वापस भी पाना है
बस न तू आंधी में उड़ियो। मती ना आंधी में उड़ियो।

गाज़ा का कुत्ता

वह जो कुर्सी पर बैठा
अख़बार पढ़ने का ढोंग कर रहा है
जासूस की तरह
वह दरअसल मृत्यु का फ़रिश्ता है ।

क्या शानदार डॉक्टरों जैसी बेदाग़ सफ़ेद पोशाक है उसकी
दवाओं की स्वच्छ गंध से भरी
मगर अभी जब उबासी लेकर अख़बार फड़फड़ाएगा,
जो दरअसल उसके पंख हैं
तो भयानक बदबू से भर जायेगा यह कमरा
और ताजा खून के गर्म छींटे
तुम्हारे चेहरे और बालों को भी लथपथ कर देंगे
हालांकि बैठा है वह समुद्रों के पार
और तुम जो उसे देख प् रहे हो
वह सिर्फ तकनीक है
ताकि तुम उसकी सतत उपस्तिथि को विस्मृत न कर सको

बालू पर चलते हैं अविश्वसनीय रफ़्तार से सरसराते हुए भारी-भरकम टैंक
घरों पर बुलडोजर
बस्तियों पर बम बरसते हैं
बच्चों पर गोलियां

एक कुत्ता भागा जा रहा है
धमाकों की आवाज़ के बीच
मुंह में किसी बच्चे की उखड़ी बची हुई भुजा दबाये
कान पूँछ हलके से दबे हुए
उसे किसी परिकल्पित
सुरक्षित ठिकाने की तलाश है
जहाँ वह इत्मीनान से
खा सके अपना शानदार भोज
वह ठिकाना उसे कभी मिलेगा नहीं ।

तोप

कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप

इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार

सुबह-शाम कम्पनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में

अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें

वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बन्द !

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे

तू तभी अकेला है जो बात न ये समझे
हैं लोग करोड़ों इसी देश में तुझ जैसे

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे
दाना पानी देती है वह कल्याणी है
गुटरूं-गूं कबूतरों की, नारियल का जल
पहिये की गति, कपास के हृदय का पानी है

तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने
पीड़ा की कठिन अर्गला को तोड़ें कैसे!

नाक

हस्ती की इस पिपहरी को
यों ही बजाते रहियो मौला!
आवाज़
बनी रहे आख़िर तक साफ-सुथरी-निष्कंप

इलाहाबाद : 1970

एक

मैं ले जाता हूँ तुझे अपने साथ
जैसे किनारे को ले जाता है जल

एक उचक्कापन, एक अवसाद, एक शरारत,
एक डर, एक क्षोभ, एक फिरकी, एक पिचका हुआ टोप
चूतड़ों पर एक ज़बरदस्त लात
खुरचना बन्द दरवाज़े को पंजों की दीनता से

विचित्र पहेली है जीवन

जहाँ के हो चुके हैं समझा किए
तौलिया बिछाकर इत्मीनान की साँस छोड़ते हुए
वहीं से कर दिए गए अपरिहार्य बाहर

दो

भरभरा कर गिरी पचासों शहतीरें
उनके नीचे एक आदमी है जो अभी ज़िन्दा है
आँखों की पुतलियाँ चढ़ गई हैं
होंठ की कोर से बह रही है ख़ून की एक लकीर
मगर अभी ज़िन्दा है वह आदमी
सहस्रों प्रकाश वर्ष दूर झिलमिलाता है जो स्वप्न
उस तक पहुँचने के लिए
एक रथ है उसकी नींद

तीन

अँधेरे में माचिस टटोलते हुए,
उँगलियों को मिलते हैं
कई परिचित चीज़ों के अपरिचित स्पर्श
देखते-बूझते भी
शाम को नहीं भरा था स्टोव में मिट्टी का तेल

आलस भाग
प्यार रह
नौकरी मिल
पत्नी हो
बना दे थोड़ी-सी खिचड़ी और चटनी

अकेलेपन
मत चिपचिपा गुदड़ी तकिए पे धरे गालों पर
मई के पसीने की तरह।

चार

एक व्यक्तिगत उदासी
दो चप्पलों की घिस-घिस
तीन कुत्तों का भौंकना
ऐसे ही बीत गया, यह भी, पूरा दिन

क्या ही अच्छा हो अगर ताला खोलते ही दीखें
चार-पाँच खत
कमरे के अँधेरे को दीप्त करते

पाँच

शुरू से मैंने पढ़ा
ग़लतियाँ इतनी थीं कि उन्हें
सुधारना मुमकिन न था
एक ग़रीब छापेख़ाने में छपी किताब था जीवन
ताक़त के इलाज इतने
कि बन गए थे रोग

कवि का सौभाग्य है पढ़ लिया जाना
जैसे खा लिया जाना
अमरूद का सौभाग्य है
हाँ, स्वाद भी अच्छा है और तासीर में भी
शायद कुछ और भी याद आ जाए
जैसे किसी और शहर में रहता कोई और

सात

धीरे-धीरे चुक जाएगा जब असफलता का स्वाद
तब आएगी ईर्ष्या

याद नहीं रहेगा रबड़ की चप्पल में
बार-बार निकलने वाली बद्दी का बैठाना
याद नहीं रहेगा साबुत अमरूद का टिर्रापन
हताश हृदय को कँपाएगी तेजस्वी प्रखरता
बदज़ायका लगेगी अच्छाई
शर्मिन्दगी होगी हृदय के कूप का मण्डूक
गुना था जिनके साथ जीवन का मर्म
वे ही दोस्त-अहबाब मिलेंगे अर्धपरिचितों की तरह

सफल होते ही बिला जाएगा
खोने का दुख और पाने का उल्लास

तब आएगी ईर्ष्या
लालच का बैण्ड-बाजा बजाती

आठ

छूटते हुए छोकड़ेपन का ग़म, कड़की, एक नियामत है दोसा
काफ़ी हाउस में थे कुछ लघु मानव, कुछ महामानव
दो चे ग्वेवारा
मनुष्य था मेरे साथ रमेन्द्र
उसके पास थे साढ़े चार रुपए

नौ

ग़फ्फ़ार
चेहरे पर एक वाचाल मुस्कान
कत्थे के चमकदार लोटे पर जलतरंग !
तजुरबे से ही आता है यह सब

कुरता सफ़ेद ही रहेगा अति-नीलग्रस्त झका-झक्क
घुटने तो ख़ैर, दुखेंगे ही
सोलह घण्टे जब लगातार बैठना होगा
इस बित्ते भर की गुमटी में

— अब वो बात कहाँ रही साहेब
अब तो एक से एक आवे लगा है
यूनवरसीटी में पढ़ने के लिए।

इस हिकारत में है चापलूसी का एक अद्वितीय ढंग
तजुरबे से ही आता है यह सब

— अपना लड़का है एकराम
वह बहरहाल छठी से आगे नहीं गया।

इतना ज़रूर है कि कभी किसी छात्र-नेता तक से
गाली नहीं खाई ग़फ्फ़ार ने
हालाँकि उधार भी न दिया
किसी कमज़ोर आसामी को।

(1982)

नागपुर के रस्ते

1

गाडी खडी थी

चल रहा था प्लेटफार्म

गनगनाता बसंत कहीं पास ही मे था शायद

उसकी दुहाई देती एक श्यामला हरी धोती में

कटि से झूम कर टिकाए बिक्री से बच रहे संतरों का टोकरा

पैसे गिनती सखियों से उल्लसित बतकही भी करती

वह शकुंतला

चलती चली जाती थी खडे खडे

चलते हुए प्लेटफार्म पर

तकती पल भर

खिड़की पर बैठे मुझको

2

सुबह कोई गाड़ी हो तो बहुत अच्छा

रात कोई गाड़ी हो तो बहुत अच्छा

चांद कोई गाड़ी हो तो सबसे अच्छा

सुबह कोई गाड़ी होती तो मैं शाम तक पहुंच जाता

रात कोई गाड़ी होती तो मैं सुबह तक पहुंच जाता

चांद कोई गाड़ी होती तो मैं उसकी खिड़की पर ठंडे ठंडे

बैठा देखता अपनी प्यारी पृथ्वी को

कहीं न कहीं तो पहुंच ही जाता।

नैनीताल में दीवाली

नैनीताल में दीवाली
ताल के ह्रदय बले
दीप के प्रतिबिम्ब अतिशीतल
जैसे भाषा में दिपते हैं अर्थ और अभिप्राय और आशय
जैसे राग का मोह

तड़ तडाक तड़ पड़ तड़ तिनक भूम
छूटती है लड़ी एक सामने पहाड़ पर
बच्चों का सुखद शोर
फिंकती हुई चिनगियाँ
बगल के घर की नवेली बहू को
माँ से छिपकर फूलझड़ी थमाता उसका पति
जो छुट्टी पर घर आया है बौडर से

पत्रकार महोदय

‘इतने मरे’
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।

अब सम्पादक
चूंकि था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी
लिहाज़ा अपरिहार्य था
ज़ाहिर करे वह भी अपनी राय।
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा
रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प।

जीवन
किन्तु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख़ के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा हहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था
अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार !

परम्परा

पहले उस ने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए
और कहा – ‘असल में यह तुम्हारी स्मृति है’
फिर उस ने हमारे विवेक को सुन्न किया
और कहा – ‘अब जा कर हुए तुम विवेकवान’
फिर उस ने हमारी आंखों पर पट्टी बांधी
और कहा – ‘चलो अब उपनिषद पढो’
फिर उस ने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की
नदी में उतार दी
और कहा – ‘अब अपनी तो यही है परम्परा’।

पेप्पोर रद्दी पेप्पोर

पेप्पोर रद्दी पेप्पोर
पहर अभी बीता ही है
पर चौंधा मार रही है धूप
खड़े खड़े कुम्हला रहे हैं सजीले अशोक के पेड़
उरूज पर आ पहुंचा है बैसाख
सुन पड़ती है सड़क से
किसी बच्चा कबाड़ी की संगीतमय पुकार
गोया एक फरियाद है अजान-सी
एक फरियाद है एक फरियाद
कुछ थोड़ा और भरती मुझे
अवसाद और अकेलेपन से

पन्द्रह अगस्त

सुबह नींद खुलती
तो कलेजा मुंह के भीतर फड़क रहा होता
ख़ुशी के मारे
स्कूल भागता
झंडा खुलता ठीक ७:४५ पर, फूल झड़ते
जन-गण-मन भर सीना तना रहता कबूतर की मानिन्द
बड़े लड़के परेड करते वर्दी पहने शर्माते हुए
मिठाई मिलती

एक बार झंझोड़ने पर भी सही वक़्त पर
खुल न पाया झण्डा, गांठ फंस गई कहीं
हेडमास्टर जी घबरा गए, गाली देने लगे माली को
लड़कों ने कहा हेडमास्टर को अब सज़ा मिलेगी
देश की बेइज़्ज़ती हुई है

स्वतंत्रता दिवस की परेड देखने जाते सभी
पिताजी चिपके रहते नए रेडियो से
दिल्ली का आंखों-देखा हाल सुनने

इस बीच हम दिन भर
काग़ज़ के झण्डे बनाकर घूमते
बीच का गोला बना देता भाई परकार से
चौदह अगस्त भर पन्द्रह अगस्त होती
सोलह अगस्त भर भी

यार, काग़ज़ से बनाए जाने कितने झण्डे
खिंचते भी देखे सिनेमा में
इतने बड़े हुए मगर छूने को न मिला अभी तक
कभी असल झण्डा
कपड़े का बना, हवा में फड़फड़ करने वाला
असल झण्डा
छूने तक को न मिला!

पितृपक्ष

मैं आके नहीं बैठूँगा कौवा बनकर तुम्हारे छज्जे पर
पूड़ी और मीठे कद्दू की सब्ज़ी के लालच में
टेरूँगा नहीं तुम्हें
न कुत्ता बनकर आऊँगा तुम्हारे द्वार
रास्ते की ठिठकी हुई गाय
की तरह भी तुम्हें नहीं ताकूँगा
वत्सल उम्मीद की हुमक के साथ

मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर
नमी बनकर
जिसके स्पर्श मात्र से
जाग उठता है जीवन मिट्टी में
कभी-कभी विद्रूप से भी भर देगी तुम्हें वह
जैसे सीलन नई पुती दीवारों को
विद्रूप कर देती है
ऐसा तभी होगा जब तुम्हारी इच्छाओं की इमारत
बेहद चमकीली और भद्दी हो जाएगी
पर मैं रहूँगा हरदम तुम्हारे भीतर पक्का

पी० टी० ऊषा

काली तरुण हिरनी
अपनी लम्बी चपल टाँगों पर
उड़ती है
मेरे ग़रीब देश की बेटी

ऑंखों की चमक में जीवित है अभी
भूख को पहचानने वाली विनम्रता
इसीलिए चेहरे पर नहीं है
सुनील गावस्कर की छटा

मत बैठना पी० टी० ऊषा
इनाम में मिली उस मारुति कार पर मन में भी इतराते हुए
बल्कि हवाई जहाज़ में जाओ
तो पैर भी रख लेना गद्दी पर

खाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है ?
कोई ग़म नहीं
वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के
सबसे ख़तरनाक खाऊ लोग हैं !

प्रेम कविता

प्यारी, बड़े मीठे लगते हैं मुझे तेरे बोल !
अटपटे और ऊल-जुलूल
बेसर-पैर कहाँ से कहाँ तेरे बोल !

कभी पहुँच जाती है अपने बचपन में
जामुन की रपटन-भरी डालों पर
कूदती हुई फल झाड़ती
ताड़का की तरह गुत्थम-गुत्था अपने भाई से
कभी सोचती है अपने बच्चे को
भाँति-भाँति की पोशाकों में
मुदित होती है

हाई स्कूल में होमसाइंस थी
महीने में जो कहीं देख लीं तीन फ़िल्में तो धन्य ,
प्यारी
गुस्सा होती है तो जताती है अपना थक जाना
फूले मुँह से उसाँसे छोड़ती है फू-फू
कभी-कभी बताती है बच्चा पैदा करना कोई हँसी-खेल नहीं
आदमी लोग को क्या पता
गर्व और लाड़ और भय से चौड़ी करती ऑंखें
बिना मुझे छोटा बनाए हल्का-सा शर्मिन्दा कर देती है
प्यारी

दोपहर बाद अचानक उसे देखा है मैंने
कई बार चूड़ी समेत कलाई को माथे पर
अलसाए
छुप कर लेटे हुए जाने क्या सोचती है
शोक की लौ जैसी एकाग्र

यों कई शताब्दियों से पृथ्वी की सारी थकान से भरी
मेरी प्यारी !

फ़ैजाबाद-अयोध्या

(फिर फिर निराला को)

1.

स्टेशन छोटा था, और अलमस्त
आवाजाही से अविचलित एक बूढा बन्दर धूप तापता था
अकेला
प्लेटफार्म नंबर दो पर।
चिलम पी रहा एक रिक्शावाला, एक बाबा के साथ।
बाबा संत न था
ज्ञानी था और गरीब।
रिक्शेवाले की तरह।

दोपहर की अजान उठी।
लाउडस्पीकर पर एक करुण प्रार्थना
किसी को भी ऐतराज़ न हुआ।
सरयू दूर थी यहाँ से अभी,
दूर थी उनकी अयोध्या।

2.

टेम्पो
खच्च भीड़
संकरी गलियाँ
घाटों पर तख्त ही तख्त
कंघी, जूते और झंडे
सरयू का पानी
देह को दबाता
हलकी रजाई का सुखद बोझ,
चारों और स्नानार्थी
मंगते और पण्डे।
सब कुछ था पूर्ववत अयोध्या में
बस उत्सव थोडा कम
थोडा ज्यादा वीतराग,
मुंडे शीश तीर्थंकर सेकते बाटी अपनी
तीन ईंटों का चूल्हा कर
जैसे तैसे धौंक आग।
फिर भी क्यों लगता था बार बार
आता हो जैसे, आता हो जैसे
किसी घायल हत्-कार्य धनुर्धारी का
भिंचा-भिंचा विकल रुदन।

3.

लेकिन
वह एक और मन रहा राम का
जो
न थका।
जो दैन्यहीन, जो विनयहीन,
संशय-विरहित, करुणा-पूरित, उर्वर धरा सा
सृजनशील, संकल्पवान
जानकी प्रिय का प्रेम भरे जिसमें उजास
अन्यायक्षुब्ध कोटिशः जनों का एक भाव
जनपीड़ा-जनित प्रचंड क्रोध
भर देता जिस में शक्ति एक
जागरित सतत ज्योतिर्विवेक।
वह एक और मन रहा राम का
जो न थका।

इसीलिए रौंदी जा कर भी
मरी नहीं हमारी अयोध्या।
इसीलिए हे महाकवि, टोहता फिरता हूँ मैं इस
अँधेरे में
तेरे पगचिह्न।

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