शंभुनाथ तिवारीकी रचनाएँ

उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है 

उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है
नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है

जिनकी बुनियादें खुदग़र्ज़ी पर होंगी
ऐसे रिश्तों का चल पाना मुश्किल है

बेहतर है कि खुद को ही तब्दील करें
सारी दुनिया को समझाना मुश्किल है

जिनके दिल में कद्र नहीं इनसानों की
उनकी जानिब हाथ बढ़ाना मुश्किल है

रखकर जान हथेली पर चलना होगा
आसानी से कुछ भी पाना मुश्किल है

दाँवपेंच से हम अनजाने हैं बेशक
हम सब को यूँ ही बहकाना मुश्किल है

उड़ना रोज परिंदे की है मजबूरी
घर बैठे परिवार चलाना मुश्किल है

क़ातिल की नज़रों से हम महफूज़ कहाँ
सुबहो-शाम टहलने जाना मुश्किल है

तंग नजरिये में बदलाब करो वर्ना
कल क्या होगा ये बतलाना मुश्किल है

हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद 

हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद

कौन समझेगा कभी उस तैरने वाले का ग़म
डूब जाये जो समंदर पार कर जाने के बाद

आग से जो खेलते हैं वे समझते है कहाँ
बस्तियाँ फिर से नहीं बसतीं उजड़ जाने के बाद

आशियाने को न जाने लग गई किसकी नज़र
फिर नहीं आया परिंदा लौटकर जाने के बाद

ज़लज़ले सब कुछ मिटा जाते हैं पल भर में मगर
ज़ख्म मिटते है कहाँ सदियाँ गुज़र जाने के बाद

आज तक कोई समझ पाया न यह राज़े-हयात
आदमी आखिर कहाँ जाता है मर जाने के बाद

प्यार से जितनी भी कट जाए वही है ज़िंदगी
याद कब करती है दुनिया कूच कर जाने के बाद

नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में

नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में
मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में

तलाशो मत मियाँ रिश्ते, बहुत बेदर्द हैं गलियाँ
बड़ी मुश्किल से मिलते है सही इंसान दिल्ली में

शराफ़त से किसी भी भीड़ में होकर खड़े देखो
कोई भी थूक देगा मुँह पे खाकर पान दिल्ली में

जिन्हें लूटा नहीं कोई बड़ी तक़दीर वाले हैं
यहाँ फूलन की भी लूटी गई दुकान दिल्ली में

गली- कूचे- मुहल्ले- सड़क- चौराहे- कहीं भी हों
जहाँ भी जाइए हर वक्त ख़तरे- जान दिल्ली में

सुनाएँ क्या कहानी भीड़वाली बस में चढ़ने की
हथेली पर लिए फिरते हैं अपनी जान दिल्ली में

पते की पर्चियाँ ज़ेबों में डाले कर सफ़र वर्ना
सड़ेगी लाश लावारिश बिना पहचान दिल्ली में

लफंगे- चोर- चाईं- गिरहकट- गुंडे- लुटेरों से
मुझे तो दूर ही रखना मेरे भगवान दिल्ली में

घुटन होती है सुनकर दास्ताने-शहर दिल्ली की
जहाँ जीना भी, मरना भी, नहीं असान दिल्ली में

कौन यहाँ खुशहाल बिरादर 

कौन यहाँ खुशहाल बिरादर
बद-से-बदतर हाल बिरादर

क़दम-क़दम पर काँटे बिखरे
रस्ते-रस्ते ज़ाल बिरादर

किसकी कौन यहाँ पर सुनता
भटको सालों-साल बिरादर

मिल जाएँगे रोज़ दरिंदे
ओढ़े नकली ख़ाल बिरादर

समय नहीं है नेकी करके
फिर दरिया में डाल बिरादर

वह क्या देगा ख़ाक़ किसी को
जो ख़ुद ही कंगाल बिरादर

जब से पहुँच गए हैं दिल्ली
बदल गई है चाल बिरादर

लफ़्फ़ाजी से बात बनेगी
ख़ुशफहमी मत पाल बिरादर

हम बेचारों की उलझन तो
अब भी रोटी-दाल बिरादर

क्या कहें ज़िंदगी का फ़साना मियाँ

क्या कहें ज़िंदगी का फ़साना मियाँ
कब हुआ है किसी का ज़माना मियाँ

रोज़ है इम्तिहाँ आदमी के लिए
ये सुब्ह-शाम का आना-जाना मियाँ

दर्द जो दोस्तों से मिला है हमें
उसको मुश्किल बहुत है भुलाना मियाँ

एक मुद्दत से मेरी ज़ुबा बंद है
क्या ज़रूरी वजह भी बताना मियाँ

लौटकर क्यों परिंदे इधर आएँगे
जब रहा ही नहीं आशियाना मियाँ

हमको तक़दीर लेकर गई जिस जगह
हमने माना वहीं आब-दाना मियाँ

बात जब हद से आगे गुज़र जाती है
काम आता न कोई बहाना मियाँ

आज बेशक यह सूखा हुआ पेड़ है
था परिंदों का वर्षों ठिकाना मियाँ

आदमी जिनकी नज़रों में कुछ भी नहीं
ऐसे लोगों से क्या दोस्ताना मियाँ

लोग क्या से क्या न जाने हो गए

लोग क्या से क्या न जाने हो गए
आजकल अपने बेगाने हो गए

आदमी टुकड़ों में इतने बँट चुका
सोचिए कितने घराने हो गए

बेसबब ही रहगुजर में छोड़ना
दोस्ती के आज माने हो गए

प्यार-सच्चाई-शराफत कुछ नहीं
आजकल केवल बहाने हो गए

वक्त ने की इसकदर तबदीलियाँ
जो हकीकत थे फसाने हो गए

जो कभी इस दौर के थे रहनुमा
अब वही गुज़रे ज़माने हो गए

आज फिर खाली परिंदा लौट आया
किसकदर मुहताज़ दाने हो गए

थे कभी दिल का मुकम्मल आइना
अब मगर चेहरे सयाने हो गए

जब हुआ दिल आसना ग़म से मेरा
दर्द के बेहतर ठिकाने हो गए

सोचकर मुझको ये हैरानी बहुत है

सोचकर मुझको ये हैरानी बहुत है
दुश्मनी अपनों ने ही ठानी बहुत है

जानकर मैं अबतलक अनजान-सा हूँ
हाँ,उसी ने मुट्ठियाँ तानी बहुत है

दे गया है ग़म ज़माने भर का लेकिन
अब उसे क्योंकर पशेमानी बहुत है

चाहता है दिल से पर कहता नहीं क्यों
ये अदा जो भी हो लासानी बहुत है

दोस्ती का भी शिला मुझको मिला ये
ख़ाक़ मैंने उम्र भर छानी बहुत है

ज़िंदगी में फूल भी काँटे भी बेशक़
चंद ख़ुशियाँ तो परीशानी बहुत है

किसलिए ख़ुद पर गुमाँ कोई करेगा
जब यकीनन ज़िदगी फ़ानी बहुत है

रह सकूँ खामोश सबकुछ जानकर भी
गर मिले मुझको ये नादानी बहुत है

आ सके आँखों में गर दो बूँद पानी
ज़िंदगी के बस यही मानी बहुत है

बेमतलब आँखों के कोर भिगोना क्या

बेमतलब आँखों के कोर भिगोना क्या
अपनी नाकामी का रोना-रोना क्या

बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की
वक़्त गया फिर पछताने से होना क्या

भाईचारा-प्यार-मुहब्बत नहीं अगर
तब रिश्ते-नातों को लेकर ढ़ोना क्या

जिसने जान लिया की दुनिया फ़ानी है
उसे फूल या काटों भरा बिछौना क्या

क़ातिल को भी क़ातिल लोग नहीं कहते
ऐसे लोगों का भी होना-होना क्या

मज़हब ही जिसकी दरवेश फक़ीरी है
उसकी नज़रों में क्या मिट्टी-सोना क्या

जहाँ नहीं कोई अपना हमदर्द मिले
उस नगरी में रोकर आँखें खोना क्या

मुफ़लिस जिसे बनाकर छोड़ा गर्दिश ने
उस बेचारे का जगना भी सोना क्या

फिक्र जिसे लग जाती उसकी मत पूछो
उसको जंतर-मंतर-जादू-टोना क्या

नहीं कुछ भी बताना चाहता है 

नहीं कुछ भी बताना चाहता है
भला वह क्या छुपाना चाहता है

तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की
वही ख़ुद मुस्कुराना चाहता है

किया है ख़ाक़ जिसने चमन को वो
मुक़म्मल आशियाना चाहता है

हथेली पर सजाकर एक क़तरा
समंदर वह बनाना चाहता है

ज़माना काश,हो उसके सरीखा
यही दिल से दीवाना चाहता है

ज़रा सी बात है बस रौशनी की
मगर वह घर जलाना चाहता है

ज़ुबाँ से कुछ न बोलूँ जुल्म सहकर
यही मुझसे ज़माना चाहता है

लगीं कहने यहाँ खामोशियाँ भी
ज़ुबाँ तक कुछ तो आना चाहता है

होना मत हैरान परिंदे 

होना मत हैरान परिंदे
दुनिया को पहचान परिंदे

पिंजड़े से बाहर मत आना
बात पते की मान परिंदे

कैसा ज़हर हवाओं में है
तू इससे अनजान परिंदे

बाहर आकर पछताएगा
मान भले मत मान परिंदे

तरसेगा दाने-दाने को
बेशक दुनिया छान परिंदे

खुली हवा में उड़ना शायद
रहा नहीं असान परिंदे

जाने कौन कहाँ कर जाए
तुमको लहूलुहान परिंदे

बहुत हो गए हैं दुनिया में
पत्थर के इनसान परिंदे

तू महफ़ूज़ सिर्फ़ पिंजड़े में
बाहर खतरे-जान परिंदे

लीक से हटकर अलग अंदाज़ की बातें करें

लीक से हटकर अलग अंदाज़ की बातें करें
भूलकर गुज़रे ज़माने आज की बातें करें

वक्त बीता लौटकर वापस कभी आता नहीं
है यही बेहतर नए अंदाज़ की बातें करें

आदमीयत से बड़ा जज्बा कोई होता नहीं
दिल को छू जाए उसी आवाज़ की बातें करें

आस्माँ तक का सफ़र मुश्किल है नामुमकिन नहीं
हौसले के साथ गर पर्वाज़ की बातें करें

प्यार का पैगाम देना आदमी का फर्ज़ है
छोड़िए उनको जो नख़रो-नाज़ की बातें करें

पाँव मंज़िल की तरफ़ जब उठ गए तो खौफ़ क्या
बुजदिलों को छोड़कर जाँबाज़ की बातें करें

हर किसी से ग़म – खुशी भी बाँटना अच्छा नहीं
जो समझता हो उसी से राज़ की बातें करें

खो चुका है आदमी जब आजकल शर्मो-हया
तब बदलते दौर में कुछ लाज की बातें करें

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