शकुन्त माथुर की रचनाएँ

दोपहरी 

गरमी की दोपहरी में
तपे हुए नभ के नीचे
काली सड़कें तारकोल की
अँगारे-सी जली पड़ी थीं
छाँह जली थी पेड़ों की भी
पत्ते झुलस गए थे
नँगे-नँगे दीघर्काय, कँकालों से वृक्ष खड़े थे
हों अकाल के ज्यों अवतार

एक अकेला ताँगा था दूरी पर
कोचवान की काली सी चाबुक के बल पर
वो बढ़ता था
घूम-घूम ज्यों बलखाती थी सर्प सरीखी
बेदर्दी से पड़ती थी दुबले घोड़े की गरम
पीठ पर।
भाग रहा वह तारकोल की जली
अँगीठी के उपर से।

कभी एक ग्रामीण धरे कन्धे पर लाठी
सुख-दुख की मोटी सी गठरी
लिए पीठ पर
भारी जूते फटे हुए
जिन में से थी झाँक रही गाँवों की आत्मा
ज़िन्दा रहने के कठिन जतन में
पाँव बढ़ाए आगे जाता।

घर की खपरैलों के नीचे
चिड़ियाँ भी दो-चार चोंच खोल
उड़ती – छिपती थीं
खुले हुए आँगन में फैली
कड़ी धूप से।

बड़े घरों के श्वान पालतू
बाथरूम में पानी की हल्की ठण्डक में
नयन मून्द कर लेट गए थे।

कोई बाहर नहीं निकलता
साँझ समय तक
थप्पड़ खाने गर्म हवा के
सन्ध्या की भी चहल-पहल ओढ़े थी
गहरे सूने रँग की चादर
गरमी के मौसम में।

डर लगता है

मधु से भरे हुए मणि-घट को
ख़ाली करते डर लगता है।

जिसमें सारा सिन्धु समाया
मेरे छोटे जीवन-भर का
दूजे बर्तन में उँड़ेलते
एक बून्द भी छिटक न जाए
कहीं बीच में टूट न जाए
छूने भर से जी कँपता है।

इस धरणी की प्यासी आँखें
लगीं इसी की ओर एकटक
आई जग में सुधा कहाँ से
जल का भी तो काल पड़ा है।

प्राण बिना मिट्टी-सा यह तन
भार उठाऊँ इसका कैसे
छोड़ नहीं पाती फिर भी तो
ज़रा उठाते जी हिलता है।

तन गरमाया दुख लपटों से
धीरे-धीरे जला जा रहा
अभी बहुत बाक़ी जलने को
घट में मेरी पड़ी दरारें
साहस आज दूर भगता है।

मधु से भरे मणि-घट को
ख़ाली करते डर लगता है।

पानी बहुत बरसा

अबकी पानी बहुत बरसा
टूट गए तन बाँध
मन तो बहुत सरसा

बहती रही रस धार
दूर हुई सारी थकान
मन ने फिर से
थाम ली लगाम

पानी बहुत बरसा

ये बाढ़ से खण्डहर हुए घर
अपने पर हँसते
यह बसे-बसे घर
उजड़े से दिखते
मेरा मन डरपा
पानी बहुत बरसा

हम तुम निहाल
समर्पण के गीत
विश्वसनीय गीत
दोनों का आकर्षण खींच रहा
कोई बगिया सींच रहा
फिर भी क्यूँ
एक दुखी
अनुभव तड़पा
सिंधु का, सेतु का, नदिया का
जुड़ा है इतिहास
पानी पड़ी नौका रही काँप
जल को देखो
स्वयं अपने को
रहा साध
अबकी पानी बहुत बरसा।

जब मैं थका हुआ घर आऊँ

जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।

चाहे दिन भर बहें पसीने
कितने भी हों कपड़े सीने
बच्चा भी रोता हो गीला
आलू भी हो आधा छीला

जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो

सब तूफ़ान रुके हों घर के
मुझको देखो आँखें भर के
ना जूड़े में फूल सजाए
ना तितली से वसन, न नखरे

जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो

अधलेटी हो तुम सोफ़े पर
फॉरेन मैगज़ीन पढ़ती हो
शीशे सा घर साफ़ पड़ा हो
आहट पर चौंकी पड़ती हो
तुम कविता मत लिखो सलोनी,
मैं काफी हूँ, तुम प्रियतर हो

जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।

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