शबाना यूसफ़ ग़ज़लें

है कोई दर्द मुसलसल रवाँ-दवाँ मुझ में

है कोई दर्द मुसलसल रवाँ-दवाँ मुझ में
बना लिया है उदासी ने इक मकाँ मुझ में

मिला है इज़्न सुख़न की मसाफ़तों का फिर
खुले हुए हैं तख़य्युल के बादबाँ मुझ में

सहाबी शाम सर-ए-चश्म फैलते जुगनू
किसी ख़याल ने बो दी ये कहकशाँ मुझ में

मुहाजरत ये शजर-दर-शजर हवाओं की
बसाए जाती हैं ख़ाना-बदोशियाँ मुझ में

अजीब ज़िद पे ब-ज़िद है ये मुश्त-ए-ख़ाक बदन
अगर है मेरी रहे फिर ये मेरी जाँ मुझ में

मिरा वजूद बना है ये कैसी मिट्टी से
समाए जाती हैं कितनी ही हस्तियाँ मुझ में

हम अगर सच के उन्हें क़िस्से सुनाने लग जाएँ

हम अगर सच के उन्हें क़िस्से सुनाने लग जाएँ
लोग तो फिर हमें महफ़िल से उठाने लग जाएँ

याद भी आज नहीं ठीक तरह से जो शख़्स
हम उसे भूलना चाहें तो ज़माने लग जाएँ

शाम होते ही कोई ख़ुश्बू दरीचा खोले
और फिर बीत हुए लम्हे सताने लग जाएँ

ख़ुद चरागों को अंधेरों की ज़रूरत है बहुत
रौशनी हो तो उन्हें लोग बुझाने लग जाएँ

इक यही सोच बिछड़ने नहीं देती तुझ से
हम तुझे बाद में फिर याद न आने लग जाएँ

एक मुद्दत से ये तन्हाई में जागे हुए लोग
ख़्वाब देखें तो नया शहर बसाने लग जाएँ

हिसार-ए-ज़ात में सारा जहान होना था

हिसार-ए-ज़ात में सारा जहान होना था
क़रीब ऐसे तुझे मेरी जान होना था

तिरी जबीं पे शिकन क्यूँ विसाल-लम्हे में
मोहब्बतों का यहाँ तो निशान होना था

तुम्हारे छूने से कुछ रौशनी बदन को मिली
वगरना उस को फ़क़त राख-दान होना था

तुम्हारी नफ़रतों ने मिट्टी में मिला डाला
जो ख़्वाब तारा सा पल्कों की शान होना था

बहुत ही थोड़ी थी दिल में तुम्हारे उम्र मिरी
थी ख़्वाब-ज़ाद मुझे दास्तान होना था

बिछड़ गया तो ‘शबाना’ मलाल क्या करना
उसे बिछड़ना था वहम ओ गुमान होना था

इक महकते गुलाब जैसा है 

इक महकते गुलाब जैसा है
ख़ूब-सूरत से ख़्वाब जैसा है

मैं उसे पढ़ती हूँ मोहब्बत से
उस का चेहरा किताब जैसा है

बे-यक़ीनी ही बे-यक़ीनी है
हर समुंदर सराब जैसा है

मैं भटकती हूँ क्यूँ अँधेरों में
वो अगर आफ़्ताब जैसा है

डूबती जाए ज़ीस्त की नाव
हिज्र लम्हा चनाब जैसा है

मैं हक़ाएक़ बयान कर दूँगी
ये गुनह भी सवाब जैसा है

चैन मिलता है उस से मिल के मगर
चैन भी इजि़्तराब जैसा है

अब ‘शबाना’ मिरे लिए वो शख़्स
एक भूले निसाब जैसा है

लौट आएगा किसी शाम यही लगता है 

लौट आएगा किसी शाम यही लगता है
जगमगाएँगे दर-ओ-बाम यही लगता है

ज़ीस्त की राह में तन्हा जो भटकती हूँ मैं
ये वफ़ाओं का है इनआम यही लगता है

एक मुद्दत से मुसलसल हूँ सफ़र में लेकिन
मंज़िल शौक़ है दो-गाम यही लगता है

इक कली बर सर-ए-पैकर ख़िज़ाओं से हैं
ये नहीं वाकिफ़-ए-अंजाम यही लगता है

मेरे आने की ख़बर सुन के वो दौड़ा आता
उस को पहुँचा नहीं पैग़ाम यही लगता है

मुझ को भी कर देगा रूस्वा वो ज़माने भर में
ख़ुद भी हो जाएगा बदनाम यही लगता है

भूलना उस को है आसान ‘शबाना’ लेकिन
मुझ से होगा नहीं ये काम यही लगता है

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है
सहारे पेड़ के ये बेल जो खड़ी हुई है

अभी से छोटी हुई जा रही हैं दीवारें
अभी तो बेटी ज़रा सी मिरी बड़ी हुई है

बना के घोंसला चिड़िया शजर की बाँहों में
न जाने किस लिए आँधी से अब डरी हुई है

अभी तो पहले सफ़र की थकन है पाँव में
कि फिर से जूती पे जूती मिरी पड़ी हुई है

नई रूतों के मुक़द्दस बुलावे तो हैं मगर
सलीब वादों की जो रह में इक गड़ी हुई है

मैं हाथ बाँधे हुए लौट आई हूँ घर में
कि मेरे पर्स में इक आरज़ू मरी हुई है

अगर बिछड़ने का उस से कोई मलाल नहीं
‘शबाना’ अश्क से फिर आँख क्यूँ भरी हुई है

ये अपने आप पे ताज़ीर कर रही हूँ मैं

ये अपने आप पे ताज़ीर कर रही हूँ मैं
कि अपनी सोच को ज़ंजीर कर रही हूँ मैं

हवाओं से भी निभानी है दोस्ती मुझ को
दिए का लफ़्ज़ भी तहरीर कर रही हूँ मैं

न जाने कब से बदन थे अधूरे ख़्वाबों के
तुम्हारी आँख में ताबीर कर रही हूँ मैं

दरीचा खोले हुए रंग और ख़ुशबू का
सुहानी-शाम को तामीर कर रही हूँ मैं

वो मुंतज़िर है मिरा कब से ख़ुद पे रात ओढ़े
‘शबाना’ सुब्ह सी ताख़ीर कर रही हूँ मैं

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है
सहारे पेड़ के ये बेल जो खड़ी हुई है

अभी से छोटी हुई जा रही हैं दीवारें
अभी तो बेटी ज़रा सी मिरी बड़ी हुई है

बना के घोंसला चिड़िया शजर की बाँहों में
न जाने किस लिए आँधी से अब डरी हुई है

अभी तो पहले सफ़र की थकन है पाँव में
कि फिर से जूती पे जूती मिरी पड़ी हुई है

नई रूतों के मुक़द्दस बुलावे तो हैं मगर
सलीब वादों की जो रह में इक गड़ी हुई है

मैं हाथ बाँधे हुए लौट आई हूँ घर में
कि मेरे पर्स में इक आरज़ू मरी हुई है

अगर बिछड़ने का उस से कोई मलाल नहीं
‘शबाना’ अश्क से फिर आँख क्यूँ भरी हुई है

ये तो सोचा ही नहीं उस को जुदा करते हुए

ये तो सोचा ही नहीं उस को जुदा करते हुए
चुन लिया है ग़म भी ख़ुशियों को रिहा करते हुए

जिन चराग़ों पर भरोसा था उन्हों ने आख़िरश
साज़िशें कर लीं हवाओं से दग़ा करते हुए

आँख के संदूक़चे में बद है इक सैल-ए-दर्द
डर रही हूँ क़ुफ़्ल उन पल्कों के वा करते हुए

जानती थी कब भटकती ही रहेगी दर-ब-दर
हम-सफ़र अपना सहाबों को घटा करते हुए

दोस्त को पहचानती थीं आँखें न दुश्मन कोई
फोड़ डाला है उन्हें अपनी सज़ा करते हुए

Share