‘शमीम’ करहानी की रचनाएँ

अगरचे इश्क़ में इक बे-ख़ुदी सी रहती है 

अगरचे इश्क़ में इक बे-ख़ुदी सी रहती है
मगर वो नींद भी जागी हुई सी रहती है

वही तो वजह-ए-तआरूफ़ है कोई क्या जाने
अदा अदा में जो इक बे-रूख़ी सी रहती है

बड़ी अजीब है शब-हा-ए-ग़म की ज़ुल्मत भी
दिए जलाओ मगर तीरगी सी रहती है

हज़ार दर्द-ए-फ़राएज़ हैं और दिल-ए-तन्हा
मिरे ख़ुलूस को शर्मिंदगी सी रहती है

‘शमीम’ ख़ून-ए-जिगर से उभारिए लेकिन
हर एक नक़्श में कोई कमी सी रहती है

अनमोल सही नायाब सही बे-दाम-ओ-दिरम बिक जाते हैं

अनमोल सही नायाब सही बे-दाम-ओ-दिरम बिक जाते हैं
बस प्यार हमारी क़ीमत है मिल जाए तो हम बिक जाते हैं

सिक्कों की चमक पे गिरते हुए देखा है शैख़ ओ बरहमन को
फिर मेरे खंडर की क़ीमत क्या जब दैर ओ हरम बिक जाते हैं

क्या शर्म-ए-ख़ुदी क्या पास-ए-हया ग़ुर्बत की अँधेरी रातों में
कितने ही बुतान-ए-ज़ोहरा-जबीं बा-दीदा-ए-नम बिक जाते हैं

ये हिर्स ओ हवा मंज़िल है ऐ राह-रवो हुश्यार ज़रा
जब हाथ रूपहले बढ़ते हैं रहबर के क़दम बिक जाते हैं

वो साहिब-ए-इल्म-ओ-हिकमत हों या पैकर-ए-अक़्ल-ओ-दानाई
इक मेरे दिल-ए-नादाँ के सिवा सब तेरी क़सम बिक जाते हैं

ये शहर है शहर-ए-ज़रदारी क्या होगा ‘शमीम’ अंजाम तिरा
याँ ज़ेहन ख़रीदा जाता है याँ अहल-ए-क़लम बिक जाते हैं

चमन लहक रे रह गया घटा मचल के रह गई

चमन लहक रे रह गया घटा मचल के रह गई
तिरे बग़ैर ज़िंदगी की रूत बदल के रह गई

ख़याल उन के साथ साथ देर तक चला किया
नज़र तो उन के साथ थोड़ी दूर चल के रह गई

वो इक निगाह-ए-मेहर-बाँ का इल्तिफ़ात-ए-मुख़्तसर
अँधेरे घर में जैसे कोई शम्अ जल के रह गई

कहाँ चमन की सुब्ह में चमन का हुस्न-ए-नीम-शब
कँवल बिखर के रह गए कली मसल के रह गई

जलाई थी तो जो दो दिलों में इक हसीन रात में
वो शम्अ अब भी है जवाँ वो रात ढल के रह गई

चमन का प्यार मिल सका न दश्त की बहार को
कली बिकस के रह गई सबा मचल के रह गई

वो मेरा दिल था जो पराई आग में जला किया
वो शम्अ थी जो अपनी आँच में पिघल के रह गई

हर एक जाँ-गुदाज़ ग़म का मा-हसल यही रहा
कि ग़म के मशग़लों में ज़िंदगी बहल के रह गई

‘शमीम’ उन की इक झलक भी ता सहर न मिल सकी
निगाह-ए-शौक़ करवटें बदल बदल के रह गई

दर्द-शनास दिल नहीं जलवा-तलब नज़र नहीं 

दर्द-शनास दिल नहीं जलवा-तलब नज़र नहीं
हादसा कितना सख़्त है उन को अभी ख़बर नहीं

और बढ़ेगा दर्द-ए-दिल रात जो भीग जाएगी
देख न वक़्त की तरफ़ वक़्त भी चारागर नहीं

किस को ख़बर कि हम से कब आप निगाह फेर लें
नशा तो धूप छाँव है बादा भी मोतबर नहीं

हम तो ख़ज़ाँ की धूप में ख़ून-ए-जिगर छिड़क चले
मौसम-ए-गुल की चांदनी किस को मिले ख़बर नहीं

दिल के तअल्लुक़ात से कौन सा दिल को चैन है
आओ किसी से तोड़ लें रिश्ता-ए-दिल मगर नहीं

इश्क़ पे कैसा दुख पड़ा हुस्न पे क्या गुज़र गई
आज गली उदास है आज वो बाम पर नहीं

दिल से ‘शमीम’ गुफ़्तगू देखिये कब तलक चले
रात भी मुख़्तसर नहीं बात भी मुख़्तसर नहीं

ग़म दो आलम का जो मिलता है तो ग़म होता है

ग़म दो आलम का जो मिलता है तो ग़म होता है
कि ये बादा भी मिरे ज़र्फ़ से कम होता है

कब मिरी शाम-ए-तमन्ना को मिलेगा ऐ दोस्त
वो सवेरा जो तिरा नक़्श-ए-क़दम होता है

बे-ख़बर फूल को भी खींच के पत्थर पे न मार
कि दिल-ए-संग में ख़्वाबीदा सनम होता है

हाए वो महवियत-ए-दीद का आलम जिस वक़्त
अपनी पलकों का झपकना भी सितम होता है

ग़म हुआ करता है आग़ाज़ में अपना लेकिन
वही बढ़ता है तो हर एक का ग़म होता है

इश्क़ कर देता है जब आँख पे जादू तो ‘शमीम’
दैर होता है नज़र में न हरम होता है

हुजूम-ए-दर्द में ख़ंदाँ है कौन मेरे सिवा

हुजूम-ए-दर्द में ख़ंदाँ है कौन मेरे सिवा
हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ है कौन मेरी सिवा

दवा-ए-दिल के लिए अपने पास आया हूँ
कि मेरे दर्द का दरमाँ है कौन मेरे सिवा

ये हम-सफ़र तो चमन तक के हम-सफ़र ठहरे
मिरा रफ़ीक़-ए-बयाबाँ है कौन मेरे सिवा

सितारा-ए-शब-ए-ग़म किस पे मुस्कुराएँगे
फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-पैमाँ है कौन मेरे सिवा

वो आदमी ही तो इंसानियत का दुश्मन है
जो कह रहा है कि इंसाँ है कौन मेरे सिवा

पुकारती हैं मुझ को तमाम ज़ंजीरे
ज़बान-ए-हल्क़ा-ए-ज़िंदाँ है कौन मेरे सिवा

मिरा पता तो किसी गुल से पूछ लो कि ‘शमीम’
चमन में चाक-गिरेबाँ है कौन मेरे सिवा

 

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे
पहुँच के वो किसी मंज़िल पे थम गए होंगे

पलट के दश्त से आएँगे फिर न दीवाने
पुकार लो कि अभी कुछ क़दम गए होंगे

जो मावरा-ए-तसव्वुर नहीं कोई सूरत
तो बुत-कदे ही तक अहल-ए-हरम गए होंगे

तिरे जुनूँ ने पुकारा था होश वालों को
न जाने कौन से आलम में हम गए होंगे

मिलेंगी मंज़िल-ए-आख़िर के बाद भी राहें
मिरे क़दम के भी आगे क़दम गए होंगे

न पूछ हौसला-ए-हम-रहान-ए-सहल-पंसद
जहाँ थकन ने कहा होगा थम गए होंगे

जो कह रहे हैं कि आई नज़र न मंज़िल-ए-दोस्त
वो लोग जानिब-ए-दैर-ओ-हरम गए होंगे

कहाँ से आए दियार-ए-शफ़क़ में रंगीनी
इधर से तेरे शहीदान-ए-ग़म गए होंगे

‘शमीम’ हिम्मत-ए-पा-ए-तलब की बात न पूछ
वहाँ गया हूँ जहाँ लोग कम गए होंगे

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे
पहुँच के वो किसी मंज़िल पे थम गए होंगे

पलट के दश्त से आएँगे फिर न दीवाने
पुकार लो कि अभी कुछ क़दम गए होंगे

जो मावरा-ए-तसव्वुर नहीं कोई सूरत
तो बुत-कदे ही तक अहल-ए-हरम गए होंगे

तिरे जुनूँ ने पुकारा था होश वालों को
न जाने कौन से आलम में हम गए होंगे

मिलेंगी मंज़िल-ए-आख़िर के बाद भी राहें
मिरे क़दम के भी आगे क़दम गए होंगे

न पूछ हौसला-ए-हम-रहान-ए-सहल-पंसद
जहाँ थकन ने कहा होगा थम गए होंगे

जो कह रहे हैं कि आई नज़र न मंज़िल-ए-दोस्त
वो लोग जानिब-ए-दैर-ओ-हरम गए होंगे

कहाँ से आए दियार-ए-शफ़क़ में रंगीनी
इधर से तेरे शहीदान-ए-ग़म गए होंगे

‘शमीम’ हिम्मत-ए-पा-ए-तलब की बात न पूछ
वहाँ गया हूँ जहाँ लोग कम गए होंगे

हुजूम-ए-दर्द में ख़ंदाँ है कौन मेरे सिवा

हुजूम-ए-दर्द में ख़ंदाँ है कौन मेरे सिवा
हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ है कौन मेरी सिवा

दवा-ए-दिल के लिए अपने पास आया हूँ
कि मेरे दर्द का दरमाँ है कौन मेरे सिवा

ये हम-सफ़र तो चमन तक के हम-सफ़र ठहरे
मिरा रफ़ीक़-ए-बयाबाँ है कौन मेरे सिवा

सितारा-ए-शब-ए-ग़म किस पे मुस्कुराएँगे
फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-पैमाँ है कौन मेरे सिवा

वो आदमी ही तो इंसानियत का दुश्मन है
जो कह रहा है कि इंसाँ है कौन मेरे सिवा

पुकारती हैं मुझ को तमाम ज़ंजीरे
ज़बान-ए-हल्क़ा-ए-ज़िंदाँ है कौन मेरे सिवा

मिरा पता तो किसी गुल से पूछ लो कि ‘शमीम’
चमन में चाक-गिरेबाँ है कौन मेरे सिवा

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे
पहुँच के वो किसी मंज़िल पे थम गए होंगे

पलट के दश्त से आएँगे फिर न दीवाने
पुकार लो कि अभी कुछ क़दम गए होंगे

जो मावरा-ए-तसव्वुर नहीं कोई सूरत
तो बुत-कदे ही तक अहल-ए-हरम गए होंगे

तिरे जुनूँ ने पुकारा था होश वालों को
न जाने कौन से आलम में हम गए होंगे

मिलेंगी मंज़िल-ए-आख़िर के बाद भी राहें
मिरे क़दम के भी आगे क़दम गए होंगे

न पूछ हौसला-ए-हम-रहान-ए-सहल-पंसद
जहाँ थकन ने कहा होगा थम गए होंगे

जो कह रहे हैं कि आई नज़र न मंज़िल-ए-दोस्त
वो लोग जानिब-ए-दैर-ओ-हरम गए होंगे

कहाँ से आए दियार-ए-शफ़क़ में रंगीनी
इधर से तेरे शहीदान-ए-ग़म गए होंगे

‘शमीम’ हिम्मत-ए-पा-ए-तलब की बात न पूछ
वहाँ गया हूँ जहाँ लोग कम गए होंगे

जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से

जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से
गुज़र गई है मोहब्बत हसीन राहों से

चराग़ जल के अगर बुझ गया तो क्या होगा
मुझे न देख मोहब्बत भरी निगाहों से

बला-कशों की अँधेरी गली को क्या जाने
वो ज़िंदगी जो गुज़रती है शाह-राहों से

लबों पे मुहर-ए-ख़ामोशी लगाई जाएगी
दिलों की बात कही जाएगी निगाहों से

इधर कहा कि न छूटे सवाब का जादा
उधर सजा भी दिया राह को गुनाहों से

फ़ज़ा-ए-मै-कदा-ए-दिल-कुशा में आई है
हयात घुट के जो निकली हैं ख़ानक़ाहों से

मिरी नज़र का तक़ाज़ा कुछ और था ऐ दोस्त
मिला न कुछ मह ओ अंजुम की जलवा-गाहों से

ख़जाँ की वादी-ए-ग़ुर्बत गुज़ार लें तो ‘शमीम’
मिलें दियार-ए-बहाराँ के कज-कुलाहों से

निकल पड़े हैं सनम रात के शिवाले से

निकल पड़े हैं सनम रात के शिवाले से
कुछ आज शहर-ए-ग़रीबाँ में हैं उजाले से

चलो पलट भी चलें अपने मय-कदे की तरफ
ये आ गए किस अँधेरे में हम उजाले से

ख़ुदा करे कि बिखर जाएँ मेरे शानों पर
सँवर रहे हैं ये बादल जो काले काले से

बुतों की ख़ल्वत-ए-रंगी में बज़्म-ए-अंजुम में
कहाँ कहाँ न गए हम तिरे हवाले से

जुनूँ की वादी-ए-आज़ाद में तलब कर लो
निकाल लो हमें शाम ओ सहर के हाले से

हयात-ए-अस्र फेर दे मिरा माज़ी
हसीन था वो अँधेरा तिरे उजाले से

कोई मनाए तो केसे मनाए दिल को ‘शमीम’
ये बात पूछिए इक रूठ जाने वाले से

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से हम को छुड़ा लिया

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से हम को छुड़ा लिया
अच्छा किया कि आप ने अपना बना लिया

होने दिया न हम ने अँधेरा शब-ए-फिराक़
बुझने लगा चराग़ तो दिल को जला लिया

दुनिया के पास हे कोई तंज़ का जवाब
दीवाना अपने हाल पे ख़ुद मुस्कुरा लिया

क्या बात थी कि ख़ल्वत-ए-ज़ाहिद को देख कर
रिंद-ए-गुनाह-गार ने सर को झुका लिया

चुप हूँ तुम्हारा दर्द-ए-मोहब्बत लिए हुए
सब पूछते हैं तुम ने ज़माने से क्या मिला

ना-क़ाबिल-ए-बयाँ हैं मोहब्बत की लज़्ज़तें
कुछ दिल ही जानता है जो दिल ने मज़ा लिया

रोज़-ए-अज़ल पड़ी थी हज़ारों ही नेमतें
हम ने किसी का दर्द-ए-मोहब्बत उठा लिया

बढ़ने लगी जो तल्ख़ी-ए-ग़म-हा-ए-ज़िन्दगी
थोड़ा सा बादा-ए-ग़म-ए-जानाँ मिला लिया

वाक़िफ़ हीं गिरफ़्त-ए-तसव्वुर से वो ‘शमीम’
जो ये समझ रहे हैं कि दामन छुड़ा लिया

रखना है तो फूलों को तू रख ले निगाहों में

रखना है तो फूलों को तू रख ले निगाहों में
ख़ुशबू तो मुसाफ़िर है खो जाएगी राहों में

क्यूँ मेरी मोहब्बत से बरहम हो ज़मीं वालो
इक और गुनह रख लो दुनिया के गुनाहों में

कैफ़ियत-ए-मय दिल का दरमाँ न हुई लेकिन
रंगीं तो रही दुनिया कुछ देर निगाहों में

काँटों से गुज़र जाना दुश्वार नहीं लेकिन
काँटें ही नहीं यारो कलियाँ भी हैं राहों में

पर्दा हो तो पर्दा हो इस पर्दे को क्या कहिए
छुपते हैं निगाहों से रहते हैं निगाहों में

यारान-ए-रह-ए-ग़ुर्बत क्या हो गए क्या कहिए
कुछ सो गए मंज़िल पर कुछ खो गए राहों में

गुज़री हुई सदियों को आग़ाज़-ए-सफ़र समझो
माज़ी अभी कम-सिन है फ़र्दा की निगाहों में

रंगीं है ‘शमीम’ अब तक पैराहन-ए-जाँ अपना
हम रात गुज़ार आए किस ख़्वाब की बाँहों में

समझे हैं मफ़हूम नज़र का दिल का इशारा जाने है

समझे हैं मफ़हूम नज़र का दिल का इशारा जाने है
हम तुम चुप हैं लेकिन दुनिया हाल हमारा जाने है

हल्की हवा के इक झोंके में कैसे कैसे फूल गिरे
गुलशन के गुल-पोश न जानें गुलशन सारा जाने है

शम-ए-तमन्ना पिछले पहर तक दर्द का आँसू बन ही गई
शाम का तारा कैसे डूबा सुब्ह का तारा जाने है

क्या क्या हैं आईन-ए-तमाशा क्या क्या हैं आदाब-ए-नज़र
चश्म-ए-हवस ये सब क्या जाने वो तो नज़ारा जाने है

अपने ‘शमीम’-ए-रूसवा को तुम जानो हो अनजान कोई
बस्ती सारी पहचाने है सहरा सारा जाने है

शराब ओ शेर के साँचे में ढल के आई है

शराब ओ शेर के साँचे में ढल के आई है
ये शाम किस की गली से निकल के आई है

समझ रहा हूँ सहर के फ़रेब-ए-रंगीं को
नया लिबास शब-ए-ग़म बदल के आई है

तिरे क़दम की बहक है तिरी क़बा की महक
नसीम तेरे शबिस्ताँ से चल के आई है

वफ़ा पे आँच न आती अगर तुम कह देते
ज़बाँ तक आज जो इक बात चल के आई है

सजी हुई है सितारों से मय-कदे की फ़ज़ा
कि रात तेरे तसव्वुर में ढल के आई है

ब-एहतियात हमारी तरफ़ उठी है निगाह
लबों पे मौज-ए-तबस्सुम सँभल के आई है

हमारी आह हमारे ही दिल की आह नहीं
न जाने कितने दिलों से निकल के आई है

सहर तक आ गई शम्अ ता-बा परवाना
मगर हरारत-ए-ग़म से पिघल के आई है

मिरी निगाह-ए-तमन्ना का अक्स हो न ‘शमीम’
किसी के रूख़ पे जो सुर्ख़ी मचल के आई है

वो दिल भी जलाते हैं रख देते हैं मरहम भी

वो दिल भी जलाते हैं रख देते हैं मरहम भी
क्या तुर्फ़ा तबीअत है शोला भी हैं शबनम भी

ख़ामोश न था दिल भी ख़्वाबीदा न थे हम भी
तन्हा तो नहीं गुज़रा तन्हाई का आलम भी

छलका है कहीं शीशा ढलका है कहीं आँसू
गुलशन की हवाओं में नग़मा भी है मातम भी

हर दिल को लुभाता है ग़म तेरी मोहब्बत का
तेरी ही तरह ज़ालिम दिल-कश है तिरा ग़म भी

इंकार-ए-मोहब्बत को तौहीन समझते हैं
इज़हार-ए-मोहब्बत पर हो जाते हैं बरहम भी

तुम रूक के नहीं मिलते हम झुक के नहीं मिलते
मालूम ये होता है कुछ तुम भी हो कुछ हम भी

पाई न ‘शमीम’ अपने साक़ी की नज़र यकसाँ
हर आन बदलता है मय-ख़ाने का मौसम भी

ये ख़ुशी ग़म-ए-ज़माना का शिकार हो न जाए

ये ख़ुशी ग़म-ए-ज़माना का शिकार हो न जाए
न मिलो ज़ियादा हम से कहीं प्यार हो न जाए

जो मचल रही है शीशे में हसीन है वो शबनम
मिरे लब तक आते आते जो शरार हो न जाए

न कटें अकेले दिल से ग़म-ए-ज़िंदगी की राहें
जो शरीक-ए-फिक्र-ए-दौराँ ग़म-ए-यार हो न जाए

न बढ़ा बहुत चमन से रह-ओ-रस्म-ए-आशियाना
कि मिज़ाज-ए-बाग़-बाँ पर कहीं बार हो न जाए

तिरी ताज़ा मुस्कुराहट से भर आई आँख यानी
कहीं ये निशान-ए-मंज़िल भी ग़ुबार हो न जाए

जो क़रीब है किनारा तो बढ़ा है और तूफ़ाँ
कि ये सख़्त-जान कश्ती कहीं पार हो न जाए

इसी तरह ख़ून-ए-दिल से तू चमन को सींचता जा
ये ख़जाँ ‘शमीम’ जब तक कि बहार हो न जाए

ज़ुल्मत-गह-ए-दौराँ में सुब्ह-ए-चमन-ए-दिल ह 

ज़ुल्मत-गह-ए-दौराँ में सुब्ह-ए-चमन-ए-दिल हूँ
रोको न सफ़र मेरा मैं क़िस्मत-ए-मंज़िल हूँ

ज़िन्दानी-ए-हस्ती हूँ पाबंद-ए-सलासिल हूँ
किस तरह मिलूँ तुम से ख़ुद राह में हाइल हूँ

बर्बाद सही लेकिन बर्बाद-ए-ग़म-दिल हूँ
आँखों से लगा मुझ को गर्द-र-रह-ए-मंज़िल हूँ

ऐ संग-ब-कफ़ दुनिया आ शौक़ से आ लेकिन
आहिस्ता क़दम रखना मैं शीशा-गह-ए-दिल हूँ

मौज़-ए-ग़म-ए-जानाँ हो या मौज़-ए-ग़म-ए-दौराँ
आने दो मिरे दिल तक हर मौज का साहिल हूँ

हस्ती को ग़म-ए-आलम आलम को ग़म-ए-हस्ती
ज़िंदाँ से बयाबाँ तक इक सिलसिला-ए-दिल हूँ

तुम महव-ए-ख़ुदा-आराई में आलम-ए-तन्हाई
तुम महफ़िल-ए-ख़ल्वत हो मैं ख़ल्वत-ए-महफ़िल हूँ

ख़ून अपनी तमन्ना का ख़ुद किस ने किया होगा
मुझ पर न तरस खाओ बिस्मिल नहीं क़ातिल हूँ

गुलशन से ‘शमीम’ आख़िर किस तरह गुज़र जाएँ
हर फूल ये कहता है मैं प्यार के क़ाबिल हूँ

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
अभी उठके आये हैं,बज़्म-ए-दुआ से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
दुखी आत्मा, शान्ति पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

ये घेरे है क्यों, रोने वालों की टोली
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली?
अबस, मादर-ए-हिन्द, शरमा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने?
उसे तो अदा, अम्न की भा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

अभी उठके खुद वो, बिठायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
दिलों पर सियाही सी क्यों छा गई है?
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आँसू बहा, देस-माता
उदासी ये क्यों, बाल बिखरा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

वो हक़ के लिए, तन के अड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
बिना, ज़ुल्म की जिससे,थर्रा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

वो उपवास वाला, वो उपकार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
लगन जिसकी, साहिल का सुख पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है।

कोई उसके ख़ू से, न दामन भरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्योंकर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
हयात उसकी, खुद मौत पर छा गई है
जगाओ ना बापू को, नींद आ गई है।

 

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