शमीम जयपुरी की रचनाएँ

दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया 

दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया
अब क्या है जिस पर नाज़ करें इक दिल था वो भी टूट गया

साक़ी के हाथ से मस्ती में जब कोई साग़र छूट गया
मय-ख़ाने में ये महसूस हुआ हर मय-कश का दिल टूट गया

जब दिल को सुकूँ ही रास न हो फिर किस से गिला नाकामी का
हर बार किसी का हाथों में आया हुआ दामन छूट गया

सोचा था हरीम-ए-जानाँ में नग़्मा कोई हम भी छेड़ सकें
उम्मीद ने साज़-ए-दिल का मगर जो तार भी छेड़ा टूट गया

क्या शय थी किसी की पहली नज़र कुछ इस के अलावा याद नहीं
इक तीर सा दिल में जैसे लगा पैवस्त हुआ और टूट गया

इस नग़्मा-तराज़-ए-गुलशन ने तोड़ा है कुछ ऐसा साज़-ए-दिल
इक तार कहीं से टूट गया इक तार कहीं से टूट गया

फ़ुर्क़त की भयानक रातों को इस तरह गुज़ारा करता हूँ

फ़ुर्क़त की भयानक रातों को इस तरह गुज़ारा करता हूँ
दिल मुझ को पुकारा करता है मैं तुम को पुकारा करता हूँ

अब उन के तसव्वुर से मैं ने अंदाज़-ए-जुनूँ भी सीख लिए
हर ख़ार से बातें करता हूँ हर गुल को इशारा करता हूँ

ये रंग-ए-जुनून-ए-इश्क़ है क्या इस रंग-ए-जुनूँ को क्या कहिए
मैं जिस से मोहब्बत करता हूँ ख़ुद उस से किनारा करता हूँ

ख़ामोश फ़ज़ाएँ देखती हैं या चाँद सितारे सुनते हैं
जब याद मुझे तुम आते हो जब तुम को पुकारा करता हूँ

साक़ी की निगाह-ए-मस्त मुझे जब याद ‘शमीम’ आ जाती है
उस वक़्त ही अपने ताक़ से मैं शीशों को उतारा करता हूँ

जब शिकायत थी कि तूफ़ाँ में सहारा न मिला

जब शिकायत थी कि तूफ़ाँ में सहारा न मिला
अब किनारे पे भी आए तो किनारा न मिला

बे-सहारों को कहीं कोई सहारा न मिला
कोई तूफ़ाँ न मिला कोई किनारा न मिला

हाथ उट्ठे ही नहीं साग़र-ओ-मीना की तरफ़
हम को जब तक तिरी आँखों का इशारा न मिला

चल न सकता था कभी अहल-ए-हवस का जादू
तुझ को ऐ दोस्त कोई इश्क़ का मारा न मिला

जिस ने देखा हमें दुश्मन की नज़र से देखा
तेरी महफ़िल में कोई दोस्त हमारा न मिला

मौत बेहतर है ‘शमीम’ उस के लिए जीने से
जिस को जीने के लिए कोई सहारा न मिला

जब सुब्ह का मंज़र होता है या चाँदनी-रातें होती हैं 

जब सुब्ह का मंज़र होता है या चाँदनी-रातें होती हैं
उस वक़्त तसव्वुर में उन से कुछ और ही बातें होती हैं

जब दिल से दिल मिल जाता है वो दौर-ए-मोहब्बत आह न पूछ
कुछ ओर ही दिन हो जाते हैं कुछ और ही रातें होती हैं

तूफ़ान की मौज़ों में घिर कर पहुँचा भी है कोई साहिल तक
सब यास के आलम में दिल को समझाने की बातें होती हैं

क्यूँ याद ‘शमीम’ आ जाते हैं वो अपनी मोहब्बत के लम्हे
जब इश्क़ के क़िस्से सुनता हूँ जब हुस्न की बातें होती हैं

न पूछ कब से ये दम घुट रहा है सीने में 

न पूछ कब से ये दम घुट रहा है सीने में
कि मौत का सा मज़ा आ रहा है जीने में

न जाने क्यूँ ये तलातुम डुबो नहीं देता
कि नाख़ुदा भी नहीं अब मिरी सफ़ीने में

क़दम क़दम पे बचाया है ठोकरों से मगर
ख़राश आ ही गइ्र दिल के आबगीने में

महक रही है सबा सुब्ह से न जाने क्यूँ
नहा के आई है शायद तिरे पसीने में

‘शमीम’ साहिल ओ कश्ती से कुछ उम्मीद न रख
कोई वक़ार नहीं इस तरह से जीने में

न पूछ कब से ये दम घुट रहा है सीने में

न पूछ कब से ये दम घुट रहा है सीने में
कि मौत का सा मज़ा आ रहा है जीने में

न जाने क्यूँ ये तलातुम डुबो नहीं देता
कि नाख़ुदा भी नहीं अब मिरी सफ़ीने में

क़दम क़दम पे बचाया है ठोकरों से मगर
ख़राश आ ही गइ्र दिल के आबगीने में

महक रही है सबा सुब्ह से न जाने क्यूँ
नहा के आई है शायद तिरे पसीने में

‘शमीम’ साहिल ओ कश्ती से कुछ उम्मीद न रख
कोई वक़ार नहीं इस तरह से जीने में

रौशनी लेने चले थे और अंधेरे छा गए

रौशनी लेने चले थे और अंधेरे छा गए
मुस्कुराने भी न पाए थे कि आँसू आ गए

आज कितने दोस्त मुझ को देख कर कतरा गए
अल्लाह अल्लाह अब मोहब्बत में ये दिन भी आ गएर

जब भी आया है किसी को भूल जाने का ख़याल
यब-ब-यक आवाज़ आई लीजिए हम आ गए

आह वो मंज़िल जो मेरी ग़फ़लतों से गुम हुई
हाए वो रहबर जो मुझ को राह से भटका गए

फिर ये रह रह कर किसी की याद तड़पाती है क्यूँ
अब तो हम तर्क-ए-मोहब्बत की क़सम भी खा गए

देख कर उन की निगाह-ए-लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद
क्या बताएँ क्या ख़याल आया कि आँसू आ गए

उन के ही क़दमों की आहट रात भर आती रही
दिल की हर धड़कन पे हम समझे कि वो ख़ुद आ गए

अब कौई दैर ओ हरम से भी सदा आती नहीं
हम तिरी धुन में ख़ुदा जाने कहाँ तक आ गए

सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता

सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता
जो हर तूफ़ाँ से टकराने के क़ाबिल हो नहीं सकता

गुज़र जाए जो आदाब-ए-जुनूँ से तेरी महफ़िल में
वो दीवाना तिरी महफ़िल के क़ाबिल हो नहीं सकता

हवादिस के थपेड़ों से उलझ तूफ़ाँ से टकरा जा
कि ग़म जब तक न हो इंसान कामिल हो नहीं सकता

मुझे तुग़्यानियों से खेलना आता है हँस हँस कर
मिरा अज़्म-ए-जवाँ ममनून-ए-साहिल हो नहीं सकता

‘शमीम’ इस दौर का ये संग-दिल इंसाँ अरे तौबा
कि जिस से एहतिराम-ए-शीशा-ए-दिल हो नहीं सकता

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