शम्स फ़र्रुख़ाबादी की रचनाएँ

कमरे की दीवारों पर आवेज़ां जो तस्वीरें हें 

कमरे की दीवारों पर आवेज़ां जो तस्वीरें हें
अहद-ए-गुज़िश्ता के ख़्वाबों की बिखरी हुई ताबीरें हैं

उनके ख़त महफ़ूज़ है अब तक मेरी ख़ुतूत की फ़ाइल में
क़समें वादे अहद ओ पैमाँ प्यार भरी तहरीरें हैं

हाथ की रेखा देखने वाले मेरा हाथ भी देख ज़रा
बर आएँ उम्मीदें जिन से ऐसी कहीं लकीरें हैं

फिर ये किस ने अपना कह कर दी है सदा इक वहशी को
ज़िंदाँ जिस के शोर से लरज़ा पाँव पड़ी ज़ंजीरें हैं

‘शम्स’ की हालत का मत पूछो कुछ दिन से ये हाल हुआ
हर दम तन्हा सोच में बैठे दामन अपना चीरें हैं

 

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है 

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है
हम ने हर सुब्ह इक उम्मीद पे दर खोला है

मैं भटकता रहा सड़कों पे तिरी बस्ती में
कब किसी ने मेरी ख़ातिर कोई घर खोला है

हो गई और भी रंगीं तिरी यादों की बहार
खिलते फूलों ने मिरा ज़ख़्म-ए-जिगर खोला है

उन की पलकों से गिरे टूट के कुछ ताज-महल
नींद से चौंक के जब दीदा-ए-तर खोला है

यार मेरा तो मुक़द्दर है वो चादर जिस ने
पाँव खोले हैं कभी और कभी सर खोला है

रात भारी कटी शायद गए दिन लौट आए
‘शम्स’ ने परचम-ए-उम्मीद-ए-सहर खोला है

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में
उस को क्या मालूम ज़मीं पर चढ़े हैं तीर कमानों में

फूल तोड़ के लोग ले गए ऊँचे बड़े मकानों में
अब हम काँटें सजा के रक्खें मिट्टी के गुल-दानों में

बे-दर-ओ-बाम ठिकाना जिस में धूल धूप सन्नाटा ग़म
वही है मुझ वहशी के घर में जा कुछ है वीरानों में

आप के क़दमों की आहट से शायद ख़्वाब से जाग उठे
सोई हुई वीरान उदासी कमरों में दालानों में

रंज ओ अलम तन्हाई के साथी गुज़र बसर को काफ़ी हैं
ख़ुशी तो शामिल हो जाती है आए गए मेहमानों में

अरमाँ सजे सजे पलकों पर तार तार थी अपनी जेब
अपने लिए तो ज़ख़्म-ए-दिल थे बाज़ार और दुकानों में

वक़्त ने कैसा रूप दिया जो लोग नहीं पहचान सके
काश कि ख़ुद को देख भी सकते जग के आईना-ख़ानों में

ज़िक्र-ए-‘शम्स’ उदास करेगा छोड़ो और कोई बात करो
ऐसे शख़्स की क्यूँ तुम गिनती गिनते हो इंसानों में

बिछड़ते टूटते रिश्तों को हम ने देखा था

बिछड़ते टूटते रिश्तों को हम ने देखा था
ये वक़्त हम पे भी गुज़रेगा ये न सोचा था

नमी थी पलकों पे भीगा हुआ सा तकिया था
पता चला कि कोई ख़्वाब हम ने देखा था

हमारे ज़ेहन में अब तब उसी की है ख़ुशबू
तुम्हारे सेहन में बेले का एक पौदा था

खुरच के फेंक दूँ किस तरह दाग़ यादों के
मैं भूल जाता वो सब कुछ तो कितना अच्छा था

हमारे हाल को देखो निगाह-ए-इबरत से
ये बात हम से न पूछो कि कौन कैसा था

जनाब-ए-ख़िज़्र कहाँ आप मुझ को छोड़ेगें
जो साथ छोड़ गया वो अभी आप जैसा था

मिलेगा क्यूँ किसी दुश्मन की आस्तीं पे लहू
तुम्हारा ‘शम्स’ निगाह-ए-करम का मारा था

ये घर जो हमारे लिए अब दश्त-ए-जुनूँ है

ये घर जो हमारे लिए अब दश्त-ए-जुनूँ है
आबाद भी रहता था कभी अपनों के दम से

सौ बार इसी तरह मैं मर मर के जिया हूँ
देरीना तअल्लुक़ है मिरा मक़्तल-ए-ग़म से

ये जीना भी क्या जीना है सर फोड़ना ठहरा
क़िस्मत को है जब वास्ता पत्थर के सनम से

बस इतना ग़नीमत रहे उन से ये तअल्लुक़
हम अपने को बदलें न वो बाज़ आएँ सितम से

आवाज़ न दो ‘शम्स’ को तड़पेगा बिचारा
आज़ाद तो हो जाए ज़रा बंद-ए-अलम से

 

 

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