शशि पाधा की रचनाएँ

मन रे कोई गीत गा

टूटे न विश्वास कोई
घेरे न अवसाद कोई
बाँधे न विराग कोई
गीत गा –
राग भरा कोई गीत गा

नील गगन का खुला वितान
पंछी सा भर ले उड़ान
तारों से कर ले पहचान
गीत गा–
कोकिल सा मृदु गीत गा

लहरों के संग बह ले आज
किरणें अंजुरि भर ले आज
बदली सा तू झर ले आज
गीत गा—
रिम झिम सा कोई गीत गा

शब्द मौन हो जाएँ न
भाव कहीं खो जाएँ न
तार कहीं सो जाएँ न
गीत गा—
सुर सरगम सा गीत गा

बीहड़ जंगल राह भुलाए
घोर अंधेरा घिर- घिर आए
अमा सारे दीप बुझाए
गीत गा —
उजियारों के गीत गा

मौन का सागर

मौन का सागर बना अपार
मैं इस पार – तू
उस पार

कहीं तो रोके अहं का कोहरा,
कहीं दर्प की खड़ी दीवार
शब्दों की नैया को बाँधे
खड़े रहे मंझधार।

शाख मान की झुकी नहीं
बहती धारा रुकी नहीं
कुंठाओं के गहन भंवर में
छूट गई पतवार

सुनो पवन का मुखरित गान
अवसादों का हो अवसान
संग ले गई स्वप्न सुनहले
खामोशी पतझार

लहरें देती नम्र निमंत्रण
संध्या का स्नेहिल अनुमोदन
अस्ताचल का सूरज कहता
खोलो मन के द्वार

लौट आया मधुमास 

आज अचानक अंगना में
लौट आया मधुमास प्रिय
क्या तुम भी हो कहीं पास प्रिय?

पंछी नभ में डोल रहे
कलरव में कुछ बोल रहे
नील गगन के पंथी बादल
फागुन के रंग घोल रहे

देते कुछ आभास प्रिय कि-
तुम हो कितने पास प्रिय

पुष्प गन्ध से पगी-पगी
पुरवाई आ गले लगी
धूप -छाँव आँगन में खेलें
दोपहरी कुछ जगी जगी

जागी कुछ-कुछ आस प्रिय कि-
तुम ही हो कहीं पास प्रिय

सूरज की अनुरागी किरणें
कोमल कलियाँ चूम रहीं
नव किसलय की ओढ़ चुनरिया
डाली -डाली झूम रही

कण-कण मुखरित हास प्रिय, क्यों
लगता तुम हो पास प्रिय?

लहरें छेड़ें सुर संगीत
कोकिल के अधरों पे गीत
मुग्ध चातकी के नयनों से
छलक रही चिर संचित प्रीत

मन में इक विश्वास प्रिय कि-
तुम ही हो मधुमास प्रिय

संधिकाल

सुबह की धूप ने अभी
ओस बूँद पी नहीं
आँख भोर की अभी
नींद से जगी नहीं
पंछियों की पाँत ने
नभ की राह ली नहीं
किरणों की डोरियाँ अभी
शाख से बँधी नहीं

शयामली अलक अभी
रात की बँधी नहीं
चाँद को निहारती
चातकी थकी नहीं
तारों की माल मे जली
दीपिका बुझी नहीं
हर शृंगार की कली
शाख से झरी नहीं

धरा को आँख में सजा
चाँद भी रुका-रुका
पुनर्मिलन की आस में
गगन भी झुका झुका
द्वार पर दिवस खड़ा
आँख रात की भरी
विरह और मिलन की
कैसी यह निर्मम घड़ी

आश्वासन 

विदा की वेला में सूरज ने
धरती की फिर माँग सजाई
तारक वेणी बाँध अलक में
नीली चुनरी अंग ओढ़ाई
नयनों में भर सांझ का अंजन
हर सिंगार की सेज बिछाई
और कहा सो जाओ प्रिय
मैं कल फिर लौट के आऊँगा ।

भोर किरण कल प्रात: तुझे
चूम कपोल जगाएगी
लाल गुलाबी पुष्पित माला
ले द्वारे पर आएगी
पुनर्मिलन के सुख सपनों की
आस में तू शरमाएगी
उदयाचल पर खड़ा मैं देखूँ
तू कितनी सज जाएगी
पलक उठा तू मुझे देखना
मैं किरणों में मुसकाऊँगा ।
कल फिर लौट के आऊँगा ।

दोपहरी की धूप छाँव में
खेलेंगे हम आँख मिचौली
डाल-डाल से पात-पात से
छिपकर देखूँ सूरत भोली
प्रणय पुष्प की पाँखों से तब
भर दूँगा मैं तेरी झोली
किरणों के रंगों से हम तुम
खेलेंगे तब प्रीत की होली

दूर क्षितिज तक चलना संग संग
नयनों में भर ले जाऊँगा
मैं कल फिर लौट के आऊँगा ।
मैं कल फिर लौट के आऊँगा ।

क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन

मोती माणिक की धरती से
माँगे केवल सुख के कण ।
क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन?

निशि तारों की लड़ियाँ गिन -गिन
अनगिन रातें बीत गईं,
भोर किरण की आस में मुझ
विरहन की अँखियाँ भीज गईं।
कह दो ना अब कैसे झेलूँ
पर्वत जैसे दूभर क्षण ।
क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन?

स्वप्न लोक आलोक खो गया
रात अमा की लौट के आई,
पतवारों सी प्रीत थी तेरी
मँझधारों में छोड़ के आई ।
नयनों में प्रतिपल आ घिरते
सजल, सघन, अश्रुमय घन।
क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन ?

नियति का लेखा मिट न पाया
अश्रु-जल निर्झर बरसाया,
निश्वासों के गहन धूम में
अँधियारा पल-पल गहराया।
अन्तर के अधरों पे मेरे
मौन बैठा प्रहरी बन।
क्यों पीड़ा हो गई जीवन धन?

बस तेरे लिए

नीलम सी साँझ
चाँदी का चाँद
तारों के दीप
सागर की सीप
जोड़ी है मैंने तेरे लिये
बस तेरे लिये।

कोयल् की कूज
झरनों की गूँज
स्वर्णिम सी भोर
किरणों की डोर
बाँधी है मैंने तेरे लिये
बस तेरे लिये।

छेड़े हैं साज
वीणा के राग
सपनों के मीत
सावन के गीत
गाए हैं मैंने तेरे लिये
बस तेरे लिये।

केसर की गंध
क्षितिज के रंग
सावन का मेह
आँचल में नेह
ओढ़ा है मैंने तेरे लिये
बस तेरे लिये।

फूलों का हास
वासंती आभास
चातक की प्रीत
समर्पण की रीत
चाही है मैंने तेरे लिये
बस तेरे लिये
बस तेरे लिये

फूल कदंब

उमड़े काले मेघा नभ में
खिल खिल आया फूल कदम्ब,
देख के महुआ की मुस्कान
मुस्काया अब फूल कदम्ब।

सूरज ने रंग दी पंखुरियाँ
शीत पवन ने भेजी गन्ध,
पात-पात में बजी बाँसुरी
दिशा-दिशा झरता मकरन्द

सावन के भीगे संदेसे,
ले कर आया फूल कदम्ब।

स्वर्णिम आनन, रक्तिम आभ
केसर कलियाँ कोमल अँग,
वृन्दावन की कुन्ज गली में
राधा यों सखियों के संग।

अब जानूँ क्यों कृष्णा के मन
इतना भाया फूल कदम्ब।

चम्पा और चमेली पूछें
कहाँ से पाई सौरभ सुषमा,
अमलतास भी छू कर कहता
देखी कभी न ऐसी ऊष्मा।

प्रेम रंग में रंग कर देखो,
हँस कर कहता फूल कदम्ब।

कैसे खेलें आज होली

आतंक के प्रहार से सहमती है धरा भोली
प्रेम के गुलाल से आओ खेलें आज होली।

घट रही हैं आस्थाएँ
क्षीण होतीं कामनाएँ
आज धरती के नयन से
बह रहीं हैं वेदनाएँ
खो गई हँसी – ठिठोली कैसे खेलें आज होली।

स्नेह का अबीर हो
सदभाव की फुहार हो
धूप अनुराग की
फागुनी बयार हो
हो राग -रंग की रंगोली ऐसी खेलें आज होली।

गांधी आएँ, गौतम आएँ
ईसा और मोहम्मद आएँ
साधु-सन्त देव आएँ
प्रेम की गाथा सुनाएँ
विश्वास से भरी हो झोली मिलजुल खेलें आज होली।

न कोई घर वीरान हो
न संहार के निशान हों
न माँग सूनी हो कोई
अनाथ न सन्तान हो
दिशा- दिशा हो रंग-रोली ऐसी खेलें आज होली।

नव वर्ष आया है द्वार 

मंगल दीप जलें अम्बर में
मंगलमय सारा संसार
आशाओं के गीत सुनाता
नव वर्ष आया है द्वार

स्वर्ण रश्मियाँ बाँध लड़ी
ऊषा प्राची द्वार खड़ी
केसर घोल रहा है सूरज
अभिनन्दन की नवल घड़ी
चन्दन मिश्रित चले बयार
नव वर्ष आया है द्वार

प्रेम के दीपक नेह की बाती
आँगन दीप जलाएँ साथी
बदली की बूँदों से घुल मिल
नेह सुमन लिख भेजें पाती
खुशियों के बाँटें उपहार
नव वर्ष आया है द्वार

नव निष्ठा नव संकल्पों के
संग रहेंगे नव अनुष्ठान
पर्वत जैसा अडिग भरोसा
धरती जैसा धीर महान
सुख सपने होंगे साकार
नव वर्ष आया है द्वार

वसंतागमन

मैंने उसको दूर क्षितिज से
धीरे-धीरे आते देखा।

नदिया के दर्पण में मुखड़ा
देखे और शृंगार करे
झरनों की पैंजनियाँ बाँधे
रवि किरणों से माँग भरे

मैंने उसको दिशा दिशा में
स्वर्णिम आभा भरते देखा।

कभी वो ओढ़े हरित चुनरिया
कभी वो पहने पुष्पित माल
कभी वो झाँके किसलय दल से
कभी सजाए केसर भाल

मैंने उसको बड़े चाव से
पंखुड़ियों से सजते देखा।

पुलकित हों वे धरती के कण
जहाँ-जहाँ वो पाँव धरे
कुहुक-कुहुक कर कोकिल उसका
गीतों से आह्वान करे

मैंने उसको गोद धरा की
उपहारों से भरते देखा।

पीत सुनहरी लाल गुलाबी
पुष्पों की वो पहने चोली
मलयानिल मकरंद बिखेरे
मँडराई भँवरों की टोली

डाल-डाल से पात-पात से
मैंने उसको हँसते देखा।

गर्मी के दिन 

कुछ अलसाये
कुछ कुम्हलाये
आम्रगन्ध भीजे, बौराये
काटे ना
कटते ये पल छिन
निठुर बड़े हैं गर्मी के दिन

धूप-छाँव
अँगना में खेलें
कोमल कलियाँ पावक झेलें
उन्नींदी
अँखियां विहगों की
पात-पात में झपकी ले लें
रात बिताई
घड़ियां गिन-गिन
बीतें ना कुन्दन से ये दिन

मुर्झाया
धरती का आनन
झुलस गये वन उपवन कानन
क्षीण हुई
नदिया की धारा
लहर- लहर
में उठता क्रन्दन
कब लौटेगा बैरी सावन
अगन लगायें गर्मी के दिन।

सुलग- सुलग
अधरों से झरतीं
विरहन के गीतों की कड़ियाँ
तारों से पूछें दो नयना
रूठ गई
क्यों नींद की परियाँ
भरी दोपहरी
सिहरे तन-मन
विरहन की पीड़ा से ये दिन

मन की बात

मन की बात
बताऊँ, रामा!
सुख की कलियाँ
गिरह बाँधूँ
नदिया पीर बहाऊँ, रामा!

माथे की तो पढ़ न पाई
आखर भाषा समझ न आई
नियति खेले आँख मिचौनी
अँखियाँ रह गईं
बँधी बँधाई।
हाथ थाम,
कर डगर सुझाए
ऐसा मीत बनाऊँ, रामा!

कभी दोपहरी झुलसी देहरी
आन मिली शीतल पुरवाई
कभी अमावस रात घनेरी
जुगनू थामे
जोत जलाई
विधना की
अनबूझ पहेली
किस विध अब सुलझाऊँ, रामा!

ताल तलैया, पोखर झरने
देखें अम्बर आस लगाए
नैना पल-पल सावन ढूँढ़ें
बरसे,
मन अंगना हरियाए
धीर धरा,
पतझार बुहारी
रुत वसंत मनाऊँ, रामा!
मन की बात बताऊँ, रामा!

तुम तो सदा रहे अनजान 

तुम तो रहे तटस्थ सदा
मैं लहरों सी चंचल गतिमान
संग बहे, न संग चले
क्या इसका तुझे हुआ था भान?

श्यामल शीतल साँझ सलोनी
सपनों सी संग बनी रही
मांझी के गीतों की गुंजन
इन अधरों पे सजी रही

मन्द पवन छुए जो आँचल
मन्द -मन्द मैं गाऊँ गान
मेरे गीतों की सरगम से
तुम तो सदा रहे अनजान।

अस्ताचल पर बैठा सूरज
बार -बार क्यों मुझे बुलाये
स्वर्णिम किरणों की डोरी से
बांध कभी जो संग ले जाये

इक बार कभी जो लौट न आऊँ
दूर कहीं भर लूं उड़ान
टूटे बन्धन की पीड़ा का
तुझे हुआ थोड़ा अनुमान?

पल -पल जीवन बीत गया
साधों का घट रीत गया
लहरों ने न तुझे हिलाया
और किनारा जीत गया

तुम तो, तुम ही बने रहे
थी मुझसे कुछ पल की पहचान
पागल मन क्यों फिर भी कहता
तुझ में ही बसते मन प्राण ?

ठंडी सी छाँव 

दुर्गम पथ और भरी दोपहरी
दूर है मेरा गाँव,
थका बटोही मनवा चाहे
रिश्तों की ठंडी सी छाँव

पगडंडी पर चलते चलते
कोई तो दे अब साथ,
श्वासों में जब कम्पन हो तो,
कोई थाम ले हाथ ।

निर्जन मग, चंदा छिप जाए
जुगनु सा जल जाए कोई,

तेरे लिए

नीलम सी साँझ
चांदी का चांद
तारों के दीप
सागर की सीप
जोड़ी है मैंने तेरे लिए
बस तेरे लिए।

कोयल् की कूज
झरणों की गूँज
स्वर्णिम सी भोर
किरणों की डोर
बांधी है मैंने तेरे लिए
बस तेरे लिए ।

छेड़े हैं साज
वीणा के राग
सपनों के मीत
सावन के गीत
गाए हैं मैंने तेरे लिए
बस तेरे लिए ।

केसर की गंध
क्षितिज के रंग
सावन का मेह
आँचल में नेह
ओढ़ा है मैंने तेरे लिए
बस तेरे लिए ।

फूलों का हास
वासंती आभास
चातक की प्रीत
समर्पण की रीत
चाही है मैंने तेरे लिए
बस तेरे लिए ।

बस तेरे लिए।

सृजन

जब रिमझिम हो बरसात
और भीगें डाल और पात
जब तितली रंग ले अंग
और फूल खिलें सतरंग

जब कण -कण महके प्रीत
तब शब्द रचेंगे गीत

जब नभ पे हँसता चाँद
और तारे भरते माँग
जब पवन चले पुरवाई
हर दिशा सजे अरूणाई

जब मन छेड़े संगीत
तब शब्द लिखेंगे गीत

जब पंछी करें किलोल
लहरों में उठे हिलोल
जब धरती अम्बर झूमें
और भंवरे कलिका चूमें

जब बन्धन की हो रीत
तब शब्द बुनेंगे गीत

जब कोकिल मिश्री घोले
पपिहरा पिहु-पिहु बोले
कोई वासंती पाहुन आये
नयनों से नेह बरसाये

जब संग चले मनमीत
तब शब्द बनेंगे गीत

पल दो पल 

जीवन के दो चार पलों में
पल दो पल ऎसे चुन लाएँ
रिमझिम मेघा बरसें जैसे
बूंद-बूंद नेहा बरसाएँ ।

सागर की लहरों को देखो
दौड़ किनारे मिलने आतीं
रेतीली तपती धरती को
गले लगा शीतल कर जातीं
हम भी क्यों न सागर जैसे
लहर – लहर में प्रेम बहाएँ ।

तरुवर की हर डाली डाली
जलती-तपती धूप सहे
झुक-झुक कर धरती को चूमे
ठंडी- ठंडी छाँव करे
प्रेम से हम भी छू लें सबको
स्नेह भीगा आँचल फैलाएँ ।

श्यामल तन कोकिल को देखो
कटु वचन वो भी न बोले
मीठे सुर में गीत सुना कर
कानों में मधुरस ही घोले
रूप रंग तो बाहरी चोला
अंतर्मन सींचें सरसाएँ ।

ढाई अक्षर का मन्तर देकर
गूढ़ बात कह गये कबीरा
प्रेम रंग में रंग कर देखो
पत्थर भी लगता है हीरा
मीरा पीकर जोगन हो गई
स्नेह सुधा बांटें बिखराएँ।

पल – पल जीवन घटता जाता
बीता कल फिर लौट न आता
हर पल के कर्मों का लेखा
समय लेखनी लिखता जाता
जीवन के कागज़ पर हम भी
प्रेम के अक्षर लिख कर जाएँ।

रिमझिम मेघा बरसें जैसे
बूंद-बूंद नेहा बरसाएँ ।

नारी चेतना

न समझे मुझे अब कोई निर्बला
शक्ति रूपा हूँ, नारी हूँ मैं वत्सला।

कोमलाँगी हूँ, अबला न समझे कोई
न धीरज की सीमा से उलझे कोई,
मन की कह दूँ तो पत्थर पिघल जाएंगे
चुप रहूँ तो विवशता न समझे कोई ।

न मैं सीता जिसे कोई राम त्याग दे
न मैं द्रौपदी जिसे दाँव में हार दे ,
न मैं राधा जिसे न ब्याहे कृष्ण
मैं हूँ मीरा जो प्रेम का दान दे ।

अपने कंपन से पर्वत कँपा दूंगी मैं
शीत झरनों में अग्नि जला दूंगी मैं,
आज सूरज को दीपक दिखा सकती हूँ
चांद निकले तो घूंघटा उठा दूंगी मैं ।

मैं नदी हूँ, किनारा तोड़ सकती हूँ
बहती धारा का मुख मोड़ सकती हूँ,
जी चाहे तो सागर से मिल लूंगी मैं
जी चाहे तो रास्ता छोड़ सकती हूँ।

मैं धरा हूँ, मैं जननी, मैं हूँ उर्वरा
मेरे आँचल में ममता का सागर भरा,
मेरी गोदी में सब सुख की नदियाँ भरीं
मेरे नयनों से स्नेह का सावन झरा।

दया मैं , क्षमा मैं , हूं ब्रह्मा सुता
मैं हूँ नारी जिसे पूजते देवता ।

मीमांसा

वेद पुराण सब बाँचे मैंने
पढ़ ली सब ग्रन्थों की भाषा
फिर भी क्यों मैं समझ न पाई
जग में सुख दुख की परिभाषा ?

जल बिन्दु से सुख के पल तो
दुख की रातें लम्बी लगतीं
इन्द्र धनु रंग भरता नभ में
काली बदली आकर ढकती

रिमझिम बूंदें बरसा करतीं
पपीहरा किस बूंद का प्यासा ?
जाने क्यों मैं समझ न पाई
जग में जीने की परिभाषा ।

जिस नभ से सुख के कण बरसे
ओस कणों में वो भी रोये
पुष्पित करता हरित धरा जो
चुभते कांटे वो ही बोये

सुख दुख से कुछ भी तुम चुन लो
नियति ने फेंका है पाँसा
न जाने क्यों समझ न पाई
जीवन क्रीडा की परिभाषा।

नव जीवन का संदेशा ले
वासंती रुत इठलाती आती
दूर खड़ी तब पतझड़ हँसती
पीत पात झरती बिखराती

मूल तरू कब सूखा करते
कोंपल सी उगती अभिलाषा
कैसे फिर भी समझ न पाई
हंस कर जीने की परिभाषा?

मैली हो गई धूप 

पथ में छाया धूम गुबार
कोहरे में डूबा संसार ,
अम्बर से धरती तक आते
मैली हो गई धूप ।

फीकी पड़ गई सोनल चुनरी
धूमिल सा सब हार शृंगार ,
किरणों की डोरी को थामे
ढूँढ़े हरित तरू की डार ,

दिशा- दिशा कोलाहल शोर
बहरी हो गई धूप ।

नदिया की लहरों का दर्पण
अंग -अंग निहारा जिसने ,
सागर संग अठखेली करती
कण-कण रूप संवारा जिसने ,

देख के अब धुंधली परछाईं
सांवली हो गई धूप ।

पिघले पर्वत , निर्जन उपवन
दूषित वायु , पंकिल ताल ,
व्याकुल पंछी कैसे तोड़ें
घुटी-घुटी साँसों का जाल ,

धरती का दुख नयनों में भर
गीली हो गई धूप ।

जोगन

मन बनवासी , तन जोगन
अधरों पे नीरव मौन धरे,
जीवन पल यूँ झरते जाते
पतझर में यूँ पात झरे।
इच्छाओं की गठरी इक दिन
अनचाहे ही बांधी मैंने ,
अनजानी अनबूझी सी कोई
साध न मन में साधी मैंने ।
मन बिरवा प्यासा मुर्झाया
किस सावन की आस करे ?
मन चाहे इक पंछी बन कर
दूर गगन उड़ जाऊँ मैं,
जगती से सब बंधन तोड़ूं
लौट कभी न आऊँ मैं ।
मन तो बस पगला बौराया
मन की पूरी कौन करे ?
सुख और दुख की कलियाँ गूँथी
जीवन माल पिरोई मैंने,
आस निरास के रंग भिगोए
तन की डार डुबोई मैंने।
विधना नित -नित जाल बिछाए
मन पंछी सिमटे -सिहरे ।
मन के इस बनवास का जाने
कभी कहीं कोई ठौर तो होगा,
इस जोगन संग अलख जगाए
यहां नहीं, कहीं और तो होगा ।
नित सपनों में देखूँ सूरत
आँख खुले तब क्यों बिसरे ?

दो अक्षर

मानस के कागद पर प्रियतम
दो अक्षर का गीत लिखा
पहला अक्षर नाम तुम्हारा
दूजा अक्षर प्रीत लिखा

भूल गई मैं बाकी सब कुछ
जब से तुम संग प्रीत लगी
छोड़ आई सब स्याही कागद
अब मिलने की आस जगी
नयन झरोखे खोल के देखूं
तू आया कि चांद दिखा ?

अब न कोई आधि-व्याधि
अब न कोई साध रही
अब न मोह की बन्धन बाधा
नदिया यूं निर्बाध बही
नाम तेरे की माला पहनी
जपने की तू रीत सिखा

दो अक्षर में सब सुख बसता
जग को क्या समझाऊँ मैं
न जानूं कोई जन्तर मन्तर
सुलझी , क्यों उलझाऊँ मैं
न मैं जोगन, न वैरागन
प्रेम की अविरल दीपशिखा ।

मंझधार

मौन का सागर अपार
मैं इस पार – तू उस पार।
कहीं तो रोके अहं का कोहरा,
कहीं दर्प की खड़ी दीवार

शब्दों की नैया को बाँधे
खड़े रहे मंझधार।

न इस पार – न उस पार ।
मान की डाली झुकी नहीं
बहती धारा रुकी नहीं
कुंठायों के गहन भंवर में

छूट गई पतवार ।
मैं इस पार – तुम उस पार ।

सुनो पवन का मुखरित गान
अवसादों का हो अवसान
संग ले गया स्वप्न सुनहले
मौन का पतझार

न इस पार – न उस पार।
लहरें देती मौन निमंत्रण

संध्या का स्नेहिल अनुमोदन
अस्ताचल का सूरज कहता
खोलो मन के द्वार।
न इस पार – न उस पार ।

जी चाहता है 

जी चाहता है आज कुछ नया करूं!
सिंधु की तरंग-सी
चाँद को चूम लूं,
वसंत के उल्लास में
तरंग बन झूम लूं
बीच जल धार में
भंवर बन घूम लूं।

जी चाहता है
साज के तार में
गीत बन कर सजूं
कोकिला के गान में
प्रेम के स्वर भरूं
धरा के खंड खंड को
राग रंग से रंगूं ।

जी चाहता है
पंछियों की पाँत में
गगन तक जा उड़ूँ
पुष्प के पराग में
सुगंध बन कर बसूँ
तितलियों की पाँख में
रंग बन कर घुलूँ ।

जी चाहता है
तारों के इन्द्र जाल में
दीप बन कर जलूँ
दूधिया नभगंग में
धार सी जा मिलूँ
ऒढ़ नीली ओढ़नी
बादलों में जा घिरूँ

जी चाहता है
प्राण में उमंग हो
गान में तरंग हो
जिस राह् पर चलूँ
हास मेरे संग हो
धरा से आकाश तक
प्रेम क ही रंग हो

जी चाहता है जी भर कर जियूँ  !
जी चाहता है आज कुछ नया करूँ  !

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