शहंशाह आलम की रचनाएँ

कुत्ते के बारे में

शताब्दी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहरेदार
साबित हुआ है कुत्ता
जातीय विकास का ज्ञान भी हम में
कुत्ते की वजह से आया शायद

कुत्ते की गुणकारी कलाओं का उपयोग अभी-अभी
करना आरंभ किया है हमने और कई रथ-यात्राएं निकाली हैं
बहुत हद तक कामयाब भी हुए हैं भविष्य का मुंह नोच लेने में

कुत्ते के प्रति लोगों का नीक समर्पण-भाव बढ़ता ही जा रहा है
निर्णायक-मंडल व ऊँचे घराने की स्त्रियों की वजह से
कुत्ता हमारी संस्कृति में पूरी तरह से शामिल हुआ है

ठीक हमारे घर में कुत्ते ने बनाया है अपने लिए घर
कुत्ते का मन ‘अतीव हर्षित कए रहल अछि’
इस भरोसे कि खनिज-पदार्थों के संसर्ग में रहकर
वह भी अपने लिए मनुष्यों के मौलिक गुण अपनाएगा
समृद्ध करेगा और अधिक अपने को इस तरह
महफूज़ रखेगा जन-समुदाय के स्वभाव को
हो सका तो असल लीडर बना रहेगा

जहां बहुत सारे लोग अपने पैरों की कमज़ोरी से पीडि़त हैं
सत्ताधीशों ने वहां पर भिजवाया है कुत्ते को

शुरू से आखि़र तक की मुहब्बत को
सुरक्षित बचाए रखने के लिए
यही उद्यम शेष बचा था संभवतः उनके लिए

कुत्ते ने हज़ारों-हज़ार पहाड़ियों को लांघा है
कृष्णा नदी से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पार किया है
मवेशियों की प्रतिध्वनि को सुरक्षित कर लिया है अपने भीतर
अंतरिक्ष की यात्राएं तक कर डालीं हैं और
अव्यक्त प्रेम को परिभाषित करने का काम भी किया है

मनुष्यों को जितने ख़िताब व वज़ीफे मिलने चाहिएं
कुत्ते को मिला करेंगे अब से
इस हेतु कि सर्वोत्तम से सर्वोत्तम स्वप्न
कुत्ते पूरा किया करेंगे अब से लगातार घूमती पृथ्वी पर

अब से बस इतना-भर होगा कि
कुत्ता हमारे लिए दुख-तंत्र सरीखा नहीं रहेगा

असल भाषा जीने का तरीक़ा भी हम कुत्ते से सीखा करेंगे

कुत्ते से हताश होने की बात है फिजूल
कुत्ते की वजह से हमारा नाम गृहमंत्रालय तक पहुंचेगा एक दिन
एक दिन हम कुत्ते की वजह से
कोई ऐतिहासिक सम्मान पाने की इच्छा पूरी कर सकेंगे

जलते शहर का दर्द 

ज़िक्र छिड़ा जब दौरे-अजब का
झील में रोया है चांद शब का

सीना ताने कब से खड़ा है
हौसला पर्वत का है ग़ज़ब का

जलते शहर का दर्द न जाने
सूरज निकला बस मतलब का

मांगा लहू जब शे’रो-सुख़न ने
ग़म में ‘शहंशाह’ डूबा कब का।

डोर से बंधी पतंग

डोर से बंधी पतंग
पार कर जाती है
क्षितिज-रेखा

छू आती है
मंगल ग्रह की गिलहरी
मंगल ग्रह की स्त्री
मंगल ग्रह का बाघ
मंगल ग्रह की मिट्टी
मंगल ग्रह का जल
मंगल ग्रह का तल

छू आती है पतंग
समूचा मानचित्र जैसे।

स्त्रियाँ 

स्त्रियाँ हैं इसलिए
फूटता है हरा रंग वृक्षों से
उड़ रहे सुग्गे से

स्त्रियाँ हैं इसलिए
शब्द हैं वाक्य हैं छन्द हैं
विधियाँ हैं सिद्धियाँ हैं
भाद्रपद हैं चैत्र है

इसलिए अचरज है
अंकुर हैं फूटने को आतुर ।

इस लोक के इस आर्यावर्त में

इस ऋतु का कथा आरंभ भी
पुरानी तमाम दरिद्र ऋतुओं जैसा ही था

खिड़कियां थीं अपनी-अपनी जगह पर
परंतु खिड़कियों के बाहर हत्यारे थे जमा
और वे असंख्य-अनगिनत थे
जैसे सांप थे अनगिनत
अनगिनत थे चीते तेंदुए

पीठ थी लेकिन पीठ का ज़ख़्म था वैसा का वैसा
जीवित लोग थे सड़कों पर ढेरों पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में
पर जीवन झलकता नहीं था जीवन जैसा
न हंसी झलकती थी हंसी जैसी हमारी स्मृतियों में

आत्मा को थी देह की
देह को थी आत्मा की खोज
इस परिदृश्य में
और घर भी था अदृश्य
इस परिदृश्य में

शब्द थे जो मंत्र की तरह जापे नहीं जा रहे थे
दरख़्त थे जो काटे जा रहे थे निरंतर मनुष्यों की तरह
स्त्रियों में भाद्रपद की माघ-फागुन की
प्रतीक्षा नहीं थी अनाज से कंकड़ चुनते समय
न प्रार्थनाओं के प्रति उत्साह था बचा हुआ
न धान पकने के दिन का था इंतज़ार

नहाते समय युवा लड़कियां गुनगुनाती नहीं थीं
लोकगीत कोई अपने स्वप्नकुमारों के लिए

थकने से पहले ही सुस्ताने लगे थे लोग
पकने से पहले ही बुझने लगा था चूल्हा

इस लोक के इस आर्यावर्त में
सब कुछ था जैसे लड़खड़ाता हुआ
सब कुछ था जैसे दरार में समाता हुआ
सब कुछ था जैसे विपक्ष में हंसता हुआ

लानत है जो हम अपनी सभ्यता में
ऐसे दृश्यों को जी रहे थे
दुखों की संख्या बढ़ा रहे थे

झूठ को झूठ को
सिर्फ़ झूठ को गा रहे थे
निहायत झूठे आदमी की तरह।

पाटलिपुत्र के सौ बिल्ले और एक बिल्ली की कथा 

पाटलिपुत्र में रोज़ एक नई कथा जन्म लेती है
रोज़ चमत्कार का बाज़ार लगता है नवीन और पुरातन

किसी नए अचरज की ही मानिंद छाया हुआ है
गौतम-शिल्पी हत्याकांड राजधानी में इन दिनों

हमारे-तुम्हारे लिए यह एक हत्या का मामला हो सकता है
राजनीतिज्ञों-पदाधिकारियों के लिए यह सब परंतु
राजधानी में हो रही सामान्य मृत्यु जैसा है

जिस तरह मुंबई चेन्नई कोलकाता आदि महानगरों में
किसी की हत्या एक सामान्य मृत्यु की तरह ली जाती रही है
फिर अंततः क़िस्सा ख़त्म किया जाता रहा है साक्ष्य को मिटाकर

दिल्ली ऐसी हत्याओं ऐसी वारदातों को लेकर
असहज रही है शताब्दियों से

चूंकि हम सौ चैनलों से भी अधिक चैनलों वाले
समय को भोगते जो रहे हैं
अपने-अपने गुप्त रोगों को छिपाए हुए

महानगरों और राजधानियों की देव कन्याओं में
शिल्पी भी क्या चीज़ थी बाप
अक्खा बिंदास अक्खा समुद्र

भोंसड़ी के तुम्हारा मन काहे को कचोट रहा है
तुम्हारे यहां की नताशा-वताशा कुछ कम थीं क्या
हमारी शिल्पी से हमारी सर्दियों की धूप से

नैना को भी तो तुम्हीं लोगों ने झोंका था तंदूर में

पहले मक़बूल फ़िदा हुसेन
और अब बिरजू महाराज लगे हैं माधुरी की धक्-धक् के पीछे
यह सूचना कम दहलाने वाली सूचना थोड़े ही है
दोनों बुढ़ऊ को लेकर इस वितान में

वह पाटलिपुत्र की सड़कों पर चलती तो
आत्मा का अंधेरा छू हो जाता
वाक्य-विन्यास तक इधर-उधर हो जाते
इस भाद्रपद में इस फागुन इस चैत में
सारे असंभव संभव हो जाते

हमारी सहपाठिनियों की तरह उसके भी स्तन जब
समुद्र की लहरों की तरह ऊपर-नीचे होते
या लोटन कबूतरों की तरह एक साथ उड़ते तो
कितने-कितने शब्द जन्म लेते कितनी-कितनी भाषाएं
कितनी-कितनी वनस्पतियां उगतीं मंगल ग्रह पर

एक पूरी आधुनिक संस्कृति थी शिल्पी
इस पाटलिपुत्र को डेग-डेग पर गतिशील करती हुई

इस पाटलिपुत्र में मरते वक्त
इस अज़ीमाबाद में मरते वक्त
इस पटना में मरते वक्त
क्या था शिल्पी के पास

एक हैंडबेग
कुछ मेकअप के सामान
एक गैराज
एक एसी गाड़ी
जिसमें उसकी अधनंगी लाश बरामद हुई थी
और एक अदद उसका प्रेमी
जो उसके साथ ही मारा गया उसको स्पर्श करते हुए

दुनिया में कई ऐसी लाशें मिली होंगी और
हत्यारा हमारे ही आसपास रोज़ उठता-बैठता होगा
अपने चेहरे पर देवत्व लिए

शिल्पी कविताएं नहीं लिखती थी
या क्या मालूम उसकी डायरी मिल जाए
फिर शायद बहुत सुंदर गद्य
डायरी को झाड़ने-पोछने के बाद
पढ़ने की हमारी इच्छा पूरी हो भी जाए
यह बात हमारे लिए हैरत की बात होगी

एक महान सदी के विदा के समय की वह
एक महान लड़की थी यार
एकदम झकास एकदम किसी नायिका जैसी
उसके घर में दुर्भाग्यपूर्ण कुछ भी नहीं रहा होगा
बस उसने किसी से सच्चा प्रेम किया होगा
और मार डाली गई होगी
भूमंडलीकरण वैज्ञानिकता युद्ध आतंकवाद
और ‘मिज़ाइल मैन’ जैसे राष्ट्राध्यक्ष वाले इस समय के
सौ बिल्लों के बीच एक बिल्ली क्या करती भला

अथवा किस प्रकार ख़ूंख़ार बिल्लों की
यौन प्रवृत्तियों को करती रेखांकित

अच्छा हुआ शिल्पी कविता नहीं लिखती थी
नहीं तो एक गुमनाम मौत मारी जाती
कई-कई युवा कवयित्रियों की तरह

दुनिया में ढेरों ऐसी लड़कियां हैं
जो कविताएं नहीं लिखतीं
अपनी मृत्यु तक के बारे में नहीं

लेकिन दुनिया में ऐसी ढेरों लड़कियां हैं
जो डायना की तरह मरीं और ख़ूब चर्चित हुईं
जो दिव्या भारती की तरह मरीं और अख़बारों की सुर्खियां बनीं

बहुत सारी लड़कियां मुख मैथुन करते हुए
चर्चित हुईं मोनिका लेविंस्की की तरह
बहुत सारे न्यायाधीश समलैंगिकता को
सही ठहराते हुए चर्चित हुए

एक-एक लड़की में सौ-सौ बिल्लियां हैं
एक-एक लड़के में सौ-सौ बिल्ले लेते हैं जन्म
अपनी कामुक इच्छाओं के साथ
उदासी की बात यह नहीं है मित्रो कि
सर्वाधिक सूचनाओं वाले इस कालखंड में
मारी गई शिल्पी
गुलाम अली और जगजीत सिंह की गाई ग़ज़लों
को सुनते हुए मारी गई

उदासी की बात तो यह है कि उसका हैंडबैग पड़ा है
अभी भी उसकी गैराज में
उसकी हत्या निर्मम हत्या की दास्तान सुनाता हुआ।

मक़बूल फ़िदा हुसेन के प्रति : छह कविताएं

एक

इस समय कोई भी जीव
चुप नहीं है
इस समय किसी को
घर लौटने की जल्दी नहीं है
इस समय देवताओं को
कोई हड़बड़ी नहीं है

इस समय देवकन्याओं को
अपने सजने की चिंता नहीं है

इस समय किसी को
अन्न-जल की फ़िक्र नहीं है

इस समय समृद्ध होने का समय है
इस समय छायाओं के फैलने का वक्त है
इस समय सब कुछ दृश्य में है

इस समय थोड़ी देर
एकांत में बैठकर
इस समय अपने-अपने अश्व गज बाघ
पृथ्वी अनंत ग्रह नक्षत्र को छोड़कर
अपने-अपने मंगल-अमंगल को भुलाकर
हमें देखना चाहिए
हुसेन की पेंटिंग में
माधुरी दीक्षित को रंगों में तब्दील होते
और अद्वितीय सक्रियता के साथ
कला-दीर्घा में पहुंचते

दो

डांस डायरेक्टर नचाए तो वह नाचती है
अपने भीतर की पूरी उत्तेजना को समेटे

हीरो कहे तो लिपटती है ज़ोर से

निर्देशक कहे तो
उरोजों को चुहल करने देती है
नदी समुद्र की दिशा तक मोड़ती है

अपने हुसेन कहें तो
जानलेवा तरीक़े से चहचहा उठती है
चित्र-संसार में

बग़ैर किसी पूर्व सूचना के
अपनी संपूर्ण अदाओं के संग
अपनी संपूर्ण कलाओं के संग
सारे नगर को पर्युत्सुक करने
कभी मुंबई
कभी कोलकाता के
थियेटर में होती है
तो कभी आगरा जबलपुर बांदा
कभी डिब्रूगढ़ सागर
या दरभंगा मुंगेर पटना के थियेटर में

यह सच और झूठ का खेल है
प्रिय दर्शको
जो लगातार जारी है
इस कुछ हां कुछ नहीं के बीच

तीन

माधुरी दीक्षित को तो
सभी धक्-धक् करा रहे हैं
अपने बुढ़ऊ हुसेन चाचा भी

उसी के पर्वत
उसी की नाभि
उसी के देह-जल को
छूना चाह रहे हैं
तमाम छोकरे

आईने के सामने
और झील के पानी में
उसी की नक़ल भी
उतारती फिर रही हैं
ढेरों छोकरियां

किन्तु मैं
अपने दुखों में रोती
निढाल होती
उस लड़की को
हंसाने की अपनी इच्छाएं
इस लगातार गर्म होती जा रही धरा पर
बार-बार दोहराता चला आ रहा हूं
जिसका रोना
जिसका निढाल होना
इस अद्भुत-विचित्र मायानगरी में
कोई नहीं सुनता महसूसता

चार

देखते तो ज़रूर देख लेते
तुम अपने आस पास फैले हुए
गहरे सन्नाटे और गहरे अंधेरे को

महसूसते तो महसूस लेते
तुम भी नैना साहनी का दर्द

खोजते तो ज़रूर खोज लेते
तुम भी भंवरी बाई की लड़ाई का मतलब

सुनते तो ज़रूर सुन लेते
तुम भी विस्थापित क्षमा कौल की आवाज़

समझना चाहते तो ज़रूर समझ लेते
तुम भी हमारे घरों की स्त्रियों के दुखों को
उनकी ख़ामोशियों को

एक अकेली नहीं थी
पूरे परिदृश्य में
माधुरी दीक्षित छाई
जिसकी एक-एक अदा को
तुम निखारते रहे अपनी कला में
जिसे तुम निहारते रहे सौ-सौ बार
‘हम आपके हैं कौन’ में
और सपनाते रहे इस गजगामिनी की
दिगंबर देह को

पांच

मालूम नहीं क्यों
सबसे अधिक आह्लादित
हुए जा रहे हैं
अपने म़कबूल फ़िदा हुसेन

मालूम नहीं क्यों
सबसे अधिक दिल भी
कचोट रहा है उन्हीं का

मालूम नहीं क्यों
सबसे ज़्यादा भीड़ से घिरी हुई
और सबसे ज़्यादा अकेली है
माधुरी दीक्षित

मालूम नहीं क्यों
माधुरी के माधुर्य पर
मोहित हैं हुसेन
और माधुरी फ़िदा है
फ़िदा हुसेन पर

मालूम नहीं
मालूम नहीं

छह

कितना अच्छा है
हुसेन अपने घर लौटेंगे
ब्रश को धोकर
और रंगों को समेटकर

कितना अच्छा है
माधुरी दीक्षित अपनी किसी
नई फिल्म का क्लाइमेक्स निबटाकर
अपने घर लौटेगी

शायद लौट जाएं
आप सब भी अपने घर प्रिय पाठको
प्रिय श्रोताओ
कितना अच्छा है
कितना अच्छा है
ऐसा होना परंतु
सब-सब आप सब
अपने-अपने घरों से देखेंगे कि
काम पर से लौटते हुए कुछ अदद पिता
मोरचे पर से लौटते हुए कुछ अदद घायल सिपाही
नगरपालिका से लौटते हुए कुछ अदद मेहतर
दवा लेकर लौटते कुछ अदद लड़के
रह गए हैं घर पहुंचने से
और ख़बरों में आने से

चुप भी कर यार
हुसेन हंस देंगे
माधुरी दीक्षित हंस देगी
उनके प्रशंसक हंस देंगे

पर एक ज़ख़्म होगा
जो मेरे अंदर
बार-बार हरा होता रहेगा।

विदा का समय

परितोष के लिए

विदा का समय आ गया मित्र
हम ख़ूब रहे साथ
हम ख़ूब घूमे साथ

साथ खाई बाजरे की रोटी
साथ चखी पुदीने की चटनी

आओ गले लग जाओ
विदा करो तो ऐसे करो
लगे कि हमें फिर-फिर मिलना है
कहीं न कहीं
किसी न किसी शक्ल में
किसी न किसी वितान में।

वहां भिलाई में

वहां भिलाई में गूंथा जा रहा है आटा
यहां पटना में भी तो चल रही है तैयारी रोटी पकाने की

वहां कोहिमा में गिरता है बारिश का पानी
तो तुम्हारे यहां भी तो आता है आषाढ़

वहां राउरकेला में लिखी जा रही हैं कविताएं
तो डिब्रूगढ़ से भी कविताएं आ रही हैं छपकर

वहां बनारस में भोर-सूर्य को किया जा रहा है नमन
तो पश्चिम बंगाल में भी दिख रहा है सूरज लाल

जो तुम्हारी घड़ी में बज रहा है
जो तुम्हारे हृदय में धड़क रहा है
जो तुम्हारी मुंडेर पर कांय-कांय कर रहा है
वही सब कुछ घट रहा है हमारे यहां भी यारा

अब बोलो तुम्हीं कि
तुम्हारी रगों में दौड़ रहा है रक्त
तो उस पागल स्त्री की नसों में

रहती दुनिया तक

लड़की नदी जितनी हंसती है
लड़की हवा जितनी दौड़ती है
लड़की पतंग जितनी उड़ती है

उसका हंसना
उसका दौड़ना
उसका उड़ना
रहती दुनिया तक
देखना चाहता हूं मैं।

रात के आसेब से

प्रो जाबिर हुसेन के विचारों के प्रति

मिरा कमरा आज़ाद हुआ
रात के आसेब से
आके देख
मैं ज़िंदा हूं
मैं अभी ज़िंदा हूं
इस दुश्मन शहर में
फिर से एक पूरा दिन
जीने के लिए।

सभाओं के बाद

शहर में रोज़ सभाएं होती हैं इन दिनों
मरुस्थल के निकट पीले पत्तों के बीच

सभाओं में उन्हें अपनी ही कही बातों को
सत्य साबित करने की चिंता होती बस

हमें दुष्ट घोषित करते वे बार-बार
सभाओं में और सभास्थल से बाहर

यही समय है बिलकुल सही समय उनके लिए

वे सबसे मौलिक शैली में
असंख्य पक्षियों को मारते
असंख्य वृक्षों को काटते
असंख्य घरों को उजाड़ते
असंख्य तस्वीरों को फाड़ते

असंख्य-असंख्य शब्दों के साथ करते बलात्कार तन्मय

सभाओं के बाद अमात्य-महामात्य
मुस्काते हौले-हौले एकदम असामाजिक
उस पागल स्त्री के रुदन पर

एक स्त्री मरी पड़ी है

एक स्त्री मरी पड़ी है
वृक्षों के एकांत में

दूसरी स्त्री खोजती है सूर्योदय
अमरता की उम्मीद में चुपचाप

ढेर सारी स्त्रियां अदृश्य और अनाम
देवताओं के लिए
जल और अक्षत लिए भटकती हैं
बेचैन आत्माओं-सी यहां-वहां

अंततः पीठ खुजाती हैं
भौंचक करती हुईं
अपनी ही विधियों में।

हरी घास पर प्रेम

प्रेम में तुम्हें चाहिए था
एकांत और सन्नाटा और असंभव सब कुछ
मुझे चाहिए था कोई प्राचीन चमत्कार

प्रेम में तुम दौड़तीं हरी घास पर
मैं निहारता तुम्हें एकाग्र
पुल पर चढ़कर

प्रेम में तुम धंसतीं मुझ में
मैं धंसता तुम में
जैसे कि एक नदी मिलती है
दूसरी नदी में संपूर्ण
शरीर मिलता है दूसरे शरीर में
आत्मा दूसरी आत्मा में।

दर्शक-दीर्घा में अकेली तालियां बजाती हुई लड़की

भरसक बहुत दूर नहीं गई होगी
तितली की तरह उड़ती हुई
चिडि़या की तरह फुदकती हुई
वह लड़की
बस अगले ही चौक अगले ही मोड़ तक
पहुंच पाई होगी और
झुकी हुई कमर वाली बुढि़या को
सड़क पार करा रही होगी

कुछ नए शब्द
कुछ नए वाक्य
कुछ नए मुहावरे
गढ़ रही होगी प्रफुल्लित

यह सब असंभव नहीं था उसके लिए

चले जाते हैं जब सारे दर्शक और श्रोता
और प्रेमी जोड़े और हत्यारे
उठकर अपने-अपने घरों में
शिलाओं के पीछे
अंधेरी छायाओं में
दर्शक-दीर्घा में अकेली बैठी हुई लड़की
जीवन को बीज को जंगल को
पृथ्वी-ब्रह्मांड को गा रहे
कवियों की कविताओं पर
तालियां बजाती है
वाह-वाह करती है

लड़की पहाड़ के कंधे पर
घने जंगलों में
पतंग के रंगों में
भोर के उजास में
कश्ती पर समुद्र-स्मरण करती हुई
बीजों फलों पत्तियों
और झींसियों के बीच
नटों के यहां
खूबसूरत बाघों के बीच
हमारे द्वारा देखे जा रहे महास्वप्नों में
रहती है मौजूद
अपने पूरे वजूद के साथ

आरा मशीन में जब लकड़ी को
ग़लत चीरा जाता है
बढ़ई जब लकड़ी को
ग़लत आकार देते हैं
ऐसा करने से रोकती है लड़की
वह जानती है पेड़ों के न होने का अर्थ
वह जानती है पेड़ों का न होना
इस पूरी दुनिया का न होना है
लड़की गेहूं और चावल और चीनी के बोरों को
ठेलों रिक्शों बैलगाडि़यों पर
लादने में मदद करती है अपने पिता की
एक भी दाने को
नीचे गिरने नहीं देती है

जहां हीला-हवाला और हंगामे होते हैं
जहां चूल्हे जलते हैं
जहां महान अभिनय होते हैं
जहां शांति-वार्ता चल रही होती है युद्धों के बीच
जहां अच्छे दिनों को
चिडि़यों के घोंसलों को
जीवन और सभ्यता को और भाषा को
बचाया जा रहा होता है
लड़की होती है वहीं आस पास बिलकुल सक्रिय

मैं काव्यपाठ से लौटता तो
वह मेरे शब्दों को अपने शब्द
मेरे उत्सव को अपना उत्सव
मेरे उल्लास को अपना उल्लास बनाती
मेरी गति को अपनी गति
मेरी लय को अपनी लय

मैं काम पर से लौटता
उस समय सांझ होती एकदम से
या मेरे किराए के मकान के पिछवाड़े वाले पेड़ों पर
रात आने की प्रक्रिया चल रही होती
लड़की सहला रही होती है मेरी सायकिल को
किसी झबरे कुत्ते की तरह

वह चकित करती अपने अभिनय से
इस कालखंड को
कई निरर्थक चीज़ों को सार्थक कर लेती
अपने हुनर से
साध लेती अपने भीतर के सन्नाटे को
अपने बर्बर और कठिन दिनों को

वह क्षण में कैटरीना कैफ़ बन जाती है
क्षण में सानिया मिर्जा
क्षण में नदी बन जाती है बहती हुई निरंतर

जैसे मुझे पसंद नहीं थीं बिपाशा मल्लिका
रिया सेन अथवा राखी सावंत अथवा नेहा धूपिया
वैसे ही उसे भी पसंद नहीं थीं
न इनकी देह के अंधेरे-उजाले पसंद थे उसे

‘उठाओ और ज़ोर लगाओ’
वह कुलियों को उकसाती है
लतीफ़ चाचा के चश्मे को
खोज कर देती है
अपने दुखों को बिसूरने का
यही एक तरीक़ा था उसके पास

लड़की मुहल्ले के हरी घास वाले मैदान में
टहलते हुए क्षितिज को पुकारते हुए
किवाड़ के पीछे छिपकर
बंजर ज़मीन को जोतते हुए
अपनी नयकी भउजी के संग
हंसी-ठिठोली करती है करोड़ों-करोड़ बार

जैसे बीज अंकुरता है धीरे-धीरे
लड़की भी ख़रामां-ख़रामां और बेख़ौफ
कहां-से-कहां चली जाती है
सोमजी अथवा बरनवाल जी के यहां
‘मछलीघर’ की रंग-बिरंगी मछलियों को
ख़ूब ग़ौर से देखती है
फिर खो जाती है कहीं
अपने किसी शून्य
अपने किसी बुरे समय
अपनी ही किसी दुष्ट छाया में

लड़की ज़रा-सी खिड़की खोलकर
ज़रा-सा सर बाहर निकालकर
हवा और बारिश पर
उड़ रहे महापक्षियों पर
दीवार पर पैफली हुई अनंत धूप पर
बच्चों के सपने में उतर रहीं उड़नतश्तरियों पर
इनके और उनके पोर्टिको में दौड़ रहे
रोबोट कुत्ते और रोबोट आदमियों पर
रखती है नज़र किसी ‘कैटवोमेन’ की मानिंद

लड़की नाचती है आदिवासी उत्सवों में बिंदास
लड़की अपने शतरूपों में नहाती है पानी के कुण्ड में
कह देती है कि दुनिया के सारे नदीतट
उसी के लिए बने हैं

लड़की बचाना चाहती है इन करोड़ों-करोड़ बरस से
जीवित पृथ्वी को घाटियों को नदियों को जंगलों को
पहाड़ों को और शहद के छत्तों को

लड़की देखना चाहती है
दिल्ली को दिल्ली की तरह
मुंबई को मुंबई की तरह
गुजरात को गुजरात की तरह
अयोध्या को अयोध्या की तरह
और असम को असम की तरह

लड़की ख़त्म कर देना चाहती है
बुरे ग्रहों को
फुसफुसाहटों को
विपत्तियों को

लड़की लाल फ्रॉक और स्कर्ट-टॉप में
अटके ख़राब समय
या अपने भीतर-बाहर
या अपने आजू-बाजू के
सब सन्नाटे सब अंधेरे सब बुरे तमाशे
फेंक आती है उस सबसे पुराने बरगद के पास वाले
सबसे पुराने कुएं की अनंत गहराइयों में

लड़की हमेशा मुहल्ले के बनिए के यहां
मिल जाती है कभी नमक-तेल
कभी चावल-दाल ख़रीदते हुए

लड़की इस बाज़ार चढ़े दिनों में भी
जब बनिए के यहां बहुत-बहुत चीज़ें
ख़रीदती हुई नज़र आती है
तब मैं समझता हूं कि एकदम क़रीब है
कोई महापर्व कोई महोत्सव
या कोई महाआयोजन
अब जबकि लड़की इस सावन-भादों के दिनों में
ब्लाउज़ और साड़ी में नज़र आने लगी है
जैसे कि ब्लाउज़ और साड़ी में
नज़र आती है कोई नई बढ़ी हुई लड़की
मैं नहीं समझ पाता उस अगीत को
जो कि गाया जा रहा होता है
जो कि बड़बड़ाया जा रहा होता है
उस साड़ी के इर्द-गिर्द
उस झुटपुटे में
उस एकांत के एकांत में

मैं नहीं समझ पाता
समय के अपहरणकर्ता-बलात्कारी
क्यों शामिल हो रहे हैं गिद्ध-भोज में
लड़की के घर लौटने वाले रास्तों में
क्यों खड़े किए जा रहे हैं अवरोध उनके द्वारा

आप समझदार जन ज़रूर समझते होंगे
उनकी विधियां और भाषाएं और योजनाएं

लड़की फिर भी लौटती है घर

जो समय है और जो है समय का फेरा
सबको लांघती हुई लड़की लौटती है घर
और बदलती है समय को समय में
पानी को पानी में
रंग को रंग में
सुंदरता को सुंदर में
और जीवन को जीवन में।

इसे हम ऊंट बना सकते हैं

सायकिल
हमारी इच्छाओं रुचियों का
जैसे प्रथम ध्रुवतारा
जिसकी ख़ासी ज़रूरत है
हमें और तुम्हें
हमारे पिता और भाई को

मृत या थकी हुई
कभी नहीं लगती सायकिल
इसे हम ऊँट बना सकते हैं
अश्व बना सकते हैं
वायुयान बना सकते हैं
और न जाने क्या-क्या बना सकते हैं
अगर आप-हम ठान लें

जब पहाड़ पुकारता है
जब जंगल पुकारता है
जब नदी पुकारती है
जब घाटी पुकारती है
जब पुकारता है प्रकाश-स्वर
हम भागते हैं सायकिल पर सवार

जैसे घर में होती हैं
गेंदें
किताबें
खिड़कियां
पतंगे
थपके
तस्वीरें
दूसरी ज़रूरी वस्तुएं
उसी तरह से
घरों में होती हैं सायकिलें

इस क़स्बाई रात में
इस शहरी सुबह में
इस गोधूलि के समय में
गर सायकिल है हमारे साथ
तो फ़िक्र की नहीं कोई बात

सायकिल प्रसन्न होती है
जब गृहस्थ उस पर चढ़कर
जाते हैं खेत
अब्बा हुज़ूर जाते हैं काम पर
बतियाते हैं रास्ते में
अनाज उपजाने वाले भाई से छककर
लड़के जाते हैं स्कूल
लड़कियां जाती हैं कॉलेज
शायर और कवि जाते हैं
मुशायरों और गोष्ठियों में

अपने ऊपर
एक मुकम्मल यक़ीन भी
चाहती है सायकिल

दूर-दूर तक फैली चांदनी को
संभाले रखती है सायकिल
अपने आस पास
युवा लड़कियों और चिडि़यों के
संगीत को
और चरवाहे के गीत को
उगती सुबह
डूबती सांझ को
कपास के दिन
खनिज की रात को
दृश्य और शब्द को
सायकिल गाती है समवेत

बच्चे मुंह अंधेरे
सायकिल की समस्त रचनाशीलता के संग
घर से निकल जाना चाहते हैं
समय से पहले बड़े हो जाने के लिए
पूरी पृथ्वी घूम लेने के लिए।

अपनी दाढ़ी को लेकर

कोई उठा था नाई से दाढ़ी बनवाकर
अभी-अभी नए सपने बुनते हुए
मेरी दाढ़ी लेकिन किसी फिल्म में
किसी टीवी सीरियल में
नाटक के किसी महत्त्वपूर्ण दृश्य में
काम करने की ख़ातिर
अथवा कवि-सा दिखने की ख़ातिर
नहीं बढ़ाई थी मैंने

दाढ़ी को रचा जा सकता था
पद्य की तरह गद्य की तरह
और सचमुच कठिन नहीं था ऐसा करना
मेरे लिए अज्ञात हरे पत्तों
अज्ञात पक्षियों को पुकारते हुए

फिर भादों के दिनों में
कबाड़िए को घर का कबाड़ बेचते हुए
अब्बू की दाढ़ीदार तस्वीर
लग गई थी मेरे हाथ
किसी चमत्कार की तरह
एक सज्जन-सी उदार और विनम्र तस्वीर
लगा था मेरी ही काया है उस तस्वीर में

मैं चाहता था पिता की देह को अपनी देह बनाना
पिता की तरह दाढ़ी रखकर
आस पास ही कोई गाए जाता था
बंजर ज़मीन के उपजाऊ होने का लोकगीत
ऐसा तो
ख़ुशी के संदर्भों
वसंत के दिनों में
होता था अमूमन

जबकि अब्बू ने बतलाया था कि
तालिबान के ध्वंस की घोषणा
अमेरिका कर चुका है बहुत पहले
फिर भी मेरे बच्चे
पिछले पखवाड़े एक आदमी को
जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
को देखते हुए वहां पर घूमते हुए
सिर्फ़ इसलिए पकड़ लिया था सुरक्षाकर्मियों ने
चूंकि उसको दाढ़ी थी

उस पिंक कलर वाली जैकेट पहने
अधेड़उम्र शख़्स की तो
इसलिए हत्या कर दी गई थी
क्योंकि हत्यारा उसकी दाढ़ी को देखकर
डर जाता था
ख़ौफज़दा हो जाता था बुरी तरह

फिर तुम मेरठ देख चुके हो
भागलपुर जमशेदपुर देख चुके हो
पूरे गुजरात को देख चुके हो

भय से भय से सिर्फ भय से
वीर्यपात कर रहा था यह समय
यह अनपेक्षित भी नहीं था
इस पूरे दृश्यफलक पर

कुछ अतिराष्ट्रवादी मित्रों ने तो
यहां तक कहा मुझसे कि
भाई शहंशाह, आप दाढ़ी बनवा लें प्लीज़

हर दाढ़ीदार आदमी को
शक के घेरे में लिया गया था
महामहिम के द्वारा
जबकि हत्यारा ख़ुद रखे हुए था दाढ़ी अरसे से

घुमक्कड़ी के इन दिवसों में
सोचा जाना चाहिए पूरी गंभीरता से
इस महासदी की
इस महाविडंबना पर
अपने-अपने उत्सवों को छोड़कर

काला पहाड़ और काला हुआ जाता था
उदास दिन और उदास
बीमार स्त्री और बीमार

मैं महामहिम के ख़ुतूत फाड़ता हूं
मैं महामहिम की नज़्मों को जलाता हूं

इस आदिकालीन समय को जीते हुए
मैं भी गाता हूं मैं भी अलापता हूं
सदियों से गाए जाने वाला कोई शोकगीत।

मृतात्माओं के इस नगर की इस संध्या-बेला में

सच कहूं तो मृतात्माओं के इस नगर की
इस संध्या-बेला में
वही सब कुछ घटित नहीं हुआ था
पूरी भयावहता और भयानकता लिए
पृथ्वी के प्रेम में घर से निकले
उन वृद्धजनों के साथ
या उन जैसे टहलते हुए
अन्य-अनेक वृद्धों के साथ

चूंकि सच आपको पसंद है अधिक
वे वृद्ध भी निकले थे सच की तस्वीरें
उतारने के लिए ही शायद इस शामियाने में

रास्ते में मिलते छायाकार के झुंडों
वनस्पतियों के दृश्यों समुद्र की हलचलों
पक्षियों की शून्य को भरती हुई आवाज़ों
सांपों की और नेवलों की ठीक उनकी बग़ल से
गुज़रने की सरसराहटों
अथवा निरंतर आते मीठे स्वरों से
मिटती उनकी थकानों
अथवा करोड़ों बरस से अंतरिक्ष और वनों से
उनके बीच के संबंधें से भरा उनका जीवन
आज कहीं पर दिखाई नहीं दे रहा था
न उनके भीतर के शिशु में
न उनके भीतर के इलाक़े में
न उनके भीतर के वितान में
न उनके भीतर के सुंदर बाघ में
न उनके भीतर की बहती हुई नदी में

कहने का तात्पर्य यह है कि
आज जो भी था उनके बाहर या अंदर
पिछले सौ-सौ हज़ार-हज़ार बरसों में नहीं था
इतना अनचाहा इतना अनजाना
जैसे आज संध्या-स्नान करते हुए
उन्होंने महसूसा
उनकी स्मृतियों पर तैनात थे शत्रु असंख्य
राष्ट्रव्यापी हड़ताल पर चले गए थे
बैंक के बाबू
सचिवालय के अधिकारी
पड़ोस के सिपाही
स्कूल के हेडमास्टर
कॉलेज के प्रोफेसर

सांसद, विधायक और मंत्री ख़ुश थे कि
पगार बढ़ाने के लिए कभी ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद
नहीं कहना पड़ा उन्हें
न अभूतपूर्व हड़ताल पर जाना पड़ा कभी
वे जब चाहते अपनी पगार पढ़वा सकते थे
अपने-अपने विचारों को भुलाकर

कहने का तात्पर्य यह है कि
कोई ऐतिहासिक क्षण नहीं दिखाई देता था
उनके जीवन में इन दिनों न उनकी विधि क्रियाओं में
न उनके भादों मास में
न उनके पूस-माघ में

न प्रेम की उक्तियां ही थीं
उनके भीतर के हरे पत्तों की
इस तिथि से उस तिथि तक में उनके साथ

आज वे खड़े थे जहां
पृथ्वी के जिस इलाक़े में
जिस पेड़
जिस छत
जिस शिविर
जिस मलबे
जिस समय और जिस काल के बीच
यदि सब कुछ
यही सब कुछ
सिर्फ़ घटित होता उन्हीं वृद्धजनों के साथ
तो समझते वे कि
यह तो होना ही था उनके साथ
यह हुआ और ऐसा घटा परंतु सबके साथ
स्त्रियों पुरुषों शिशुओं पशुओं पक्षियों
समुद्र की मछलियों
सबके साथ

चाहे मस्जिद वाली गली के सुलेमान मियां हों
चाहे काली मंदिर के पीछे रहने वाले बंगाली दादा हों
चाहे लोकल ट्रेन के यात्री-सहयात्री हों
चाहे पेड़ों के नीचे दिल्लगी कर रहीं लड़कियां हों
अथवा बारिश की प्रतीक्षा कर रहे
बायलोजिकल गार्डेन के जानवरों व दरिद्रजनों
के फोटो उतार रहे फोटोग्राफर
सभी डरे थे सभी सहमे थे
इस रहस्यमयी संध्या-बेला में

यूं कहिए
सभी को डराया गया था
डराए जाने के हर संभव-असंभव तरीक़ों से

ख़ुलासे के तौर पर उनसे बस यही कहा गया था कि
आज़ादी की हीरक-जयंती की तरफ़ बढ़ रहे
सारे साधरणजन डरें बस डरें

वे उनके कथित इस कथन को वैध समझें

वे डरें प्रार्थना करने वाली जगहों से
वे डरें प्राणिशास्त्र से
वे डरें आलोचकों की गुंडई-लफंगई से
वे डरें नायकों-नायिकाओं से
वे डरें अपनी ही महत्त्वाकांक्षाओं से
वे डरें अपनी शिष्टता से विशिष्टता से अपनी ईमानदारी से
वे डरें मुल्जि़म से
मुजरिम से
सटोरिए से
सिपाही से
वे डरें विज्ञापनों से
अर्थशास्त्रियों से
विश्वसुंदरियों से
सूट और टाइयों से वे डरें
ऐसा कहने वालों ने यह सब कहा था
एकदम शहदघुली भाषा में
सबके उत्सव के दिनों में

गर मैं संगीत-शिक्षक होता तो सुनाता संगीत
उनकी इस उदारता और हमारी दासता का
और हमें मारे जाने के
उनके और-और तरीक़ों के बारे में बतलाता
बतलाता उनके
और-और विचारों के बारे में

हमारा मारा जाना तो
शासकों की स्वैच्छिक क्रियाओं में
था शामिल पूरी तरह
यह सब स्वीकारा जाना चाहिए
दुनिया के अंतिम सत्य की तरह

हमारा मारा जाना कितना भी सच हो बड़ा
या उन बूढ़ों को डराया जाना कितना भी सच हो बड़ा
उनकी आत्माओं ने ही बचाया था
उन्हें डरने से और डरकर किसी पेड़ पर
लटक जाने से चमगादड़ों की तरह

पृथ्वी की अंतिम प्रजाति वे वृक्ष
जिन्होंने मालूम नहीं जिया था
कितनी हत्याएं
कितने बंटवारे
कितने दंगे
कितने हादसे
कितने शुभ-अशुभ
कितने एकांत
कितने सन्नाटे
कितनी अमानुषिकताएं
कितने इतिहास
कितनी आदिम प्रजातियां
कितने अनुभव अनूठे

यह अविश्वसनीय नहीं था बिलकुल
बल्कि सौ प्रतिशत सच था

मृतात्माओं के इस नगर की
इस संध्या-बेला में वे वृक्ष
जीवित कर आए थे अपना सारा हरा सारी ख़ुशी
अपने निबंधों संस्मरणों अफसानों
और अपने जीवन की उत्तरगाथाओं में
शासकों का मुंह चिढ़ाते हुए।

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