शहनाज़ इमरानी की रचनाएँ

एक ऊब 

घर, इत्मीनान, नींद और ख़्वाब
सबके हिस्से में नहीं आते
जैसे खाने की अच्छी चीज़ें
सब को नसीब नहीं होतीं

जीवन के अर्थ खोलने के लिए
ख़ुद पर चढ़ाई पर्तों को
उतारना होता है

पैदा होते ही एक पर्त चढ़ाई गई थी
जो आसानी से नहीं उतरती है
पर्त-दर-पर्त पर्तों का यह खोल
उतरने में बहुत वक़्त लगता है
बहुत कड़वा और कसैला-सा एक तजुर्बा

यह ऊब बाहर से अन्दर नहीं आती है
बल्कि अन्दर से बाहर की तरफ़ गई है
कुछ बचा जाने की ख़्वाहिश के टुकड़े
कुछ यूँ कि उसे ठीक करने की कोशिश भी
बेमानी लगती है ।

इसी अफ़रा-तफ़री में इतना हो जाता है
तयशुदा रास्ते पर चलते रहना
मोहज़ब बने रहना बहुत मुश्किल है
उम्र के दूसरे सिरे पर भी बचपन हँसता है
गहरे ज़मीन में जाती जड़ें
पानी का कतरा खोज कर शाख़ पर पहुँचाती हैं
शाख़ें अपनी ख़ुशियाँ फूलों को सौंपती हैं
फल सब कुछ खो देने के लिए पकता है

जैसे जैसे पेड़ की उम्र होती जाती है
इंसानी झुर्रियों जैसी पर्त-दर-पर्त
उसका बाहरी हिस्सा बनता जाता है
और फिर नाख़ूनों की तरह बेजान हो जाता है ।

वो जो मर गया 

सरों पर धूप है
वक़्त लिख रहा है इतिहास
कभी पसीने से तर
और कभी ख़ून से
हड्डियों पर चढ़ी खाल जैसी बीवी
आधे नंगे बच्चे और
दिन भर खाट पर पढ़ी खाँसती माँ को
भूख ग़रीबी और बीमारी से तंग आकर
वो गाँव में छोड़ कर
शहर की तरफ़ भाग आया था

दिन के कन्धे पर हाथ रख कर
उठे पाँव
भटकते -भटकते जब जड़ हो गए
रेलवे स्टेशन की एक और ज़िन्दगी
के साथ साँस लेने लगा
शहर में उसे जगह नहीं दी
और जंगल भी उससे छीन लिया
ग़रीबी रेखा को ऊपर-नीचे सरकाकर
उसे नकार दिया गया
जगमगाता रोशनियों से भरा शहर
बाज़ारों में ईमान ख़रीदने वाली दुकानें
मन्दिरों कि घण्टियों और मस्जिदों की अज़ानों
से जागने वाला यह शहर फिर सो जाता है
एक रोटी और घूँट भर पानी
कि माँग भी यहाँ जुर्म है

इस जुर्म कि सज़ा भी मिली
बन्द आँखें अन्दर तक धँसे गाल स्याह होंठ
खेत में खड़े बिजूका की तरह जिस्म
और चिथड़ों से आती बदबू
शहीद होने के लिए सरहद पर मरना ज़रूरी है
और हर धर्म के कुछ निशाँ होते हैं

यह जो मर गया है बग़ैर कोई पहचान के
यह तो लावारिस मुर्दा घर में जाएगा
आधा दिन तो गुज़र गया
मक्खियाँ और चीटियों के साथ
झाड़ू लगाने वाले ने लाश को
दीवार की तरफ खिसका दिया
एक धुन्ध में घिरने लगा था फिर शहर
और लोगों कि रफ़्तार तेज़ होने लगी थी !

मेरा शहर

शहर में भीड़ है
शहर में शोर है
शहर को ख़ूबसूरत बनाया जा रहा है

सरों पर धूप है
खुरदरी, पथरीली, नुकीली,
बदहवास, हताश
परछाइयाँ…..

तमाम जुर्म, क़त्ल, ख़ुदकशी
सवाल लगा रहे हैं ठहाके
क़ानून उड़ने लगा है वर्कों से
घुल रही हैं कड़वाहट हवाओं में
एक बेआवाज़ ग़ाली जुबाँ पर है
मर चुकी सम्वेदनाओं के साथ जी रहा है शहर
अब बहुत तेज़ भाग रहा है मेरा शहर !

इस कमरे की अकेली खिड़की

तुमसे मिल कर लगा
तुम तो वही हो ना
मैं अपने ख़यालों में अक्सर
तुम से मिलती रही हूँ

एक ख़याल की तरह तुम हो भी
और नहीं भी

तुमसे बातें यूँ की जैसे
सदियों से जानती हूँ तुम्हे
बिछड़ना न हो जैसे कभी तुमसे

शायद तुम्हें पता न हो
इस कमरे की अकेली
खिड़की तुम हो
मेरी हर साँस लेती है
हवाएँ तुमसे !

अब डर लगता है 

जायज़ या नाजायज़ हालात
समय की पैदाइश हैं

ग़ायब हो चुके पार्क में
वो झूले याद आते है
तेज़ झूले का डर
छिपकलियों और कॉकरोचों से डर
परीक्षा में फ़ेल होने का डर
भूत, चुड़ैलों का डर

डर भी कितने छोटे होते थे
शरारत और डाँटों के बीच
डर अँधेरे के साथ ही रोज़ रात आता
डराता और सुबह होते चला जाता

साल-दर साल मेरे साथ-साथ
डर भी बड़े हुए
में तो एक हूँ यह अनन्त हुए

अब डर लगता है
लोगों की चालाक मुस्कानों से
दोस्ती में छुपी चालों से
शतरंज की बिसातों से
नफ़रतों से चाहतों से
आतंक, विस्फोट, और इंसानी जिस्मों के टुकड़ों से
दंगाइयों से, आग से, लाठीचार्ज से
पुलिस, नेताओं, चुनाव और फ़साद से
मस्जिद में अल्लाहो अकबर और
मन्दिर में हर-हर महादेव के नारों से
भीड़ में और बस में पास बैठे
अजनबी के स्पर्श से

रास्ता चलते हुए
जिस्म का जायज़ा लेती नज़रों से
ख़ुद के नारी होने से ।

ओ मेरे वक़्त तुम सुनो ! 

उन्हें भी चाहिए
उनके हिस्से की हवा
उनके हिस्से की ज़मीन
उनके हिस्से का आसमान
उनके हिस्से की ख़ुशी

ओ मेरे वक़्त तुम सुनो !
कि ज़िन्दगी में
इन्सान मोहब्बतों के लिए
और चीज़ें इस्तमाल के लिए थीं
लेकिन हवस ने हमारी आत्मा
की गठरी बना कर
एक गहरे काले समन्दर में
पत्थरों से बाँध कर फेंक दिया
अब हम चीज़ों से मोहब्बत करते हैं
और इन्सानों का इस्तमाल करते हैं
अपनी तमाम अमानवी क्रूरताओं के साथ
हर जगह क़ब्ज़ा करती जा रही हैं
बढ़ती ज़रूरतें और लालसाएँ

दीमक 

फैलती जा रही है दीमक रिश्वत की
स्कूल में एडमीशन के लिए, ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए
रेड लाइट पर चालान से बचने के लिए
मुक़दमा जीतने और हारने के लिए
नौकरी के लिए, राशनकार्ड, लाइसेंस, पासपोर्ट के लिए,
अस्पताल के लिए, घर के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए
साँस लेने के लिए
जुर्म, नाइंसाफ़ी, बेईमानी
अल्फ़ाज़ों ने नए लिबास पहन लिए हैं
महँगाई, ग़रीबी, भूख और बेरोज़गारी से लोग जूझ रहे हैं
हमारे पास ईमानदारी बची नहीं
और बेईमानी एक राष्ट्रीय मजबूरी बन गई
सब की अपनी-अपनी ढपली अपना राग
सम्वेदनशीलता से बचते हुए इंसान के ख़िलाफ़
हर नाइंसाफ़ी को बर्दाश्त करना
कोई तो सीखे क़ैदी ज़हनों में सोच भरना
कोई तो सुलझाए ज़िन्दगी का गणित
ज़िन्दा आदमी कंकाल की तरह
करते है मेहनत ढोते हैं
ईंटे, रेत, सीमेंट
बनते जा रहे है कंक्रीट के जंगल
बगैर, ब्याज़ और क़र्ज़ का बोझ
आदमी का ख़ून पी कर
मानते है कामयाबी का उत्सव
नेपथ्य में काम करने वाले अँधेरे में
रंगमंच पर तालियों की गड़गड़ाहट और शोर ।

ख़ुदाओं की इस जंग में 

दिन रात का सारा हिसाब बिगड़ा हुआ इन दिनों
धार्मिक नफ़रत ने राजनीति से निकलकर
क़ब्ज़ा कर लिया लोगों के दिमागों पर
कहीं भीड़ बनकर कहीं भीड़ में शामिल होकर
शक के आधार पर बेगुनाहों का क़त्ल
हार पहनाकर स्वागत किया जाता अब हत्यारों का

सदियों की उपेक्षा और सियासी चालबाज़ियों का नतीजा
पुकारा जाता ग़द्दार और देशद्रोही के नाम से
हो रही है लगातार विचारों की हत्या
यहाँ प्रतिरोध अब बेमानी और बेअसर

दीवारें ख़ामोश हैं निःशब्द खड़े हैं पहरेदार
जेल में बन्द है अहिंसा
सबका साथ सबका विकास नहीं होता
सिर्फ़ कुछ लोगों का विकास
झूठ को झूठ कहना देशद्रोह हुआ
शब्दों और भाषणों से फ़ैल रही नफ़रतें
वो डराते हैं ज़िन्दगी को

वो हमारे मारे जाने का ख़्वाब देखते
भूखमरी और जंग के बीच भी बनाते नये क़ायदे
अमन के परिन्दे बैठे बारूद के ढेर पर
लाशों पर राष्ट्र की बुनियाद
हर जुर्म में एक क़ौम को तलाशना लाज़मी
मुस्लिम फ़ोबिया फैलता मीडिया
इनसान से जानवर होते जाने के वक़्त में

राजनीति और धर्म के बदलते मायने
किए जा रहे हैं छल
एक-दूसरे को निगल जाने के षड्यंत्र
भूख और हाथ के बढ़ते जाते फ़ासले के बीच
पदक और पदोन्नतियाँ
मिलते हैं जो मौत के सौदागरों को

नाउम्मीदी काली रात सी
सबके अपने दाँव
कोई ऐसा कोई वैसा और कोई न जाने कैसा
उदासीनता के इस सन्नाटे में
मरते जाते हैं एहसास
कब पता चलता है की न चाहते हुए भी
बन जाते हैं दर्शक इस निर्मम समय की चुप्पी के बीच ।

त्रासदी 

सफ़र की शुरूआत में
पैरों ने महसूस किया
ज़मीन का सक़्त हो जाना
विपरीत दिशा में हवा का चलना
उस एक पुरानी हवेली के दालान में
कितनी झूठी कहानियाँ सुनी थीं मैंने
कितने सच्चे अन्देशों को झूठा जाना था
बहुत से सवाल ज़हन को झँझोड़ते रहे
सीखा नाइंसाफ़ी को नाइंसाफ़ी
और ज़ुल्म को ज़ुल्म कहना ।

पूछती हूँ सवाल मेरे पिता ने भी भी पूछा था
ज़िन्दगी जीना आर्ट नहीं
पतली रस्सी पर चलता नट का खेल हुआ

कोई भी आदमी कभी भी
अलग तरह से उजागर हो कर चौंका देता
नहीं है आदमी के आकलन का कोई फार्मूला
हर कोई आइसबर्ग की तरह
दिखाता सिर्फ़ थोड़ा सा ही हिस्सा

एक मारक चाबुक की तरह
बेआवाज़ घटित होता और छोड़ जाता निशान
व्यक्ति को जानने का दावा खोखला हो चुका अब
खंजर पर क़ातिल के हाथ के निशा नहीं मिलते
धर्म के दस्ताने पहने हुए कुछ भी साबित नहीं होता
बहुत सारे विश्वासों में से भी फूट पड़ता है सन्देह ।

बी पॉज़िटिव

पहचानी हुई सी जगह पर मैं अकेली
मुझे पहचानने वाला कोई नहीं
पहचान तो ख़ुदी से होती है, फिर अन्धेरा हो या रौशनी
सामने वाले बिस्तर पर रोती स्त्री के
आँसुओं का गीलापन, ख़ुद की आँखों में महसूस होता
खिड़की से बाहर नज़र जाती
गली के नुक्क्ड़ पर लगा उदास लैम्प पोस्ट
शायद अब रोशनी नहीं देता
लोहे के जंगले पर फुदकती चिड़िया
गमलों के मुरझाते फूल
बैचेनी हर चीज़ का रंग बदल देती
कहीं बादलों के बीच “मैं” और कोई आवाज़ नहीं
एक निर्वात में खो जाती
किताबों के नाम, कहानियों के किरदार
हादसों का बयान, एथनाग्राफिक डिटेल्स
किसी मायावी घटना के घटने की उम्मीद
मुझे छूकर निकल जाती

बिस्तर पर वापस
घुटने पेट की तरफ़ मोड़ते हुए
महसूस होता, ख़ालीपन कुछ कम हुआ
“बी पॉज़िटिव” एक बोतल ख़ून दौड़ने लगता नसों में ।

शिनाख़्त 

क्या होगा ?
कुछ होने के बारे में
ढेर सारे सवाल सामने खड़े
ग़लत जगह पर रखी सही चीज़ें
ग़लत उपयोग की आदी हो गईं
सुबह आईने में देखा
रातों की स्याही आँखों के नीचे बैठी थी
मुँह छुपाने पर अपनी ही
हथेलियों के अन्दर राहत नहीं मिलती
मैं भी तो इसी मिट्टी की हूँ
पैबस्त है गहरे लफ़्ज़ों में नाम इसका
पुरातत्व के शिलालेख की तरह
मगर कागज़ पर लिखे चन्द शब्द सुबूत हुए
हर चेहरे पर मौजूद हैं उनके शुरूआत की जड़ें
आदमी की पूरी कहानी कहती हुई
जड़ों से ही होता दरख़्त हरा

जगह नहीं बदलते दरख़्त
ग़ायब हो जाती उनकी प्रजातियाँ
पहचान विस्मृत हुई और इतिहास भी
साथ छूट सकता है कहीं भी
हवा की तरह
पिता के हाथ की तरह
रात के काले वर्कों पर सर्द सन्नाटा
ठिठुरती हवा रूक-रूक कर चलती
यह न्याय और अदालत के सोने का वक़्त

देती हूँ ख़ुद को तसल्ली
बाँधती हूँ नए सिरे से मुट्ठियाँ
अपने ही चेहरे में ख़ुद को ढूँढ़ती हूँ
ख़ुद के होने में ख़ुद ही को
मैं किसको पुरसा देती
मुझे ताज़ियत तो ख़ुद से करनी थी ।

मेरा ख़ौफ़ 

एक ही सिम्त में चलते दिन रात
उदासी एक गहरी नदी
जिसमे चेहरा भी उचाट नज़र आता
सुबह से शाम और शाम से रात तक
नपे-तुले क़दमों की हरकत
बदलती दुनिया की हर चीज़ के बदलते मायने
शाम ढलते हुए काली रात में बदली
चाँद के लम्बे हाथ
दरख़्तों के सर्द कन्धों को छूते हुए
बादलों के समन्दर में डूबे

असमंजस की सीढ़ियों पर बैठे हुए
सन्नाटे की आवाज़ें नींद और जागने के बीच
नब्ज़ टटोलने पर सांसे किसी आशंका में उखड़ती
आती हुई बमुश्किल चन्द सांसें
जिनमे उलझी एक पूरी दुनिया
उम्मीदों की खुली खिड़कियों से
खुलता आसमान मगर कुछ वक़्त के लिए
एक धूसर दुख चुप्पी ओढ़ लेता
एक अजीब ख़ौफ़ सर उठाता
बावजूद इसके के मौत एक सामान्य सी बात है अब ।

चुनाव 

खेतों के साथ चलते हुए
रातो-रात मैदान बन जाते हैं
सड़कें दौड़ने लगती हैं
कुछ जाँबाज़ लफ़्ज़ छलाँग लगाते हैं
और ख़बर के सबसे सियाह पहलू को
नए बने शहर के सामने लाते हैं
जब मानी का सबसे मुश्किल नुक़ता आता है
लोग फिसल कर जल्लाद के साथ हो लेते हैं
जो राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता
वो ही तो नेता बन जाता है
चुनाव जीतना दहशतगर्दी का लाइसेंस मिल जाने जैसा है
देशवासियों को खाना नसीब नहीं
और वो पार्टी के बाद का खाना ट्रकों में भर कर फेंकते है
बे घर लोग बदन पर चीथड़े
खाली पेट सरकारी अस्पतालों के फ़र्श पर
बिना दवा इलाज के दम तोड़ते रहते हैं
ख़ून, बलात्कार, हिंसा, अन्याय, अत्याचार, कट्टरवाद
मेरे देश में आज भी राष्ट्र से पहले धर्म आता है !
अणु-परमाणु से चल कर
न्यूट्रोन-प्रोटोन तक पहुँची
इस चरम सभ्यता की ज़िन्दगी में
प्रजा पीछे छूट गई और तन्त्र बुलेट-प्रूफ़ कारों में आगे निकल गया ।

गाँव का एक दिन 

परिन्दे जाग गए है
एक दूसरे का अभिवादन
कर रहे हैं शायद
दो चिड़ियाँ आपस में
प्यार करती है
या झगड़ती हैं
चार खम्बे और एक छप्पर
कहने को है एक घर
आँगन के चूल्हे से
उठता कण्डों का धुआँ है
एक बछड़ा उछलता है
एक चितकबरी गाय रँभाती है
एक कुत्ता आँगन में सोता है
एक गहरा कुआँ
जिस से लौटती थीं गूँजती आवाज़ें
समय ने पाट दिया है
कुछ पेड़ों के पत्ते पीले हुए है
सूनी डालियों को छोड़ कर
हवा के रुख़ पर तैरते है
जैसे बिना इरादों के आदमी
कच्चे रास्तों से गुज़र कर
गाँव की छरहरी पगडण्डी
चौड़ी सड़क से जा मिली है
यहाँ सब कुछ वैसा सुन्दर नहीं है
जो अक्सर टी० वी० के चैनलों पर
दिखाया जाता है
मुख्तलिफ़ दुनिया है गाँव की
अभावों से भरी ज़िन्दगी की साँसे
किसान का पसीना
और ग़रीबी की मार ।

अब्बू तुम्हारी याद

तुम्हारी याद
रोज़ तपते दिन का सामना करती है
फिर ढलते शाम के सूरज तक पँहुच जाती है
आज देखो फिर काला अँधेरा पीला चाँद ले आया है
क्यों बेतरतीब-सी है यह दुनिया
कुछ ठीक करने की कोशिश में तुम
माथे का पसीना पोंछते रहे
तुम्हारी बातों में थी रोशनी
ज़िन्दगी का संघर्ष और बहुत सारा साहस
शुरूआत और अन्जाम के बीच अब भी
भटकती है कहानी
कहीं धुएँ को तरसते हैं चूल्हे तो कहीं
जीवन ने सिर्फ़ व्यापारी बना दिया है
ज़ुल्म करने वालों और
ज़ुल्म सहने वालों तक एक ही कहानी है
जनसंख्या बढ़ती है तो भूख भी बढ़ जाती है
रिश्तों का जोड़ टूट गया है
इस दौड़ में अगला क़दम पीछे वाले से छूट गया है
हवा में फैले हैं अन्देशे और हाँफता हुआ डर
दुनियाँ बन गई है एक बारूद की खदान
अब भी जारी है राजनीति के झगड़े कुर्सी की खींच-तान
सब कुछ ही है वैसा
बदल कर भी कुछ न बदलने जैसा ।

पिछली सर्दी में 

वो दिन बहुत अच्छे थे
जब अजनबीपन की ये बाड़
हमारे बीच नहीं उगी थी
इसके लोहे के दाँत
हमारी बातों को नहीं काटते थे
उन दिनों की सर्दी में
मेंरे गर्म कम्बल में तुम्हारे पास
कितने क़िस्से हुआ करते थे
हर लफ़्ज़ का मतलब वही नहीं होता
जो क़िताबे बताती है
लफ़्ज़ तो धोखा होते है
कभी कानों का कभी दिल का
और ख़ामोशी की अँधेरी सुरंग में
काँच सा वक़्त टूटने पर
बाक़ी रह जाती हैं आवाज़े
और उनकी गूँज !

मोहल्ले का चौकीदार 

अपने हाथ का तकिया बना कर
अक्सर सो जाता है
अपनी छोटी-छोटी आँखे और चपटी सी नाक लिए
सब को हाथ जोड़ कर सर झुकाता है
नाम तो बहादुर है पर डर जाता है
ख़ुद को साबित करने के लिए
चौकन्ना हाथ में लिए लाठी
उसे पटकता है ज़मी पर
चिल्लाता है ज़ोर से ’जागते रहो’
अपनी चौकन्नी आँखों का
एक जाल-सा फैलाता है
फिर भी सड़क का कोई कुत्ता बिना भौंके
निकल ही जाता है
हर महीने लोगों के दरवाज़े खटखटाता है
कुछ दरवाज़े तो पी जाते हैं उसकी रिरियाहट को
कुछ देते है आधा पैसा
कुछ अगले महीने पर टाल देते हैं
मेमसाब घर जाना है
माँ बहुत बीमार है
इस बार तो पूरा पैसा दे दो
और मेमसाब कुछ सुने बगैर
दरवाज़ा बन्द कर के कहती है
छुट्टा नहीं हैं फिर आना ।

इण्डिविजुअलिटी 

कभी लगता है ख़ुद को दोहरा रही हूँ
बार-बार वैसी ही बातें
नये तरीकों से ख़ुद को कहते हुए
लिखने के दरमियान
क्या है जो लफ़्ज़ों के पीछे छुप गया है
या जान-बूझकर नहीं लिखा
या ख़ुद को बचाए रखने की चालाकियाँ
छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट कर जीना
मैं जो हूं उसमें मेरा अपना होना कितना
पूरे होने की ख़्वाहिश लिये फिर भी अधूरे
अन्दर की तहों में छुपी रौशनी
आँच जो अन्दर कहीं जलती है
इसमें बहुत-सी सम्भावनाएँ हैं जीने की
सबकी अपनी इण्डिविजुअलिटी है
दूसरे की तरह होने से इंकार ज़रूरी है

मेरे देश में

समय के साथ खेत मैदान बन जाते हैं
और फिर सड़कें दौड़ने लगती हैं
जब भी मौक़ा मिला साँस लेने का
तो पाया इस में शामिल होती है चतुराई

जो राजनीति के बारे में नहीं जानता
वो ही तो नेता बन जाता है
चुनाव जीतना भी
दहशतगर्दी का लाइसेंस मिल जाने जैसा है
देशवासियों को खाना नसीब नहीं
और वो पार्टी के बाद का खाना ट्रकों में भर कर फेंकते है
रोज़ाना कई लोग
खाली पेट सरकारी अस्पतालों के फर्श पर
बिना दवा इलाज के दम तोड़ते हैं

पहले से ज़्यादा होते है
ख़ून, बलात्कार, हिंसा, अन्याय, अत्याचार
देश में आज भी राष्ट्र से पहले धर्म आता है
अणु-परमाणु से चलकर न्यूट्रोन-प्रोटोन तक

विज्ञान और तकनीक विकास के युग में
मेंरे देश में प्रजा तो पीछे रह गई और
तन्त्र बुलेट प्रूफ़ कारों में आगे निकल गया।

पुराना डाकख़ाना

चौड़ी सड़कों में दबे
पानी के बाँध में समा गए
शहर की तरह एक दिन तुम भी
तमाम मुर्दा चीज़ों में शुमार हो जाओगे

वक़्त की चाबुक से छिल गई है राब्ते की पीठ
कुछ शब्दों को नकार दिया है
कुछ पुराने पड़ गए शब्दों को
मिट्टी में दबा दिया है
उखड़ी सड़क, झाड़-झँखाड़
और अकेले खड़े तुम
रोज़ अन्दर-ही-अन्दर का
ख़ालीपन गहरा होता जाता है

पुराने धूल भरे कार्ड
पत्रिकाएँ, बेनाम चिट्ठियाँ
जाने कहाँ-कहाँ भटकी हैं

कुछ आँखें धुँधला गई होंगी इन्तज़ार में
कुछ आँखों से बहता होगा काजल
कुछ आँखें को आज भी इन्तज़ार है
गुम हुई चिट्ठियों के मिलने का।

गन्दी बस्ती

ऊँची इमारतों के पीछे
पड़ा है सभ्यता का कचरा
बेतरतीब झोंपड़ियाँ
कपड़ों की जगह चीथड़े और
ज़ुबान के नाम पर
बेशुमार गालियाँ

पॉलीथिन, टूटे काँच, कागज़
लोहे के टुकड़े कचरों के ढेर से चुनते है सारा दिन
इस गन्दी बस्ती के लोग
कबाड़ियों को बेचते
और फिर लौटती है चीज़ें
लेकर नया रूप, रंग और स्वाद

मिमियाती ख़्वाहिशों के सामने
खड़ी रहती है हताशा
समाज के क़ायदे-कानून भी
यहाँ लागू होते नहीं
आर्थिक कोई भी कोण बनता नहीं

काग़ज़ी आँकड़ों में बदल जाती हैं तस्वीर
चाट जाएगा समय का अन्धेरा इस बस्ती को भी
कोई नहीं पूछेगा न कोई बताएगा।

गन्दी बस्ती-2 

दौड़ती सड़कों और रौशनियों की चकाचौंध
ऊँची इमारतों के पीछे
जहाँ सभ्यता का कचरा पड़ा होता है
इस बस्ती को लोग
गन्दी बस्ती के नाम से जानते हैं

कच्चे आधे अधूरे घर
बेतरतीब उग आई झोंपड़ियाँ
गन्दे पर्दों के पीछे से झाँकती औरतें और बच्चे
बस्ती में रहने वाले लोगों के
कपड़ों के नाम पर चीथड़े और
ज़ुबान के नाम पर इनके पास
बेशुमार गालियाँ हैं

इनकी एक अलग दुनिया है
जिसके सारे कायदे-कानून पेट से शुरू और
पेट ही में ख़त्म होते है
भूखे, नंगे, कुपोषण और बीमारियों के बीच
बच्चे पलते और बूढ़े मर जाते
मर्द शराब और जुए में डूबे रहते है

औरतें दूसरों के घरों में बर्तन माँजतीं
कपड़े धोतीं, पोछा लगातीं
रोज़ शाम को मर्द नशे में घर आते
कभी पत्नी और बच्चों को पीटते
कभी ज़्यादा पी लेने से उल्टियाँ करते हैं
औरतें कपड़े धोतीं बच्चे पालतीं
मर्दों के हाथों पिटतीं है

फिर भी उनकी सेवा करती
और उनकी इच्छाएँ पूरी करतीं
हर एक महानगरों के हैरान
करने वाले मंज़र और रोमांच में
यह बस्तियाँ भी शामिल हैं।

सुखद सन्तुलन 

पहाड़ पर धूप का टुकड़ा
सूरज धुँधला-सा धब्बा
अन्धेरे के बीच सिकुड़ता हुआ
समय में घुलता हुआ

अब उतना भी नहीं है
अब कुछ भी नहीं है
जब कुछ भी नहीं होता
तब भी होता है
चेहरा तुम्हारा।

विस्मृति का रीसायकल बिन

अपने मायनों के साथ ही
आया उपेक्षा शब्द जीवन मे

सहजे गए अपनेपन से
हाथों ने उलीचा अपना ही दुख
उदासी में सूखते होंठों पर
हँसी का लिप-गार्ड लगाकर

समझी कि सब कुछ है ‘सामान्य’
यक़ीन था कि शाश्वत है ‘प्रेम’
पर उदासीन चीज़ों का क्या?

एक तीसरा ख़ाना
जबकि सही ग़लत के लिए है
दो ही ख़ाने

कुछ देर में अनुपस्थिति से उपस्थिति की तरफ़
लौटते हुए मैंने जाना कि
सभी पहाड़ों से लौट कर नहीं आती आवाज़ें
और नदी पहाड़ों में बहते रहने से
नहीं हो जाती पहाड़ी नदी

अन्दर आई बाढ़ के उतरने के बाद
आख़िर एक चोर दरवाज़ा
तलाश ही लिया ख़ुद के लिए

अब बची हुई औपचारिकता में
बातों के वही अर्थ हैं
जो होते हैं आमतौर पर।

एक सफ़र ऐसा भी

शहर की मसरूफ शाम
बहुत सी चीज़ों को पीछे छोड़ते हुए
भागती कारें, बाईक्स, बसें
पीछे छूटती जाती हैं साईकिलें
और पैदल चलते लोग
अनगिनत होर्नों की आवाज़ें
सभी की आगे जाने की कोशिशें

कुछ देर बारिश
और फिर वही स्टेशन
खिच-खिच करता शोर
सफ़र में मुसाफ़िर यूँ मिले
जैसे पुरानी हो पहचान
पते लिए और अदले-बदले मोबाइल नम्बर

टिक-टिक करती रात ताश के पत्तों और
खुराफ़ातों की कहानियों में बीती
दिन के साथ अंगडाई लेकर उठे थे
बचपन, रंग, और जो नाम
सभी कॉफी की ख़ुशबू में घुल गए

मुक़ाम पर पहुँचे तो सभी को जल्दी थी
अपना-अपना सामान उठाया
सलाम हुआ न हाथ मिलाया
सर्दी की ठण्डी -ठण्डी साँसे
घना कोहरा और ज़ंग लगा सूरज
घर तक मेरे साथ आया।

हद

हद का ख़ुद कोई वजूद नहीं होता
वो तो बनाई जाती है
जैसे क़िले बनाए जाते थे
हिफ़ाज़त के लिए

हम बनाते है हद
ज़रूरतों के मुताबिक़
अपने मतलब के लिए
दूसरों को छोटा करने के लिए
कि हमारा क़द कुछ ऊँचा दिखता रहे
छिपाने को अपनी कमज़ोरियों के दाग़-धब्बे
कभी इसे घटाते हैं, कभी बड़ा करते हैं

हद बनने के बाद
बनती हैं रेखाएँ, दायरे
और फिर बन जाता है नुक़्ता
शुरू होता है
हद के बाहर ही
खुला आसमान, बहती हवा
नीला समन्दर, ज़मीन की ख़ूबसूरती

हादसा

एक हादसा हुआ
कहाँ हुआ क्यों हुआ
इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है

हादसे के बाद
दूसरे हादसे का इन्तज़ार
ज़्यादा नहीं करना पड़ता

कुछ नाकें सूँघ सकती हैं
कुछ आँखें पढ़ सकती है
कुछ साँसें तेज़ होकर
इज़हार करती हैं
और कुछ साँसे
मुतावातिर चलती रहती हैं।

दीवारें

बरसों से बनती आ रही है दीवारें
मिट्टी-गारे की, ईंट-पत्थरों की
लकड़ी, मार्बल, सीमेण्ट की
तरह-तरह की दीवारें
कुछ सीलन से भरी, काई लगी
झुकी हुई गिरती हुई
कुछ मज़बूत और बहुत ऊँची
छोटी और कमज़ोर दीवारें
मज़बूत दीवारों को देखती हैं
पर मज़बूत दीवारें तनी रहती है
वो झुक कर छोटी और कमज़ोर
दीवारों को नहीं देखतीं

दीवारें दिलों में नफ़रत की
दीवारें घरों में सुरक्षा की
कुछ टूटे हुए लोग रोते हैं इनसे लिपट कर
कुछ थके हुए लोगों का सहारा होती है
कुछ दीवारें फलाँग जाते है और कुछ दीवारें तोड़ते है
कुछ तस्वीरें, पोस्टर और नारो से भरी
कहीं कैनवास बनी चित्रकार का
और कहीं इनसान के हाथों दुरुपयोग का

लिखी जाती है इन के ऊपर गालियाँ
अश्लील शब्द और थूक दिया जाता है
ये तब भी चुप रहती हैं
कहते हैं इनके कान होते हैं
यह सब कुछ सुनती है
कोई विरोध नहीं गुस्सा नहीं
जब चाहो बना दो जब चाहे गिरा दो
कुछ दीवारें समय के साथ गिर गईं
कुछ दीवारों के निशान बाक़ी हैं
कुछ अनदेखी दीवारें लगातार बन रही है।

शब्दों का जाल 

शब्द छोटे-बड़े
शब्द हलके वज़नदार
शब्द कड़वे, मीठे, तीखे
शब्द दुश्मन शब्द ही दोस्त
शब्द बोलते अन्दर और बाहर
शब्द उलझ जाते बातों में
शब्द बहे जाते भावनाओं में
शब्द फँस जाते मोह-माया में
शब्द जल जाते है नफ़रतों में
शब्द भाषण की आग बनते है
शब्द राजनीति की शतरंज बनते है
शब्द फटते बम की तरह
शब्द सवाल खड़े करते
शब्द जवाब बन जाते
शब्द सूरज में धूप बने
शब्द अन्धेरों में मशालों से जले
शब्द गोल रोटी में बेले गए
शब्द बुझे चूल्हे की राख़ बने
शब्द स्त्री की पीड़ा में उतरे
शब्द पुरुष का अहम् बने
शब्द ज़ंजीरों में क़ैद हुए
शब्द गुलाम बने
शब्द बने बँटवारा
शब्द बने ज़ख़्म
शब्द बने जंग
शब्द बने क्रान्ति
कुछ शब्द गुम हुए
कुछ नए आए
शब्द बच्चे की मुस्कान बने
शब्द लड़की की खिलखिलाहट बने
शब्द खिलते हैं फूलों की तरह
शब्द उड़ते है तितलियों की तरह
शब्द मौसम में बाद जाते है
शब्द इन्द्रधनुष बनाते है
शब्द उगते है प्यार की तरह।

क़ातिल जब मसीहा है

सिर्फ़ लात ही तो मारी है
भूखा ही तो रखना चाहते हैं वो तुम्हें
नादान हो तुम भीख माँगते हो
तुम रोटी की बात करते हो
सरकार के रहनुमा के आगे
जो मुग्ध हैं खुद के आत्मसम्मोहन में

न्याय और अन्याय की जंग में
जहाँ सच को गवाह नहीं मिलता
ख़ुदाओं की इस दुनियां में

तुम्हारे पास है सिर्फ़ दुआ
जो तुम रो कर, चीख़ कर
या हाथ फैला कर करो
कोई भी कुछ नहीं कहेगा

ख़िज़ाँ 

बदरंग आसमान और
चेहरा बदल गया धरती का
हवा ने फैला दिए हैं बाज़ू
दरख़्तों के हरे लिबास ने ओढ़ ली है बे-लिबासी
पीले पत्तों का नाच होता है अब धरती पर

जले हुए दिन का धुआँ फैलता जाता है
शाम और सूरज की बरसों पुरानी जंग में
सूरज अन्धेरे ग़ार में छुप गया है
इस लड़ाई मैं हमेशा हारने वाली शाम
उजले दिनों की ख़्वाहिश लिए
ज़ख़्मों पर धूल उड़ाती है।

नींद बे-आवाज़

अन्धेरी रात में बरसता है सहमा-सा पानी
अभी हवा दरख़्तों को छू कर गुज़री है
कुछ दैर शोर मचाया है पत्तों ने
इतना अन्धेरा और तन्हाई
दर्द की बाँसुरी के सुराखों पर
रखी हो उँगलियाँ जैसे

कई ज़ख़्मों के टाँके खुल गए हों
रात के चहरे पर दो ख़ाली आँखें
दीवार से फ़िसल कर गिरती है
बारिश थम गई है दरख़्त ऊँघने लगे
नींद बे-आवाज़ आ कर कहती है
सोना नहीं है क्या ?

नींद बे-आवाज़ 

अन्धेरी रात में बरसता है सहमा-सा पानी
अभी हवा दरख़्तों को छू कर गुज़री है
कुछ दैर शोर मचाया है पत्तों ने
इतना अन्धेरा और तन्हाई
दर्द की बाँसुरी के सुराखों पर
रखी हो उँगलियाँ जैसे

कई ज़ख़्मों के टाँके खुल गए हों
रात के चहरे पर दो ख़ाली आँखें
दीवार से फ़िसल कर गिरती है
बारिश थम गई है दरख़्त ऊँघने लगे
नींद बे-आवाज़ आ कर कहती है
सोना नहीं है क्या ?

तेज़ बुख़ार में

नींद न आने का
अफ़सोस लिए जागती आँखे
क़तरा-क़तरा
उतरते तिलिस्म में फँसती
एक डरावनी रात में
बिस्तर पर ज़ंजीरों से बँधी मैं
आँखे आँसू बहाती
तपते जिस्म के लिए
नसों में दौड़ता है ख़ून तेज़ी से
मगर दिमाग़ थक गया है

दर्द ने फैला ली है हदें
काँटों वाली बाढ़
चुभ रही है उँगलियों तक
बिना रीढ़ की हड्डी के शरीर को
निचोड़ कर बिस्तर पर टपकता है
पसीना टप-टप

सब कुछ फ़ीका-सा
ज़बान के मज़े पर
चढ़ी हुई है एक पर्त
कहीं कोई ज़ायक़ा नहीं।

बहुत दिन बाद

मैं मान लेती हूँ कि मेरे पास
कहने के लिए नया कुछ नहीं
जो भी है कहा जा चुका है
अगर में न बोलूँ तब भी
मेंरी ख़ामोशी का दूसरा मतलब निकाल लोगे
मेंरी सोच पर इल्ज़ाम लगा दोगे

अगर सोचे हुए रास्ते से चल कर
सोचे हुए मुक़ाम पर पहुँच जाऊँ
तो हो सकता है सोचा हुआ वो न हो मेरे सामने
मुश्किल है पहचान का अनपहचाना होना
मगर पहचान का अर्थ यह तो नहीं है
की उसे दृश्य मान लूँ
जो तुम्हे दिखाई देता है

पूरा सच बहुत सख़्त होता है
पर सबसे बड़ा सच मौक़ापरस्त है
वक़्त नहीं है मेंरा, मेंरे लिए देर है
फ़ीके मौसम और सख़्त वक़्त की
चाल बहुत धीमी होती है।

ख़ालीपन

आसमान की तरह
जो गिरगिट-सा रंग बदलता है
दिन और रात में

आईने पर भाप हो तो
नहीं दिखता साफ़ चेहरा
एक बैचनी होती है
अपना चेहरा साफ़ देखने की

जब दिखाई देता है साफ़ और ठहरा हुआ
वही पिघलने लगता है फिर अन्दर ही अन्दर
ख़ालीपन एक भरा-पूरा लफ़्ज़ है।

हम में से कुछ 

कई बार होती है मौत हमारी
थोड़ा-थोड़ा मर कर
ज़िन्दा हो जाते हैं
जागते हुए सोना और
और सोते हुए जागना
हम हारते हुए भी बचे रहते है

और जीत को गले नहीं लगाते
बहुत सारी चीज़ों को दुरुस्त करना
और बहुत कुछ से निजात पाना

पेट से बंधी रहती है रोटी
आँसुओं से जलती दुःखों की मशाल
गर्दन पर गिरती हुई वक़्त की कुल्हाड़ी
अपनी अन्तिम निराशा खोजते हुए
हमारे नाम बन्द रहेंगे किताबों में

पर हर बार हमारे ख़िलाफ़
हम में से ही करता है
कोई शुरूआत।

उदासीनता 

कुछ यूँ लग रहा है
कि थम गई हो हर चीज़ जैसे
ख़याल को लग गया हो ज़ंग

वो बे-तरतीब-सी बातें
बीच में खो गईं कहीं
जिन पर नहीं लिखा था पूरा पता

बर्फ़-सी जमी उदासीनता
सब तरफ और होने के
नाटक में शामिल हूँ — मैं

ख़ुद से बच कर निकलना चाहती हूँ
पर बच कर निकलने वालों के पास
आती नहीं है — कविता !!

हम

कविता में थोड़े-से तुम
थोड़ी-सी मैं
तुम कुछ मेंरे जैसे
कुछ तुम्हारे जैसी मैं

होना घटना है अगर
सचमुच हैं ’हम’।

आज़ादी 

बच गई शिकार होने से
ख़ुश है चिड़िया

अब उड़ने की ख़्वाहिश पर
क़ब्ज़ा है बहेलिए का

चिड़िया के लिए
आज़ादी का अर्थ है पिंजरा

सुरक्षित है
पिंजरे में चिड़िया।

हादसे के बाद

कितने लोग मेरी तरह
सुबह उठ कर इस डर में
अख़बार देखते होंगे
कहीं कोई बम न फटा हो
किसी जगह हमला
तो नहीं कर दिया
कहीं आंतकवादियों ने

हर हादसे के बाद लगता है
मुझे घूरती हैं मुझे कुछ नज़रें
बातें कुछ सर्द हो जाती हैं।

एक समय था

एक कहानी थी
एक लड़का था
एक लड़की थी
बारिश थी
पानी में भीगते फूल थे
झील में लहरें थीं
गुमठी पर चाय पीते
दोनों भीगे हुए थे
हवा में गूँजती
दोनों की हँसी थी
बहुत कुछ लौट कर
आता है ज़िन्दगी में
बारिशें, फूल
लहरें और हँसी
नहीं लौटा तो
गुमठी वाली
चाय का वो स्वाद।

प्रतीक्षा 

धीरे-धीरे उगता
अलसाया-सा सूरज
रोशनी का जाल
फेंकता ठण्डे हाथों से
साम्राज्य में कोहरे में
पड़ने लगी दरारें ।

बाज़ार

कम उम्र में बड़ी आमदनी
देता है बी०पी०ओ० का कॉल-सेन्टर
घूमता है सब सेंसेक्स, सेक्स
और मल्टीप्लेक्स के आस-पास
समय का सच
तय करते है बाज़ार और विज्ञापन
पूँजीवाद को बढ़ाता बाज़ार
सिमटी-सकुड़ी बन्धुता
सारे सरोकारों दरकिनार
इनसान की जगह लेती मशीने
मौजूद है हर जगह प्रतिस्पर्धा
चेहरे कितने ही बदल गए हों।

चले गए पिता के लिए 

बेपरवाह-सी इस दुनिया में
मसरूफ़ दिन बीत जाने के बाद
तुम्हारा याद आना
पिता तुम मेरे
बहुत अच्छे दोस्त थे

हम दोनों
तारों को देखा करते
आँगन में लेटे हुए
बताया था तुम्हीं ने
कई रंगों के होते है तारे
और तुम भी एक दिन
बन गए सफ़ेद तारा
देखना छोड़ दिया मैंने तारों को

पिता होने के रौब और ख़ौफ़ से दूर
काँधे पर बैठा कर तुमने दिखाया था
आसमान वो आज भी
इतना ही बड़ा और खुला है

सर्वहारा वर्ग का संघर्ष
कसता शिकंजा पूँजीपतियों का
व्यवस्था के ख़िलाफ़
नारे लगाते और
लाल झण्डा उठाए लोगों के बीच
मुझे नज़र आते हो तुम

समुद्र-मन्थन से निकले थे
चौदह रत्न एक विष और अमृत भी
देवताओं ने बाँट लिया था अमृत
शिव ने विष को गले में रख लिया

जहाँ खड़ा था कभी मनु
खड़ा है वहीँ उसका वारिस भी
पिता तुम्हारी उत्तराधिकारी
मैं ही तो हूँ।

ढोल

मन्दिर में भजन गाती हैं स्त्रियाँ हर शाम होती है पूजा और धीरे -धीरे बजता ढोल धार्मिक कार्यक्रम हो विवाह, या हो कोई त्योहार वो कमज़ोर लड़का अपनी पूरी ताक़त से बजाता है — ढोल उसकी काली रंगत और उसके पहनावे का अक्सर ही बनता है मज़ाक़ कहते है उसे ‘हीरो ज़रा दम लगा के बजा’ ख़बरों से बाहर के लोगों में शामिल नफ़रत और गुस्से में पीटता है वो ढोल नहीं होते हैं इनके जीवन में बलात्कार, आत्महत्या और क़त्ल या कोई दुर्घटना जो हो सके अख़बारों में दर्ज नहीं है इनका जीवन मीडिया के कवरेज के लिए इनके साथ कुछ भी हो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता गन्दे लोगों में है इनका शुमार रहती है गाली इनकी ज़ुबान पर पीते हैं शराब ,करते हैं गैंग वार मान लिया गया है इन्हे हिंसक ज़मीन नहीं / पैसा नहीं राजनीतिक विमर्श से कर दिया गया है बाहर ड्रम बीट्स और आर्टिफ़िशियल वाद्ययन्त्रों में भूलते गए हम — ढोल फेंके गए सिक्कों को ख़ाली जेबों के हवाले कर चल देता है अन्धेरी और बेनाम बस्ती की ओर हमारी मसरूफ़ियत से परे है इसका होना घसीटता चलता है अपने पैरों को गले में लटका रहता ख़ामोश और उदास ढोल।

पुरस्कृत होते चित्र 

रोटी की ज़रूरत ने
हुनरमन्दों के काट दिए हाथ
उनकी आँखों में लिखी मजबूरियाँ

बसी हैं इनसानी बस्तियाँ
रेल की पटरियों के आस-पास

एन०जी०ओ० के बोर्ड संकेत देते है
मेहरबान अमीरों के पास
इनके लिए है जूठन, उतरन कुछ रूपए

यही पैतृक सम्पत्ति है
यही छोड़ कर जाना है तुम्हे बच्चों के लिए
तुम्हारे लिए गढ़ी गई हैं कई परिभाषाएँ

देख कर ही तय होती है मज़दूरी
वो ख़ुश होते है झुके हुए सरों से

इनकी व्याख्या करते हैं कैमरे के फ़्लैश
और पुरस्कृत होते हैं चित्र।

सरकारी पाठशाला

गाँव में सरकारी पाठशाला खुलने से
गाँव वाले बहुत ख़ुश थे
पाठशाला में बच्चों का नाम दर्ज कराने का
कोई पैसा नहीं लगेगा
किताबें, यूनिफ़ॉर्म, दोपहर का भोजन
सब कुछ मुफ़्त मिलेगा

तीन कमरों की पाठशाला
दो कमरे और एक शौचालय
प्रधान अध्यापिका, अध्यापक और चपरासिन
सरपंच जी ने चौखट पर नारियल फोड़ा
दो अदद लोगों ने मिल कर
राष्ट्रीय गीत को तोड़ा-मरोड़ा

सोमवार से शुरू हुई पाठशाला
पहले हुई सरस्वती वन्दना
भूल गए राष्ट्रीय गान से शुरू करना

अध्यापक जब कक्षा में आए
रजिस्टर में नाम लिखने से पहले
बदबू से बौखलाए
बच्चों से कहा — ज़रा दूर जा कर बैठो
मैं जिसको जो काम दे रहा हूँ
उसे ध्यान से है करना
नहीं तो उस दिन भोजन नहीं है करना
रजिस्टर में नाम लिखा और काम बताया

रेखा, सीमा, नज़्मा तुम बड़ी हो
तुम्हे भोजन बनाने में
मदद करना है चम्पा (चपरासिन) की
झाड़ू देना है और बर्तन साफ़ करना है
अहमद, बिरजू गाँव से दूध लाना
कमली, गंगू
पीछे शौचालय है
मल उठाना और दूर खेत में डाल कर आना
तुम बच्चों इधर देखो छोटे हो पर
कल से पूरे कपड़े पहन कर आना

सब पढ़ो छोटे ’अ’ से अनार बड़े ’आ’ से आम
भोजन बना और पहले सरपंच जी के घर गया
फिर शिक्षकों का पेट बढ़ाया
जो बचा बच्चों के काम आया

दिन गुज़रने लगे
रेखा, नज्मा का ब्याह हो गया
अब दूसरी लड़कियाँ झाड़ू लगाती है
अहमद, बिरजू को अब भी
अनार और आम की जुस्तजू है
कमली, गंगू मल ले कर जाते है
खेत से लौट कर भोजन खाते
कभी भूखे ही घर लौट जाते
छोटे बच्चे अब भी नंगे हैं
छुपकर अक्सर बर्तन चाट लेते हैं
कोई देखे तो भाग लेते हैं
चम्पा प्रधान अध्यापिका के यहाँ बेगार करती है
कुछ इस तरह से गाँव की पाठशाला चलती है।

तापमान 47 डिग्री सेल्सियस

बन रही ऊँची इमारत
कि थोड़ी-सी छाँव में बैठ कर
वो खाती है सूखी रोटी
प्याज, हरी मिर्च कुतर कर

कारीगर चिल्लाता है
“अरी ओ महारानी खा लिया हो तो उठ जा”
वो बिना चबाए निवाला गटकती है
दिन भर ढोती है रेत और सीमेण्ट
छत पर ले जाती है ईंटें और पानी

शाम को मिली मज़दूरी से
बच्चों के लिए ख़रीदती है आटा-दाल
शराबी पति की मार खाकर भी
परोसती है उसे खाना और
रात होते ही जिस्म अपना

एक दिन उसने पति पर
कुल्हाड़ी से कर दिया वार
कितनी असमानता है
दिन भर मेहनत करके भी
मिलती है मज़दूरी कम जिसे
क्यों नहीं कर सकती वार वो आदमी पर
कब तक दबाए रखती गुस्से को अपने अन्दर

उम्र बीस साल 

दिन के उजाले में लोग
उस जिस्म को मिट्टी बनने के लिए
छोड़ आए हैं क़ब्र में

उन कहानियों की तरह
जो राजकुमारी को जंगल में
अकेला छोड़ आती थीं
वो सब तो झूठी कहानियाँ थीं
सच तो तुम्हारे साथ दफ़्न हो गया
उम्र बीस साल और ख़त्म ज़िन्दगी

त्याग, बलिदान और दुखों की
लम्बी फेहरिस्त के साथ
जिसे तुमने घूँट-घूँट उतारा
तुम्हारा परिचय भी हुआ होगा
हिंसा, उत्पीड़न ,यातना, अपमान शब्दों से
मौलवियों और उलेमाओं की इस दुनिया में
रोने पर पाबन्दी है और ज़ोर से हँसना मना है
तब लीग करने वाले सिर्फ फ़र्ज़ बताते है
और हक़ सिर्फ़ किताबों में लिखे जाते है

लौट रहे हैं पुरानी सभ्यता की ओर
खोदी जा रही हैं क़ब्रें लगातार
घर-बाहर, मुर्दाघरों में हर जगह हैं लाशें
चूड़ियों का बोझ ज़्यादा और कलाईयाँ पतली
कहते है क़ुदरत कि सबसे नाज़ुक संरचना हैं स्त्री

अनगिनत ज़ख्म है तुम्हारे जिस्म पर
कितनी बेहरहमी हुई है तुम्हारे साथ
तुम ने ज़िन्दगी की जंग आसानी से नहीं हारी थी
टूटी हुई उँगलियाँ इस की गवाह हैं
आँसुओं से भीगी ताज़ा लहू में डूबी कविता
लिखती हूँ काट देती हूँ फिर लिखती हूँ

आदिवासी लड़की

लोहे के पँजे से वो रेत भर रही है तगाड़ी में
हाथों की चूड़ी
याद दिला रही है भगोरिया की

भूख उसे झाबुआ के जंगल और
उसकी बस्ती से बहुत दूर ले आई
सुबह से शाम तक रेत, सीमेण्ट ढोती है

कुछ देर रुके तो ठेकेदार दिहाड़ी काटने का कहता है
छुप कर हथेली पर तम्बाकू मलती है
और फिर काम करने लगती है

उसके सपनों में
रोज़ आता है
भगोरिया का मेला

नहीं बनती है कविता

ऐसी कितनी शामें गुज़री हैं
इस कमरे की दीवारों के साथ
आसमान देखते हुए

रंग बदलता आसमान
नीला आसमां सुर्ख़ होता
फिर सारे रंग उड़ गए हैं
रह गया है काला रंग

खिड़की से आती है बारिश
अपनी ठण्डी उँगलियों से
छूती है मुझे

यह बरसती है
सुराख़ वाले घरों में
यह बरसती है
ऊँचे मकानों पर

बारिश में भीगी कुछ पंखुड़ियाँ
बारिश में भीगे कुछ शब्द
नहीं बनता फूल
नहीं बनती कविता

सुबह हो गई

रात कहानी में सन्नाटा था
मेमना था, भेड़िया था
दिखाई देने के पीछे छिपी
काली मुस्कुराहट थी

भेड़िये का छल-कपट था
मक्कारी थी, अत्याचार था
और बच निकलने कि होशियारी थी
मेमने की मौत बाद
आया था डर
सुरक्षा का कवच लिए

हर अन्याय के सामने
चुप रहने का कलंक लिए
रात का सर झुका हुआ
पूरब से सूरज निकलता हुआ
क्या सुबह हो गई थी?

आख़िरी सफ़्हा मौत है 

मौत के बाद कुछ नहीं
फिर जीवन नहीं, ग़म नहीं, ख़ुशी नहीं

जिस हद तक दुनिया में उलझे हो
उतना ही मौत से ख़ौफ़
अपने को मुक्त रखना मुश्किल है

पर दरख्त बदलते हैं लिबास
और साँप अपनी केंचुली
अपने ‘में’ से निजात भी मुश्किल नहीं

पर मरने से पहले मारना नहीं
अन्धविश्वास का न अन्धेरा होगा
बन्द आँखों में भी न डर होगा
न दुःख होगा

ज़िन्दगी की किताब का
आख़िरी सफ़्हा मौत है
मुझे यक़ीन है
मौत के बाद कुछ भी नहीं

सॉरी यार

तुम्हें याद है वो चट्टान
जिस पर बैठ कर
हम चाय पिया करते थे

तुम्हारे इस सवाल से
मेंरे पैर काँपने लगते है
जैसे ऊँचाई से गिरने का डर
मेंरे वजूद पर हावी हो जाता है
तुम मुझे भूल गईं न?

एक पल की डबडबाई ख़ामोशी में
लहरों में देखती हूँ
टूटते सूरज को
कई बार छुपा लेते हैं हम उदासी
और दर्द को घोल देते हैं
दूसरे केमिकल में

झील अचानक सिकुड़ जाती है
एक लड़का दौड़ने लगता है
गिलहरी के पीछे
पकड़ना चाहता है उसे
समय के रेगिस्तान में
खो जाते हैं कई दृश्य

कुछ चीज़ें
एहसास के बाहर ऐसे बदलती हैं
कि हमें पता ही नहीं चलता
सारे दवाबों के बीच ’मैं’
उससे पूछती हूँ अब स्टेशन चलें
नहीं तो तुम्हारी ट्रेन छूट जाएगी।

दरख़्त गिर जाने के बाद

आँगन का दरख़्त गिर जाने के बाद
उजागर हो सकता था
कौनसा सच
जड़ों का खोखला होना
या मिट्टी की कमज़ोर पकड़

कुछ दिन सूखे पत्ते खड़खड़ाए
और फिर मिट्टी का हिस्सा बन गए
हर दर्द, हर दुख को देखने का
अपना-अपना नज़रिया
खिड़की दरवाज़ों ने होंठ सी लिए

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