शाइस्ता यूसुफ़ की रचनाएँ

 

बस वही लम्हा आँख देखे

बस वही लम्हा आँख देखेगी
जिस पे लिखा हुआ हो नाम अपना

ऐसा सदियों से होता आया है
लोग करते रहेंगे काम अपना

कुछ हवाएँ गुज़र रही थीं इधर
हम ने पहुँचा दिया पयाम अपना

ज़ेहन कर ले हज़ार-हा कोशिश
दिल भी करता रहेगा काम अपना

चाहती हूँ फलक को छू लेना
जानती हूँ मगर मक़ाम अपना

क्या यही है शनाख़्त ‘शाइस्ता’
माँ ने जो रख दिया था नाम अपना

जिस ने भी दास्ताँ लिखी होगी

जिस ने भी दास्ताँ लिखी होगी
कुछ तो सच्चाई भी रही होगी

क्यूँ मिरे दर्द को यक़ीं है बहुत
तेरी आँखों में भी नमी होगी

क्या करूँ दूसरे जन्म का मैं
ज़िंदगी कल भी अजनबी होगी

कितनी अंधी है आरजू मेरी
क्या कभी इस में रौशनी होगी

कैद से हो चुकी हूँ फिर आज़ाद
जाने किस ने गवाही दी होगी

मैं रिवायत हूँ एक भूली हुई

मैं रिवायत हूँ एक भूली हुई
और तू जिद्दतों में रहता है

मेरी आँखें सवाल करती हैं
क्या ख़ुदा मंज़रों में रहता है

साअतें रक़्स कर रही हैं मगर
मेरा दिल उलझनों में रहता है

परचम-ए-जंग झुक गया लेकिन
वस्वसा सा दिलों में रहता है

गो चराग़ाँ किए गऐ ख़ेमे
पर अँधेरा दिलों में रहता है

आओ मौजों से पूछ कर आएँ
चाँद किन साहिलों में रहता है

समझ में आती है बादल की आ ओ ज़ारी अब

समझ में आती है बादल की आ ओ ज़ारी अब
वो मेहरबान मुझे भी बहुत रूलाता है

मुमासलत ही नहीं साथ रहने वालों में
कोई बताए मुझे किस से मेरा नाता है

लगा कि कुफ्ल मिरे ख़्वाब के दरीचों को
तिरा ख़याल अज़ाबों से क्यूँ डराता है

समझ में आता नहीं ज़िंदा हैं कि मुर्दा हैं
कभी तो मारता है और कभी जिलाता है

हज़ारों तारे हैं तेरी हथलियों में मगर
तू आ के घर से मेरे चाँद क्यूँ चुराता है

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