शाकिर खलीक की रचनाएँ

कब शौक़ मिरा जज़्बे से बाहर न हुआ था

कब शौक़ मिरा जज़्बे से बाहर न हुआ था
था कौन सा क़तरा जो समुंदर न हुआ था

क्या याद तिरी दिल को मिरे कर गई तारीक
इक गोशा भी तो इस का मुनव्वर न हुआ था

किस तरह कोई अहद-ए-वफ़ा मुझ से करे आज
जब रोज़-ए-अज़ल में ये मुकद्दर न हुआ था

दीदार की हसरत ही हुई वजह-ए-तअस्सुफ़
क़िस्मत में मिरी हर्फ़ मुकर्रर न हुआ था

आँखों में जगह उस को मिली वाह रे तक़दीर
वो क़तरा जो ख़ुश-बख़्ती से गौहर न हुआ था

ग़र्क़ाब हुई कश्ती-ए-हस्ती लब-ए-साहिल
‘शाकिर’ तो अभी उस का शनावर न हुआ था

तन्हाई का ग़म ढोएँ और रो रो जी हलकान करें

तन्हाई का ग़म ढोएँ और रो रो जी हलकान करें
इस से बेहतर होगा कि वो मश्क़-ए-तीर-ओ-मकान करें

वक़्त का रोना रोने वाले वक़्त को ज़ाए करते हैं
पलकों से लम्हों की किर्चें चुनने का सामान करें

सड़कों के चौराहों पर जिन को तन्हाई घेरे हो
उस सीमाबी दुनिया में क्यूँ जीने का अरमान करें

बाहर की दुनिया में जिन को जिंस-ए-वफ़ा नायाब लगे
अपने अंदर के बुतख़ानों को पहले वीरान करें

सूरज की सत-रंगी किरनें प्यास बुझाने आती हैं
सातों सखियाँ फूल-बदन जब गंगा में अश्नान करें

जो धरती की शह-रग काटें शिरयानों में ज़हर भरें
इस मूरख नगरी के बाशी उन ही के गुन-गान करें

भुगत रहा हूँ ख़ुद अपने किए का ख़ामयाज़ा

भुगत रहा हूँ ख़ुद अपने किए का ख़ामयाज़ा
टपक रहा है जो आँखों से ये लहू ताज़ा

किसी की याद के साए को हम-सफ़र समझा
लगा सको तो लगा तो जुनूँ का अंदाज़ा

किसे मजाल कि अब मेरे दिल में घर कर ले
है गरचे अब भी खुला अपने दिल का दरवाज़ा

निगार-ए-वक़्त ने हर-सू कमंद डाली है
बिखर न जाए कहीं अंजुमन का शीराज़ा

ख़ुदा गवाह है उन को भी दे रहा हूँ दुआ
जो कसते रहते हैं ‘शाकिर’ पे रोज़ आवाज़ा

हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाए हुए हैं

हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाए हुए हैं
बे-वजह नहीं है कि जो शरमाए हुए हैं

थी जिन की तब ओ ताब से इस बज़्म की रौनक़
दीपक वो सर-ए-शाम ही कज्लाए हुए हैं

हर सम्त सियाही है घटा-टोप अंधेरा
क्या ज़ुल्फ़-ए-दोता आज वो बिखराए हुए हैं

हम ख़ूगर-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा आज हैं वर्ना
माज़ी में बहुत ठोकरें भी खाए हुए हैं

है बरबत-ए-दिल सख़्ती-ए-मिज़राब से लर्ज़ां
तल्ख़ी-ए-मोहब्बत का मज़ा पाए हुए हैं

ऐ दोस्त सुकूँ हम को मयस्सर नहीं होता
आशुफ़्तगी-ए-दहर से घबराए हुए हैं

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