शाकिर ‘नाजी’ की रचनाएँ

देख मोहन तेरी कमर की तरफ

देख मोहन तेरी कमर की तरफ
फिर गया मानी अपने घर की तरफ

जिन ने देखे तेरे लब-ए-शीरीं
नज़र उस की नहीं शकर की तरफ

है मुहाल उन का दाम में आना
दिल है माइल बुताँ का ज़र की तरफ

तेरे रूख़्सार की सफाई देख
चश्‍म दाना की नईं गुहार की तरफ

हैं ख़ुशामद-तलब सब अहल-ए-दुवल
ग़ौर करते नईं हुनर की तरफ

माह-रू ने सफर किया है जिधर
दिल मेरा है उसी नगर की तरफ

हश्र में पाक-बाज़ है ‘नाजी’
बद-अमल जाएँगे सक़र की तरफ

देखी बहार हम ने कल ज़ोर मय-कदे में

देखी बहार हम ने कल ज़ोर मय-कदे में
हँसने सीं उस सजन के था शोर मय-कदे में

थे जोश-ए-मुल सीं शोरिश में दाग़ दिल के
गोया कि कूदते हैं ये मोर मय-कद में

फंदा रखा था मैं ने शायद कि वो परी-रू
देखे तो पास मेरे हो दौर मय-कदे में

है आरज़ू कि हम-दम वो माह-रू हो मेरा
दे शाम सीं जो प्याला हो भोर मय-कदे में

साकी वही है मेरा ‘नाजी’ कि गर मरूँ मैं
मुझ वास्ते बना दे जा गोर मय-कदे में

दिल का खोज न पाया हरगिज़ देखा खोल जो क़ब्रों को

दिल का खोज न पाया हरगिज़ देखा खोल जो क़ब्रों को
जीते जी ढूँडे सो पावे ख़बर करो बे-ख़बरों को

तोशक बाला पोश रज़ाई है भूले मजनूँ बरसों तक
जब दिखलावे ज़ुल्फ़ सजन की बन में आवते अब्रों को

काफिर नफ़स हर एक का तरसा ज़र कूँ पाया बख़्तों सीं
आतिश की पूजा में गुज़री उम्र तमाम उन गब्रों को

मर्द जो आजिज़ हो तन मन सीं कहे ख़ुश-आमद बावर कर
मोहताजी का ख़ासा है रूबाह करे है बबरों को

वादा चूक फिर आया ‘नाजी’ दर्स की ख़ातिर फड़के मत
छूट गले तेरे ऐ ज़ालिम सब्र कहाँ बे-सब्रों को

कमर की बात सुनते हैं ये कुछ पाई नहीं जाती 

कमर की बात सुनते हैं ये कुछ पाई नहीं जाती
कहे हैं बात ऐसी ख़याल में मेरे नहीं आती

जो चाहो सैर-ए-दरिया वक़्फ़ है मुझ चश्‍म की कश्‍ती
हर एक मू-ए-पलक मेरा है गोया घाट ख़ैराती

ब-रंग उस के नहीं महबूब दिल रोने को आशिक़ के
सआदत ख़ाँ है लड़का वज्अ कर लेता है बरसाती

जो कोई असली है ठंडा गर्म याक़ूती में क्यूँकर हो
न लावे ताब मेरे लब की जो ना-मर्द है ज़ाती

न देखा बाग में नर्गिस नीं तुझ कूँ शर्म जाने सीं
इसी ग़म में हुई है सर-निगूँ वो वक़्त नहीं पाती

कहाँ मुमकिन है ‘नाजी’ सा कि तक़वा और सलाह आवे
निगाह-ए-मस्त-ए-ख़ूबाँ वो नहीं लेता ख़राबाती

लब-ए-शीरीं है मिस्री यूसुफ़-ए-सानी है ये लड़का 

लब-ए-शीरीं है मिस्री यूसुफ़-ए-सानी है ये लड़का
न छोड़ेगा मेरा दिल चाह-ए-कनआनी है ये लड़का

लिया बोसा किसी ने और गिरेबाँ-गीर है मेरा
डुबाया चाहता है सब को तूफानी है ये लड़का

सर ऊपर लाल चेरा और दहन जूँ गुंचा-ए-रंगीं
बहार-ए-मुद्दआ लाल-ए-बदख़शानी है ये लड़का

क़यामत है झमक बाजू के तावीज़-ए-तलाई की
हिसार-ए-हुस्न कूँ काइम किया बानी है ये लड़का

हुए रू-पोश उस का हुस्न देख अंजुम के जूँ खूबाँ
चमकता है ब-रंग-ए-मेहर नूरानी है ये लड़का

क़यामत क़ामत उस का जिन ने देखा सो हुआ बिस्मिल
मगर सर ता क़दम तेग़-ए-सुलेमानी है ये लड़का

मैं अपना जान ओ दिल क़ुर्बां करूँ उस पर सेती ‘नाजी’
जिस देखें सीं होए ईद रमज़ानी है ये लड़का

तेरे भाई को चाहा अब तेरी करता हूँ पा-बोसी

तेरे भाई को चाहा अब तेरी करता हूँ पा-बोसी
मुझे सर ताज कर रख जान में आशिक हूँ मौरूसी

रफू कर दे हैं ऐसा प्यार जो आशिक हैं यक-सू सीं
फड़ा कर और सीं शाल अपनी कहता है मुझे तू सी

हुआ मख़्फी मज़ा अब शाहिदी सीं शहद की ज़ाहिर
मगर ज़ंबूर ने शीरीनी उन होंटो की जा चूसी

किसे ये ताब जो उस की तजल्ली में रहे ठहरा
रमूज़-ए-तूर लाती है सजन तेरी कमर मूसी

समाता नईं इज़ार अपने में अबतर देख रंग उस का
करे किम-ख़्वाब सो जाने की यूँ पाते हैं जासूसी

ब-रंग-ए-शम्मा क्यूँ याकूब की आँखें नहीं रौशन
ज़माने में सुना यूसुफ का पैराहन था फ़ानूसी

न छोडूँ उस लब-ए-इरफाँ को ‘नाजी’ और लुटा दूँ सब
मिले गर मुझ को मिल्क-ए-ख़ुसरवी और ताज-ए-काऊसी

ज़िक्र हर सुब्ह ओ शाम है तेरा

ज़िक्र हर सुब्ह ओ शाम है तेरा
विर्द-ए-आशिक कूँ नाम है तेरा

मत कर आज़ाद दाम-ए-जुल्फ़ सीं दिल
बाल बाँधा ग़ुलाम है तेरा

लश्‍कर-ए-ग़म ने दिल सीं कूच किया
जब से इस में मक़ाम है तेरा

जाम-ए-मय का पिलाना है बे-रंग
शौक़ जिन कूँ मुदाम है तेरा

आज ‘नाजी’ से रम न कर ऐ शोख़
देख मुद्दत सीं राम है तेरा

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