शाज़ तमकनत की रचनाएँ

अपनी अपनी शब-ए-तनहाई की तंज़ीम करें

अपनी अपनी शब-ए-तनहाई की तंज़ीम करें
चाँदनी बाँट लें महताब को तक़सीम करें

मैं ये कहता हूँ के मुझ सा नहीं तनहा कोई
आप चाहें तो मेरी बात में तरमीम करें

इब्न-ए-आदम मुझे रूसवा सर-ए-बाज़ार करे
और सर-ए-अर्श फ़रिश्ते मेरी ताज़ीम करें

बे-ग़रज़ इश्क़ है ये अहल-ए-जहाँ कहते हैं
कुछ ग़रज़-मंद भी होता है ये तस्लीम करें

इश्क़ अकेला है तो क्या हुस्न भी तनहा होगा
हिज्र वो दर्द नहीं है जिसे तक़सीम करें

काम आसाँ हो तो दुश्वार बना लेता हूँ 

काम आसाँ हो तो दुश्वार बना लेता हूँ
राह चलता हूँ दीवार बना लेता हूँ

जादा-ए-शौक को वीराँ नहीं होने देता
रोज़ नक़्श-ए-क़दम-ए-यार बना लेता हूँ

यूँ के लहजा से नुमाया न हो हसरत कोई
एक पैराया-ए-इज़हार बना लेता हूँ

वही तस्वीर जिसे मैं ने बनाया सौ बार
वही तस्वीर फिर इक बार बना लेता हूँ

ऐ ख़ुशी ग़म की कसौटी पे परख लूँ तुझ को
ऐ वफ़ा आ तुझे मेयार बना लेता हूँ

हाए वो लोग जिन्हें गिनता था बे-गानों में
आज मिलते हैं ग़म-ख़्वार बना लेता हूँ

‘शाज़’ गर्दिश-गह-ए-अफ़्लाक-ए-तमन्ना मत पूछ
नौ-ब-नौ साबित-ओ-सय्यार बना लेता हूँ

कोई तनहाई का एहसास दिलाता है मुझे 

कोई तनहाई का एहसास दिलाता है मुझे
मैं बहुत दूर हूँ नज़दीक बुलाता है मुझे

मैं ने महसूस किया शहर के हँगामे में
कोई सहरा है सहरा में बुलाता है मुझे

तू कहाँ है के तेरी जुल्फ का साया-साया
हर घनी छाँव में ले के बिठाता है मुझे

ऐ मेरे हाल-ए-परेशाँ के निगह-दार ये क्या
किस क़दर दूर से आईना दिखाता है मुझे

ऐ मकीन-ए-दिल-ओ-जाँ मैं तेरा सन्नाटा हूँ
मैं इमरात हूँ तेरी किस लिए ढाता है मुझे

रहम कर मैं तेरी मिज़गाँ पे हूँ आँसू की तरह
किस क़यामत की बुलंदी से गिराता है मुझे

‘शाज़’ अब कौन सी तहरीह को तक़दीर कहूँ
कोई लिखता है मुझे कोई मिटाता है मुझे

कोई तो आ के रूला दे के हँस रहा हूँ मैं 

कोई तो आ के रूला दे के हँस रहा हूँ मैं
बहुत दिनों से ख़ुशी को तरस रहा हूँ मैं

सहर की ओस में भीगा हुआ बदन तेरा
वो आँच है के चमन में झुलस रहा हूँ मैं

क़दम क़दम पे बिखरता चला हूँ सहरा में
सदा की तरह मकीन-ए-जरस रहा हूँ मैं

कोई ये कह दे मेरी आरज़ू के मोती से
सदफ़ सदफ़ की क़सम है बरस रहा हूँ मैं

हयात-ए-इश्क़ मुझे आज अजनबी न समझ
के साया साया तेरे पेश ओ पस रहा हूँ मैं

नफ़स की आमद ओ शद भी है सानेहा की तरह
गवाह रह के तेरा हम-नफ़स रहा हूँ मैं

जहाँ भी नूर मिला खिल उठा शफ़क की तरह
जहाँ भी आग मिली ख़ार ओ ख़स रहा हूँ मैं

मैं तो चुप था मगर उस ने भी सुनाने न दिया

मैं तो चुप था मगर उस ने भी सुनाने न दिया
ग़म-ए-दुनिया का कोई जिक्र तक आने न दिया

उस का ज़हराब-ए-पैकर है मेरी रग रग में
उस की यादों में मगर हाथ लगाने न दिया

उस ने दूरी की भी हद खींच रखी है गोया
कुछ ख़यालात से आगे मुझे जाने न दिया

बादबाँ अपने सफ़ीना का ज़रा सी लेते
वक़्त इतना भी ज़माने की हवा ने न दिया

वही इनाम ज़माने से जिसे मिलना था
लोग मासूम हैं कहते हैं ख़ुदा ने न दिया

कोई फ़रियाद करे गूँज मेरे दिल से उठे
मौक़ा-ए-दर्द कभी हाथ से जाने न दिया

‘शाज़’ इक दर्द से सौ दर्द के रिश्ते निकले
किन मसाइब ने उसे जी से भुलाने न दिया

मेरी वहशत का तेरे शहर में चर्चा होगा

मेरी वहशत का तेरे शहर में चर्चा होगा
अब मुझे देख के शायद तुझे धोका होगा

साफ़ रस्ता है चले आओ सू-ए-दीदा-ए-दिल
अक़्ल की राह से आओगे तो फेरा होगा

कौन समझेगा भला हुस्न-ए-गुरेज़ाँ की अदा
मेरे ईसा ने मेरा हाल न पूछा होगा

वजह-ए-बे-रंगी-ए-हर-शाम-ओ-सहर क्या होगी
मैं ने शायद तुझे हर रंग में देखा होगा

अब कहीं तू ही डुबोवे हमें ऐ मौज-ए-सराब
वरना फिर शिकवा-ए-पायाबी-ए-दरिया होगा

कोई तदबीर बता ऐ दिल-ए-आज़ार-पसंद
उस को जी जाँ से भुलाने में तो अरसा होगा

हुस्न की ख़ल्वत-ए-सादा भी है सद-बज़्म-तराज़
इश्क़ महफिल में भी होगा तो अकेला होगा

झुटपुटा छाया है कौन आया है दरवाज़े पर
देखना ‘शाज़’ कोई सुब्ह का भूला होगा

मिसाल-ए-शोला-ओ-शबनम रहा है आँखों में

मिसाल-ए-शोला-ओ-शबनम रहा है आँखों में
वो एक शख़्स जो कम कम रहा है आँखों में

कभी ज़्यादा कभी कम रहा है आँखों में
लहू का सिलसिला पैहम रहा है आँखों में

न जाने कौन से आलम में उस को देखा था
तमाम उम्र वो आलम रहा है आँखों में

तेरी जुदाई में तारे बुझे हैं पलकों पर
निकलते चाँद का मातम रहा है आँखों में

अजब बनाओ है कुछ उस की चश्म-ए-कम-गो का
के सैल-ए-आह कोई थम रहा है आँखों में

वो छुप रहा है ख़ुद अपनी पनाह-ए-मिज़गाँ में
बदन तमाम मुजस्सम रहा है आँखों में

अज़ल से ता-ब-अबद कोशिश-ए-जवाब है ‘शाज’
वो इक सवाल जो मुबहम रहा है आँखों में

सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता 

सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता
मैं उस को भूला जाता हूँ वरना मर जाता

मैं अपनी राख कुरेदूँ तो तेरी याद आए
न आई तेरी सदा वरना मैं बिखर जाता

तेरी ख़ुशी ने मेरा हौसला नहीं देखा
अरे मैं अपनी मोहब्बत से भी मुकर जाता

कल उस के साथ ही सब रास्ते रवाना हुए
मैं आज घर से निकलता तो किस के घर जाता

मैं कब से हाथ में कासा लिए खड़ा हूँ ‘शाज़’
अगर ये जख़्म ही होता तो कब का भर जाता

तमाम क़ौल ओ क़सम था मुकर गया है कोई

तमाम क़ौल ओ क़सम था मुकर गया है कोई
मैं रो पड़ा हूँ के जी से उतर गया है कोई

कभी कभी तो ज़राफ़त भी ख़ूँ रूलाती है
हँसी की तरह फ़ज़ा में बिखर गया है कोई

न अब तो दीं में कशिश रह गई न दुनिया में
ये मुझ पे आख़िरी एहसान कर गया है कोई

नहीं है मेज़बाँ जिस का ये कौन मेहमान है
खंडर सी आँखों में आ कर गया है कोई

मैं आप अपनी कर्मी-गाह था शिकार भी था
वो मैं था या मेरा साया था मर गया है कोई

ज़रा सी बात आ गई जुदाई तक

ज़रा सी बात आ गई जुदाई तक
हँसी ने छोड़ दिया ला के जग-हँसी तक

भले से अब कोई तेरी भलाई गँवाए
के मैं ने चाहा था तुझ को तेरी बुराई तक

तू चुपके चुपके मुरव्वत से क्यूँ बिछड़ता है
मेरा ग़ुरूर भी था तेरी कज-अदाई तक

मुझे तो अपनी नदामत की दाद भी न मिली
मैं उस के साथ रहा अपनी ना-रसाई तक

इस आईना का तो अब रेज़ा रेज़ा चुभता है
ये आईना जिसे तकती रही ख़ुदाई तक

ये हादसा है मेरे ज़ब्त-ए-हाल के हाथों
सफ़ेद हो गई कागज़ पे रौशनाई तक

पुकारती रहीं आँखें चला गया है कोई
वो इक सुकूत था आवाज़ से दुहाई तक

निकल के देखा क़फ़स से तो आँख भर आई
वो फ़स्ल-ए-गुल के खड़ी थी मेरी रिहाई तक

ग़ज़ब है टूट के चाहा था ‘शाज़’ ने जिस को
सुना ये रस्म भी थी सूरत-आश्नाई तक

आब ओ गिल

मुझे याद पड़ता है इक उम्र गुज़री
लगावट की शबनम में लहजा डुबो कर
कोई मुझ को आवाज़ देता था अक्सर
बुलावे की मासूमियत के सहारे
मैं आहिस्ता आहिस्ता पहुँचा यहाँ तक
ब-हर सम्त अम्बोह-ए-आवार-गाँ था
बड़े चाव से मैंने इक इक से पूछा
‘‘कहो क्या तुम ही ने पुकारा था मुझ को
कहो क्या तुम ही ने पुकारा था मुझ को’’
मगर मुझ से अम्बोह-ए-आवार-गाँ ने
हिरासाँ हिरासाँ परेशाँ परेशाँ
कहा सिर्फ़ इतना नहीं वो नहीं हम
हमें भी बुला कर कोई छुप गया है

अजनबी

दिन भर लोग मिरे
कपड़ों से मिलते हैं
मेरी टोपी से
हाथ मिला कर हँसते हैं
मेरे जूते पहन के मेरी
साँसों पर चलते हैं

अपने आप से कब बिछड़ा था
दिन के इस अम्बोह में मुझ को
कुछ भी याद नहीं आता
रात को अपने नंग जिस्म के
बिस्तर पर
नींद नहीं आती

बे-नंग-ओ-नाम 

रात ढलते ही इक आवाज़ चली आती है
भूल भी जाओ कि मैंने तुम्हें चाहा कब था
किस सनोबर के तले मैंने क़सम खाई थी
कोई तूफाँ किसी पूनम में उठाया कब था
मेरी रातों को किसी दर्द से निस्बत क्या थी
मेरी सुब्हों को दुआओं से इलक़ा कब था
एक महमिल के सिरहाने कोई रोया था ज़रूर
पस-ए-महफ़िल किसी लैला ने पुकारा कब था
तुम यूँ ही ज़िद में हुए ख़ाक-ए-दर-ए-मय-ख़ाना
मुझ को ये ज़ोम कि मैंने तुम्हें टोका कब था
तुम ने क्यूँ पाकई-ए-दामाँ की हिकायत लिक्खी
मेरे सर को किसी दीवार का सौदा कब था
याद कम कम हैं न छेड़ों मिरे मक्तूब की बात
वो मुरव्वत थी फ़क़त हर्फ़-ए-तमन्ना कब था

दिल न इस तरह दुखा साफ़ मुकरने वाले
मुझ को तस्लीम कि तेरी कोई तक़्सीर न थी
ये बजा है कि तुझे ज़ौक-ए-नशेमन न मिला
ये ग़लत है कि मुझे हैरत-ए-तामीर न थी

संग-बारी ये शीशे का मकाँ किस का है
इस दर ओ बाम में ख़ुश्बू-ए-वफ़ा कैसी है
किस को आवाज़ से दीवारों के सीने में फ़िगार
मेरे माबूद मिरे घर की फ़ज़ा कैसी है
छाँव देते नहीं आँगन के घनेरे अश्जार
ग़म की छाई हुई घनघोर घटा कैसी है
एक कोंपल पे था अंगुश्त-ए-हिनाई का निशाँ
ये लहू रोती हुई शाख़-ए-हिना कैसी है
किस की तस्वीर है ये जिस पे गुमाँ होता है
जाने कब बोल उठे उफ़ ये अदा कैसी है
किस ने तकिये पे काढ़ा है गिरे का मिसरा
हाए टूटी हुई नींदों की सज़ा कैसी है

सोच में गुम हूँ कि किस किस की ज़बाँ बंद करूँ
आज शायद दर ओ दीवार को ढाना होगा
जिस में तू है तिरे वादे हैं तिर क़समें हैं
क्या सितम है कि उसी घर को जलाना होगा

छटा आदमी

ये मिरा शहर है
ख़ूब-सूरत हसीं
चांदनी का नगर धूप की सरज़मीं
शहर के रोज़ ओ शब मेरी आँखें
जिस तरह पुतलियाँ और सफ़ेदी
मैं इन आँखों से सब मंज़र-ए-रंग-ओ-बू देखता हूँ
रास्ता रास्ता कू-ब-कू देखता हूँ

मैं कि शब-गर्द शाइर
चाँद से बातें करते हुए चल पड़ा था
एक बस्ती मिली
मल्गज्जे और सियह झोंपड़े चार सू
झोंपड़े जिन की शम्ओं में साँसें न थीं
ज़र्द बीमार उजाले
राख और गंदगी
इक उफ़ूनत का अम्बार
ज़िंदगी जैसे शरमा रही थी

मिरी जानिब कहीं दूर से एक साया बढ़ा
मैंने पूछा कि तुम कौन हो
वो ये कहने लगा
मैं की ज़ुल्मत हूँ तुम रौशनी दो मुझे
मैं जिहालत हूँ तुम आगही दो मुझे
मैं निजासत हूँ पाकीज़गी दो मुझे
लो सुना और देखा मुझे
मैं छटा आदमी हूँ बचा लो मुझे
मैं छटा आदमी हूँ बचा लो मुझे

दर-गुज़र 

कौन वो लोग थे अब याद नहीं आता है
फेंक आए थे मुझे यूसुफ़-ए-कनआँ की तरह
खींच लाए थे मुझे शहर के बाज़ारों में
सब को दिखलाते थे आईना-ए-हैराँ की तरह
लोग कहते हैं कि कोई भी ख़रीदार न था
कौन वो लोग थे अब याद नहीं आता है
छोड़ आए थे सुलगते हुए मैदाँ में मुझे
एड़ियाँ रगड़ीं मगर चश्मा-ए-ज़मज़म न मिला
कैसे तन्हा किया किस हाल-ए-परेशाँ में मुझे
कौन वो लोग थे अब याद नहीं आता है

बाग़-ए-आसाइश हस्ती भी दिखाया मुझ को
कोई शद्दाद-नुमा था कोई नमरूद-सिफ़त
बे-गुनाही की सज़ा थी कि वो सच का इनाम
रसन ओ दार के मिम्बर पे बिठाया मुझ को

कौन वो लोग थे अब याद नहीं आता है
कोई इसंान कोई शैताँ कोई चेहरा कोई नाम
हाफ़िज़ा शीशा की मानिंद दरक जाता है
ऐ ख़ुदा तुझ से तो पोशीदा नहीं है कोई राज़
दोस्त होंगे कि वो दुश्मन मिरा पहुँचा दे सलाम
शुक्र करता हूँ कि दुनिया के ख़ज़ाने ने मुझे
कोई मोती न सही आँख तो गिरियाँ दी है
क्या दिया क्या न दिया तू ने ख़ुदा-ए-फ़य्याज़
क्या ये कम है कि मुझे दौलत-ए-निसयाँ दी है

हम-शाद 

वो इक शख़्स जिस की शबाहत से मुझ को
बहुत ख़्वार ओ शर्मिंदा होना पड़ा था
क़बा रूह की मलगजी हो गई थी
कई बार दामन को धोना पड़ा था
वो मुझ जैसी आँखें जबीं होंट अबरू
कि बाक़ी न था कुछ भी फ़र्क़-ए-मन-ओ-तू
वही चाल आवाज़ क़द रंग मद्धम
वही तर्ज़-ए-गुफ़्तार ठहराओ कम कम
ख़ुदा जाने क्या क्या मशाग़िल थे उसे के
मिरे पास लोग आए आ आ के लौटे
कई मुझ से उलझे कई मुझ से झगड़े
मैं रोता रहा बे-गुनाही का रोना
मिरे जुर्म पर लोग थे क़हक़हा-ज़न
न काम आया अपनी तबाही का रोना
वो ज़ुल्मत में छुप छुप के दिन काटता था
मैं दिन के उजाले में मारा गया था
सुना रात वो मर गया क्या ग़ज़ब है
उसे दफ़्न कर आए लोगों को देखो
मैं कम-बख़्त नज़रों से ओझल ही कब था
ये क्या कर दिया हाए लोगों को देखो

ख़ौफ-ए-सहरा

क्या हुआ शौक़-ए-फ़ुजूल
क्या हुई जुरअत-ए-रिंदाना मिरी
मुझे पे क्यूँ हँसती है तामीर-ए-सनम-ख़ाना मिरी
फिर कोई बाद-ए-जुनूँ तेज़ करे
आगही है कि चराग़ों को जलाती ही चली जाती है
दूर तक ख़ौफ़ का सहरा नज़र आता है मुझे

और अब सोचता हूँ फ़िक्र की इस मंज़िल में
इश्क़ क्यूँ अक़्ल की दीवार से सर टकरा कर
अपने माथे से लहू पोंछ के हँस पड़ता है

कै़द-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म 

आख़िर-ए-शब की उदासी नम फ़ज़ओं का सुकूत
ज़ख्म से महताब के रिसता है किरनों का लहू
दिल की वादी पर है बे-मौसम घटाओं का सुकूत
काश कोई ग़म-गुसार आए मदारातें करे
मोम-बत्ती की पिघलती रौशनी के कर्ब में
दुख भरे नग़्मे सुनाए दुख भरी बातें करे

कोई अफ़्साना किसी टूटी हुई मिज़राब का
फ़स्ल-ए-गुल में राएगाँ अर्ज़-ए-हुनर जाने की बात
सीप के पहलू से मोती के जुदा होने का ज़िक्र
मौज की साहिल से टकरा कर बिखर जाने की बात
दीदा-ए-पुर-ख़ूँ से कासे तक की मंज़िल का बयाँ
ज़िंदगानी में हज़ारों बार मर जाने की बात
अदल-गाह-ए-ख़ैर में पासंग-ए-शर का तजि़्करा
आईना-ख़ाने में ख़ाल-ओ-ख़त से डर जाने की बात

काश कोई ग़म-गुसार आए मदारातें करे
मोम-बत्ती की पिघलती रौशनी के कर्ब में
दुख भरे नग़्मे सुनाए दुख भरी बातें करे

ज़ंजीर की चीख

समुंदर तुझे छोड़ कर जा रहा हूँ
तू ये मत समझना
कि मैं तेरी मौजों की ज़ंजीर की चीख़ से बे-ख़बर हूँ

यही मैं ने सोचा है अपनी ज़मीं को
उफ़ुक़ से परे यूँ बिछा दूँ
हद-ए-ईन-ओ-आँ तक उठा दूँ
वो तू हो कि मैं
अपनी वुसअत में ला-इंतिहा हैं
मगर हम किनारों के मारे हुए हैं

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