शारिक़ कैफ़ी की रचनाएँ

इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने 

इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने
पहले यार बनाया फिर समझाया हम ने

ख़ुद भी आख़िर-कार उन्ही वा’दों से बहले
जिन से सारी दुनिया को बहलाया हम ने

भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना
अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने

मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
ऐसा मरने का माहौल बनाया हम ने

घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे
तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने

इन लम्हों में किस कि शिरकत कैसी शिरकत
उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हम ने

दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया
फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हम ने

जब ‘शारिक़’ पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त
फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हम ने

आइने का साथ प्यारा था कभी

आइने का साथ प्यारा था कभी
एक चेहरे पर गुज़ारा था कभी

आज सब कहते हैं जिस को नाख़ुदा
हम ने उस को पार उतारा था कभी

ये मिरे घर की फ़ज़ा को किया हुआ
कब यहाँ मेरा तुम्हारा था कभी

था मगर सब कुछ न था दरिया के पार
इस किनारे भी किनारा था कभी

कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल
जो मिरा सारे का सारा था कभी

आज कितने ग़म हैं रोने के लिए
इक तिरे दुख का सहारा था कभी

जुस्तुजू इतनी भी बे-मा’नी न थी
मंज़िलों ने भी पुकारा था कभी

ये नए गुमराह क्या जानें मुझे
मैं सफ़र का इस्तिआ’रा था कभी

इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो
मैं इसी मैदाँ में हारा था कभी

झूट पर उस के भरोसा कर लिया

झूट पर उस के भरोसा कर लिया
धूप इतनी थी कि साया कर लिया

अब हमारी मुश्किलें कुछ कम हुईं
दुश्मनों ने एक चेहरा कर लिया

हाथ क्या आया सजा कर महफ़िलें
और भी ख़ुद को अकेला कर लिया

हारने का हौसला तो था नहीं
जीत में दुश्मन की हिस्सा कर लिया

मंज़िलों पर हम मिलें ये तय हुआ
वापसी में साथ पक्का कर लिया

सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए
एक दिन उस से भी झगड़ा कर लिया

क़ुर्ब का उस के उठा कर फ़ाएदा
हिज्र का सामाँ इकट्ठा कर लिया

गुफ़्तुगू से हल तो कुछ निकला नहीं
रंजिशों को और ताज़ा कर लिया

मोल था हर चीज़ का बाज़ार में
हम ने तन्हाई का सौदा कर लिया

हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा /

हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा

पढ़ाई चल रही है ज़िंदगी की
अभी उतरा नहीं बस्ता हमारा

मुआ’फ़ी और इतनी सी ख़ता पर
सज़ा से काम चल जाता हमारा

किसी को फिर भी महँगे लग रहे थे
फ़क़त साँसों का ख़र्चा था हमारा

यहीं तक इस शिकायत को न समझो
ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा

तरफ़-दारी नहीं कर पाए दिल की
अकेला पड़ गया बंदा हमारा

तआ’रुफ़ क्या करा आए किसी से
उसी के साथ है साया हमारा

नहीं थे जश्न-ए-याद-ए-यार में हम
सो घर पर आ गया हिस्सा हमारा

हमें भी चाहिए तन्हाई ‘शारिक़’
समझता ही नहीं साया हमारा

भीड़ नहीं ये आँखें हैं

भीड़ नहीं ये आँखें हैं
और इन आँखों में
किसी के चश्मे का नंबर बढ़ जाता है तो
मजबूरी है मेरी रिश्ते रखना
कुछ अच्छी आँखों से
गर्म हाथों से
मेरा होना ही तब साबित होता है जब
कोई मुझको देखे
मुझको हाथ लगाए
भीड़ नहीं ये वो आँखें हैं
जिन से हूँ मैं

रोता हुआ बकरा

वो बकरा
मेरा मरियल सा बकरा
जिसे बबलू के बकरे ने बहुत मारा था वो बकरा
वो कल ख़्वाब में आया था मेरे
दहाड़े मार कर रोता हुआ
और नींद से उठ कर रोने लगा मैं
खता मेरी थी
मैंने ही लड़ाया था बबलू के बकरे से
उसे मालूम था पिटना है उसको
मगर फिर भी वो उस मोटे से जाकर भिड़ गया था
वो भी कुर्बानी से कुछ देर पहले
मगर पापा तो कहते हैं वो जन्नत में बहुत आराम से होगा
वहां अंगूर खाकर खूब मोटा हो गया होगा
तो क्यूँ रोता है वो ख़्वाबों में आकर
वो क्यूँ रोता है आकर ख़्वाब में ये तो नहीं मालूम मुझको
मुझे तो ये पता है
वो जब जब ख़्वाब में रोता हुआ आया है मेरे
तो अगले रोज़ बबलू को बहुत मारा है मैंने

वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है

वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है
कि मेरा हाथ भी
डोंगे में अच्छी बोटियों को ढूंढता है

वो ही बकरा
खड़ा रक्खा गया है जिस को कोने में निगाहों से छुपाकर
वो जिसकी ज़िंदगी है मुनहसिर इस बात पर
कि हम खायेंगे कितना
और कितना छोड़ देंगे बस यूँही अपनी प्लेटों में

अभी कुछ देर पहले मैं खड़ा था पास जिसके
और जिसके जाविये से देख कर महफ़िल को
आँखें डबडबा आईं थी मेरी

मगर वो पल कभी का जा चुका है
कि अब हूँ मेज़ पर मैं
और मेरा हाथ भी डोंगे में अच्छी बोटियों को ढूंढता है
वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है

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