शाहिद अख़्तर की रचनाएँ

चंद शब्दों से नहीं बनती है कविता 

महज चंद शब्‍दों और चंद बिंबों से
नहीं बनती है कविता
कविता कोई भात नहीं
कविता कोई सब्‍ज़ी नहीं
कि शब्‍दों को धोया
बिंबों का मसाला डाला
और चढ़ा दिया भावनाओं के
चूल्‍हे की आँच पर।

कविता भिन्‍न है
बहुत भिन्‍न है
आप अगर चाहते हैं
उसे किसी फार्मूले में बाँधना
तो कोई ठीक नहीं कि वह तोड़ दे बंधन
कोई हैरत नहीं कि आप कहना चाहें कुछ
और वह कह दे कुछ और बातें

आख़िर जब महंगाई आसमान पर हो
और शहर पर भूख का शासन
और हर तरफ मचा हो हाहाकार
शब्‍द और कविता
किसी अभिनेत्री के नितंबों का
राग तो अलाप नहीं सकती
उनके कमनीय कुचों का
गुणगान तो नहीं कर सकती
महज चंद शब्‍दों और चंद बिंबों से…

तितलियाँ

रात सोने के बाद
तकिए के नीचे से सरकती हुई
आती हैं यादों की ति‍तलियाँ
तितलियाँ पंख फड़फड़ाती हैं

कभी छुआ है तुमने इन तितलियों को
उनके ख़ूबसूरत पंखों को
मीठा-मीठा से लमस हैं उनमें
एक सुलगता-सा एहसास
जो गीली कर जाते हैं मेरी आँखें

तितलियाँ पंख फड़फड़ाती हैं
तितलियाँ उड़ जाती हैं
तितलियां वक़्त‍ की तरह हैं
यादें छोड़ जाती हैं
ख़ुद याद बन जाती हैं

तितलियाँ बचपन की तरह हैं
मासूम खिलखिलाती
हमें अपनी मासुमियत की याद दिलाती हैं
जिसे हम खो बैठे हैं जाने अनजाने
चंद रोटियों के खातिर
जीवन के महासमर में…

हर रात नींद की आगोश में
जीवन के टूटते बिखरते सपनों के बीच
मैं खोजता हूँ
अपने तकिये के नीचे
कुछ पल बचपन के, कुछ मासूम तितलियाँ…

हाई टी’ और ‘डिनर’ के बाद

कभी देखा है तुमने
देश की तकदीर लिखने वालों ने
क्‍या क्‍या ना बनाया है हमारे लिए

आग उगलती, जान निगलती
हज़ारों मील दूर मार करने वाली मिसाइलें हैं
हम एटमी ताकत हैं अब
किसकी मजाल जो हमें डराए धमकाए

अंतरिक्ष पर जगमगा रहे हैं
हमारे दर्जनों उपग्रह
चांद पर क़दम रखने की
हम कर रहे हैं तैयारियाँ
और दुनिया मान रही है हमारा लोहा

हम उभरती ताकत है
अमेरिका भी कह रहा है यह बात
हाँ, यह बात दीगर है
कि भूख और प्‍यास के मामले में
हम थोड़ा पीछे चल रहे हैं

लेकिन परेशान ना हों
‘हाई टी’ और ‘डिनर’ के बाद
नीति-निर्माताओं की
इस पर भी पड़ेगी निगाह

यादों के फूल

…और बरसों बाद
जब मैंने वह किताब खोली
वहाँ अब भी बचे थे
उस फूल के कूछ ज़र्द पड़े हिस्से
जो तुमने कालेज से लौटते हुए
मुझे दिया था

हाँ, बरसों बीत गए
लेकिन मेरे लिए तो अब भी वहीं थमा है वक़्त
अब भी बाक़ी है
तुम्हारी यादों की तरह
इस फूल की ख़ुशबू

अब भी ताज़ा है
इन ज़र्द पंखुडि़यों पर
तुम्हारे मरमरीं हाथों का
वह हसीं लम्‍स
उससे झाँकता है तुम्‍हारा अक्‍स

वक़्त के चेहरे पे
गहराती झुर्रियों के बीच
मैं चुनता रहता हूँ
तुम्‍हारा लम्‍स तुम्‍हारा अक्‍स
तुम्हारी यादों के फूल

कभी आओ तो दिखाएँ
दिल के हर गोशे में
मौजूद हो तुम
हर तरफ गूँजती है बस तुम्‍हारी यादों की सदा

बरसों बाद जब मैंने …

ख़ामोशी के ख़िलाफ़

गज़ा पट्टी पर इस्राइली हमले के खिलाफ़ लिखी गई कविता

दर्द हो तो
मदावा भी होगा
हमारी ख़ामोशी
ज़ुर्म होगी
अपने खिलाफ़
और हम भुगत रहे हैं
इसकी ही सज़ा
लब खोलो
कुछ बोलो
कोई नारा, कोई सदा
उछालो ज़ुल्‍मत की इस रात में
आवाज़ों के बम और बारूद
ढह जाएँगे इन से
ज़ालिमों के किले

रचनाकाल : 14.01.09

तनहाइयाँ-1 

कहीं से अब भी आती है एक सदा
कहीं गूँजता है एक नग़मा
कहीं सुलगती है कोई आह
कहीं कोई लेता है मेरा नाम
यादों की दूर वादियों में
किसे मैं भूल आया
कोई बताए मुझे
क्योंकर अज़ीज़ है मुझे
मेरा ग़म, मेरी तनहाइयाँ

तनहाइयाँ-2

तुम नहीं तो क्‍या
तुम्‍हारी याद तो है
उम्‍मीद के दरीचे को
खटखटाने के लिए…

छोटी-छोटी चीज़ें हैं
छोटी-छोटी यादें हैं
दिल की वीरान महफिल को
सजाने के लिए…

ज़िन्दगी के रहगुज़र पर
मैं अकेला कब रहा
जब कोई हमसफ़र ना रहा
तुम रही, तुम्‍हारी याद रही
इक काफ़िला बनाने के लिए…

याद का पंछी
मेरे दिल के कफ़स से
उड़ कर भाग नहीं सकता
ये दिल जो मेरा भी कफ़स है

तनहाइयाँ-3

जिस दिन उसने कहा अलविदा
जिस दिन मेरी जीस्‍त हुई तन्‍हा
जिस दिन मेरी आँखें सागर हुईं
उस दिन, उस दिन तुम मेरी हुई
हाँ, और मैं तेरा…
उस दिन मेरी आगोश में
अंगड़ाई ली मेरी तन्‍हाई
और तबसे निभा रही है वफ़ा

तनहाइयाँ-4 

ख़ुदकलामी की भी
एक इंतहा होती है
मैंने हमेशा इससे परहेज किया
ख़ुदकलामी मैं क्‍यों करूँ भला
जब मेरी बात सुनने के लिए
मेरे पास मेरी तन्‍हाई है !

तनहाइयाँ-5

जाने वाले की याद
दिल के बुतख़ाने में सजा लो
वोह चला जाए भी तो
एक दर्द बन कर दिल में रहेगा
दर्द का यह रिश्‍ता
इतना अज़ीज़ क्‍यों होता है हमें
कि हम उसे तोड़ना नहीं चाहते ?

तनहाइयाँ-6 

सहरा-ए-जीस्‍त में जब
यादों के फूल खिलते हैं
आँखों से उबलते हैं
गौहर-ए-नायाब के
दिल की बस्‍ती के परे
लहलहाती है जफ़ा की फ़स्‍ल
ढलते सूरज की सुर्खी से सराबोर
आसमाँ में तैरते हैं यास के बादल
उफ़्क पर दूर मंडलाती हैं
हसीं दिलफ़रेब तितलियाँ
माजी के आइने से
झाँकते हैं परीवश चेहरे
जानम तुम क्‍या जानो
कितना ख़ुशरंग है यह मंज़र
कितना लहूरंग?

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ-1

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ
दिल के चरखे पर
ख़्वाब बुनती हैं
हसीं सुलगते हुए ख़्वाब !

तब आरिज़ गुलगूँ होता है
हुस्‍न के तलबगार होते हैं
आँखों से मस्‍ती छलकती है
अलसाई सी ख़ुद में खोई रहती हैं
गुनगुनाती हैं हर वक़्त
जवाँ होती हसीं लड़कियाँ…

वक़्त गुज़रता है
चोर निगाहें अब भी टटोलती हैं।
जवानी की दहलीज़ लाँघते उसके ज़िस्‍मो तन
अब ख़्वाब तार-तार होते हैं ।
आँखें काटती हैं इंतज़ार की घडि़याँ ।

दिल की बस्‍ती वीरान होती है
और आँखों में सैलाब ।
रुख़सार पर ढलकता है
सदियों का इंतज़ार ।
जवानी खोती हसीं लड़कियाँ…

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ
काटती रह जाती हैं
दिल के चरखे पर
हसीं सपनों का फरेब ।

जवाँ होती हसीं लड़कियों के लिए
उनके हसीं सपनों के लिए
हसीं सब्‍ज़ पत्‍ते
दरकार होते हैं ।

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ-2 

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ
सिर्फ़ हसीन होती हैं ।
सिर्फ़ हुस्‍न होती हैं ।
सिर्फ़ ज़िस्‍म होती हैं ।

कौन झाँकता हैं उनकी आँखों में
कि वहाँ सैलाब क्‍यों है ?
कौन टटोलता है उनके दिल को
कि वहाँ क्‍या बरपा है ?

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ
हसीं ति‍‍तलियों के मानिंद हैं ।
हर कोई हविस के हाथों में
उन्‍हें क़ैद करने को दरपा है ।

जवाँ होती हसीं लड़कियाँ
कब तलक रहें महुए इंतज़ार ?
कब तलक बचाएँ ज़िस्‍मो-जान?
कब तलक सुनाएँ दास्‍तान-ए-दिल फिगार ??

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