शाहीन की रचनाएँ

बदन के रूप का एजाज़ अंग अंग थी वो / 

बदन के रूप का एजाज़ अंग अंग थी वो
मिरे लिए तो मिरी रूह की तरंग थी वो

गुलों के नाम खुली पीठ पर मिरी लिख कर
ख़िजाँ के फैलते लम्हों से महव-ए-जंग थी वो

सियह घटाओं से किरनें तराश लेती थी
मिरी हयात की इक जागती उमंग थी वो

वो ज़ख़्म-ख़ूर्दा-ए-हालात ख़ुद रही लेकिन
तमाम निकहत ओ नग़्मा तमाम रंग थी वो

न जाने कितने थे ‘शाहीन’ उस के मतवाले
अगरचे शाख़ में उलझी हुई पंतग थी वो

दुनिया ने बस थका ही दिया काम कम हुए

दुनिया ने बस थका ही दिया काम कम हुए
तेरी गली में आए तो कुछ ताज़ा-दम हुए

उक़्दा खुला तो दर्द के रिश्ते बहम हुए
दामन के साथ अब के गरेबाँ भी नम हुए

जब से असीर-ए-सिलसिला-ए-बेश-ओ-कम हुए
हम को सलीब अपने ही नक़्श-ए-क़दम हुए

बदली ज़रा तो तर्ज़-ए-ख़िराम-ए-सितारगाँ
नुक़्तों में आँख बीच सहीफ़े रक़म हुए

थे मुंतज़िर हमारे भी गुल-चेहरगान-ए-शहर
लेकिन रिहा गिरफ़्त-ए-जहाँ से न हम हुए

रह कर जिन इंतिहाओं में अपनी गुज़र गई
इस तरह जीने वाले जाँ-बर ही कम हुए

दीवार पर गड़े हुए टुकड़े पे काँच के
ये किस हिसार-ए-रंग में महसूर हम हुए

चश्मक ये धूप छाँव की और एक ज़र्द फूल
इक जान-ए-ना-तवाँ पे हज़ारों सितम हुए

यकता ओ बे-नज़ीर है वो क्या उसे ग़रज़
ख़ारिज हुए कि दाख़िल-ए-काबा सनम हुए

‘शाहीन’ थे कमाल के रूतबा-शनास-ए-दहर
पर अपनी मंज़िलत से ख़ुद आगाह कम हुए

ख़ाक-ए-दिल कहकशाँ से मिलती है 

ख़ाक-ए-दिल कहकशाँ से मिलती है
ये ज़मीं आसमाँ से मिलती है

हाथ आती नहीं कभी दुनिया
और कभी हर दुकाँ से मिलती है

हम को अक्सर गुनाह की तौफ़ीक़
हुज्जत-ए-कुदसियाँ से मिलती है

दिल को ईमान जानने वाले
दौलत-ए-दिल कहाँ से मिलती है

मावार-ए-सुख़न है जो तौक़ीर
इक कड़े इम्तिहाँ से मिलती है

इंतिहा ये कि मेरी हद्द-ए-सफ़र
मंज़िल-ए-गुमरहाँ से मिलती है

हर सितारा लहूलुहान मिरा
ये जबीं आसमाँ से मिलती है

कुंज-ए-गुल क ख़बर दरीचे को
अब तो बाद-ए-ख़िजाँ से मिलती है

सहल ‘शाहीन’ ये हुनर तो नहीं
शाइरी नक़्द-ए-जाँ से मिलती है

क़ुबूल है ग़म-ए-दुनिया तिरे हवाले से

क़ुबूल है ग़म-ए-दुनिया तिरे हवाले से
ये बोझ वर्ना सँभलता नहीं सँभाले से

सुराग़ अपना उधर ही कहीं मिले शायद
तने हुए हैं जिधर मकड़ियों के जाले से

मैं एक ज़र्रा-ए-आवारा और मिरी ख़ातिर
समुंदरों सी ये रातें ये दिन हिमालय से

खुली तो रखता हूँ मैं घर की खिड़कियाँ लेकिन
वही तमाम नज़ारे हैं देखे-भाले से

किसी की याद भी उनवान-ए-बेवफ़ाई थी
पड़े हैं पाँव में क़ब्ल-ए-सफ़र भी छाले से

सुकूल कितना है जी को ये सोच कर कि हमें
हरम से कोई इलाक़ा न अब शिवाले से

ये कम नहीं कि मैं उस की दुआ में शामिल हूँ
कुछ और चाहिए क्या दूर जाने वाले से

सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है

सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है
कितनी उलझन में अपना दिल होता है

मेरी ख़ुशी का भेद है बस ये सब का दुख
मेरे अपने दुख में शामिल होता है

इल्म की मेरे यार सनद पहचान नहीं
बहुत पढ़ा लिक्खा भी जाहिल होता है

सय्यद-ज़ादे दिल माँगो या दाद-ए-हुनर
साइल तो हर हाल में साइल होता है

बीत गई जब उम्र तो ये मालूम हुआ
एक इशारा उम्र का हासिल होता है

एक हँसी लाचारी को कुछ और बढ़ाए
एक हँसी से दुश्मन घाइल होता है

ऐ मिरे दिल ऐ अच्छे दिल ऐ ख़ाना-ख़राब
तू क्यूँ हर तकरार में शामिल होता है

सह लें हम दुनिया के सितम ‘शाहीन’ मगर
ज़िद्दी दिल हर आन मुक़ाबिल होता है

ज़िंदगी है मुख़्तसर आहिस्ता चल

ज़िंदगी है मुख़्तसर आहिस्ता चल
कट ही जाएगा सफ़र आहिस्ता चल

एक अंधी दौड़ है किस को ख़बर
कौन है किस राह पर आहिस्ता चल

दीदा-ए-हैराँ को मंज़र बहुत
यूँ ही नज़्ज़ारा न कर आहिस्ता चल

तेज़-गामी जिस शिकम की आग है
उस से बचना है हुनर आहिस्ता चल

जो तग-ओ-दौ से तिरी हासिल हुआ
रख कुछ उस की भी ख़बर आहिस्ता चल

रोज़ ओ शब यूँ वक़्त का दामन न खेंच
दो घड़ी आराम कर आहिस्ता चल

Share