शिवदयाल की रचनाएँ

तिनका

करने को
जब कुछ नहीं
तो कुतरते रहो
उसे मुँह में ले
कि भर जाए कुछ खालीपन ।

जब पंछी घोंसले में
सहेज कर रखते हैं उसे
तब उसमें
कितना होता है वज़न !

इतना रौंदे जाने के बाद भी
डूबने वाला
ढूँढ़ता है सहारा
एकमात्र उसका !

कैसा आश्चर्य है,
वह वहाँ है
जहाँ और कोई तारणहार नहीं !

यह ‘कुछ नहीं’ से
‘कुछ’ होने के दरम्यान
वह कहाँ रह जाता है
सिर्फ़ तिनका !

खरीदारी

डिपार्टमेंटल स्टोर में
आइटम पसंद आ जाने पर
उन्होंने सेल्समैन को
आदेश दिया – पैक कर दो!

काउंटर पर
पर्स हाथ में ले
उन्होंने मैनेजर से पूछा –
हाउ मच?

पेमेंट रिसीव कर
मैनेजर ने जब ‘थैंक्स’ कहा
तो मचलते हुए सामान उठाए
वे बाहर निकल आए ।

लौटते हुए
उन्होंने ख़रीदी तरकारी
और मोल-भाव कर
डेढ़ रुपए की बचत कर ली
साथ में गंदे नोटों के लिए
सब्ज़ी वाले को धिक्कारा ।

ऐन गली के नुक्कड़ पर
लड़के से फ़ी दर्जन अंडों पर
अठन्नी कम कराकर
इतराते हुए घर आ गए ।

उस दिन
ऐसे की उन्होंने ख़रीदारी
छोटे मुनाफ़ों में की हिस्सेदारी
और ख़ुश हुए!

खोज

रवीन्द्रनाथ को पढ़ते हुए…

उन्होंने बनाई मशीनें
मशीनों ने बनाए सामान
और सामान
आदमी बनाने लगे
-कुछ कृत्रिम आदमी
कुछ हल्के आदमी

कवियों ने इन आदमियों पर
लिखीं कविताएँ
कलाकारों ने कलाकृतियाँ बनाईं
दार्शनिकों ने सिद्धान्त-निरूपण किए

असल आदमी कहाँ रह गया
जिसमें स्वाभाविकता थी
जिसमें कुछ वज़न था
जो बिना दिखावे के
देने का धर्म निभाता था
जैसे कि सूरज, वृक्ष और नदियाँ
जिसकी आत्मा
विश्वप्रकृति के साथ थी एकाकार…
कहाँ रह गया?

हम सबको
सभ्यता की इस महानतम खोज में
जुट जाना चाहिए
-बिना दिखावे के

लेकिन इस अभियान में वही जुटे
जो दोनों तरह के आदमियों के बीच
फ़र्क कर सके,
भले ही वह
कवि-कलाकार-दार्शनिक न हो
वह चाहे कुछ
बनावटी और हल्का ही हो
लेकिन मौलिकता और आडम्बर के बीच
बख़ूबी भेद कर सके!

कवि ने लिखी कविता

कवि ने देखा
भीड़ वाली सड़क पर
बीचोंबीच गिरा पड़ा
एक अभावग्रस्त बीमार आदमी
और उससे नज़रें चुराते
कन्नी काटते गुज़र जाते लोग

और कवि ने लिखी कविता!

कवि ने देखा
वर्दीवालों से सरेआम पिटता
और अपने निर्दोष होने की
सफ़ाई देने की कोशिश करता
एक शख़्स

और कवि ने लिखी कविता!

कवि ने देखे
झगड़े-झंझट
दंगे-फसाद
लूटमार
अँधेरगर्दी और अनाचार…
और लिख डाली कितनी ही कविताएँ !

धन्य है कवि की कविताई
जो दिनोंदिन निखरती चली गई
धन्य है कवि का यश
जो चहुँओर फैलता चला गया

कवि ने
कवि होने का फ़र्ज़ निभाया
बाक़ी को
मनुष्य होने का धर्म निभाना था!

देखना 

देखो ऐसे
कि वह सबका देखना हो

अलग देखना
अलग तरह से देखना
अलग-अलग कर देता है
सब कुछ

वह समय
सबसे ख़राब रहा
जबकि तुमने वही देखा
जो तुमने देखना चाहा

क्योंकि तुम्हारा देखना
सबका देखना नहीं था

और सबका भोगना
तुम्हारा भोगना नहीं…

जिओ ऐसे
कि वह सबका जीना हो

धोखे में मौत

अपनी
अपने लोगों की
अपनी तरह की दुनिया
अपने ढंग से बनाने के लिए
अपनी तरह से
कितनी दुनियाओं को उजाड़ते हैं!

एक ऐसी दुनिया के लिए
जिसकी कि अभी कोई शक्ल नहीं
भरी-पूरी, बसी-बसाई दुनिया
किस कदर बेशक़्ल होती जाती हैं!

ज़िन्दगियाँ वहाँ ख़त्म की जाती हैं
जहाँ कि ज़िन्दगी की आरजू की जाती है
और वहाँ भी
कि जहाँ से ज़रा बचकर
निकलना चाहते हैं
ज़िन्दगी का सामान जुटाने की
जद्दोजहद करते
मेवाराम, हरनाम सिंह, रमजान मियाँ…

काश कि यह दुनिया ऐसी होती,
इतनी साफ़-सुथरी और सेहतमंद जगह
कि न कोई यहाँ अस्पताल होता
न कूड़ेदान
न ज़िन्दगी के धोखे में
मौत का और कोई सामान!

अकिल दाढ़

ठीक ही हुआ!
अकिल दाढ़
वाकई एक मुसीबत ही तो है।
गो कि उसके होने का पता
मुझे तब चला
जब उसे निकलवाने की
नौबत आ गई!

सुनता हूँ
सबसे बाद में
निकलती है अकिल दाढ़
जिसे डाक्टर कहते हैं –
विज्डम टूथ,
यानी विवेक दाँत
या कि प्रज्ञा दाँत ।

जैसे पेट में होता है
एक अपेन्डिक्स
जो याद दिलाता रहता है
कि हम कभी
घास खाते रहे होंगे
वैसे ही यह अकिल दाढ़
प्रमाण है कि कभी
हमारे पास भी
हुआ करती होगी
थोड़ी-बहुत अकल!

अब तो अकल का होना
सलामती को जैसे चुनौती देना है,
ख़तरे में डालना है।
बेअकल रहने से
जीना हो रहता है आसान
सब ओर होते हैं तब
यार ही यार
बाघ-बकरी सब एक घाट
सबके लिए बस एक हाट
गोया हरेक माल बारह आने!

उस अकेले, उटंग,
मिसफिट, इरिटेटिंग को
निकलवाना ही श्रेयस्कर था!
अब निश्चिंत हूँ कि
अगर बैल की तरह
दाँत गिनवाने की
नौबत आ भी जाए
तो हड़केंगे नहीं ख़रीदार!

आख़िर इस दुनिया में
जब अकल के लिए ही जगह नहीं
तो अकिल दाढ़ के लिए क्यों हो,
वह भी ऐन मेरे मुँह में?

नाम-पता

उड़ रही हैं हर तरफ़
सूचनाओं की चिन्दियाँ
जिसने जितनी कतरनें
जमा कर ली हैं
उतना ताक़तवर बन बैठा है।

धरती के दुखों-क्लेशों पर
सूचनाच्छादित आकाश
बरसा रहा है सूचनाएँ !

लोग मशगूल हैं
दूसरी चीज़ों, दूसरे लोगों के बारे में
जानकारियाँ जमा करने में,
अपने से बेख़बर
वे हो रहे हैं बाख़बर!

इस दौर में
जबकि दुनिया एक हो रही है
सब दिशाएँ मिल रही हैं
सब भेद-अभेद मिट रहे हैं
अच्छा रहेगा
कि अपना नाम-पता
तकिए के नीचे रखकर सोया जाए
क्या पता किस क्षण
ख़ुद की याद हो आए
और कोई दूसरा
हमें हमारी राह दिखाए!

Share