शिवदीन राम जोशी की रचनाएँ

कोऊ विधि मोहन का बन जाऊं

कोउ विधि मोहन का बन जाऊँ ।
मोहन मेरा मैं मोहन का, प्रेम से गुण नित गाऊँ ।
प्रेम नगर में उनके बस कर, उनसे दिल बहलाऊँ ।
प्रेम पंथ की गली -गली में, चलत चलत थक जाऊँ ।
मारग सरल बतादो आ कर, पग-पग पर घबराऊँ ।
उनके संग अंग सब राचूँ, निशदिन नेह बढ़ाऊँ ।
प्रकट दृष्टि में आवत नाहीं, कैसे करके पाऊँ ।
शिवदीन दया कर आजा मोहन, भव में मैं भरमाऊँ ।
नाव पुरानी भवसागर से , कैसे पार लगाऊँ ।

चलाचल मन तू ब्रिज की ओर 

चला चल मन तू ब्रज की ओर ।
जहां गोपियां राधा संग में, नांचे नन्दकिशोर ।।
वृन्दावन में कुंजगली है, तू मन सोची बात भली है ।
रास और महारास देखना, होकर प्रेम विभोर ।।
वहीं मिलेंगें श्याम सलौना, देख-देख सब कोना-कोना ।
श्यामा श्याम मिलेंगें दोनों, देखुंगा कर जोर ।।
मोर मुकुट धर पिताम्बर धर, जय-जय मोहन जय मुरलीधर ।
मोही एक डर लग रहा मनहर, कृष्णा है चित चोर।।
नन्दलाल ब्रजराज कन्हैया, पार लगाना मोरी नैया ।
कर्महीन शिवदीन दीन की, बिरियां आना दौर ।।

मोहन खेल रहे है होरी

मोहन खेल रहे है होरी ।
गुवाल बाल संग रंग अनेकों, धन्य-धन्य यह होरी ।
वो गुलाल राधे ले आई, मन मोहन पर ही बरसाई,
नन्दलाल भी लाल होगये, लाल-लाल वृज गौरी ।
गुवाल सखा सब चंग बजावें, कृष्ण संग में नाचें गावें,
ऐसी धूम मचाई कान्हा, मस्त मनोहर जोरी ।
नन्द महर घर रंग रँगीला,रंग-रंग से होगया पीला,
बहुत सजीली राधे रानी, वे अहिरों की छोरी ।
शोभा देख लुभाये शिवजी, सती सयानी के हैं पिवजी,
शिवदीन लखी होरी ये रंग में, रंग दई चादर मोरी ।

दारिद्र को जारन को नहीं आयो

अर्जुन दग्ध कियो वन खाण्डव,
जाय यो काज तो तुच्छ सरायो ।
केसरी पुत्र कछु न करी अहो !
स्वर्ण की लंक को जाय जरायो ।
त्रिभुवन नाथ मदन को जारि के,
लोक आनन्द को दूर दुरायो ।
सब जन के मन में ताप करे,
रे ! दारिद्र को जारन को नहीं आयो ।

बरसत मिहरा आया श्रावन

बरसत मिहरा आया श्रावन ।
अमृत बरसा, बरसत रिमझिम, धरा हो गई पावन ।
बादल उमड़ी घुमड़ी रंग छाये, मौर पपिहरा कोयल गाये,
चमकत बिजरी, परम मनोहर, श्रीराधे मन भावन ।
बंशीधर की बांसुरी बाजी, सुण-सुण गोप्यां हो गई राजी,
राधा प्रेम बलैयां लेवे, नांचत कृष्ण लुभावन ।
वन पहार हरे सघन हो गये, संत मुनि मन मगन हो गये,
अद्भुत छटा बहारें आई, रति पति लगे लजावन ।
कहे शिवदीन हुये सब सुखिया, ना कोई जग में रहा न दुखिया,
आनन्द प्रेम विभोर देवगण, गंद्रफ* लागे गावन ।

गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता

वेद पुराण गुरु छवूँ शास्त्र, राम रामायण सत्य है नाता ।
गीता का ज्ञान व ज्ञान गुरु, श्रुति न्याय व सूत्र गुरु समझाता ।
पृथ्वी जल और आकाश गुरु, चहूँ और गुरु ही गुरु दरसाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

धन्य गुरु बिन ज्ञान कहाँ, उर ध्यान कहाँ गुन को लखि पाता ।
गुरुदेव के चरण गहो मन रे, शरण रहो सन्मार्ग बताता ।
धन्य है धन्य वही जन धन्य है, जो गुरुदेव को नित्य रिझाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

राम गुरु श्रीकृष्ण गुरु, सर्वस्व गुरु धन हो पितु माता ।
श्रेष्ट गुरु सबसे तुम हीं, उर माहिं बसों सब तत्व के ज्ञाता ।
दरबार गुरु सब सार गुरु व बहार गुरु, गुरुदेव विधाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

स्वर्ग गुरु बैकुंठ गुरु ब्रिजधाम गुरु, चहुँ ओर लखता ।
गुरु हैं गुरु मेरा प्रेम गुरु, शुभ नेम गुरु उर माहिं सुहाता ।
अनुराग गुरु वैराग्य गुरु बड़ भाग्य गुरु, गुरु पाठ पढ़ता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

गुरु ब्रह्म हैं ब्रह्मा हैं विष्णु गुरु, शिव सत्य स्वरूप है सृष्टि रचाता ।
सुर संत फनिन्द्र मुनीन्द्र गुरु ,रवि चन्द्र वही कोउ पार न पाता ।
सर्वज्ञ अनन्त अखंड गुरु, गुरु ज्ञान की ज्योति हृदय में जगाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

शेष महेश गणेश दिनेश हटा भ्रम सत्य स्वरूप लाखता ।
भव पार लगावनहार गुरु, जय सत्य गुरु लखि भाग्य सराता ।
रंक से राव बने पल में, गुणगान यहि विधि से कोउ गाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

शत-शत बार प्रणाम करूँ, गुरु दीन जनों के हो भाग्य विधाता ।
पापिन के उद्धारक हो तुम, ज्ञान समुन्दर ज्ञान के दाता
हे गुरुदेव दयामय प्रेम दे, प्यार अनुपम आपसे पाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा, गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता ।

शेष महेश गणेश थके वह धन्य दिनेश थके थकि जाता ।
सारद बीन बजाय थके ऋषि नारद इन्द्र अमि बरसाता ।
बलिहारी गुरु गुन गाय़ रहे नर नाग कवि कोउ पार न पाता ।
शिवदीन निरंतर ध्यान लगा , गुरु गोविन्द के सम कौन है दाता

दुःख दर्द का साथी दुनिया में

दुःख दर्द का साथी दुनिया में, देखा कोई यार नहीं मिलता |
हैं सुख के साथी बहुतेरे, उनसे कोई सार नहीं मिलता ||

सहना है दर्द अकेले ही, कहना है किसको जाकर के |
कुछ रहे यार मुसकाकर के, कुछ समय बितायें गाकर के |
शिवदीन जगत को देख लिया, कोई दिलदार नहीं मिलता ||

इसलिए शरण प्रभु की होना, सतसंग से पाप सकल धोना |
संतन के संग उमंग सदा, पर ये बाजार नहीं मिलाता ||

सतसंग बिना ना रंग चढ़े

सतसंग बिना ना रंग चढ़े,
बिन रंग चढ़े ना भक्ति मिले रे |
भक्ति मिले बिन राम न रीझत,
राम बिना नहीं फूल खिले रे |
फूल खिले बिन धूल ही है,
मन भाग्य फटा वह कैसे सिले रे |
शिवदीन यकीन करो उर में,
शुभ संत कृपा गिरिराज हिले रे |

रे रंग डारि दियो राधा पर 

रे रंग डारि दियो राधा पर, प्यारा प्रेमी कृष्ण गोपाल |
तन मन भीगा अंग-अंग भीगा, राधा हुई निहाल || रे…
गोप्या रंग रंगीली रंग में, ग्वाल सखा कान्हा के संग में |
चंग बजावे रसिया गावे, गांवें राग धमाल || रे….
श्यामा श्याम यमुन तट साजे, मधुर अनुपम बाजा बाजे |
रंग भरी पिचकारी मारे, हँसे सभी ब्रिजबाल || रे…
मोर मुकुट पीताम्बर वारा, निरखे गोप्यां रूप तिहारा |
राधा कृष्ण मनोहर जोड़ी, काटत जग जंजाल || रे…
शिवदीन रंगमय बादल छाया, मनमोहन प्रभू रंग रचाया |
गुण गावां गावां गुण कृष्णा, मोहे बरषाने ले चाल || रे…

रिद्धी सिद्धी,गजानन्द के संग 

रिद्धी सिद्धी, गजानन्द के संग |
प्रथम गणेश मनावें प्राणी, चढ़े भक्ति का रंग || रिद्धी….
अन धन लाभ लक्ष्मी घर आवे, श्री गणपति का गुणगन गावे |
च्यार पदारथ पावे मानव, जीत जाय जग जंग || रिद्धी…
माता पारवती है जांकी, महिमा कथी न जाये वांकी |
महिमा वाले शिवसंभु जी पीवे नित प्रति भंग || रिद्धी…
कहे शिवदीन गजानन्द ध्यावां, गणपति चौथ नाथ गुणगावां |
धन्य पिता शिवजी से थारे, मस्तक साजे गंग || रिद्धी…
जटा जूट की शोभा न्यारी, गणेश जाने विद्या सारी |
गावें गुण गणपति के सब ही, हिला हिला कर अंग || रिद्धी…

मोही तो भरोसो है

मोहि तो भरोसो है, भरोसो हनुमान को

आपनूं ही दास जानि, मेटो दुःख दर्द गम |
मोहि तो भरोसो है, भरोसो हनुमान को || मोहि …
ज्ञान के निधान गुनी, गुनवान बिरबली |
किये काज रामजी के आपके समान को || मोहि…
एक हांक मारके जलाई लंक रावन की |
कछु अभिमान नहीं काम ना गुमान को || मोहि…
पूजत सकल जग देव सनमान करें |
ऐसो बलवान नाम रटू गुणवान को || मोहि…
दीनन के दुःख हरे संतन के काज करे |
कहूँ से ना डरे आप जानत जहान को || मोहि…
पायक हो रामजी के लायक हो बालासाब |
अंजनी के लाल हो सपूत सत्य ध्यान को || मोहि …
जय-जय हनुमंत पंथ सारे ही सुपंथ |
आप सिवा कौन और जान पहचान को || मोहि…
केसरी के नंदन को वंदन हमेस करूं |
चन्दन सुगंध गंध गुण ज्ञान खान को || मोहि…
मेरी बेर देर क्यों है विनती सुनो तो मेरी |
भक्ति दान देवो मोहे थाम के उडान को || मोहि…
काम क्रोध लोभ मोह मद हूँ का नाश करो |
एक फूंक मार दूर करिहो तूफ़ान को || मोहि…
विनय शिवदीन दीन, हाथ जोर-जोर करे |
करि हो प्रकाश उर जैसे चाँद भान को || मोहि…
जानू नहीं हूँ अज्ञान, मैं तो हूँ गरीब नाथ |
आप जानो बलवंत लाभ और हान को || मोहि…

घन गरजत बरसत है मिहरा

घन गरजत बरसत है मिहरा
बिजरी चमके डर मोहि लागे, प्यारा लगेरी मिहरा
दादुर मोर पपिहरा बोले, आम की डाल कोयालियाँ बोले
पिहू-पिहू सबद सुनो श्रवनन से, मानत ना सखी ये मिहरा
सोय रही रतियाँ अंधियारी, नींद उड़ी नैनन ते प्यारी
मोरे श्याम श्याम ना घर पर, सोयी जगावत ये मिहरा
कहूँ किसे मन ना सखी लागे, बिरहनि रैनन में नित जागे
कहे शिवदीन राधिका अेकली, क्यूँ बरसत है ये मिहरा
आ नंदलाल पार रही हेला, मैं अलबेली तू अलबेला
आजा तपन बुझा जा मन की, देखूँ बरसे ये मिहरा

गुरु चरणों में

चरन धूर निज सिर धरो, सरन गुरु की लेय,
तीन लोक की सम्पदा, सहज ही में गुरु देय |
सहज ही में गुरु देय चित्त में हर्ष घनेरा ,
शिवदीन मिले फल मोक्ष, हटे अज्ञान अँधेरा |
ज्ञान भक्ति गुरु से मिले, मिले न दूजी ठौर,
याते गुरु गोविन्द भज, होकर प्रेम विभोर |
राम गुण गायरे ||

और न कोई दे सके, ज्ञान भक्ति गुरु देय,
शिवदीन धन्य दाता गुरु, बदले ना कछु लेय |
बदले ना कछु लेय कीजिये गुरु की सेवा,
जन्मा जन्म बहार, गुरु देवन के देवा |
गुरु समान तिहूँ लोक में,ना कोई दानी जान,
गुरु शरण शरणागति, राखिहैं गुरु भगवान |
राम गुण गायरे ||

समरथ गुरु गोविन्दजी, और ना समरथ कोय,
इक पल में, पल पलक में, ज्ञान दीप दें जोय |
ज्ञान दीप दें जोय भक्ति वर दायक गुरुवर,
गुरु समुद्र भगवन, सत्य गुरु मानसरोवर |
शिवदीन रटे गुरु नाम है,गुरुवर गुण की खानि,
गुरु चन्दा सम सीतल, तेज भानु सम जानि |
राम गुण गायरे ||

रंग बरसे, मोहन मतवारा

रंग बरसे, मोहन मतवारा |
राधा घूम-घूम कर नाचें निरखे मोहन प्यारा ||
भर-भर कर रंग की पिचकारी,ताकि ताक छोड़े गिरधारी |
राधे रानी डटी सामने, भीग गया तन सारा || रंग बरसे ….
साड़ी राधे पहनी ऐसी, क्या बतलावे थी वो कैसी |
साड़ी चिपकी अंग से ऐसे, दिखे गोरा कारा || रंग बरसे …
गोप्यां माची अद्भुत नाची, मोहन के रंग में वह राची |
बलदाऊ को पकर छविली, सारा बदन उघारा || रंग बरसे ..
हँसने लागे गुवाल-बाल जी, शिवदीन देख रहा होली हाल जी |
एक से एक रंगीले ब्रिज जन, रंग की बह रही धारा || रंग बरसे ..

यारी के घर दूर

यारी के घर दूर-दूर हैं, यारी के घर दूर |
रस्ते में खड्डे हैं गहरे, पड़े से चकनाचूर || यारी…
मंजिल यारी की जो चावे, संत शरण में वह नर आवे,
शरणागत की लज्जा राखें, मंजिल मिले जरुर || यारी…
अनगिनती नर मरे मर गये, देखा रस्ता यार डर गये,
यार की मंजिल प्यार से पाई, चमका उनका नूर || यारी…
कई एक झूठे कायर डोलें, शुरू शुरू में प्यार से बोले,
स्वारथ रत बेईमानों के सिर, पड़ जाती है धूर || यारी…
कहे शिवदीन राम भज अंधे, सच्चे मंजिल पाये बन्दे,
झूटे मजनूं बन-बन डोले, करते बहुत गरूर || यारी…

विनय करहूँ कर जौर

विनय करहूँ कर जोर |
लाज की जहाज डूब ना जाये सुनियो नंदकिशोर ||
है तूफान सागर में प्यारे, नैया के पतवार हमारे |
तुम बिन रक्षा कौन करे प्रभु, ना कोई रक्षक और ||
धीरज छूटा जय संवारा, आजा लाज बचाय संवारा |
शरणागत शिवदीन पुकारे, होकर प्रेम विभोर ||
कृपा संत की चल रही नौका,आया नाथ हवा का झौका |
नैया डगमग – डगमग करती, ना चाले मेरा जौर ||
दिल में चित्र आपका साधू, धन्य – धन्य है मता अगाधू |
बैठ गरुड़ पर आवो भगवन, आवो बेगा दौर ||

रामावतार की मूल कथा

श्री गुरु चरण पखारिहूँ उर में प्रेम बढ़ाय |
पूज्य गणपति नमन हूँ, शिव शारद पुनि ध्याय ||
श्री सुमेरुदास जी संत को बंदऊँ बारंबार |
समरथ सिद्ध सुहावने ईश्वर के अवतार ||
अक्षर दो कोऊ प्रेम से राम नाम ले जान |
मूल मन्त्र ये ही सुनहु गावें वेद-पुराण ||

कथा रामावतार की वर्णन करूं विचार |
ता सुन के प्राणी सकल होवे भाव से पार ||

नृप खट्वांग के वंश में थे जो दशरथ भूप |
तेजवान धर्मज्ञ अरु सब गुण रूप अनूप ||
अयोध्या पुरी सुहावनी तहँ जन्मे श्रीराम |
दशरथ सुत हो अवतरे परब्रह्म सुख धाम ||

शेषावतार लक्ष्मण जी का उन सहित राम रघुनायक थे,
ऋषि विश्वामित्र के संग वो ही तो यज्ञ सहायक थे |
मारीच सुबाहु को मारा भगवन राम ने बचपन में,
मख की रखवारी करी वहां विकत भयंकर कानन में |
श्री गुरु के साथ जनकपुर में जाकर शिव-धनु खंडन कीना,
क्षण में धनु तोरी वरी सीता परशुराम मद मर्दन कीना |
आज्ञा पितु की प्रभु शीश धरी तनिक न चित्त उदास किया,
श्री राम लखन सीताजी ने दस चार बरष बनवास लिया |

पंचवटी में आय प्रभु ने पर्ण कुटी में वास किया |
सुर्पणखां का नाक काट असुरी के मद का नाश किया ||
खरदूषण त्रिसिरा आ पहुंचे सेना असुरों की साथ लिये |
पल में संहार अरि दल को धनुष बाण प्रभु हाथ लिये ||
यह समाचार सुन रावन ने कपटी योगी का वेष किया |
मारीच को मारण गये राम पीछे से छल कर हरी सिया ||
मारग में गीध जटायु ने लंकापती को ललकार दिया |
संग्राम हुआ अतिशय भारी रावन ने गीध परास्त किया ||
सागर पार पुरी लंका हर लाया रावन सीता को |
अशोक वाटिका में रक्खा जग जननी परम पुनीता को ||
माया के मृग को मार शीघ्र राम वापस आये |
कुटिया प्रभु ने सूनी देखी प्रिय सीताजी न वहां पाये ||
नर तन धारण करने से स्वामी ने बिलख विलाप किया |
चले सिया संधान प्रभु मारग में गीध मिलाप किया ||
कहा जटायु ने प्रभु से रावन ने सीता हरण किया |
परम भक्त प्रिय जान उसे रघुवर ने आपनी शरण लिया ||
संस्कार सब कर प्रभु ने गीध को भव से तारा है,
पुनि आगे जाकर रघुबर ने कबन्ध राक्षस मारा है |
सुग्रीव संग मित्रता की सब तरह उसे सुख साज दिया,
मारा बाली निज मित्र हेतु अरू किस्कंधा का राज दिया |
सीताजी की सुधी लेने को कपि भालू चतुर्दिक फ़ैल गये,
हनुमान वीर गये लंका में राक्षस गण कपि से दहल गये |
जाकर के सीता सुधी लीनी लंका में आग लगा दीनी,
जितने वहां राक्षस योद्धा थे सबकी शक्ति हनु हर लीनी |
कुशलानंद सीता की कही कपि सुत ने प्रभु से आकर,
लंका पर शीघ्र चढ़ाई की श्रीराम ने कपि भालू लेकर |
नल-नील आदि योद्धाओं को प्रभु ने आदेश सुनाया है,
पार किनारे जाने को वारिद पर सेतु बंधाया है |
भ्रात विभीषण रावण का रघुवीर की शरण में आया है,
लंका का राज दिया उसको निज हाथ से तिलक लगाया है |
उसी सेतु की राह राम ने लंका को घेर लिया जाकर,
कपि भालू शस्त्र सजीले थे श्री राम कृपा का बल पाकर |

लक्ष्मण अरु सुग्रीव कपि हनुमान होय क्रुद्ध |
अंगदादि नल-नील सब कर करने लगे महायुद्ध ||

महा बलि योद्धाओं ने अति घोर विकट संग्राम किया |
राक्षस केते मार-मार वीरों ने अपना नाम किया ||
इन्द्रजीत अरु कुम्भकरण रण सन्मुख जाय लडाई की |
पुनि इनके मारे जाने पर रावन ने स्वयं चढ़ाई की ||
श्री रामचंद्र ने रावन के हृदय में अग्नि बाण दिया |
अंत समय श्रीराम नाम ले रावन ने अपना प्राण दिया ||
उसे मुक्ति पद दे प्रभु ने दिना राज विभीषण को |
सिंहासन पर बैठाय उसे पाला प्रभु ने अपने प्रण को ||
सुखपाल में सीताजी को ले जब भक्त विभीषण आता था |
भालू वानर सबका ही मन तब दर्शन को ललचाता था ||
रघुनायक अन्तर्यामी ने उन सबके मन को जान लिया |
सबके दर्शन हित पदगामी सीताजी का आव्हान किया ||
श्रीराम चरण गहे सिया ने प्रभु मिले सिया से हर्षाकर |
बानर भालू सब सुखी हुये सीताजी के दर्शन पाकर ||
चरणों में गिरकर सीता के लक्ष्मणजी ने प्रणाम किया |
आनंद से अति हरष-हरष सीता ने आशीर्वाद दिया ||
पुष्य विमान में बैठ कर हर्ष चले रघुनाथ |
हनुमदादि सेनापति सीता को ले साथ ||
तीन दिवस में प्रयाग राज आकर प्रभु बोले योद्धा को |
संदेश भारत को शीघ्र ही दो जावो हनुमान अयोध्या को ||
भगवान राम की आज्ञा ले जाकर संदेश सुनाया है |
सुना भारत ने प्रभु आये उर में आनंद समाया है ||
गुरु वशिष्ठ अरु पुरवासी आनंद से लेने आये है |
हर्षित चित मन मुदित भरत चरणों में शीश झुकाये है ||
श्रीराम परे गुरु चरणों में विनय सहित प्रणाम किया |
पुनि भ्रात भरत को गले लगा शत्रुघ्न को विश्राम दिया ||
अनेक वाहनों पर बैठे श्रीराम अयोध्या आय रहे |
भगवान राम की जय बोलो सुर सकल पुष्प बरसाय रहे ||
सीता सहित राज मंदिर में लक्षमण राम पधारे है |
जननी के चरण परे भगवन् रघुकुल के राम उजियारे है ||
गुरु वशिष्ठ की आज्ञा ले श्रीराम विराजे आसन पर |
शुभ मुहूर्त में प्रभु रामचंद्र बैठे राज सिंहासन पर ||
यह मूल पाठ करने से जन सद् आनंद को भी पा जाता |
धन धान्य मिले सुख भोग सभी अरु अंत अमर पुर को जाता ||
रामावतार की मूल कथा कह सुन कर आनंद पते है |
शिवदीन सदा सत्संगी जन गुण राम प्रभु के गाते है ||
सहस्त्र पाठ जो नर करे तां पर राजी राम |
आनंद मंगल सुख लहे पूर्ण होय सब काम ||

आई शुभ वसंत 

आनन्द-उमंग रंग, भक्ति-रंग रंग रंगी,
एहो ! अनुराग सत्य उर में जगावनी |
ज्ञान वैराग्य वृक्ष लता पता चारों फल,
प्रेम पुष्प वाटिका सुन्दर सजवानी |
सत्संगी समझदार, देखो यह बहार बनी,
अमृत की वर्षा सरस आनन्द बरसवानी |
कहता शिवदीन बेल छाई उर छाई-छाई,
आई शुभ बसंत संत संतन मन भावनी |

यमुना जल भरन गई

यमुना जल भरन गई अहीरों की छोरी संग,
राधिका रसीली फँसी कृष्ण श्याम कारे से |
ता दिन से एको पल बिसरत ना सूरत वह,
लरे नैन मेरे नैन नैन मतवारे से |
कहा करूं जाऊ कहाँ कौन सुने बात मेरी,
मोकू मिलवाय दे नेक नीक प्राण-प्यारे से |
कहता शिवदीन अहो ! बसों चाल वृन्दावन,
मन मोहन मिलेंगें मोही यमुना के किनारे से |

वसंत रंग छायो है

आनन्द की लहर-लहर लहराई सजीली सखी,
वृन्दावन गोपाल लाल मेरो मन लुभायो है |
श्यामा के संग-संग रंगीलो सयानो श्याम,
सुबरन के स्वर्ण कलश रंग घोल लायो है |
शिवदीन कहे धन्य-धन्य वृजराज राज राजेश्वर,
धन्य संत साधू सत्य गोविन्द गुण गायो है |
सुन्दर ऋतुराज आयो सबही ने सरायो ईन्हे,
मगन भये संत यो बसंत रंग छायो है |


Share