शिवदीन राम जोशी की रचनाएँ

कृष्ण सुदामा चरित्र 

बन्दहुँ राम जो पूरण ब्रह्म है, वे ही त्रिलोकी के ईश कहावें।
श्रीगुरु! राह कृपामय हो, हम पे नज़रें गुण को नित गावें॥
शारद शेष महेश नमो, बलिहारी गणेश हमेश मनावें।
बुद्धि प्रकाश करो घट भीतर, कृष्ण-सुदामा चरित्र बनावें॥

राम-राम जप बावरे साधन यही विवेक।
इस साधन की ओट से तर गए भक्त अनेक॥
परम सनेही राम प्रिय सुप्रिय गुरु महाराज।
चरन परहुँ कर जोर कर वन्दहुँ संत समाज॥
प्रभु चरित्र में चित्त रचे जन्म जन्म यहि काम।
भक्ति सदा सतसंग उर कृपा करहुँ श्रीराम॥
बंदहूँ शंकर-सुत हरखि मंगल मयी महेश।
सकल सृष्टि पूजन करे तुमरी सदा गणेश॥
नमन करत हूँ शारदा सकल गुणन की खान
नमहूँ सुकवि पुनि देव सब चरन कमल को ध्यान॥
प्रभु चरित्र आनन्द अति रुचिकर करहूँ बखान।
जाही सुने चित देय नर पावत पद निर्वाण॥

लिखूं सुदामा की कथा यथा बुद्धि है मोर।
करहूँ कृपा शिवदीन पर नागर नन्द किशोर॥

कृष्ण सुदामा चरित्र

भक्त सुदामा ब्रह्मण थे,
रहते थे देश विदर्भ नगर,
मीत प्रभु के सच्चे थे,
पत्नि भी पतिव्रता थी घर |
कुछ किस्सा उनका बयां करू,
छांया दारिद्र की घर पर थी,
वो भगवत रूप परायण थे,
आशा उन्हीं पर निर्भर थी |
थी बुद्धिमती पतिव्रता वाम,
गुणवान चतुर सुन्दर नारी,
पति इच्छा अनुकूल चले,
थी श्रीपति को अतिशय प्यारी |
वो दुःख सुख सभी भोगती थी,
पर बात न जिह्वा पर आती,
नित मीठे बैन बोलती थी,
नहीं ध्यान बुरा दिल पर लाती |

पति -पत्नी वार्ता

इक रोज कहा कर जोर दोऊ,
पति भूख से प्राण निकलते हैं,
छोटे-छोटे छौना मोरे,
बिन अन जल के कर मलते हैं |
यह दशा देख अकुलाय रही,
नहीं बच्चों को भी रोटी है,
रह सकते नहीं प्राण इनके,
अति कोमल है,वय छोटी हैं |
इसलिए कृपा कर प्राणनाथ,
तुम नमन करो अविनाशी को,
मत करो देर, बस जाय कहो,
सब हाल द्वारिका वासी को |

कृष्ण सुदामा चरित्र

वह सखा आपके प्रेमी हैं,
देखत ही सनमान करें,
सब दूर व्यथा हो जावेगी,
कर कृपा तुम्हे धनवान करें |
बतियाँ पत्नि की सुनी ब्राह्मण,
भयभीत हुआ घबराय गया,
बोल व्यथा के सुन श्रवणा,
चुप चाप रहा बोला न गया |
कुछ देर बाद समझाने को,
बोला तू सच तो कहती है,
मगर हुआ क्या आज प्रिये,
हर रोज हरष से रहती है |
ये अश्रु बिंदु किसलिए आज,
दुखमयी बात क्यों बोल रही,
क्यों तुली कोटि पर माया की,
शुभ सुखद ज्ञान को तोल रही |
हैं कृष्ण सखा मेरे प्रेमी,
धन लाने को कैसे जाऊं,
निष्काम भक्ति की अब तक तो,
किस भांति स्वार्थ अब अपनाऊँ |
है दूर द्वारिका पास नहीं,
मैं वृद्ध हुआ अकुलाता हूँ,
मग चलने की सामर्थ्य नहीं,
इसलिए तुझे समझाता हूँ |
है दया देव की अपने पर,
इसलिए नहीं धनवान किया,
सात्विक भाव ही रहा सदा,
प्रिय दिल में कब अरमान किया |

कृष्ण सुदामा चरित्र

केते ही प्रवीण फँसे माया के दल-दल में ,
ऐसा है विचित्र जाल भेद हूँ न पता है |
स्त्री और बाल बच्चे धाम धान संवार राखे ,
एते नष्ट होते कष्ट दिल में उठता है |
ऐसी यह माया, तासे बिगर जात काया,
लाखों भरमाया ऐसा झूंठ व्यर्थ नाता है |
कहता सुदामा प्रिय राम-कृष्ण राम भजो,
आनन्द ले सच्चा विप्र जो गोविन्द गुण गाता है |

अपना ना कोई प्रिया सुन री दे ध्यान चित्त,
संसार ये असार तामे झूठा ही नाता है |
स्वार्थ के मीत देख ना माने , कर प्रीत देख,
ऐसे सब मात-तात जात व्यर्थ भ्राता है |
सुत और दारा देख प्यारा से भी प्यारा देख,
सारा ही पसारा देख द्वन्द सा दिखता है |
कहता सुदामा तन धन अरु धाम झूठा ,
सच्चा तो वाही विप्र गोविन्द गुण गाता है |

बेर-बेर समझाव हूँ, आवत नहीं यकीन |
माया में फँस-फँस मरे , केते चतुर प्रवीण ||

है खान अवगुणों की माया,
हरि सुमरिण को भुलवाती है,
कहती है लाने को उसको,
घर बैठे व्याधि लगाती है |
माया वाले अंधे होकर,
नहीं सुमरिन जाप किया करते,
सत्कर्मों से रह दूर सदा,
मन माना पाप किया करते |
ऐ प्रिया इसी से बिता रहा,
यह समय प्रभु गुण गा-गा के,
अब हँसी बुढ़ापे में होगी,
माँगुगा द्रव्य वहाँ जाके |

कृष्ण सुदामा चरित्र

सत्य विचार कहूँ सुनारी प्रिय यो जग झूठ मुझे हरसावे |
प्रीति बिना परमेश्वर के धृक है धन जो धनवान कहावे ||
धन्य उन्हें धन राम अमूल्य की खोज लगा कर मौज उडावे |
ऐ प्रिय तू मति मोय कहे कछु कृष्ण बिना नहीं चैन लखावे ||

भक्त वही भगवान भजे धन दौलत पाय न राम भुलावे |
दान करे सनमान करे नर संतन को निज शीश झुकावे ||
मन्दिर बाग़ तड़ाग बनाकर जीवन को जग माही बितावे||
ऐ प्रिय तू मति मोय कहे कछु कृष्ण बिना नहीं चैन लखावे ||

पति देव विनती करहुँ मान लेहु मम बात |
दुःख संकट सब टारी हैं वह त्रिभुवन के नाथ ||

स्वामी ने सब ठीक कहा,
जो हाल द्रव्य के होते हैं,
है दिल में दर्द यही मेरे,
जब भूखे बच्चे सोते हैं |
है हाल वही पति जागने पर,
जो हाल काल में है गुजरा,
हर रोज नहीं देखा जाता,
गम खाली से यह पेट भरा |
जाओ जल्दी देरी न करो,
वह दीनानाथ कहाते हैं,
भक्तों के हितकारी बन,
बिगरी को शीघ्र बनाते है |
तुम धन के हित सकुचाते हो,
दर्शन हित ही तो जाओ,
बिन मांगे ही दे देंवेगे,
द्रव्य लेकर नाथ शीघ्र आओ |
प्रसन्न चित्त से सेवा कर,
नित गोविन्द के गुन गाऊँगी,
तुम कृष्ण चन्द्र के गुन गाना,
सेवा कर प्रभु रिझऊँगी |

कृष्ण सुदामा चरित्र 

आप विचार कियो अति सुन्दर मोर विचारन को उर धारो,
मैं कर जोर करूँ विनती पति कृष्ण सखा निज मीत तिहारो |
जाय मिलो अरु हाल कहो अति कष्ट करे दुःख दैन्य हत्यारो,
ये सब बात विचार पति अब कृष्णपुरी तुम शीघ्र सिधारो |

मान करे मिलते ही मन-मोहन दूर करें विपदा दुःख थारो,
दौलत पाय भजो हरि को पति जीवन को फल नेक विचारो |
बात कहूँ फिर नाथ यही हरि दर्शन से यह जन्म सुधारो,
दूर न है कबहूं वह ग्राम बसे मन मोहन नन्द दुलारों |

भक्त सुदामा ने कहा, सुनरी बावरी वाम|
झूठा मंगू द्रव्य क्या, निर्धन का धन राम ||

मानस को तन है तो, मन करके भजो ईश,
अकारण दयालु दाता, सदा शुभकारी है |
श्रद्धा अरु भक्ति से, शक्ति कर अमोघ पैदा,
अनुभव को मार्ग सत्य, मिथ्या संसारी है |
पूर्व जन्म पुण्यहूँ से, मार्ग सुमार्ग मिले,
जन्म-जन्मान्तर की बिगरी सुधारी है |
कहता है सुदामा प्रभु ही प्रतिपाल करे,
उनही को सत्य प्रिया गावे वेद चारि हैं |

जड़ अरु चेतन में प्रभु का प्रकाश प्रिये,
मानव विचित्र खूब बुद्धि के बनाये हैं |
केते हैं भक्त योगी योग में तल्लीन रहते,
केते ही अफंडी बन दुनियां में आये हैं |
केते हैं शरीफ सज्जन जन सुशील शील,
केते ही मानव शुद्ध कृष्ण गुण गए हैं |
कहता सुदामा प्रिये राम-कृष्ण भजे सार,
बात यह विचारि देख वेही सुख पाए हैं |

कृष्ण सुदामा चरित्र

जो कयम चीज नहीं रहती,
उस चीज का मांगना वाम वृथा,
जीवन मेरा तो भगवत है,
धन माल और आराम वृथा ।
सब समय हमारा बीत गया,
यह चौथापन भी आन चला,
श्रीराम कृष्ण रट मगन रहा,
दुःख सुख का मुझे पता न चला ।

अब जाने तू कहती है,
जाऊँ कैसे सुन प्राण प्रिया,
वहाँ जाकर भेंट करूँगा क्या,
कैसे होगी पह्चान प्रिया ।
अव्वल तो जाना है मुश्किल,
जाने को जो तू कहती है,
जाऊं तो क्या भेंट करूं,
मन शङ्का ये ही रहती है ।
सेना गजरथ घोडे भृत्य,
कितने लाख सवार वहां,
हैं राजा कृष्ण्चन्द्र प्यारी,
होता है नित दरबार वहां ।
न जाने कौन महल होगा,
सिहांसन कृष्ण मुरारी का,
शायद पहचाने न प्रभु,
यह मेरा वेश भिखारी का ।
मैं खाली हाथ न जाऊंगा,
भेजो तो भेंट तैयर करो,
ले आवो मांग किसी से कुछ,
झट लावो नहीं अबेर करो ।

कृष्ण सुदामा चरित्र 

गुरु साधु नृप के यहाँ शुद्ध भेंट ले जाय ।
दर्शन करने को प्रिया खाली हाथ न जाय ॥
प्रफुलित चित मन मुदित हो पति वचन उर धार |
ले आई कछु माँग कर चावल मुठ्ठी चार ||

चार परोसन से चावल,
लाकर बोली न अबेर करो,
कह देना हम कंगालों की,
प्रभु भेंट यही स्वीकार करो |
वह दीन दयालु राम कृष्ण,
उत्तर प्रसन्न चित्त देवेंगे,
यह सूक्ष्म भेंट ग़रीबों की,
वह हँसी खुशी से लेवेंगे |
हैं भक्त जनों के ही भगवत,
प्यारे हैं संत महात्मा के,
तुम्हरे वह बाल सखा प्रेमी,
तुम परम भक्त परमात्मा के |
दर्शन से उनके बड़े बड़े,
जन पापी भी उद्धार हुए,
प्रेमी जिनके बन बन कर,
नर भवसागर से पर हुए |

== प्रस्थान और राह में चिन्तन ==

लोटा डोरी कंधे पर धार,
कर चले स्मरण गजानन्द का,
दिल लगन लगी हरि दर्शन की,
कछु पार न था उस आनन्द का |
मारग में यहीं विचारते थे,
न द्रव्य लिखा है ललाट मेरे,
जन्म सुधर जावेगा जब,
देखूंगा कृष्ण मुरार मेरे |

कृष्ण सुदामा चरित्र

चित्त में चिन्ता है एक यही,
वहाँ जाने देगा कौन मुझे,
मेरे दिल के अनुरागों को,
वहाँ गाने देगा कौन मुझे |
जहाँ दरबानों से भूप बड़े,
जाने की अर्जी लगाते हैं,
खड़े रहे घन्टों ही तक,
मुश्किल से मौका पाते हैं |
वहाँ कौन मुझे जाने देगा,
कंगाल दीन दुखियारे को,
मैं कैसे हाल सुनाऊंगा,
उस मोहन मुरली वारे को |
कौन करेगा खबर मेरी,
यह हालत देख दीवाने की,
ठीक नहीं जचती दिल में,
अब लज्जावश घर जाने की |

विप्र सोचता राह में चलता रहा हमेश |
जा पहुँचा कछु काल में पुरी द्वारिका देश ||

== द्वारिका वर्णन ==

बिल्लोर के स्थान बने सुन्दर,
उत्तम दिखलाई देते थे,
सुनहले जटित रत्नों से थे,
मन लुभा लुभा हर लेते थे |
द्वारों पर मोती सटे हुए,
वहाँ बंधी झालरें लहराती,
किले पर रंग बिरंगी सुन्दर,
ध्वजा पताका फहराती |
महलों के छज्जे छज्जे पर,
ताख झरोखे में बोले,
तोते और कबूतर कोयल,
मधुर मधुर हौले हौले |

कृष्ण सुदामा चरित्र

थी नगर गली सड़कें सुन्दर,
सब जन के मन चित चाव रहा,
गुलाब जल सब जगह सुगंधित,
चन्दन का छिड़काव रहा |
दीवार चमकती महलों की,
मुख दिखलाई देता था,
धन्य द्वारिका देखा जिसने,
अदभुत आनन्द लेता था |
सुन्दर सुन्दर कई बाग वहाँ,
और नगर चहुँ ओर रहे,
उनमें रंग बिरंगे खिलते,
फूल फूल चित चोर रहे |
तरह तरह के फल फूलों से,
बाग बगीचे सुन्दर थे,
कुण्डों में निर्मल नीर भरा,
कई एक वहाँ पर मंदिर थे |
तड़ाग बावली कुण्डों में,
था साफ मधुर शीतल पानी,
आते देव सकल नहाने,
वहाँ और कई ज्ञानी ध्यानी ।
आस पास वारिद की लहरें,
पानी की लहर निराली थी,
हरे भरे सब वृक्ष खड़े,
वहाँ चहुँ ओर हरियाली थी |
कहीं नहर नदी तालाब भरे,
कहीं कहीं पर झरना झरते थे,
कोकिल शुक शिखी सारिका,
कहीं मीठे बैन उचरते थे |
कहीं बाग भरा फूलों से था,
सरसब्ज छटा दिखलाती थी,
कहीं अमोलक हंस हंसिनी,
कोयल गाना गाती थी |

कृष्ण सुदामा चरित्र 

कहीं हो रहा हरि कीर्तन,
कृष्ण कृष्ण गुण गाते थे,
कहीं देवता ब्राह्मण पण्डित,
गीता का रहस्य सुनते थे |
कहीं वेद ध्वनि सुन पड़ती थी,
कहीं मनहर साज सजाते थे,
कहीं भक्त जय बोल बोलकर,
आनन्द उर न समाते थे |
कहीं नारियां मंगल गा के,
अद्भुत दृश्य दिखाती थी,
बड़ी मनोहर वाणी उनकी,
कृष्ण कृष्ण गुन गाती थी |
कहीं मोर नाचते खुश होकर,
कहीं सारस जोड़ा खड़ा हुआ,
कहीं स्वर्ण की सड़कें सुन्दर थी,
था हीरा पन्ना जड़ा हुआ |
जारी बारी और झरोखा,
अद्भुत महल दीखते थे,
उनमें रहने वाले प्रेमी,
पाठ प्रेम का सीखते थे |
हर घट भक्ति बिराज रही,
छाय रही हरि प्रेम घटा,
कोई आनन्द से कृष्ण कहे,
कोई बोले प्रभु हैं ऊँची अटा |
सभी सुखी जन रहते थे,
कौन करे वहाँ का वर्णन,
आनन्द अनोखा देख विप्र,
कहता था मुख से धन्य धन्य |

कृष्ण सुदामा चरित्र 

सुन्दर रम्य मनोरम मन्दिर द्वार सुधाम लखे मन भाए |
देखत ही शुभ साज सजावट और बनावट को हरषाए |
काहि कहूँ दिल माहि विचारत काहि कहूँ किस कारण आए |
कृष्ण साखा जग-पलक के करतूत कला लाख चाव बढ़ाये |

सुदामा- द्वारपाल से

देख द्वारिका दृश्य को चकित भयो हरषाय |
कहाँ कृष्ण पूछन लगे द्वारपाल से जाया ||

= गीत =
कृष्ण हमारे हम उनके हैं, कृष्ण से शीघ्र मिलादो |
विप्र सुदामा द्वार खडयो है, नाम हमारा बतादो ||
हम साथी बचपन के मित्रो, मीत हमारा माधो |
भवसागर से नव हमारी, कृष्णा पर लगादो ||
काम क्रोध अरु लोभ मोह को, हम से दूर भगादो |
अनपायनी भक्ति निश्छलता, ह्रदय मांहि जगादो ||
अर्जी हमारी भैया श्याम सखे को सुनादो |
कृष्ण हमारे हम उनके हैं, कृष्ण से शीघ्र मिलादो ||

महाराज कृष्ण क्या करते है, है उनसे काम मेरा भाई।
हम बचपन के सखा मित्र, वह होते परम गुरू भाई।।
जाकर के उनसे खबर करो, यह हाल बता देना सारा।
मैं ब्राह्मण द्रविड़ देश का हूं, दिल ख्याल करा देना सारा।।

द्वारपाल- कृष्ण से

जा करके द्वारपाल ने जब श्रीकृष्ण चन्द्र से हाल कहा।
इक दुर्बल ब्राह्मण खड़ा खड़ा कहता है श्री गोपाल कहां?
चाहता है प्रभु से मिलने को प्रभु दर्शन का अनुरागी है।
है मस्त गृहस्थ में रह करके जानो सच्चा वैरागी है।।

नाम आपका रैन दिन जपत सदा व्रज राज |
औरन से नहीं कछु कहे है तुम ही से काज ||

वस्त्र फटे अरु दीन दशा, इक ब्राह्मण दीन पुकारत है।
द्वार खड्यो चहुं ओर लखे वह निर्मल नेक कहावत है।।
पास नहीं कछु भी धन दौलत बौलत ही मन भावत है।
कृष्ण रटे मुख से निशि-वासर नाम सुदामा बतावत है।।

कृष्ण सुदामा चरित्र

आप सिवा न चहे अरु को, हम को वह दीखत है अति ज्ञानी।
हर्ष विषाद नहीं कछु व्यापत, कृष्ण सिवा कछु लाभ न हानी।।
है मति शु़द्ध पवित्र महा अति सार सुधामय बोलत बानी।
कौन पता किस ग्राम बसे अरु दीख रहा मति सात्विक प्रानी।।

कृष्ण मनोदशा वर्णन

बहुत मुद्दतों बाद कृष्ण पाया,
पाया प्रेमी का ठीक पता ।
उठ दौड़े, चौके, प्रभु बोले,
है कहां सुदामा बता बता ।
सुनते ही नाम सुदामा का,
अति उर में प्रेम उमंग आया ।
प्रेम प्रभु तो खुद ही थे,
हद प्रेम जिन्होंने बरसाया ।

हाल सुने करुणानिधि ने करुणेश करी करुणा अति भारी,
मीत सखा अरु प्रीत सखा सच आवत यों बहु याद तिहारी।
मीत बड़े सब जानत आप, बड़े हमसे सुधि लीन हमारी,
यों उठ दौरि न देर करी कित रंक सुदामा व कृष्ण मुरारी।

उठ दौडे पैर पयादे ही,
झट पट से प्रभु बाहर आये।
बोले शुभ दिवस आज का है,
हम प्रेमी के दर्शन पाये।

प्रीती व रीति न छानी छुपे झट प्रीतम कृष्ण सखा ढिग आये।
देखत ही उपज्यो सुख आनन्द वो कविता कवि कौन बनाये।
अंग व अंग मिलाकर नैनन, नैनन से प्रभु नीर बहाये।
नेह निबाहन हार प्रभो अति स्नेह सुधामय बोल सुनाये।

कृष्ण सुदामा चरित्र

      स्वागत

प्रभु मिले गले से गला लगा
चरणोदक लीनो धो धोकर।
बोले प्रेम भरी वाणी
पुछे हरि बतियां रो-रो कर।
निज आसन पे बैठा करके
सब सामग्री कर में लीनी।
चित प्रसन्नता से कृष्ण चन्द्र
विविध भांति पूजा कीनी।
बोले न मिले अब तक न सखा
तुम रहे कहां सुध भूल गये।
आनन्द से क्षेम कुशल पूछी
प्रभु प्रेम हिंडोले झूल गये।
रुक्मणि स्वयं सखियां मिलकर
सब प्रेम से पूजन करती थी।
स्नान कराने को उनको
निज हाथों पानी भरती थी।
चंवर मोरछल करते थे
सेवा से दिल न अघाते थे।
निज प्रेमी के काम कृष्ण
सब खुद ही करना चाहते थे।
यह आनंद अद्भुत देख-देख,
द्विज सोचे यह जाने न मुझे |
करते हैं स्वागत धोखे में,
प्रभु शायद पहचाने न मुझे |
भक्त की कल्पना सभी,
उर अन्तर्यामी जान गए |
भक्त सुदामा के दिल की,
बाते सब पहचान गए |

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