शिवदीन राम जोशी

श्री हनुमत अष्टक 

सुख सम्पति दायक, राम के पायक, सत्य सहायक, संकट हारी |
ध्यान दे ज्ञान दे शक्ति दे भक्ति दे, मुक्ति सामिप्य दे शरण तिहारी ||
रघुनन्दन के प्रिय प्रेमी तुम्ही, हनु दर्शन दे हमको शुभकारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी ||१ ||
लंकेश को गर्व गलाय दियो, मैं सुनी श्रवणा तुम लंक को जारी |
लिन्ही सिया सुधि शीघ्र महाबली, सत्य कथा तुम्हरी बलिहारी ||
दुष्ट हने क्षण एक ही में, प्रभु संतन के सब कारज सारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी || २ ||
बेर ही बेर ये टेर रह्यो हनु, फेर रह्यो इक माला तिहारी |
मंत्र न तंत्र न जानू कछु, उर प्रेम भयो लखि मूरत थारी ||
सत संगत की पल एक भली, मिली है हमको हनु की बलिहारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी || ३ ||
श्री राम ही राम रटो निशि वासर, भक्त महा बली हो व्रत धारी |
लोक बना परलोक बने, सन मारग दे हनु सत्य विचारी ||
सियाराम से नेह-सनेह रहे, उर प्रेम बढे प्रभु उमर सारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी || ४ ||
फल चार मिले उर फूल खिले, शुभ संत मिले खिली है फुलवारी |
मांगत दान दे ये वरदान दे, बीरबली महिमा तव न्यारी ||
दे धन धाम व वाम सुता सुत, मीत पुनीत दे हे ब्रह्मचारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी || ५ ||
जय कार तेरी सब लोकन में, यश छाय रह्यो हनु की बलिहारी |
वरणन कौन करे यश को, लाख के महिमा वह सारद हारी ||
शेष गणेश महेश दिनेश, सभी यश गावत हैं गुणकारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी ||६||
श्री राम बिराज रहे घट में, बजरंग बली सबसे बलकारी |
हनुमान सिवा नहीं और कोऊ, दुःख द्वन्द प्रपंच हनु भय हारी ||
स्वागत है सर्वत्र प्रभु, सब जानत हैं जग के नर नारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी || ७ ||
मंत्र षडाक्षर सिद्ध सदा, सर्वत्र करे हनु पूजन थारी |
तव द्वार से कोई न खाली गया, नर नारी की बिगरी तू ही सुधारी ||
शिवदीन की आस भरि भरी है, कबहूँ नहीं व्याप सके भव घ्यारी |
मेरी ही बेर क्यूँ देर करो हो, सुनो हनुमान ये अर्ज़ हमारी ||८||
दोहा
सकल कमाना पूर्ण हो अष्टक पढ़े जो कोय |
निश्चय पावे भक्ति फल ज्ञान दीप उर जोय ||
लंगड़े तेरे नाम से काज चढ़े सब पेश |
भक्त राज हनुमान को करि है याद हमेश ||
राम कृष्ण हनुमान को अर्पण ये पद आठ |
सज्जन जन सब ही करे प्रेम प्यार से पाठ ||
प्रेम भाव उर भावना शुद्ध हृदय शिवदीन |
पाठ करे शुभ फल मिले ताप मिटावे तीन ||

मनवा बेग विचारो रे 

मनवा बेग विचारो रे |
दीनानाथ दयाल बिना अब कौन तिहारो रे |
मात पिता सुत सुख के साथी ना कोई रे |
भाई बन्धु सब ही स्वार्थ के यो जग को धरो रे |
अंत समय सब साथ छोड़ कर करें किनारों रे |
सुखिया साथी काम ना आवे वांको धरक जमारो रे |
काम क्रोध अरु लोभ मोह को पटक पछारो रे |
सुरता डोर एक कर, आपो सुधरे थारो रे |
भाव सुभाव सरल कर निर्मल चित्त चितारो रे |
शिवदीन राम की विनय बिहारी शीघ्र स्वीकारो रे |

अनुभव 

खड़े जब वारिद अनुभव में, विचारों की कर धारा है |
लहर जो लेता है उसकी, वही दुनियां से न्यारा है ||
भाव की नौका कर बैठे,पथिक सच्चे अरु स्याने हो |
कहो उस आनंद की सीमा, मिले जब दीवाने ही दो ||
रगड़ कर दूर हटाया है, जमा जो भ्रम रूपी मैला |
पथिक तो सब ही अच्छे हैं,खुला पर उसका ही गैला ||
किया स्नान ऐसा जो, विवेकी पहन कर वस्तर |
कहो शिवदीन वह प्राणी, जायेंगे क्यों न भव से तर ||
करे हद आनंद की बातें, मस्त बनकर मतवाले से |
राम रस का ये चस्का है,कम क्या मद के प्याले से ||
जिन्होंने मुक्ति का साधन, किया है जीते जी ऐसा |
मुक्ति जीवन में ही है, तरेगा मर कर फिर कैसा ||
समझलो सोचनीय बातें, सही ही जीवन में करता |
वही फल अक्षय है सच्चा,कर्म शुभ करके नर मरता ||
मिटा कर वासना दिल से, दूर से आशा जो त्यागी |
वही है भक्त निष्केवल, प्रभु का सच्चा अनुरागी ||
तडपना छोड़ दी जिसने, नहीं स्वारथ में जो रत है |
संत है महात्मा वही, अटल उसका ही तो मत है ||
बुरा करता ना कोई का, भला कोई ही करता है |
समझ कर बात ऐसी ही,समझ अपनी में धरता है ||
दया का भाव रख दिल में, विचरता भूमि के ऊपर |
क्षमा संतोष ही धन है, रहा इस प्राण पर ही निर्भर ||
कहो क्यों नां अपनाएंगे, दयालु भक्त वत्सल है |
उन्हीं के नाम पर मस्ता, किया मन को जो निश्छल है ||
कवि है पंडित है वह ही, वही है ज्ञानेश्वर ज्ञानी |
जिन्होंने मन को समझाया,ज्ञान जो आत्म का जानी ||
और सब भूले भटकाए, बिना मन के समझाने से |
ताल और लय से बाहर है,कहो क्या मतलब गाने से ||
बना मन में तो पंडित है,मगर ये मन तो शठ वोही |
कहो क्या होगा पढ़ने से, समय सब व्यर्थ ही खोई ||
रटना तोते की सी में, नहीं कुछ लाभ ही होता |
बिना जाने मनाने मन, मैल क्या भीतर से धोता ||
मिले जब सद्गुरु आकर के, भाग्य का खुलना ही जानू |
भरम के परदे फट जाते, सच्ची मुक्ति वह मानू ||

राम को नाम जपो रसना

राम को नाम जपो रसना |
राम नाम को जान पियारे छांड सकल पोथी बसना |
आसन साधन जोग तत्व लख राम नाम लेले हंस ना ||
राम नाम के सिवा देखले और कहीं प्यारे कस ना |
राम नाम सोही ब्रह्म निरंतर माया की सारी रचना ||
शिवदीन राम भज राम राम तज और काम काहे फ़सना |
राम नाम के बिना देखले प्यारे मन जग में जस ना

काहे करत सखी बात मोहन की 

काहे करत सखी बात मोहन की |
बिछुर गए हमसे कर प्रीति, जानि न प्रीतम मन की |
ब्रज सूनों कीनो हरि देखो, निठुर भये प्रभु सनकी || काहे ..
बिडरी -बिडरी फिरत कृष्ण बिन, सुधि नाहीं कछु तन की |
गुवाल बाल सब ताहि पुकारे, याद करत हैं बन की || काहे..
मथुरा में सबसे जा कहती, होय जो बात कहन की |
हमसे प्रीत कृष्ण क्यों करि हैं, वहां कामिनी गोरे तन की ||काहे..
शिवदीन राम, कृष्ण कब मिलिहैं, सुधि भूले निज जन की |
हाथ पकर प्रभु पार उतारो, पीर हरो गोपीन की ||काहे..

आर्तनाद

क्या कैसे हो विनती, ना जानू भगवान,
जानि न पाया आज तक, होता क्या है ज्ञान |
होता क्या है ज्ञान, ध्यान लग जाता कैसे,
भक्ति क्या है करूँ, भरम भग जाता कैसे |
शरणागत हूं रामजी, संत चरण का दास,
शिवदीन दीन के हृदय में, कर दो प्रेम प्रकाश |
राम गुण गायरे ||

बडे़-बड़े पापियों को, त्यारे तुम दीना नाथ,
बारी ये हमारी प्रभु, भूल हूं न जाइये।
निपट दीन हीन मूर्ख, मैं हूं मतिमंद मूढ़,
शरण जानी दर्शन हित, शीघ्र प्रभु आइये।
प्रेमी करतार राम, पूर्ण करो काम मेरा,
भक्ति रस अमृत मोहीं, घोर-घोर पाइये।
शिवदीन दीन तेरा दास, मेरे उर प्रकाश करो,
अर्जुन को दियो ज्ञान, मोकूं समझाइये।

बडी-बडी नदियां है, बडे-बडे पहार खडे,
बडे-बडे खड्डे खुदे, वामें गिर जाउं मैं।
लोभ रूप नदी बहत, काम को पहार जानो,
क्रोध रूप कूप घोर, कैसे बच पाउ मैं।
जंगल विकट मोहमूल, मुश्किल से मिलत मग,
तुम्ही कहो कैसे फिर, तेरे को रिझांउ मैं।
कहता शिवदीन राम, राम नाम लेवूं कैसे,
कैसे नाथ भक्ति बिन, तेरे द्वार आउं मैं

या ते कियो इनको मुख कारों 

राधिका से मिलाने जो गई,
सखियाँ हंसि के उर रूप निहारो |
ब्रज बालाएं बात करी सो करी,
सुनि राधिका और विचार विचारों |
बृजराज बसे मथुरा सुनरी,
तेरे पास नहीं वह प्रीतम प्यारो |
प्यारी कहूँ कछु खारी न मानिये,
यो दृग अंजन कौन पे सारो |

पिव पास नहीं मथुरा बसि है,
वह रूप स्वरूप हृदय हम धारो |
तन है बृज में मन है पिय में,
श्री कृष्ण बिना सखी कौन हमारो |
चैन कहाँ बैचेन रहूं,
इन नैनन को गुन नेक विचारो |
सुन भैण ये नैन कह्यो नहीं मानत,
या ते कियो इनको मुख कारो |

तेरी महिमा अपार

तेरी महिमा अपार | ( ध्रुपद )
निर्गुण निराकार, वेद हूं न पाया पार, तू ही सर्वाधार ||
संत वेद रटत चार, शेष सब तेरे आधार, तू ही पारावार ||
सत्य सृष्टि के आधार, योगी मुनि प्राणाधार, तू ही सुन पुकार ||
शिवदीन प्रभु निर्विकार, पूर्ण ब्राह्म तेज सार, तू ही कर सुधार ||

तत्व से न्यारे निरंजन

तत्व से न्यारे निरंजन दंडवत मेरी |
ढूंढने से तू न मिलता, न वेद पढ़ने से,
न मंत्र के आधीन हो, न जंत्र मढ़ने से,
निराकार ओंकार, स्वरूप भासता,
ब्रह्मा शेष शारद, भूले तेरा रास्ता,
ना रंग तेरा श्याम, धोला पीत सुनहरी,
तत्व से … ||
योगी लगावें ध्यान तेरा, स्वांस रोककर,
कोई न पाया पार हठी, प्राण झोंक कर,
तेरा पता कैसे लगे प्रभु, कौन जाना है,
तेरी कृपा बिन समझलो, सब भेद छाना है,
प्रतिमा निराली ज्योति तेरी, किस ने जा हेरी,
तत्व से …||
तेरा ठिकाना प्रेम के दरबार में देखा,
प्रेम ही से हो प्रकट संसार में देखा,
देखा जहाँ तो तू मिला, घट आर में देखा,
तेरा निराला रूप, पारावार में देखा,
हर वक्त इंतजार में हूं, साँझ सवेरी,
तत्व से …||
तुम प्रेम ड़ोरी से, गहरे बंधाए हो,
भक्त की पुकार सुन दौरी आये हो,
बिन स्वार्थ का प्रेमी मिले, वही प्रेम प्यारा है,
सत प्रेम भक्तों को प्रभु, तुमने उबारा है,
शिवदीन प्रेमी चरण का, कर जोर कर टेरी,
तत्व से …||

कर्म 

को किसको दुःख देत है, कर्म देत झकझौर,
उरझत सुरझत आप ही, ध्वजा पवन के लौर |
ध्वजा पवन के लौर, समझ थोरी में सारी,
कर्म गति बलवान, गति है न्यारी-न्यारी |
संत समागम सुख है, सत संगत शुभ रंग,
शिवदीन सुकर्म ही कर चलो पावो प्रेम उमंग |
राम गुण गायरे ||
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कर्म चढ़ावे स्वर्ग, कर्म नरकन में डारे,
कर्म धर्म बैकुंठ, कर्म ब्रह्मलोक सिधारे |
कर्म कर्म है कर्म, कर्म की गति गहन है,
कर्म करो शुभ कर्म, बने उज्वल जनमन है |
कर्म ही से कारुंस लगे, कर्म ही धोवत दाग,
शिवदीन कर्म गति समझ के उपजवों अनुराग |
राम गुण गायरे ||
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कर्म ही से सुख भोग मिले, सब कर्म ही से दुःख पावत नाना,
कर्म ही स्वर्ग विमान चढ़ावत, कर्म ही डारत नरक निशाना |
कर्म ही से जग में यश किरती, निंदित कर्म ही है अपमाना,
शिवदीन कहे नहीं आन को दोष, जो कर्म करे नर वह फल पाना |
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कर्मन के आधीन सकल संसार देख रे,
विधिना लिखे विचार बांचले सत्य लेख रे |
ज्ञानी ध्यानी और नृपति बनि रहे करम से,
चातुर मूरख लोग दुखी है और भरम से |
सन्यासी साधू लखे भजन करें धरि मौन,
शिवदीन करम के बस सभी बचा हुआ यहाँ कौन |
राम गुण गायरे ||
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लिखते पढ़ते थक गए, कर्मन केरा हाल,
कर्मन के बस होत है, ऋषि, नृप, भक्त, कंगाल |
ऋषि, नृप, भक्त, कंगाल, कर्म का अदभुत् खेला,
ये संसार असार, जगत का देखो मेला |
मिले कोऊ साधु सुजन, तो बनि जाये बात,
शिवदीन भरम सब छांडी के, भजन करो दिन रात |

कृष्णा बहुत करे बदमाशी 

कृष्णा बहुत करे बदमाशी |
बृजजन गोपी गुवाल बाल जन, बहुरी करत हैं हांसी |
छेर करत बृज बालाओं से, आँख मिचोनी कर गुवालों से,
नंगी कर देता है छलिया, नां आवे शरम जरासी |
दधिदान मांगे बरजोरी, भरे रीस में वह सब गौरी,
कौन इसे समझावे समझो, साधू संत उदासी |
श्रीराधे नखराली बाला, श्याम रंग है देखो काला,
वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में पकर बांहें लेजासी |
यमुना के तट पर नटनागर, खड़ा है मांखन चोर उजागर,
शिवदीन जच गई मनमोहन के, नैन से नैन मिलासी |

शिव 

शिवजी हैं दयाला ललाट चन्द्र का उजाला,
हाथ त्रिशूल और भाला, गले सर्पन की माला है |
धोले बैल वाला, पिये भंग हूं का प्याला,
शीश गंग की तरंगे, पाप जारबे की ज्वाला है |
बाघम्बर धारे, नेत्र तीसरा उघारे,
कामदेव को पछारे, शिव शंकर मतवाला है |
कहता शिवदीन लाल, दीनन की करत पाल,
ऐसे शिव दयाल, सत्य देवन में निराला है |
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शिव मस्तक चन्द्र बिराज रह्यो,
अहिराज गले शिर गंग की धारा |
मृगछाल बाघम्बर आसन की,
छवि छाज रही अहो अपरंपारा |
बाज रही डमरू कर में,
व आवाज भली जग जानत सारा |
शिवदीन सदा शिव सहायक है,
वर दायक दानी वे दाता हमारा |
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(सवैया छंद )
शिव शीश पे गंग तरंग सजे शुभ साजत है तेरे जूट जटा |
अहि नाग गले लपटैं झपटैं गन राज चढ़े कैलाश अटा |
भंग के रंग में भूतों के संग में शंकर धन्य उमा की छटा |
शिवदीन सुप्यार सुधा बरषे महादेव लखे नभ माहीं घटा |

विद्या और विद्वान

विद्या बिन अविद्या रूप, गोरा तन शोभा क्या,
विद्या से विहीन लोग दुःख ही दुःख सहते हैं |
दिन में ना सूझ परे जन-जन से जूझ परे,
रात के ही राजा ज्यूँ राजा बन रहते हैं |
अरमासे गरमासे और वे निसरमा से,
कछु-कछु शरमा से मारे मन रहते हैं |
कहता शिवदीन राम सोचो और समझो तो,
लोगन को लोग कई मूरख क्यूँ कहते हैं |
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विद्या से अर्थ मिले मान सनमान मिले,
विद्या से धर्म कर्म काम मोक्ष धाम भी |
विद्या है अपर बल अक्ल अनुमान करो,
ज्ञान करो ध्यान करो मिलता आराम भी |
विद्या से मनोहर तन मन भी प्रसन्न रहे,
मस्ती रहे आठों याम सुबह और शाम भी |
कहता शिवदीन राम सुधर जाय सकल काम,
विद्या से सालों साल उज्वल शुभ नाम भी |
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विद्वानन की गतियाँ मतियाँ,
बतियां सुण चातुर लोग ही जाने |
धन्य गुणी गुण को लखि है,
अरु मूरख तो अपनी जिद ठाने |
गुमान घमंड भरे तन में,
मन में अभिमान से होय दिवाने |
शिवदीन वो जायें जहाँ भी कहीं,
पर मूरख मूढ़ रहें नहीं छाने |
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विकसित होता है विद्या से, हृदय कमल का फूल,
विद्या धन बिन धन सकल समझो माटी धूल |
समझो माटी धूल, धूल से फूल बनाना,
धूल फूल बनि जाय वाही तो विद्या पाना |
विद्वानन की गति मति, समझत हैं विद्वान,
शिवदीन सुशोभित विद्वता करके देखो ज्ञान |
राम गुण गायारे ||

मन के झरोखे से “मन” 

मंत्र मिला ना एक यंत्र भी ध्वस्त हो गया,
तंत्र चले ना यार देख बल होश खोगया।
करवाये अभिषेक देवता सब ही पूजे,
झाड़ -फूकियां थके चाल कोई ना सूझे,।
शूरवीर जोधा थके किस पर करे यकीन,
मन मतंग माने नहीं क्या उपाय शिवदीन।
राम गुण गायरे।।

मन कारण बन में गये तज करके घर द्वार,
जोगी जंगल में रहे हुए न भव से पार।
हुए न भव से पार चतुर चालाक गुनी जन,
राजा रंक फकीर सभी के साथ रहे मन।
शिवदीन संत कोउ बस करे यो मन है गजराज,
मन भागे आगे बहुत के बस है महाराज।
राम गुण गाय रे।।

मन के कारण जनम मरण है, मन राजा मन रंक,
मन चंगा शिवदीन लख पल में बने निशंक।
पल में बने निशंक संत का सेवक सच्चा,
वही नर तन है धन्य और अच्छा ये अच्छा।
भव बन्धन बेडी कटे कटे पाप घनघोर,
ब्रह्म राम मिल जाय रे प्यारा नन्द किशोर।
राम गुण गायरे।।

मन से है लाभ हानि, यो भ्रम दूर निवारो,
जनम मरण मन मुक्त, मुक्ति न्यारी ना यारो।
ज्ञान भक्ति अनुराग, सत्य वैराग्य जगावे,
मन है मन में, जानि-जानि, मन हरि गुण गावे।
शिवदीन बिना मन क्या बने, है बिगार नहीं और,
अपना मन ही बन रहा, शंहशाह अरू चोर।
राम गुण गायरे।।

सब झगरा है मन ही का, मन से करो विचार,
जहां लगाया मन लगा, प्रेम प्यार से यार।
प्रेम प्यार से यार और कोई सार नहीं है
मन है अपना यार, अन्य दिलदार नहीं है।
शिवदीन मन ही तो जाळ है और नहीं कोई जाल,
राम नाम में मन लगा, बाकी सब जंजाळ।
राम गुण गायरे।।

माने ना मन है बली ज्ञान ध्यान की आन,
पद्मासन आसन लगा कर बैठे अभिमान।
कर बैठे अभिमान उन्हे मन पटक पछारे,
देखो बात विचार यार सब ही जन हारे।
शिवदीन सत्य शरणागति संतन केरा संग,
मन मतंग थिर हो वहीं पावे भक्ति रंग।
राम गुण गायरे।।

मन कपूत मन उत है, मन ही भूत बेताल,
मन के कारण दुःख भरम मन ही है खुशहाल।
मन ही है खुशहाल, सुख सब संग है मन के,
सुख-दुःख स्वप्न समान, संत सायक* जिस मन के। *सहायक
शिवदीन संत की शरण में, रूक जाये मन चोर,
मन बस करने का नहीं, मंत्र दूसरा और।
राम गुण गायरे।।

मन मूरख माने नहीं, तब तक मिटे न खेद,
पढ़ि पुराण भरमा गये, केते पढ़ि-पढ़ि वेद।
केते पढ़ि-पढ़ि वेद, गुणी ज्ञानी जन डूबे,
चातुर डूब्या जाय, घणे अभिमानी डूबे।
संत शरण बिन ना बने, रीझें ना वह राम,
शिवदीन मनोरथ पूर्ण हो मन के घले लगाम।
राम गुण गायरे।।

मन हाथी बंधता नहीं, पचि हारे गुणवान,
कोई जादू ना चले, बांधे क्या नादान।
बांधे क्या नादान, तपस्वी केते हारे,
युक्ति बिन कई मरे, सूरमा बात विचारे।
धन्य-धन्य हे संत जन, बारंबार प्रणाम,
शिवदीन बंधे गजराज मन सधि हैं आठो याम।
राम गुण गायरे।।

मन रूक जाये, रोक दे, साधु सूर सुजान,
बाकी सब पचि-पचि मरे, जोधा जोर अज्ञान।
जोधा जोर अज्ञान, रोकि मन को सब हारे,
सज्जन सतसंग संत, भक्त को राम उबारे।
ना कोई मन हलचल करे, लखि बात शिवदीन,
राम नाम सतनाम से, मिटे ताप अघ तीन।
राम गुण गायरे।।

भजन बिन भटकत जैसे प्रेत

भजन बिना भटकत जैसे प्रेत।
रंक राव चाहे बने भिखारी, हरी से राखे हेत।
बिना भजन भगवान प्रभु के, बीते जन्म अनेक।।
माया को मद सब ढल जावे, सूखे हरिया खेत।
भजन संजीवन बूंटी जग में, क्यो न इसे पी लेत।।
कंचन काया राख बने नर, सुवरण होवे रेत।
पारस भजन भजन कर बन्दे, भजन करो कर चेत।।
शिवदीन भजो भगवत को प्यारे, जो भक्ति वर देत।
बिना भजन भगवान प्रभू के, थोथा बने ढलेत।।

कृष्ण -सुदामा 

बंदहुं राम जो पूरण ब्रह्म है, वे ही त्रिलोकी के ईश कहावें |
श्री गुरु राह कृपामय हो, हम पै नजरे, गुण को नित गावें ||
शारद शेष महेश नमो, बलिहारी गणेश हमेश मनावें |
बुद्धि प्रकाश करो घट भीतर, कृष्ण-सुदामा चरित्र बनावें ||
राम राम जप बावरे साधन यही विवेक |
इस साधन की ओट से तर गए भक्त अनेक ||
परम सनेही राम प्रिय सुप्रिय गुरु महाराज |
चरण परहूँ कर जोर कर वन्दहु संत समाज ||
प्रभु चरित्र में चित रचे जन्म-जन्म यही काम |
भक्ति सदा सत्संग उर कृपा करहुं श्रीराम ||
बंदहु संकर-सुत हरखि मंगल मयी महेश |
सकल सृष्टि पूजन करे तुमरी सदा गणेश ||
नमन करत हूं शारदा सकल गुणन की खान |
नमहूँ सुकवि पुनि देव सब चरण कमल से ध्यान ||
प्रभु चरित्र आनंद अति रुचिकर करहूं बखान |
जाहि सुने चित देय नर पावत पद निर्वाण ||
लिखूं सुदामा की कथा यथा बुद्धि है मोर |
करहूं कृपा शिवदीन पर नागर नन्दकिशोर ||
भक्त सुदामा ब्रह्मण थे,
रहते थे देश विदर्भ नगर,
मीत प्रभु के सच्चे थे,
पत्नि भी पतिव्रता थी घर |
कुछ किस्सा उनका बयां करू,
छांया दारिद्र की घर पर थी,
वो भगवत रूप परायण थे,
आशा उन्हीं पर निर्भर थी |
थी बुद्धिमती पतिव्रता वाम,
गुणवान चतुर सुन्दर नारी,
पति इच्छा अनुकूल चले,
थी श्रीपति को अतिशय प्यारी |
वो दुःख सुख सभी भोगती थी,
पर बात न जिह्वा पर आती,
नित मीठे बैन बोलती थी,
नहीं ध्यान बुरा दिल पर लाती |
इक रोज कहा कर जोर दोऊ,
पति भूख से प्राण निकलते हैं,
छोटे-छोटे छौना मोरे,
बिन अन जल के कर मलते हैं |
यह दशा देख अकुलाय रही,
नहीं बच्चों को भी रोटी है,
रह सकते नहीं प्राण इनके,
अति कोमल है, वे छोटी हैं |
इसलिए कृपा कर प्राणनाथ,
तुम नमन करो अविनाशी को,
मत करो देर, बस जाय कहो,
सब हाल द्वारिका वासी को |
वह सखा आपके प्रेमी हैं,
देखत ही सनमान करें,
सब दूर व्यथा हो जावेगी,
कर कृपा तुम्हे धनवान करें |
बतियाँ पत्नि की सुनी ब्राह्मण,
भयभीत हुआ घबराय गया,
बोल व्यथा के सुन श्रवणा,
चुप चाप रहा बोला न गया |
कुछ देर बाद समझाने को,
बोला तू सच तो कहती है,
मगर हुआ क्या आज प्रिये,
हर रोज हरष से रहती है |
ये अश्रु बिंदु किसलिए आज,
दुखमयी बात क्यों बोल रही,
क्यों तुली कोटि पर माया की,
शुभ सुखद ज्ञान को तोल रही |
हैं कृष्ण सखा मेरे प्रेमी,
धन लाने को कैसे जाऊं,
निष्काम भक्ति की अब तक तो,
किस भांति स्वार्थ अब अपनाऊँ |
है दूर द्वारिका पास नहीं,
मैं वृद्ध हुआ अकुलाता हूँ,
मग चलने की सामर्थ्य नहीं,
इसलिए तुझे समझाता हूँ |
है दया देव की अपने पर,
इसलिए नहीं धनवान किया,
सात्विक भाव ही रहा सदा,
प्रिय दिल में कब अरमान किया |
सुदामा- द्वारपाल से
महाराज कृष्ण क्या करते है, है उनसे काम मेरा भाई।
हम बचपन के सखा मित्र, वह होते परम गुरू भाई।।
जाकर के उनसे खबर करो, यह हाल बता देना सारा।
मैं ब्राह्मण द्रविड़ देश का हूं, दिल ख्याल करा देना सारा।।

द्वारपाल- कृष्ण से
जा करके द्वारपाल ने जब श्रीकृष्ण चन्द्र से हाल कहा।
इक दुर्बल ब्राह्मण खड़ा खड़ा कहता है श्री गोपाल कहां।
चाहता है प्रभु से मिलने को प्रभु दर्शन का अनुरागी है।
है मस्त गृहस्थ में रह करके जानो सच्चा वैरागी है।।

वस्त्र फटे अरु दीन दशा, इक ब्राह्मण दीन पुकारत है।
द्वार खड्यो चहुं ओर लखे वह निर्मल नेक कहावत है।।
पास नहीं कछु भी धन दौलत बौलत ही मन भावत है।
कृष्ण रटे मुख से निशि-वासर नाम सुदामा बतावत है।।

आप सिवा न चहे अरु को, हम को वह दीखत है अति ज्ञानी।
हर्ष विषाद नहीं कछु व्यापत, कृष्ण सिवा कछु लाभ न हानी।।
है मति शु़द्ध पवित्र महा अति सार सुधामय बोलत बानी।
कौन पता किस ग्राम बसे अरु दीख रहा मति सात्विक प्रानी।।

बहुत मुद्दतों बाद कृष्ण पाया,
पाया प्रेमी का ठीक पता।
उठ दौड़े, चौके, प्रभु बोले,
है कहां सुदामा बता बता।
सुनते ही नाम सुदामा का,
अति उर में प्रेम उमंग आया।
प्रेम प्रभु तो खुद ही थे,
हद प्रेम जिन्होंने बरसाया।

हाल सुने करुणानिधि ने करुणेश करी करुणा अति भारी,
मीत सखा अरु प्रीत सखा सच आवत यों बहु याद तिहारी।
मीत बड़े सब जानत आप, बड़े हमसे सुधि लीन हमारी,
यों उठ दौरि न ढ़ील करी कित रंक सुदामा व कृष्ण मुरारी।
उठ दौडे पैर पयादे ही,
झट पट से प्रभु बाहर आये।
बोले शुभ दिवस आज का है,
हम प्रेमी के दर्शन पाये।
प्रीती व रीति न छानी छुपे झट प्रीतम कृष्ण सखा ढिग आये।
देखत ही उपज्यो सुख आनन्द वो कविता कवि कौन बनाये।
अंग व अंग मिलाकर नैनन, नैनन से प्रभु नीर बहाये।
नेह निबाहन हार प्रभो अति स्नेह सुधामय बोल सुनाये।

प्रभु मिले गले से गला लगा
चरणोदक लीनो धो धोकर।
बोले प्रेम भरी वाणी
पुछे हरि बतियां रो-रो कर।
निज आसन पे बैठा करके
सब सामग्री कर में लीनी।
चित प्रसन्नता से कृष्ण चन्द्र
विविध भांति पूजा कीनी।
बोले न मिले अब तक न सखा
तुम रहे कहां सुध भूल गये।
आनन्द से क्षेम कुशल पूछी
प्रभु प्रेम हिंडोले झूल गये।
रुक्मणि स्वयं सखियां मिलकर
सब प्रेम से पूजन करती थी।
स्नान कराने को उनको
निज हाथों पानी भरती थी।
चंवर मोरछल करते थे
सेवा से दिल न अघाते थे।
निज प्रेमी के काम कृष्ण
सब खुद ही करना चाहते थे।
यह आनन्द अद्भुत देख देख,
द्विज जाने यह जाने न मुझे |
करते हैं स्वागत धोके में,
प्रभु शायद पहचाने न मुझे |
भक्त की कल्पना सभी,
उर अंतर्यामी जान गये |
भक्त सुदामा के दिल की,
बाते सब ही पहचान गये |
बोले घनश्याम याद है कछु,
जब तुम हम दोनों पढ़ते थे |
थी कृपा गुरु की अपने पर,
पढ़ पढ़ के आगे बढ़ते थे |

भजन सुख क्यों छांडे मन धीर

भजन सुख क्यों छांडे मन धीर।
जां सुख ते उपजत उर आनंद, करें कृपा रघुबीर।
विषय वासना भूल न त्यागे, कैसी नींद तनिक ना जागे,
मौत सिराने खड़ी हुई है, भव भय तां में पीर।
नेम धर्म व्रत पल में छांडे, काम क्रोध छांडे नहीं बा़ढ़े,
लोभ मोह की पहिन रहा तू, लोहे की जंजीर।
ये दुनियां, दुनियां भदरंगी, देख रहा क्यू ये हैं नंगी,
रहने दे, ढ़क परदा नैना, मति बहावे नीर।
कहे शिवदीन संतजन साथी,सिवा राम के कौन संगाती,
सज्जन संत उबारे भव से, लगजा परली तीर।

जन हरषे रंग वृन्दावन में

जन हरषे, रंग वृन्दावन में।
बृज मण्डल में घूम घाम है, प्रेम छागया जन-जन में।
मोहन मदन गोपाल लाल संग, नांचे गावें गुवाल बाल संग,
घूमर घाले राधा रानी, लाल गुलाल उडी घन में।
चंग बजनिया बाजा बाजे, जय बृजराज साज शुभ साजे,
होली का त्यौहार मनावें, रंग उडावें प्यारा बन- बन में।
कहे शिवदीन रसिक जन रसिया, संत भक्त के तू मन बसिया,
धन्य धमाल रागनी अनुपम, मुरली लहर हरि तन- तन में।
शिव ब्रह्मा सुर सकल सरावें, दर्शन के हित बृज में आवें,
नंद यसोदा करत बडाई, सुरता राची मोहन में।

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