शिवदेव शर्मा ‘पथिक’ की रचनाएँ

वाणी-वन्दना 

प्यासे प्राणों की धरती पर तू तरस-बरस
हे स्नेहमयी, हे किरणमयी, अनुरागमयी!
स्वर जगा कुहा की इस पथराई बेला में,
हे स्वर्णमयी, हे दयामयी! हे कलामयी!

वाणी! वीणा के तारों में भर दे कम्पन
दे मुक्ति ज्वाल, जो जला सके तम का बंधन
जीवन को संज्ञा मिले, चरण को संशोधन
चाहिए मनुज को ज्ञान, चेतना, उद्बोधन

आ! दे दे नश्वर धरती को तू अमर गान
दे निशा, दिशा, दे अमित सर्जना का विहान
मन के नंदन की जुही खिले सौ बार खिले
कामना प्रतीक्षित, अंजुलियों में दूब, धान

तू आ! बिखरी आशाओं को निर्माण मिले
तू गा! सूखे कंठों को मधुमय गान मिले
तू बहा ज्ञान की गंगा रीते अंतर में
वर दे वाणी! युग को अक्षय दिनमान मिले

कण-कण को चूमे नवल चेतना का प्रभात
भूली-भटकी मानवता पाये रश्मि द्वार
जग उठे दृष्टि में निखिल सृष्टि का सम्मोहन
वीणा-वाणी तुमको जन-जन का नमस्कार

विदा कर रहे हैं 

तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना
अगर भूल जाओ तो चिन्ता नहीं है
मगर याद आकर हमें मत रुलाना !

तुम्हारे लिए तो तड़पना पड़ेगा
बहुत पास आकर बने हो पराए
तुम्हारे लिए क्यों न आएँगी आहें
दबेगा नहीं दर्द दिल का दबाए

तुम्हें आँख से हम मिटाने चले हैं
कहीं आँसुओं में नज़र आ न जाना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना !

बहुत हो चुकी रोक लेने की कोशिश
मनाए न माने मगर जानेवाले
अभी तो मिले थे अभी जा रहे हैं
अभी जा रहे हैं अभी आनेवाले !

भुलाने की तुमने क़सम ली अगर ले
शपथ है कभी भी सपन में न आना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

अगर जानते ये कि मिलना बुरा है
किसी बेरहम से मिला ही न होता
विदाई की रहती न कोई कहानी
जुदाई से कोई गिला ही न होता

अगर मन पतंगा नहीं मानता है
तुम्हें चाहिए क्या दिए को बुझाना ?
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना ।

चले जा रहे हो तुम्हारे मिलन के
ये सारे सितारें ग़वाही रहेंगे
ग़वाही रहेंगी ये जूही की डारें
नदी के किनारे ग़वाही रहेंगे

तुम्हारे सहारे कभी हम भी कुछ थे
तुम्हीं से अलग कर रहा है ज़माना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना !

किसी के गरम आँसुओं की कलम से
लिखी जा रही है तुम्हारी विदाई
किसी की नरम कल्पना की शरम से
लजाई हुई है तुम्हारी जुदाई

जहाँ जो मिले वे विदा हो गए हैं
कि धंधा है कोई दिलों का लगाना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना !

उमड़ आँख में आँसुओं की घटाओं
अरे! उनको इसकी ख़बर भी नहीं है
हमारी नज़र आज उनकी तरफ़ है
मगर इस तरफ़ वो नज़र ही नहीं है

फ़िक़र ही नहीं है उन्हें अब किसी की
अभी सोचते हैं सवारी मँगाना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना !

मिले थे तो सोचा बिछुड़ना न होगा
चले हैं सफ़र में तो मिलना न होगा
मगर राह से राह मिलने न पाई
डगर से लिखी थी तुम्हारी विदाई

कि मिलना बिछुड़ना यही ज़िन्दगी है
मनाया सभी ने मगर मन न माना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

हमारे लिए फूल शोले बने हैं
तुम्हारे लिए हो मुबारक़ बहारें
हमारी हँसी भी लिए जा लिए जा
मुबारक़ तुम्हें आसमाँ के सितारें

कभी डूबती प्यास बढ़ने लगे तो
ज़रा ओस बनकर वहीं झिलमिलाना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

अगर हो तुम्हें भूल जाने की आदत
हमें भूल जाना नहीं भूल होगी
हमें भूलकर तुम ख़ुशी से रहोगे
हमें भी इसी से ख़ुशी कुछ मिलेगी

भला हम ग़रीबों की हस्ती ही क्या है ?
न हक़ है हमें एक नाता निभाना ?
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

विदाई तुम्हारी रुलाएगी हमको
बुलाए बिना याद आएगी हमको
कि मौसम तुम्हें याद देगा हमारी
कभी तो कहीं याद आएगी तुमको !

कभी याद आने लगे जो हमारी
हमें भूलने के लिए मुस्कुराना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना!

कहाँ कौन पंछी करेगा बसेरा
कहाँ घोंसला कल बनाएगा कोई
पड़े गीत सौ-सौ मिलन के रहेंगे
विदाई की कविता सुनाएगा कोई

नहीं कम सकेगा कभी आँसुओं का
किसी याद के ही लिए रिमझिमाना
बहुत पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

अगर जा रहे हो तो जाओ मगर हम
तेरी याद दिल में बसाकर रहेंगे
निगाहों में आँसू हँसी चेहरे पर
छिपा दर्द ये मुस्कुराकर कहेंगे

हमारी यही कामना अन्त में हो
जहाँ भी रहो तुम वहीं लहलहाना
तुम्हें पास आकर विदा कर रहे हैं
कहीं दूर जाकर हमें मत भुलाना

हर रात न काली होती है

हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है,
हर रोज न फूल खिला करते, हर रोज न डाली रोती है।

पल-पल में अंतर होता है, क्षण में संसार बदल जाता,
हंसते मधुवन को पल में ही, आकर पतझाड़ बदल जाता।
प्रत्येक सांस में अंतर है, प्रत्येक बात में अंतर है,
कैसा परिवर्तन धरती पर, हर पात-पात में अंतर है।

हर रात न पूनम आता है, हर गागर खाली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है।

परिवर्तन ही जब जीवन है, संघर्षों से भय खाना क्या?
कल मरना है, सब मरते हैं, फिर तड़प-तड़प मरजाना क्या?
जीना हो तो संकट झेलो, काँटों में कलियाँ खिलती हैं,
चलनेवाले को एक नहीं, मंज़िलें हजारों मिलती हैं!

जिस बस्ती में हो अंधकार, कल वहीं दिवाली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है।

यह पृथ्वी की परिक्रमा अरे! दुनिया ही चलनेवाली है,
जलते जीवन में मौनसून की हवा बदलनेवाली है।
चक्कर ही है तो सूरज को अँधेरे में आना ही है,
रोनेवाले को आज नहीं तो कल हंसना, गाना ही है।

आशा की प्यासी धरती पर, बरसात कभी तो बरसेगी,
मन की दूबों पर बादल की बेटी शबनम भी तरसेगी!
विश्वास बचाये चल राही! यह रेत पार हो जायेगी,
कल बालू के मंसूबों पर रजनीगंधा इतरायेगी!

पक गये धूप से सरस बांस, बंशी मतवाली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है।

अंगार भरी पगडंडी पर कलियाँ गुलाब की खिलती हैं,
सौ बार फिसलनेवाले को, सीधी राहें भी मिलती हैं।
गिरनेवाले कुछ होश करो, चोटी को लक्ष्य बनाना है,
चोटी को पाँव छुयें, मन की आशाओं को थिरकाना है।

ऊपर को उठनेवाले में, कुछ लगन निराली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है।

जीने दो आशा, अभिलाषा, चेतना, प्रेरणा प्राणों की,
बन-बन कर मोम पिघलती है, छाती निर्मम चट्टानों की!
जीवन की भाषा रहती है कुछ बिखड़े विश्वासों में भी,
प्राणों का यौवन रहता है कुछ घुटती-सी साँसों में भी!

यह कसक, प्रगति की चिता-लपट पर जीने वाली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है!

जो गिर-गिर कर उठ जाता है, जो फिसल-फिसल कर चलता है,
अँधेरे का राही कोई, युग-युग दीपक बन जलता है।
सीढ़ियाँ बनी हैं चढ़ने को, पीछे की ओर उतरना क्या?
यदि टूट गयी पतवार, जूझ जा लहरों से, फिर मरना क्या?

लहरों पर तिरनेवाले में तट की खुशियाली होती है,
हर दिन न एक-सा होता है, हर रात न काली होती है।

तुम माँगते हो

क्या गीत लिखूँ बरसातों पर
मनखेत तृषित, धनखेत शून्य
तुम गीत मांगते हो उससे
जिसके सौ-सौ साकेत शून्य?

उजरा राधा का वृन्दावन
पायल मीरा की टूट गई
ऐसे में गाए कौन गीत
मुरली मोहन की टूट गई!

कवि कलम उठा पथ हेर रहा
बारिश हो तब तो गीत बने
ममता-समता हो धरती पर
आंसू कोमल संगीत बने
पूरब धरती जल रही
गगन की बाढ़ निहारो मत भोले!
सर्वोदय आनेवाला है
तुम बना रहे फिर भी शोले?

गाएगी धरती सर्जन गीत
लहराना है धन खेतों को!
मानव-मानव को प्यार करे
बसना होगा साकेतों को!
सूरज के घर में हो प्रकाश
बादल के मन में गीत भरे
यह दीप जला जो आँधी से
रिमझिम में इसकी लौ बिखड़े।

पगध्वनि

अलमस्त पथिक के पग उठते,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।
तिमिरांचल पर आशाओं की,
अरुणिमा सुनहली झड़ती है ।

बढ़नेवाला पंथी पथ पर ,
दुलराता है तूफानों को।
फूलों का दर्द कहा करता ,
बढ़ते जाना मस्तानों को।

मंजिल हो चाहे दूर मगर,
पग उठे -बढे परिश्रांत न हो ।
मत रुको – झुको जाने वाले ,
दो पल भी मन उद्भ्रांत न हो ।

छाया में मधु विश्वासों की ,
प्राणों की जलन ठहरती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।

आहट जो पहली -पहली हो ,
उसमें जीवन का भान रहे ।
अरुणोदय से चलकर पूछो ,
कैसा होगा दिनमान कहे ।

तो बढो पथिक! तुम चढो -चढो ,
मिल जाता है सोपान तुम्हें !
हे वर्द्धमान  ! अब करता है ,
आह्वान सुयश कल्याण तुम्हें !

पगध्वनि है वह जिसको सुनकर ,
मानवता राह पकड़ती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते ,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।

जब -जब पगध्वनि हो- हो उठती ,
कोना-कोना जग जाता है ।
पगध्वनि है उसका नाम कि ,
जिसके लय में मंगल गाता है ।

ओ ! पंथी के पग के छाले ,
मुस्काओ, नवनिर्माण करो ।
पगध्वनि जगी ,अब जगो विश्व ,
जग -जग कर नवल विहान करो !

आशा की पगध्वनि उठी- उठी ,
पुलकित हो धरा सिहरती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते ,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है।

पगध्वनि

अलमस्त पथिक के पग उठते,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।
तिमिरांचल पर आशाओं की,
अरुणिमा सुनहली झड़ती है ।

बढ़नेवाला पंथी पथ पर ,
दुलराता है तूफानों को।
फूलों का दर्द कहा करता ,
बढ़ते जाना मस्तानों को।

मंजिल हो चाहे दूर मगर,
पग उठे -बढे परिश्रांत न हो ।
मत रुको – झुको जाने वाले ,
दो पल भी मन उद्भ्रांत न हो ।

छाया में मधु विश्वासों की ,
प्राणों की जलन ठहरती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।

आहट जो पहली -पहली हो ,
उसमें जीवन का भान रहे ।
अरुणोदय से चलकर पूछो ,
कैसा होगा दिनमान कहे ।

तो बढो पथिक! तुम चढो -चढो ,
मिल जाता है सोपान तुम्हें !
हे वर्द्धमान  ! अब करता है ,
आह्वान सुयश कल्याण तुम्हें !

पगध्वनि है वह जिसको सुनकर ,
मानवता राह पकड़ती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते ,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है ।

जब -जब पगध्वनि हो- हो उठती ,
कोना-कोना जग जाता है ।
पगध्वनि है उसका नाम कि ,
जिसके लय में मंगल गाता है ।

ओ ! पंथी के पग के छाले ,
मुस्काओ, नवनिर्माण करो ।
पगध्वनि जगी ,अब जगो विश्व ,
जग -जग कर नवल विहान करो !

आशा की पगध्वनि उठी- उठी ,
पुलकित हो धरा सिहरती है ।
अलमस्त पथिक के पग उठते ,
पगध्वनि सुनाई पड़ती है।

गीत का मोल 

अंधी दुनिया क्या पहचाने मोल किसी के गीत का,
दर्द भरे संगीत का।
नयनों की ही तप्त धार पर बहता अंतर प्रीत का,
नेह किसी के गीत का।

मानस-सागर के मंथन से,
निकले कवि के गाने रे!
पिघलाकर पाषाण पिघलती,
गीतों की मधु-तान रे!

मन में पल-पल सोता जगता मरघट यह अनरीत का,
दर्द भरे संगीत का।

संगीता के प्रणय-गान में,
मृदु आहट का भान रे!
व्यथित उरों का कंपन ही तो,
गीतों का निर्माण रे!

किसे पता है मधुमय-स्वर्णिम बिछड़े हुए अतीत का, दर्द भरे संगीत का।

वैभव विष में चूर जमाना,
क्या जाने मधु पान को?
किसने पाया है गागर में,
सागर के तूफान को!

तूफानों के गायक पहिरो हार गीत के जीत का,
दर्द भरे संगीत का।

गीतों का जग मोल न जाने,
कितनी उलझी बात है।
मरुप्रदेश पर बह-बह जाती,
गीतों की बरसात है।

मानव! कह दे, उत्तर क्या है, ऐसी निठुर अनीति का,
दर्द भरे संगीत का।

जग गायक की चिता जला ले,
जलना भी आसान है।
फिर भी चिता लपट पर ज्योतित,
दीपित, जीवित गान है।

गंगा की लहरों में पावन गायन किसी पुनीत का,
दर्द भरे संगीत का।

अंधी दुनिया क्या पहचाने मोल किसी के गीत का,
दर्द भरे संगीत का।

हलचल मन के गाँव में 

बड़ी डगरिया उथल-पुथल की हलचल मन के गाँव में,
कहती है दुपहरिया मुझसे चल रे! चल-चल छांव में!
डगर-डगर पर ठहर-ठहर कर देख लिये तूफ़ान भी,
मरघट-मरघट अलख जगाकर पाये मैंने प्राण भी!

लहर-लहर पर चाँद लहरता, पहर-पहर पर रात है,
झिहिर-झिहिर कर बह-बह जाती, तन-मन में बरसात है।
मन के मन में घुल-घुल जाती ढुलमुल-ढुलमुल आस रे!
भाव-भाव में, छन्द-छन्द में, तान-तान में हास रे!

मोड़-मोड़ पर, छोर-छोर पर, कोर-कोर पर गान है,
बात-बात पर, पात-पात पर, डगर-डगर निर्माण है।
पृष्ठ-पृष्ठ रच रहा मुसाफ़िर, पंक्ति-पंक्ति को जोड़कर,
तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा, बिखरे फूल बटोरकर।

द्वार-द्वार पर अलख जगाकर, पार-पार पर गीत भी,
राह-राह पर, चाह-चाह पर, थिरक रहा संगीत भी,
अरी गगरिया! छलको छल-छल, पल-पल चंचल पाँव रे!
पीछे मेरे कांटे जंगल दलदल आगे छाँव रे!

कैसे गाये गीत मुसाफ़िर 

कैसे गाये गीत मुसाफ़िर मंज़िल कैसे जाये!
शोषण की आंधी में कोई कैसे पाँव बढ़ाये!

क़दम-क़दम पर काँटे चुभते, राह-राह पर रोड़े,
फूल मिले तो लिखा हुआ है ‘इसे न कोई तोड़े’ ।
आशाओं में आग लगाकर, चलना भी मुश्किल है,
‘छलना’ हीं जिसका धन्धा हो, उसे मिली मंज़िल है।

चलनेवाला थक जाता है, छलनेवाला पाये!
उल्टी गंगा बही हुई है कौन किसे समझाये!

गरल प्रवाहित इंसानों की नस में, लहू नहीं है,
बुढ़िया धरती चीख रही है ‘आशा बहू कहीं है’ !
प्राणों की संगिनी साँस में ज्वाला है आहों की,
सुलग रही अंगारों के नीचे छाती राहों की।

सबको होड़ लगी जाने की बाट कौन बतलाये!
सोने की लंका में युग की सीता नीर बहाये!

एक बढ़े तो सौ-सौ आंखें जलने लग जाती है,
हंसता है संसार, किसी की साधें मर जाती है।
जला रहा इंसान स्वयं सर्वोदय की परिभाषा,
आज खड़ा है विश्व नाश के तट पर हारा-प्यासा।

अरे! किसी में बल है तो प्यासों की प्यास बुझाये?
लाज नग्न हो गयी, अभी भी कोई चीर बढ़ाये!

ऊंचे मंचों पर विकास की बनी योजना प्यारी,
नीचेवाले बना रहे हैं धनखेतों की क्यारी,
कटी धान की फ़सल मंच ने हंसकर टोपी तानी,
ऊपर होती मौज़ और नीचे होती क़ुर्बानी,

श्रम खरीदते नेता जनता रोटी को मुँह बाये,
‘गान्धी जी ने यही कहा था’-कहकर झूठ छिपाये!

कैसे बिखरे धनखेतों में ‘पंचशील’ का गाना?
उठनेवाला चाह रहा है अन्तरिक्ष तक जाना!
गिरनेवाले को धरती का धूल भरा आंचल है,
रामराज का पाठ पढाना-‘राजनीति का छल’ है।

भोली जनता राजनीति की हलचल से घबड़ाये,
नेता अपने में उलझे हैं राह कौन दिखलाये?

लगी हुई है आग चतुर्दिक दुनिया जलनेवाली,
जला रहा विज्ञान मनुजता की संचित हरियाली।
जिनकी ऊपर पहुंच वही बारूद बनानेवाले,
कैद किये बैठे मंज़िल को राह बतानेवाले!

पहुंच नहीं है दिल्ली तक कवि कैसे कलम चलाये?
नंगी, भूखी आज़ादी का क्या शृंगार सजाये?

चिल्लाओ मत ठोस, गगन तक धूम्रशिखा छाई है,
ऊपर ऊँचे मंच और नीचे गहरी खाई है!
पीस रहा है न्याय मगर नेताजी कैसे मानें?
दिखलाने के लिये लगे हैं चर्खा रोज चलाने।

उजली खादी कैसे दिल के काले दाग छिपाये?
जनता का दिल खौल रहा है पता न कुछ हो जाये!

बना शहीदों के स्मारक कहते हो ‘सेवा है’ ,
पार उतरते नेता, जनता चुका रही खेवा है।
मन्दिर बनते भगवानों के भक्त भले मर जायें,
फ़सल उगानेवाले भूखे, नाज भले सड़ जायें!

जनता करती प्रश्न, किसी नेता को कैसे भाये?
यह नंगा जनतन्त्र भला क्यों नहीं अधिक चिल्लाये?

स्वतंत्रता को तुम प्रचार का साधन बना रहे हो,
आज़ादी की सालगिरह पर तोपें उड़ा रहे हो!
जनता मौन नहीं बैठेगी, शोषण की सीमा है,
मनुष्यता का दीप कभी भी हुआ नहीं धीमा है!

नेता तो वह जो जनहित को जीवन भेंट चढ़ाये,
मरे अगर तो कोटि-कोटि का ‘बापू’ बनकर जाये!

मुझी को भूल बैठे हैं 

मुझी को भूल बैठे हैं मुझे पहचानने वाले
मुझी से रूठ बैठे हैं मुझी को जानने वाले

न जाने क्यों उन्हें मुझमें शिक़ायत ही नज़र आती
नज़र में आजतक उनकी हिदायत ही नज़र आती
मुहब्बत को मुसीबत का दिया है नाम उन्होंने
हक़ीक़त को बिना जाने किया बदनाम उन्होंने

मुझे अनजान लगते हैं मुझी को जानने वाले
समझता था जिन्हें अपना पराया वह समझ बैठे

समझता था जिन्हें अपना पराया वह समझ बैठे
किसी को छूट है मुझसे बिना समझे उलझ बैठे
जो ख़ुद मज़बूर हैं उनको सहारा क्यों कहे कोई?
जहाँ पर मैं खड़ा उसको किनारा क्यों कहे कोई?

मुझे मझदार कहते हैं मुझी को चाहने वाले
मुझी को भूल बैठे हैं मुझे पहचानने वाले

कि जिन पर था भरोसा यह मुझे पहचानते हैं वे
उन्हीं पर हो रहा सुबहा न मुझको जानते हैं वे
बहुत से यार मिलते हैं मुझे दुनिया के मेले में
मगर अपना न है कोई यही लगता अकेले में

न अपने को समझते हैं मुझे अनुमानने वाले
मुझी को भूल बैठे हैं मुझे पहचानने वाले

ज़रूरत है मुझे, उसकी मुझे पहचान जो पाए मगर किसको पुकारूं मैं मुझे कुछ जान जो जाये
भला ऐसे अकेले में कहीं इन्सान जीता है?
ज़हर हर रोज़ क्या ऐसे कोई नादान पीता है?

मुझे नादान कहते हैं, निगाहें तानने वाले
मुझी को भूल बैठे हैं मुझे पहचानने वाले

मुझे कहते रहे वहशी जिन्हें मैं प्यार करता हूँ
मुझे छोटा कहा करते जिन्हें संसार कहता हूँ
उजाले के लिये पूजा, अन्धेरे की डगर पाई
किसी से रास्ता पूछा भटकने को लहर पाई

भला कैसे जियूंगा मैं नरम दिल में लिये छाले
मुझी को भूल बैठे हैं मुझे पहचानने वाले।

तुम्हीं थी 

 तुम्हीं थी अन्तर्मन की साँस
तुम्हीं थी विह्वल मन की आश
तुम्हीं थी चंचल मन की धीर
तुम्हीं बन बैठी हो उपहास

तुम्हीं थी एक आत्मविश्वास
तुम्हीं थी भावों का आकाश
तुम्हीं थी चाहों का परिवेश
तुम्हीं बन बैठी हो अभिशाप

तुम्हीं को समझा था आराध्य
तुम्हें पूजा पहना कर ताज
तुम्हें था समझा आशीर्वाद
तुम्हीं बन बैठी हो अपवाद

जागता हीं रहा रात भर रात भर

जागता हीं रहा रात भर रात भर
पास आने को सपने तरसते रहे
रात रोती रही ओस गिरती रही
और आँखों से आँसू बरसते रहे

मन ने चाहा मगर याद सोई नहीं
खिड़कियों से पिघल चाँदनी बह गई
रात को नींद आने लगी जब कभी
जागने को उसे ज़िन्दगी कह गई

रात सूनी मेरी बेबसी देखकर
तारकों को तनिक नींद आई नहीं
रात भर जागती रह गई यह हवा
साँस में गन्ध बेला की आई नहीं

मोम को पी गई एक लौ आग की
मौन होकर मगर वह टहकता रहा
एक लौ सौ शलभ को जलाती रही
पंख जलते रहे मन बहकता रहा

तारकों से सजायी हुई चुन्दरी
खोलकर रात नंगी खड़ी हो गई
ढाँक रवि ने उसे जब किरण चीर से
एक चुम्बन लिया तो सुबह हो गई

लाज से भी नरम रात के ग़ाल पर
लाल चुम्बन उगा तो उषा बन गई
मैं वियोगी बना रात दिन का मिलन
देखने जब लगा तो घटा तन गई

हार कर मन मगर प्यार करता रहा
ठोकरों से अँधेरा जगाता रहा
याद उनकी लिए मैं भिखारी बना
द्वार उनका सदा खटखटाता रहा

दस्तकें द्वार पर अनसुनी हो गईं
बेरहम ने मगर द्वार खोले नहीं
मैं बुलाता रहा-कौन माने भला?
लौट आया मगर प्यार बोले नहीं

मेला है दो दिन का

माँझी खेता नाव लहर पर लहर खे रही तिनका
कहे किनारा आनेवालो! मेला है दो दिन का!
जलते दीप, पतंगे जलते, सुलग रहा जग सारा
जीनेवाले राख हो गए सत्य न केवल हारा
प्यासों को पीनेवालों को, मिलती पावन गंगा
सदी-सदी के पाप ढक गए सत्य अभी तक नंगा
अमर आस्था टूटे चाहे हर सपना पल छिन का
कहे किनारा-आनेवालो! मेला है दो दिन का
मेला है दो दिन का राही! वेला है दो पल की
जीवन के पनघट पर नित दिन भरी गगरिया छलकी
सबकी सांझें ढलकीं, रातें थककर बनीं पराई
पड़ी नहीं धरती पर पागल जुगनू की परछाई
जुगनू की तड़पन सम्बल है लाख-लाख दुर्दिन का
कहे किनारा आनेवालो! मेला है दो दिन का!
कहे किनारा आनेवालो होश बचाकर चलना
रजनी की काली चुनरी पर जुगनू बनकर जलना
लील न जाए धार, कठिन है पता पार का पाना
एक फूल के लिए पड़ेगा सौ-सौ शूल चुभाना
समय करेगा न्याय सही में यह पथ किनका-किनका
कहे किनारा आनेवालो! मेला है दो दिन का!
भूल न जाओ कूल किसी को सीधे मिल जाता है
बिना चुभाए शूल कभी भी फूल न खिल पाता है
बिना जलाए अधर कभी भी ज्योति नहीं आती है
मंज़िल छलियों की नहीं अरे! दीवानों की थाती है
राहें उसकी चरण-चिह्न पर नाम अमिट जिन-जिनका
कहें किनारा आनेवालो! मेला है दो दिन का!
नाम अमिट है उनका आहट जिनकी अलख जगाती
कभी नहीं चेतना किसी भी साधक की मुरझाती
दो दिन का जग खेल और दो दिन का यह अपनापन
जीता तो है इस धरती पर तिमिर-विजय आन्दोलन
अर्थहीन अनगिन मरते हैं कौन ठिकाना इनका!
कहे किनारा आनेवालो! मेला है दो दिन का!

तत्व

आम के टिकोलों की तरह
आशायें
चटनी की तरह
विवशताओं के दिन
सेनुरिया रंगों में रंगी
पगी
बम्बइया उमंगें
पीली-पीली
पकी-पकी
भरी-भरी फलियाँ
अमौट-सी बनी आस्था
सरस-संग्रह!
आँधी आने दो
टिकोले सामना करेंगे
जिनकी टहनियाँ कमजोर होंगी
टूटेंगी
जो प्रबल होंगी-जीयेंगी
आशाएँ कोमल पत्र नहीं होतीं
विश्वास बूढ़ा नहीं होता
आस्था जवान रहती है।

जाग्रत स्वप्न

मेरे मर्म की आँखों में
तुम गुलाब की
एक नर्म पंखुड़ी सी
चुभ गई हो
तुम्हारी साँसों की
गर्म चुभन का
मीठा-सा दर्द
अब भी मेरे सीने में है
मेरी भावुकता की खिड़की से
रेशमी सपनों का
पर्दा उठाकर
तुम्हारी सुधियों की
हवा आती है
मुझे छूती है
और मैं भूल जाता हूँ
कि मैं कौन हूँ
और जब कभी भी
भींगने लगती हैं पलकें
मैं मुस्कुरा उठता हूँ
मेरा दर्द मुस्कुरा उठता है
एक तुम्हारी याद का दर्द है
जो न हो
तो गीतों की फ़सल
सूख जाए
एक तुम्हारी याद है
जो आए
तो मैं गुनगुना उठूँ!
आज रजनीगंधा की
डोली पर चढ़कर
तुम्हारी मधुगंधा याद आई है
और मैंने
उसे गीतों की सेज पर
सुलाकर चूम लिया है।
तुम्हारी याद के गालों पर
लाली है
मैं जगा हुआ हूँ
और सपना देख रहा हूँ
जाग्रत स्वप्न…
जहाँ तुम नहीं
तुम्हारी याद के साथ
अकेला मैं हूँ।

कभी तो रात बीतेगी

जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी
नयन रोते घड़ी पल को निठुर बरसात बीतेगी
चले लू भी, बहे आँधी, कभी पतझाड़ गाएगा,
अरी मझधार की नैया! मचल कल पार आएगा,
लहर की बाहुओं से ही बँधी पतवार आएगी,
झुलस कर भावना मन की मधुर मल्हार गाएगी!
किनारे पास आएँगे तपन की बात बीतेगी
जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी
बुलाकर पास चलता हूँ हवाओं को तूफ़ानों को,
कि मापे जा रहा हूँ मैं उतारों को, चढ़ानों को
पचाकर ही बढ़ा जाता, उबालों को, उफानों को
दिए कुछ जा रहा हूँ मैं ज़माने के दिवानों को
हँसे मुझपर भले दुनिया विजय मनजात जीतेगी
जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी
किसी उम्मीद पर ही तो जिए जाता ज़माने से
भला बुलबुल कभी रुकती किसी के गुल मचाने से
किसी के चूकने से क्या कभी सूरज नहीं निकला?
हज़ारों मोम जल जाए मगर पत्थर नहीं पिघला।
मेरी दुल्हन मेरी मंज़िल, विरह की रात बीतेगी
जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी
न बँधते पाँव राही के यहाँ जंजीर बनती है
यहाँ पथ रोक देने को बहुत तदबीर बनती है
हज़ारों खाइयाँ मिलतीं हज़ारों ढूह मिलते हैं
यहाँ तो पंक में हर दिन कमल के फूल खिलते हैं।
किरण की पीत बारिश में कली जलजात जीतेगी
जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी
किसी के बीज बोने से नरम कलियाँ निकलती हैं
सुना है धीर के तरु में मधुर फलियाँ निकलती हैं
मनुज को जन्म लेने पर चुकाना ब्याज होता है
किसे कैसे मिलेगा पथ न कुछ अंदाज़ होता है
गगरिया जो छलकती थी-छलकती है न रीतेगी
जलाए दीप बैठा हूँ कभी तो रात बीतेगी।

प्रतीक्षा

सच कहता हूँ इस जीवन में मैंने तुमको जितना चाहा
तुमने उतना चाहा होता तो यह जीवन भार न होता
साथ तुम्हारे रहने पर होता मेरा हर मौसम फागुन
फूलों से जलन नहीं होती पतझड़ से प्यार नहीं होता
तुम मौन रही, मैं प्रश्नों की
रेखा पर उमर गुज़ार गया
आवाज न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया
तेरी यादों की मूरत पर मैंने जितने आँसू ढाले
उतना तो मंदिर में पूजक नदियों के नीर न डालेगा
अपनी इन भीगी पलकों में मैंने जितने सपने पाले
उतना क्या कोई चातक भी सावन के सपने पालेगा?
पावस के रिमझिम स्वर में भी
मैं हीं तो तुम्हें पुकार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया
मैं नाम तुम्हारा सूने में प्रिय! जितनी बार पुकार गया
उतना तो कभी पपीहा भी ‘पी’ कहकर नहीं पुकारेगा
जलने की पीड़ा भोगी है मैंने जितनी धीरे धीरे
क्या पंख जलाकर शलभ प्रेम पर इतनी देर विचारेगा
कोयल जितना हीं कूकी है
उतना हीं तुम्हें उचार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया।
अपने मन की खिड़की खोले मैं जितना पंथ निहार गया
राधा भी अपने मोहन की उतनी क्या बाट निहार सकी?
हर काँटे-काँटे से जाकर जो दर्द उधारा है मैंने
उतनी पीड़ा तो यमुना से गोपी भी नहीं उधार सकी
मैं सात रंग के सपनों से
छवि तेरी सदा सँवार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया
सच कहता हूँ इस जीवन में मैंने तुमको जितना चाहा
पूनों के जगमग चन्दा को सागर के ज्वार न चाहेंगे
मन के सरगम पर गीतों को मैं जितनी बार रुला आया
गायक अंगुलियाँ फेरेगा वीणा के तार न गाऐंगे
खोया तेरी तस्वीरों में
अपना हीँ रूप बिसार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया
मैं कितना जगा प्रतीक्षा में किसलिए सितारे जागेंगे?
जितने गाए हैं गीत न कोई पगली बुलबुल गाएगी
मन की शाखों पर फूल खिले, जितने दर्दीले गीतों के
सौ-सौ बासंती क्या उतने रंगों के फ़ूल खिलायेगी?
मेरी हीं आँखों का शबनम
चुपके आकाश पसार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया
मैं एक प्रतीक्षाकुल प्रेमी तुम भी पत्थर की देवी हो
जब तक चलती है साँस तुम्हें कैसे मैं नहीं पुकारूंगा
चाहे जैसे भी हो, तुमको मैं मोम बनाकर छोड़ूँगा
आँखों के दीपक जला-जला तेरी आरती उतारुँगा
कल सोच नहीं लेना ऐसा
तुम जीत गई मैं हार गया
आवाज़ न तुम तक पहुँच सकी
सौ बार तुम्हारे द्वार गया।

नारी 

मैं प्रतीकों में न तुमको
बाँध पाउँगा कभी भी
बाँध पाएँगे नही
तुमको कभी उपमान
मात्र नारी हीं नहीं तुम
तरु संज्ञाहीन
सृष्टियों की सृष्टि हो तुम
दृष्टियों में लीन
तुम तिमिर की ज्योति,
मन का दीप
दुग्ध फेनिल धार-सी
अति स्निग्ध
मोम-सा मन और
तन नवनीत
छू न सकती है तुम्हें
अनुमान की सीमा कभी भी
व्याप्त तेरी साँस में संगीत
संज्ञा से परे तुम
लाजवन्ती!
मानिनी प्रिये वादिनि
मधुहासिनी, मनवासिनी हो
तुम प्रिया हो, नायिका हो
चेतना हो सर्जना हो
अर्चना-सी मौन कोमल
कामना से भी मधुरतम
कल्पना से अधिक सुन्दर
भावना से भी तरलतम

जा रहा नाविक अकेला 

बह रही है ज़िन्दगी की नाव
सागर की लहर पर
जा रहा नाविक अकेला
ज्वार की बांहें पकड़कर;
दूर है खोया किनारा
आँख लहरों पर थमी है
दांव पर जीवन लगा दे
जो-वही तो आदमी है
वह लहर पथ का बटोही
नाव लेकर जा रहा है
आ रहा तूफ़ान सीना
खोलकर वह गा रहा है
मस्त नैया का खेवैया,
चांदनी का पाल धर-धर
जा रहा नाविक अकेला,
ज्वार की बाँहें पकड़कर!
काल का निस्सीम सागर,
आस की पतवार कोमल
प्यास का आधार केवल
नयन का नमकीन-सा जल
साधना को तृप्ति मिलती है
भंवर में खेलने से
पार जाता है मुसाफ़िर
नित लहर को झेलने से
चेतना का रूप गढती है
लहर अल्हड़ छहरकर
जा रहा नाविक अकेला,
ज्वार की बांहें पकड़कर!

तुम नदी की लहर

तुम नदी की लहर मत बनो मानिनी
नेह अपना किनारे से टूटे नहीं
प्रीत पनपी सतह से सतह पर रहे
धार बनकर मुझे प्यार लूटे नहीं
बाँह में हीं रहो छाँह में ही रहो
वक्ष की धारियों में जगह कम नहीं
गीत की पूर्णिमा में नहाया करो
आँख में हीं रहो तुम वजह कम नहीं
दूर सागर की लम्बी डगर मत धरो
प्यास गागर उठाये खड़ी घाट पर
अंजुली में तरल तुम बनो अश्रु सी
नीर बनकर न बहना किसी बाट पर
वादियों में न बह देख पलकें खुलीं
सेज कोई नहीं पुतलियों से नरम
स्नेह की पीड़ उछला करे आँख़ में
देखकर हो जिन्हें मछलियों को भरम
तुम न मैना बनो पार की डार की
घोंसला प्राण वन का उजड़ जाएगा
नीड़ में मैं अकेला रहूंगा नहीं
द्वार पर एक मौसम ठहर जायेगा
दूब सूखे नहीं छंद के खेत की
ओस की बून्द-सी मत पराई बनो
साँस के द्वार पर तुम जुही—सी खिलो
धूप-सी मत तपो तुम जुन्हाई बनो
सावनी-सी बरस लो इसी देह पर
रेत की छाँक तुमसे भरेगी नहीं
बीन-सी अंगुली में उलझती रहो
रीत की बाँह तुमसे भरेगी नहीं
कल्पना मत गगन की करो मानिनी
भूमिका-सी रहो पुस्तिका में अमर
बाँसुरी पर बनो तान की राधिका
साधना-सी रहो संचिका में अमर
अर्चना मैं करूँ तुम बनो सर्जना
वर्जना मत बनो, तुम शिखा-सी जलो
चेतना का कपूरी दीया जल उठे
प्राण के तीर्थ में वर्तिका-सी बलो
स्वप्न-सी तुम न छलना बनो संगिनी
तुम न रूठो अगर साँस रूठे नहीं
तुम नदी की लहर मत बनो मानिनी
नेह अपना किनारे से टूटे नहीं

गीत नहीं लिखता हूँ साथी

गीत नहीं लिखता हूँ साथी! मैं संसार लिखा करता हूँ!
पतझड़ में जलता हूँ लेकिन निर्झर-धार लिखा करता हूँ!

गीत छोड़ कर मेरा कोई जीने का आधार नहीं है
एक यही है सत्य, रूप भी तो मिलता साकार नहीं है।
ये मंज़िल के गीत पाँव को आस दे रहे
गीत प्राण के मीत बने विश्वास दे रहे!

साँस नहीं ठंडी हो जाये मैं अंगार लिखा करता हूँ।
गीत नहीं लिखता हूँ साथी! मैं संसार लिखा करता हूँ!

इन गीतों का मोल लगा मत, बिकनेवाला रक्त नहीं यह
लिखता तो हूँ गीत, गीत क्या? कर सकता हूँ व्यक्त नहीं यह।
एक लहर पर जिये जा रहा, एक तान पर उमर ढ़ो रहा
उधर पड़ी है रेत, देख प्लावन गीतों का इधर हो रहा!

गीत नहीं लिखता हूँ केवल मैं पतवार लिखा करता हूँ!
गीत नहीं लिखता हूँ साथी! मैं संसार लिखा करता हूँ!

एक गीत है जिसके आगे दुनिया फीकी
एक विश्व से अधिक कीमती कविता कवि की।
पतझड़ के पत्तों से मैने गीत चुराये-
अपनी पलकों से वीणा के तार चढाये।

छन्द-छन्द को बाँध-बाँधकर मैं झंकार लिखा करता हूँ।
गीत नहीं लिखता हूँ साथी! मैं संसार लिखा करता हूँ!

शहीद की समाधि

जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढ़ाते जाना!
सोया होगा यहीं कहीं कोई शहीद मस्ताना!

यहीं कहीं मिट्टी में है अरमान तुम्हारा सोया।
खुले गगन के नीचे साधक बड़े प्यार से खोया
सोया है जिसने अँगारों पर अंकुर पनपाया
और लपट पर जिसने कर दी अपने तन की छाया।
यह समाधि है उस शहीद की जो न कभी मरता है
यह निशान है लाल खून का जो न कभी भरता है।
यह सोना है जो तपने पर खड़ा उतर जाता है
इसे झाँकने आसमान का सूरज नित आता है।

ध्येय धार पर तलवारों की कदम बढ़ाते जाना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढ़ाते जाना!

ईसा को शूली देकर जग शीश झुका पाता है
युग का पूजक ही युगवालों की ठोकर खाता है।
ठोकर खा कर दीवाने का प्यार उभर आता है
लैला जब तक होश सम्भाले-मजनू मर जाता है।
पड़ा यहीं है तूफानों में दीप जलानेवाला
सागर में पतवार छोड़कर नाव चलाने वाला।
ढूँढ सकोगे? राणा का हिमहास यहीं खोया है
यहीं तुम्हारा गाँधी या सुकरात कहीं सोया है

यह शहीद की चिता! उभारे मन का घाव पुराना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढ़ाते जाना!

‘तू मजार की अमर चिरन्तन ज्योतिदायिनी रेखा
या हिम का वह श्रृंग न जिसको झुकते जग ने देखा?’
‘मैं बहार का फूल आग का जलता शोला भी हूँ
चढ़ी उमर की लहर धूप की चढ़ती वेला भी हूँ
ठहर! सुनो तो इस समाधि की मिट्टी बोल रही है-
मरो न्याय के लिये ज़हर यदि दुनिया घोल रही है!

जय हो अपने उस राही की-सोया सीना खोले
वह शहीद!-जो मानवता के हित निगलेगा शोले

गाओ! उनके गीत अंत तक है दुहराते गाना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढ़ाते जाना!

फूल चढ़ाते जाना प्यारे! यह शहीद का घर है
जी कर जो था मरा कभी वह मरकर बना अमर है
ओ! अशोक का चक्र पूजकर शान्ति मांगने वाले!
इस समाधि के पास प्राण की पल उलझन सुलझाले!
मत खोजो ‘बहुजन हिताय’ की परिभाषा प्रस्तर पर
मिली चेतना थी अशोक को किसी की समर लहर पर?
यहाँ नये मानव को नवयुग का अभियान मिलेगा
इसे झुकाओ शीश ज्योति का मधु-वरदान मिलेगा

यहाँ चिता के सीने में भी वह अभिमान मिलेगा
ओ भूले इन्सान! यहीं तुमको भगवान मिलेगा!

गानेवाले! इसे सींचकर स्वर बिखराते जाना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढाते जाना!

कह समाधि पर फूल चढाकर विश्वशान्ति की जय हो!
जय हो जग के शोषित-गण की-महाक्रांति की जय हो!
अरे! वही सच्चा शहीद जो मरकर भी जीता है
नीलकंठ! जो विष का जलता प्याला भी पीता है।
आ रही भीष्म को नींद वाण की शैय्या शरमाती है
रचे जमाना व्यूह वीर की तनी हूई छाती है।
स्वप्न बने साकार न्यायपथ तुम्हें बनाना होगा
हो नूतन निर्माण तुम्हें इस पथ पर आना होगा

सदा शहादत तुम्हें कहेगी पाँव बढ़ाते जाना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढाते जाना!

मिट्टी जब तक नम होती है सूखा पड़ जाता है
जब तक आये फूल पेड़ का पत्ता झड़ जाता है
जब तक बिखरे गीत वीणा का तार उतर जाता है
होती है पहचान प्यार का देश बिछुड़ जाता है।
आने लगी बहार-तड़पकर मर जाता है माली-
फूल गिराती चरण-चिह्न पर झुक-झुक टहनी-डाली
मधुशाला के चोर मधुप का देखो कंकर खाना
मिट जाये यदि मधुप लाश पर जग का फूल सजाना।

नादानों का काम भूल पर भूल बढ़ाते जाना!
जानेवाले! इस समाधि पर फूल चढाते जाना!

काँप रही क्यों कलम

काँप रही क्यों आज अंगुली कलम चलानेवाले?
कभी सहमते नहीं राह पर मंज़िल जानेवाले!

चाँद कभी भी नहीं छिपा, उमड़ीं घनघोर घटायें
नहीं रूकी है कभी बाँध पर लहरों की कवितायें!
जली नहीं है कभी आग में अरमानों की सीता
गा सकती है शान्ति-स्वरों पर कभी बाँसुरी गीता!

देख रहे हो समय? भूल है ओ विराट मतवाले!
काँप रही क्यों आज अंगुली कलम चलानेवाले?

बढ़ो! समय की आग सुलगती लेकर नयी जवानी
उठो! बुलाता है तुमको इस पार एक अभिमानी,
रुकी कहीं यदि कलम, धरा की चाल बदल जायेगी
कलम रुकी तो विश्व-शांति की गाथा जल जायेगी।

जगो! आँधियों में विकास का दीप जलानेवाले!
काँप रही क्यों आज अंगुली, कलम चलानेवाले?

कलम चलानेवाले इसकी मर्यादा तोड़ो मत
त्याग, साधना की गागर में विष के कण छोड़ो मत,
यह तो ऐसी राह कि जिस पर जला हुआ जीता है
यह है ऐसा खेत-हृदय का रक्त-विंदु पीता है!

क्यों सीमा का मोह रूको मत पाँव बढ़ानेवाले!
काँप रही क्यों आज अंगुली कलम चलानेवाले?

उदास धागा

एक पहेली की तरह
उलझी हुई
मेरी ज़िन्दगी
जिसे-
जितना ही सुलझाता हूँ उतना ही उलझ जाता हूँ!

मेरी कल्पना की डोर
किसी घाटी में कट गई है
और मेरे सपनों की पतंग
शहर के चौराहे पर बने
बिजली के तारों में
उलझ गई है।
कविता के कुंतल को
सुलझाने वाली ऊँगलियाँ
बिजली के तारों को
छूने से सहम रही हैं।

मेरे बौने हाथों का
लंबा धागा
अपनी रंगीन पतंग के
विछोह से उदास है।
मैं अपनी कटी पतंग को
देख तो सकता हूँ
छू नहीं सकता!

मेरी पतंग
जो बिजलियों के पहरे में
कैद है…
हो सकता है
कि उसे छूने पर
ये बिजलियाँ भी मुझे छू लें
इनकी जंजीरे
मुझे भी बाँध लें
और तब…
कहीं मेरी ही आग से
मेरी पतंग भी न जल जाए

मैं अपनी पतंग को
बिजलियों के घेरे में
भले ही छोड़ सकता हूँ
मगर इन्हें जलने नहीं दूँगा!

ऐ शहर के चौराहों पर रहनेवाली बिजलियों!
रखो मेरी पतंग
अपने हीँ पास रखो…

मेरी साँसों से एक बयार उठेगी
जो तुम्हें झकझोर कर
मेरी पतंग को
मेरे आँगन के
कोने में खड़े
हनुमान की ध्वजा से
लिपटा देगी
और मैं अपनी विजय पर
मुस्कुरा उठूँगा!
मेरी प्रतीक्षा
उतनी बौनी नहीं है-
जो कोई हँसे-

मेरा सपना किसी
टुटपुंजिए का
सपना नहीं है
जो नीलाम हो जाए.

मेरी साख वैसी नहीं
जो कोई दिवालिया कहे मुझे

मैंने उधार पर
व्यापार नहीं किया है।
मेरी मस्ती
कोई उधारी हुई मस्ती
नहीं है
मेरे हाथ में पड़ा
पतंग का धागा उदास है!

मेरे सपने उदास हैं।

मेरी रंगीन कल्पना
बिजली के तारों से
उलझ गई है
एक मैं हूँ मैं
जो-
सपने देखे जा रहा हूँ!

है कोई
जो मुझसे मेरी कल्पनाओं को
छीन ले? …

अग्निशीला में की गई
साधना से
चिलचिलाती धूप का
स्वागत है!
स्वागत है

प्रयाण गान

ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो! बढ़े चलो!
तू दीप रामराज के समाज को गढ़े चलो!

स्वदेश के सपूत हो-विहान की कड़ी बनो,
ओ नौनिहाल! देश के विकास की लड़ी बनो।
कि घिर रहा है अन्धकार हाथ में मशाल लो,
जो जल रही दिशा-दिशा
तो ज़िन्दगी को ढ़ाल लो!

हहर रहा तूफान हो-कमान पर चढ़े चलो!
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो! बढ़े चलो!

तू भीष्म के सपूत हो-तू राम के समान हो,
तू लाल आग क्रांति की-कृपाण के समान हो!
ओ शांतिदूत! विश्व के विनाश का विरोध कर,
है बस रहा नया नगर कि
पाँव बढ़ रहे जिधर!

न जग रहा जहान हो-महान स्वर पढ़े चलो!
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो!

दे आँधियाँ चुनौतियाँ
झुकी नहीं जवानियाँ, पहाड़ या पहाड़ियाँ रुकी नहीं रवानियाँ!
न मिट सकी कहानियाँ शहीद की, महान की,
आगे बढ़ रहे हैं पाँव, राह नौजवान की!
तू ज़िन्दगी के गान से जमीन को मढ़े चलो!
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो!

तनी हुई हैं छातियाँ चल रही है गोलियाँ,
खेल कर मरे नहीं तू खून की भी होलियाँ,
तू खून हो शहीद के-मस्तियों की टोलियाँ
नौजवान! हम तुम्हें लगा रहे हैं रोलियाँ!

तो तुम नया प्रयाण-पथ गढ़े चलो! गढ़े चलो!
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो!

कविता भी दीप जलायेगी

इस साल दिवाली में कवि की कविता भी दीप जलायेगी
वह नयी डगर के नये मोड़ पर हर मानव को लायेगी!

यह दीप-पर्व तो एक रात का खेल नहीं, त्यौहार नहीं
थपकियाँ लहर की खा-खाकर यदि टूट गयी, पतवार नहीं
दीपक तो वह जिसकी लौ से बनता है अंजन आँधी का
जिसमे ताक़त हो नेहरु की, स्वर गौतम का, वर गाँधी का।

अंगार नहीं, शीतलता की चाँदनी प्राण पर छायेगी
इस साल दिवाली में कवि की कविता भी दीप जलायेगी!

इस वर्ष दीवाली में किसका मन गुमसुम या चुपचाप रहा-
जब सन्त विनोबा वामन की धरती को पग से माप रहा!
बँध रहे बाँध के बाँध यहाँ-सागर की सीमा बोल रही
अब वीर भगत की मिट्टी पर गेंहू की पत्ती डोल रही।

सर्वोदय-धारा मानव का बंजर मनखेत पटायेगी
इस साल दिवाली में कवि की कविता भी दीप जलायेगी!

चार दिन की ज़िन्दगी में 

चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?
प्रीत के पथ पर मुसाफ़िर! जीत क्या है हार क्या है?

चार दिन की ज़िन्दगी से साँस का विद्रोह कैसा
दो घड़ी की चाँदनी से ज़िन्दगी को मोह कैसा
चार दिन की ज़िन्दगी में मान क्या अपमान क्या है?
दो घड़ी की साधना में शाप क्या-वरदान क्या है?

चार दिन के इस सफ़र में पार क्या है-धार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

रात भर तो घोंसलों में पंछियों का है बसेरा
और उसके बाद मिलता है उन्हें जलता सबेरा
आह! मन पंछी भटकता रह गया अपनी उमर भर
किन्तु प्यासा ही रहा वह सात सागर की लहर पर

प्यास बुझ पाई नहीं तो सिन्धु क्या है-ज्वार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

ओ मुसाफ़िर! ज़िन्दगी की राह के भटके हुए तुम
देख किस वीरान के सुनसान में अटके हुए तुम
देख! अब भी देख किस शमसान में भटके हुए तुम
देख रे पागल! किसी तूफ़ान में भटके हुए तुम

दो दिनों की रोशनी में फूल क्या है-ज्वार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

दो घड़ी की संगिनी क्या-दो पहर का मीत कैसा?
दो घड़ी की कल्पना क्या-दो पहर का गीत कैसा?
एक पल की ये बहारें-एक क्षण का रूप कैसा?
दो घड़ी की तपन क्या है-दो पहर का शीत कैसा?

चाँदनी बंधती नहीं तो रूप का आधार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

आदमी को बींध देता है नयन का तीर कैसे?
आंख से बहता भरम का द्वीप कैसे-नीर कैसे?
खींच लेता है चितेरा रूप की तस्वीर कैसे?
बाँध लेती आदमी को चाँदनी की पीर कैसे?

चाँदनी ख़ुद ही लहर है बोल फिर पतवार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

चार दिन की ज़िन्दगी में गा सको तो गीत गाओ
यार मेरे पास आओ खिलखिलाओ-गुनगुनाओ
ओ मुसाफ़िर! इस डगर के रूप को पहचान जाओ
चार दिन की ज़िन्दगी में बात मेरी मान जाओ

हो नहीं जिसमें समर्पण, रूप का शृंगार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

दो घड़ी का प्यार कैसा-दो घड़ी का रूठ जाना
प्यार से मिलना बिछुड़कर फिर विदा के गीत गाना!
दो घड़ी मधुमास का आना घड़ी में लूट जाना!
और पनघट पर गगरियों का बिखर कर टूट जाना!

फूल के आगे मुसाफ़िर! तीर क्या तलवार क्या है?
चार दिन की ज़िन्दगी में दो घड़ी का प्यार क्या है?

गागर में सागर छलक उठा

गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है
मीरा पीड़ा के गीत लिखे, तुम कहते हो ‘मतवाली है’ !

जिसको शहीद ने खून दिया, तुम उसको माटी कहते हो?
कुछ सीमा की भी बात करो! जब इस धरती पर रहते हो।
चन्दा में भी देखा कलंक, सूरज को भी बदनाम किया,
जो महल प्यार का बना रहा, उसको ‘मजनू’ का नाम दिया।

ज़िन्दगी विवश है पतझर में, आँखें कहतीं-हरियाली है
गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है!

कवि ने भाषा को पायल दी, उस कलाकार ने ताजमहल,
मज़दूर उसे दुनिया कहती जो गढ़ता है ये राजमहल!
जो जला प्रकाश का व्रत लेकर, केवल परवाना कैसे है?
जो बिना सफ़र के मिल जाये वह मंज़िल पाना कैसे है?

दीपक पर जले पतंग मगर, इन्सान कहे-दिवाली है,
गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है!

मन्दिर के पत्थर ‘देव’ बने, इन्सान मगर उपहास बना,
मर गये समर में लाख, मगर राजा का ही इतिहास बना।
हो गया आदमी खाद जहाँ, वह क्या है! मरघट ने पूछा,
यह गागर कैसे खाली है?-घबराकर पनघट ने पूछा-

पूछा पनघट ने दुनिया की तस्वीर कहाँ से काली है?
गागर में सागर छलक उठा, जग कहता-गागर खाली है!

परदेशी से

सौ-सौ सावन बीत गए पर, एक बार भी आ न सके तुम!

धुला सजल नयनों का काजल
मैं विरहिन, मेरा मन चंचल
पलक खुले रह गए अचंचल

सौ-सौ दीप जलाए मैंने, छवि अपनी दिखला न सके तुम!

प्राण सिहरते रहे तड़पकर
मेघ गरजते रहे रातभर
पाती लिखूँ लेखनी थर-थर

ओ परदेशी! अपनापन का नाता मधुर निभा न सके तुम!

ओ मेरे निर्मम मनवासी
मैं पगली सावन की प्यासी
लिए जेठ की तपन, उदासी

कब से तुम्हें पुकार रही हूँ मलयज लहर उठा न सके तुम!

निशा अमावस, पावस बरसे
विरहिन मूक, हूक ले तरसे
करवट-करवट अँखिया बरसे

पल-पल सपन मिलन का आये, मिलकर नयन मिला न सके तुम!

पहर-पहर सुधि तुम्हें पुकारे
लहर-लहर पर कटे किनारे
थके आज दो नभ के तारे

डगर-डगर पर पलकें बिखरीं, चरण इधर को ला न सके तुम!

पँख नहीं जो उड़कर आऊँ
बंधे पाँव पग किधर बढ़ाऊँ
अब मैं कितने दीप जलाऊँ

ओ परदेशी! कब आओगे पाती एक पठा न सके तुम!

नारी-बंधी लाज की चेरी
पाँखों में पायल की बेड़ी
पुरुष अगम है छलना तेरी

चूड़ी की जंजीर, उलझने वाली लट सुलझा न सके तुम!

किए प्रतीक्षा तेरी दुलहिन
बैठ गई है बनकर विरहिन
लम्बी रातें, लम्बें हैं दिन

कभी आरती की वेला में ओ प्रियतम मुसका न सके तुम!

आत्म-परिचय

मैं उनका कवि, जो जीवन भर, जलते ही रह गये खेत में,
लिये कारवाँ चले कभी तो चलते ही रह गये रेत में!

जिनकी राह-राह पर काँटे,
जो जीवन भर आँसू बाँटे,
चुम्बन देकर पाये चाँटे,

दीप जलाने लगे कभी तो सदा जलाते चले गये जो,
मैं उनका कवि, स्वयं जले तो ज्योति जगाते चले गये जो!

जिन पर जग उपहास कर रहा,
जिनके मन का आस मर रहा,
जिन्हें जमाना नाश कर रहा,

नयी दिशा की ओर बढ़े तो बढ़ना ही अविराम हो गया,
मैं उनका कवि, मर जाने पर ‘रहबर’ जिनका नाम हो गया!

मैं प्रतिनिधि भूखे-प्यासों का,
एक लक्ष्य कटु उपहासों का,
लिये साथ कुछ विश्वासों का,

एक अकेला पंथी पथ का, सबको अपना मान रहा मैं,
कुम्भकार निर्माण-चाक का! बिखरी मिट्टी सान रहा मैं!

तन्तु-तन्तु को जोड़ रहा हूँ,
अणु में जीवन छोड़ रहा हूँ,
बना नया ही मोड़ रहा हूँ,

चिता-धूलि में नये जागरण बोने यहाँ चला आया हूँ,
पत्थर की छाती पर अपने मन का मोम गला आया हूँ!

हर काँटे को मीत बनाता,
हर पीड़ा को गीत बनाता,
नाम हार का जीत बनाता,

एक मुसाफ़िर हूँ दुनिया का, जाना जिसका कर्म बन गया,
मैं उनका कवि, जलकर जिनका गीला कोमल मर्म बन गया!

साथी हूँ पथ के भूलों का,
मृदुल-प्राण में वनफूलों का,
पता लगाता हूँ कूलों का,

बिना लिये पतवार लहर का नाविक मैं पागल, मतवाला,
बाँध रहा पगली लहरों के जूड़े में बाँहों की माला!

लहर-लहर से मुझे प्यार है,
यहाँ न कोई जीत-हार है,
जो है बढ़ने की बयार है,

सागर में भी गीतों का ही अंश मिला तो ज्वार बन गया,
मैं उनका कवि, जिनका आँसू पिघला तो अंगार बन गया!
मैं अँगारों की वाणी हूँ,
हिम-गिरी के मन का पानी हूँ,
विश्व-प्रगति का अभिमानी हूँ,

लिया कैद में जन्म और निकला तो जग घरबार हो गया,
निकला था चुपचाप, चला तो जग में हाहाकर हो गया!

सपने भी साकार बन गए, आहों के आकार बन गए,
फूल कभी अँगार बन गए,

कभी पिघलकर पत्थर का भी सीना मुसलाधार हो गया,
जिस-जिस पतझड़ से मैं गुजरा सबका हीँ शृंगार हो गया!

मैं दुखिया माँ की आशा हूँ,
घायल माँ की अभिलाषा हूँ,
जनम-जनम का मैं प्यासा हूँ

सबकी प्यास बुझे तब पीयें, यह जिसका अरमान बन गया,
मैं उनका कवि, जिनके श्रम से फसल उगी, खलिहान बन गया!

मैं कवि रोते-भिखमंगों का,
घिसते-पिसते अधनंगों का,
अंधों का, बहरों, गूंगों का,

कभी कहीं मुख खोल न पाये उनको नशा पिला सकता हूँ
कवि हूँ शोषित का!
शोषण के घर में आग जिला सकता हूँ!
मैं हूँ पाँव बढ़ानेवाला,
नई डगर पर जानेवाला,
आँधी को दुलरानेवाला,

बना न्याय का प्रबल समर्थक, मरना भी स्वीकार करूँगा,
न्याय मरा तो इसी कलम को घिस-घिसकर तलवार करूँगा!

जीभ कटे मत सत्य छोड़ना,
हर फिसले से नेह जोड़ना,
जोड़ जुल्म का मूल कोड़ना,

मैं असली चाणक्य! कूश की जड़ में मट्ठा डाल रहा हूँ,
खुली हुई है शिखा, युगों से दर्द प्रगति का पाल रहा हूँ
!

लू-लपटों में जीते जाना,
विष के प्याले पीते जाना, हर दरार को सीते जाना,

ऐसा जिसका लक्ष्य, वही तो कभी अमर आधार बनेगा,
मैं उनका कवि जो मिटकर भी नयनों में साकार बनेगा!

तोड़ रूढ़ि के निर्मम बन्धन, मिटा स्वार्थ का अविरल क्रंदन
भरे विश्व में सुखद नयापन,

संघर्षो में जीनेवाला राही, युग-हुंकार बनेगा,
माटी का दिया जल-जलकर पावन ज्योतिर्धार बनेगा!

मैं कवि गाँव, कुदाल, हलों का,
मैं कवि गेंहूँ की फसलों का,
मानवता के हर पगलों का,

मानवता की फसल उगी तो एक नया संसार बन गया,
मैं उनका कवि, जिनका जीवन सागर में पतवार बन गया!

मिटा मिटा कर टीले, खाई
समतल की आशा मुसकाई,
पंथी की पग्ध्वनि फिर आई,

जादू की परछाईं जिस पर पड़ जाये, वह हरा हो गया!
मैं उनका कवि, जिस शहीद के बल पर मानव खड़ा हो गया!

गाना होगा महाप्रलय को,
निकल मानवों! विश्व विजय को,
मिटा विश्व के भय-विस्मय को

चलनेवाले हर राही का साथी हूँ, पथ का प्यारा हूँ, शोषित मानव के सीने की आहों से निकला नारा हूँ!

ऊँच नीच का भेद मिटाकर,
मानवता को सुधा पिलाकर,
बढ़ना होगा पाँव बढ़ाकर,

जिस जिस में पथ पर बढ़ने का यह जलता अभ्यास बन गया,
मैं उनका कवि जिनके बल पर सर्जन फला, इतिहास बन गया!

बदनाम आदमी 

सच कहनेवाला दुनिया में बदनाम बनाया जाता है,
इन्सान न्याय की वेदी पर ईसा का खून चढ़ाता है!

है कहाँ खड़ा मंसूर आज जो बलिवेदी पर जायेगा?
गाँधी अपनी सच्चाई का उपहार गोलियाँ खायेगा!
ज़ंजीरें सबने पहिनायीं मानवता के मतवालों को,
ली काट जीभ तलवारों से, हँस दिया देखकर छालों को.

यह दुनिया आग लगा देती हर दीप जलानेवाले को,
बेड़ियाँ पाँव में देती है मंज़िल पर जानेवाले को.
निर्माण जगानेवाले को दे रही लहू की होली है,
ताने कसती है रहबर पर, यह दुनिया कितनी भोली है!

तालियाँ उसी पर देती है जो राह बताने आता है,
बीसवीं सदी का हरिश्‍चन्द्र ईमान बेचकर खाता है!

हर एक वीर है बेईमान, हर झूठा एक खिलाड़ी है,
जो पाप छिपाले ख़ूबी से, वह जीने का अधिकारी है,
इन्साफ़ चीज है सौदे की, जो चाहेगा, वह पायेगा.
ईमान तौलनेवाला यह बाज़ार, न मिटने पायेगा.

इस दुनिया की बदनामी से, हर बार मुसाफ़िर हारा है,
सच कहो अगर तो कट जाओ-बस यही आज का नारा है.
छल को देता है कर्ण कवच-कुंडल भी अपनी काया है,
आदमी नाम है छलियों का, मदहोशों का, दोपाया का!

आदमी एक आवारा-मन, जो माँ, बहनों पर आता है,
फिर मन्दिर, मस्जिद, गिरजे में पूजा के फूल चढ़ाता है.

इन्सान खड़ा चौराहे पर, चाँदी के जूते खाने दो,
इसको नंगी मानवता पर खुल-खुलकर टिकट लगाने दो.
इन्सान बाप है बेटी का, उस्ताद खुले बाज़ारों का,
ईज़्ज़त की टोपी पहन-पहन जो काम करे गद्दारों का.

आदमी, शान्ति का चाहक है-यह महानाश का गोला है,
आदमी, फ़सल है धरती की-रेगिस्तानों का शोला है.
यह महावीर है, गौतम है, तो हिटलर का अनुयायी भी,
यह सत्य-अहिंसा पूज रहा तो छूड़ी लिये कसाई भी!

आदमी, पेट के लिये, लाज को बेच शहर में आता है,
यह शाहजहाँ जो शोणित पर पत्थर का ताज़ बनाता है!

यह दुनिया, अग्नि-परीक्षा दे सीता होती बदनाम जहाँ,
लग गया चाँद में भी कलंक, लगता अस्मत का दाम यहाँ.
फिर मिले मान भी योगी के माटी में, कैसा नाता है ?
बदनाम सूर्य भी कुन्ती के आँचल में प्यार चुराता है.

बदनाम गली है दुनिया की गंगा-यमुना की धारा है,
फिर भी आदमी समुन्दर है, जो खारे का ही खारा है.
यह सर्वोदय की मधुर कड़ी, कटु सर्वनाश की ज्वाला है,
सागर से निकला अमृत भी, यह विष का जलता प्याला है.

आदमी फूल का माली है, जो पथ पर शूल बिछाता है,
अपने भाई के खेतों पर कस-कसकर मेड़ बनाता है.

इन्सान तपाया सोना है, यह राख बनी मर्यादा है,
यदि अवतारों का चेला है, तो आवारों का प्यादा है.
यह धर्मराज ! जो कभी स्वार्थ के हित असत्य चिल्लायेगा,
खोखले आन की छाया में नारी पर दाँव लगायेगा!

मानव गाँधी की ताक़त है, संतों, मुनियों का चेला भी,
यह नाथू की पिस्तौल अगर, बाज़ारों का अलबेला भी.
यह घिसी-पिसी मानवता है, जो घिसती-पिसती जायेगी,
क्या पता कि वह किस राही को, कब शूली पर ले आयेगी!

क्या कभी साँच को आँच लगी, माटी का तन जल जाता है,
सच कहनेवाला दुनिया में, बदनाम बनाया जाता है!

ज़िन्दगी की रीत

ज़िन्दगी हर क़दम स्वर बदलती गयी-
आँख मलती गयी, साध पलती गयी, साँस चलती गयी.

क्षण डगर पर रही, पल लहर पर बही, बात यह अनकही,
मोड़ पर वह मुड़ी, छोर भी गह रही, ताप भी सह रही,
पंथ छूटा मगर, आश रूठा मगर, प्यार टूटा मगर-
चाह आती रही, आह जाती रही, बात भाती रही…
चेतना पाँव उसके दबाती रही, साध गाती रही,
ज़िन्दगी स्वप्न सजती-सजाती रही, पग बढ़ाती रही,
पग उठाती चली, दीप-बाती जली, राह पाती चली-
स्नेह जलता गया, मन मचलता गया, मोम ढ़लता गया!
मोम की ज़िन्दगी!साँझ में जो बली-भोर तक वह जली,
उम्र की यह लहर, ज़िन्दगी बुलबुला, अब बनी, तब मिटी,
हर लहर पर छहर, हर घड़ी-हर पहर वह मचलती गयी-

रोक खलती गयी, याद छलती गयी, साँझ ढ़लती गयी,
ज़िन्दगी हर क़दम स्वर बदलती गयी-

गीत बुलबुल के गा, शूल पथ में चुभाकर बढ़ी ज़िन्दगी,
काढ़ घूँघट लजा और घूँघट उठाकर कढ़ी ज़िन्दगी-
ताज़ उसका यहीं, राज उसका यहीं, साज भी सज रहा,
मन नशीला था कल, तार ढ़ीला था कल-
आज भी बज रहा!
नाश फटते रहे, पाश कटते रहे, ज़िन्दगी है अड़ी,
ज़िन्दगी की घड़ी-
रेत में भी तपी, धार में भी खपी, पृष्ठ में भी छ्पी!
खेत में फल रही, आग पर चल रही, काल-तरू पर
खिली, कामना की कली…

काल सीमा में है ज़िन्दगी पर नहीं,
ज़िन्दगी चल रही खोजती दर नहीं,
उसकी डगरें बहुत कोई भी घर नहीं,
उसके दुश्मन बहुत – कोई भी डर नहीं!…

ज़िन्दगी जी रही-आसमां कह रहा ‘औ’ ज़मीं कह रही,
आदमी बढ़ रहा-ज़िन्दगी बढ़ रही-

आत्मा जी रही, रूप का आवरण उड़ गया तो उड़े,
साधना पी रही, प्यास लेकर मरण मुड़ गया तो मुड़े!
रात-दिन यह चिता, दे रही है पता, बढ़ रहा आदमी-
पल रहा आदमी, चल रहा आदमी, जल रहा आदमी…

साध पलती गयी-साँझ ढ़लती गयी-सेज जलती गयी,
ज़िन्दगी हर क़दम स्वर बदलती गयी !

सुनसान डगर

न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?
यहाँ गहराईयाँ इतनी, लहर अनजान लगती है!

उड़ाकर धूल राही ने, जगाकर पाँव से शोले,
पुकारा जोर से-‘मंज़िल’ ! मगर बहरा जगत बोले ?
कराहा आह ! मुझको राह का सुनसान खलता है,
अरे इन्सान ! तुमको स्वयं ही इन्सान छलता है.

बहुत इन्सान मिलते हैं सड़क वीरान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

न जाने क्यों हृदय कोमल सजाये प्यार बैठा है?
बहुत गुब्बार है मन में, नयन में ज्वार बैठा है!
कहाँ संसार सपनों का कहाँ वो तार कम्पित है?
कि आनत ग्रीष्म-पत्रों पर ‘नया संसार’ अंकित है.

जलन की वेदनाओं से बहुत पहिचान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

रखे आशा कहाँ राही, निराशा के बवंडर में,
पनप कर ज्ञान के अंकुर, न फैले निठुर वंजर में !
बुझे जब दीप तो आँधी मनाने भी नहीं आयी,
जले जब दीप तो आँधी क्षितिज के छोर तक छायी.

दिशा के छोर में सिमटी मधुर मुस्कान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

न जाने क्यों कभी अपने, पराये से नज़र आते,
न कोई आज तक बोला, कटा दो रात कुछ गाके.
बहुत धीरज समेटे हैं अभी तक बाँह फैली है,
कहाँ ठहरें ? यहाँ तो धूप से ही छाँह मैली है!

थकी है ज़िन्दगी, दम तोड़ती सी तान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

प्रगति चीखी- ‘तनिक ठहरो’, तो आँधी ने कहा- ‘बल है’ ?
मुसाफ़िर ने कहा-‘इतना अधिक इन्सान निर्बल है?
सफ़र है ज़िन्दगी जो आँधियों में भी मचलती है,
अँधेरा जब बहुत बढ़ता, हृदय की ज्योति जलती है !

हृदय का दीप जलने दे- धरा नादान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

मुसाफ़िर बढ़ रहा देखें- कहीं भगवान भी बोले,
न बोला आदमी तो राह की चट्टान भी बोले!
कहे पथ पर कोई आकर- ‘बटोही ! पंथ प्यारा हो’,
भले साँसें उखड़ जायें, बढ़ो का एक नारा हो.

यहाँ मंज़िल बताने को खड़ी चट्टान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है!

डगर सुनसान लगती है – बटोही तुम बढ़े जाओ,
सड़क वीरान लगती है – बढ़े जाओ न घबराओ!
जो चलता आग में जलता, उसे वरदान मिलता है,
कभी अनजान मंज़िल को नया मेहमान मिलता है!

हवा तूफ़ान की करती हुई आह्वान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

उठाले लाश ओ राही! किसी विश्वास के घर की,
बनाकर अर्थियां चल दे, यहाँ से आज पतझड़ की !
जिये विश्वास, पतझड़ की नया जीवन कहीं पाये,
बढ़ो तुम क्योंकि सम्भव है यहीं मंज़िल चली आये !

सजग यह चेतना गति की, लिये अभिमान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है !

विदा के आँसू 

जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है!
हर प्रीत-नगर के कैदी की ज़ंजीर मगर रह जाती है.

मेरे परदेशी ! बिछुड़न की इस वेला में मुस्काओ तो!
गीली पलकों को एक बार आकर धीरे सहलाओ तो!
मेहमान ! विदा की वेला में सुधि व्यथा कहाँ पर बोयेगी?
आँखों की यमुना पर रह-रह राधिका प्राण की रोयेगी !
थिरकेगी मन की मीरा जब प्रति साँस-साँस पर याद लिये-
स्वर माँग पपीहरे से उसकी, मैं आऊँगा फ़रियाद लिये!

पी कहाँ ? पपीहरे की भींगी अवाज़ तुम्हें दुहराती है,
वेदना विदा की वेला में लिख रही प्यार की पाती है.
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है!

इस विदा-गीत को प्राणों का स्वर देकर कैसे गाऊँ मैं?
जब तार वीण के टूट रहे, झँकार कहाँ से लाऊँ मैं?
किसको-किसको मैं विदा करुँ ? हर मिलनेवाला जायेगा,
कल समय ज्वार के कंधों पर जाने किसको बिठलायेगा?
हर मिलनेवाला जाने के पहले पत्थर हो जाता है,
पंछी से या परदेशी से दो-चार घड़ी का नाता है !

यह नीड़ तुम्हारा ओ पंछी! वेदना पवन-पथ आती है,
कैसे जाओगे ? आँसू की वरसात उमड़ती जाती है!
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है!

जानेवाले के लिये मगर, बरसातों का कुछ मोल नहीं,
है एक हमीं, जो पाते हैं मन की बातें भी खोल नहीं.
सौ बार आँख को समझाया मत रोओ-मन घबड़ाता है,
चढ़कर आँखों की पाँखों पर यह धीर-विहग उड़ जाता है.
भर-भर जाते हैं नयन आह ! धुँधलापन छा-छा जाता है,
अन्तर का नीरव स्नेह पिघल, खारा आँसू बन जाना है!

जा रहा मुसाफ़िर डगरों की पहचानी रीति बुलाती है,
बेपीर विदा की वेला में कुछ प्रीति नहीं कह पाती है.
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है!

तुम जाओ तुमको पलकों की पँखुड़ी बिछाकर जाने दें!
तेरे पथ पर हम दीपों की आरती सजाकर जाने दें!
बस, एक माँग है ढ़ोकर भी हम सब की याद लिये जाना!
जब नीड़ पुराना याद पड़े, भूले-भटके भी आ जाना !
जूही की कलियाँ सिमट रहीं जब साँझ विदा की आयी है
सब वही-सिमटने को आतुर तेरे पग की परछाई हैं.

रह-रहे तुम्हारे चरण-चिह्न, रह रही कसक बन थाती है,
मिट जायें पतंगे चुपके से वह लौ भी है, वह बाती है.
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है !

दस्तूर यही है दुनिया का सब की आँखों का नूर गया,
जो एक लहर बनकर आया, बुलबुले बनाकर दूर गया.
छवि की ‘मुमताज़’ बिछुड़ती जब, फिर साज सजाकर क्या होगा?
पंकिल पलकों पर पत्थर का अब ‘ताज़’ बनाकर क्या होगा ?
मन आज मोम का तड़प रहा, लौ सहम रही जानेवाले !
हे निठुर ! अर्चना के स्वर ले आँखों की गंगा जल ढ़ाले !

पाषाण पूजकर क्या होगा फिर भी माला ललचाती है,
तुम जाते हो अरमानों को आने की आहट आती है.
जानेवाला तो जाता है तस्वीर मगर रह जाती है !

अब तक सपने रहे अधूरे

अबतक सपने रहे अधूरे, एक गीत भी गा न सका मैं,
पत्र पतंगों ने लिख भेजे, दीपक मगर जला न सका मैं!
बहुत पुकारा पगडंडी ने, अपने क़दम चला न सका मैं!

सागर का सन्देशा आया, कवि ! लहरों से चाँद मिला दो,
मजनू बोला गीतकार ! तुम विरह-गीत की शिखा जला दो!
धरती बोली- सुनो ! प्यास का मर्म आज कहदो अम्बर से,
मानव के आँसू बोले- तुम घाव विश्व का भर दो स्वर से.

लेकिन, मानव को मानव के पास अभी तक ला न सका मैं,
आसमान, धरती से मिलकर गाये, ऐसा गा न सका मैं!
अब तक सपने रहे अधूरे…

कौन गा रहा गीत? गीत पर कैसे हो विश्वास किसी का?
गीतकार के नाम बिक रहे, कैसे बढ़े विकास किसी का?
गीत स्वयं मुझसे कहते हैं- कवि ! मेरा श्रृंगार सजा दो,
टूट रहे घूँघरू के दाने, पाँव बढ़ा दो – हाथ बढ़ा दो.

हाथों में ज़ंजीर बँधी है, बाती तक उकसा न सका मैं,
आसमान, धरती से मिलकर गाये, ऐसा गा न सका मैं!
अब तक सपने रहे अधूरे…

एक गीत भी गा न सका मैं, स्वर बाँधे तो गीत बँध गये,
ओर-छोर तक सिसकन ही थी, साधा तो संगीत बँध गये.
कला पतन के पथ से बोली- गीतकार तुम लाज बचाना,
कलाकार ! हो सके अगर तो आकर मेरी लाश उठाना!

मगर, गीत के हाथों से खुद अपने को सहला न सका मैं,
मुझे तड़पता देख हँसे सब, अपना जी बहला न सका मैं!
अब तक सपने रहे अधूरे…

ऐसे; गीत लिखे कितने ही, उमर गुजारी गीत बनाकर,
मैं प्रयोग कर रहा कि देखूँ आँसू को संगीत बनाकर!
साथ समय ही नहीं दे रहा, भावुकता का दोष न कहना,
सागर के प्यासे को कोई, शबनम पर बेहोश न कहना!

विस्मय तो यह, चला बहुत पर, मंज़िल अपनी पा न सका मैं,
चौराहे से चला, राह भी मालूम है पर, जा न सका मैं!
अब तक सपने रहे अधूरे…

रोना भी चाहा तो, आँसू बाहर अपने ला न सका हूँ,
चाहा बनना मेघ मगर, जलती धरती पर छा न सका हूँ.
पत्र पतंगों को लिखकर भी उनतक मैं पहुँचा न सका हूँ,
है इतना सन्तोष, उदासी पाकर भी घबड़ा न सका हूँ !

सोचा तक भी नहीं, कि अब तक नायक क्यों कहला न सका मैं-
कला अधूरी रही, अधूरे गीतों से नहला न सका मैं !
अब तक सपने रहे अधूरे…

आशा

आशा पर संसार टिका है सच मानो, सच बोल रहा हूँ,
जग आशा में, आशा जग में, भेद हृदय के खोल रहा हूँ,
कहाँ अछूता है वह प्राणी जगी न जिसमें कभी पिपासा?
प्यासे उर की धड़कन तुमको बुला रही है पगली आशा!

व्यथा सहनकर भी शिशुओं को पाल रही क्यों उनकी माता?
जीवन-द्रोणी भटक रही है तट पाने की ले अभिलाषा!
पिया-मिलन की ही आशा में पिया-पिया चातक रटता है,
चंचरीक का अधर कली से कुछ पाने को ही सटता है!

पतझड़-ममर में कोयल की तृष्णा जगी हुई होती है,
नव-वसन्त की बाट जोहने में ही लगी हुई होती है,
आशा की पतवार न हो तो यह भवसागर पार न होगा,
पतझड़ में द्रुम गिर जायें तो फिर उनका श्रृंगार न होगा,

घोर निराशा की बदली में आशा की बिजली आती है,
हाये! चाँद को ढूँढ़ चकोरी आस जगाये रह जाती है,
राम तपोवन में रमते हैं आह! भरत बिल्कुल प्यासा है,
रोती है माणडवी हाये रे! कैसी यह अद्भुत आशा है?

इधर राम को देख! तपोवन सूना-सूना सा लगता है,
आशा है बस पिया मिलन की, लखन वेदना से ढ़हता है,
उधर यशोदा के प्राणों में पीड़ा अगम-अपार देख लो!
विरहन राधा ढूँढ़ रही है बीती हुई बहार देख लो!

देखो! दीवानी मीरा में पायल की झनकार देख लो!
युग का सोया प्यार देख लो- आशा का विस्तार देख लो!
सुख में-दुख में सब में तुम हो, आशे! आशे! कहाँ नहीं हो?
जिस दिन आशा चली जायगी, सृजन थिरकता वहाँ नहीं हो?

मरणासन्न मनुज रटता है- पानी दे दो! पानी दे दो!
स्वतंत्रता की अभिलाषा में वीरों की क़ुर्बानी देखो!
सूर्यदेव आयेंगे नभ में सूर्यमुखी की अभिलाषा है
जड़-चेतन के मन-मन्दिर में सोई कैसी मधु आशा है!

कल्पवृक्ष की कली चली आ! आज तुम्हारा अभिनन्दन है,
पड़े न इनके बन्धन ढ़ीले, यह साँसों का स्पन्दन है!
मेरी कोमल आशा आओ! कभी निराशा तुझे न पाये
तीव्र-तुषार शिशिर के पाकर नहीं कमलिनी प्राण गवाये

आशाओं का नाम जगत है, एक इसी पर जग चलता है,
घोर निराशा की छाती पर आशा का दीपक जलता है!
तजे युगों से प्राण विश्व ने आशा नहीं तजी जाती है,
महल, कुटी, बंजर जीवन में, पायल बनी बजी जाती है!

श्रान्त प्राण की तपन-जलन पर स्नेह सुधा बरसा दो आशे
जीवन की तम-पूर्ण डगर पर जग-मग दीप जला दो आशे
आज धरा के रन्ध्र-रन्ध्र में मधुर हास बिखरा दो आशा
चूमूँ कहाँ कपोल तुम्हारे?…अयि! मेरे जीवन की भाषा

इसको केवल गीत कहो मत

इसको केवल गीत कहो मत, जिसमें नयन-सिन्धु लहरा है,
एक दर्द का गीत तुम्हारे सात समुन्दर से गहरा है!

विकल हृदय का रक्त गीत की उष्ण कल्पना लिये प्रवाहित,
सरल, तरल, फेनिल प्राणों में शत-शत स्नेह-प्रदीप प्रदीपित.
मोहन की मुरली में राधा के स्वर का तूफ़ान रह रहा,
तानसेन गा रहा मोम बनकर कोई पाषण- बह रहा!
मन की अल्हड़, चंचल मीरा थिरके तो विषपान, गान हो,
हे उपासने गीतकार की! -स्वर साधो, ज्योतिर्विहान हो.

गीतकार जी रहा, साँस पर वाणी का मंगल-पहरा है,
एक दर्द का गीत तुम्हारे सात समुन्दर से गहरा है!

यही दर्द के गीत बदलते रहे युगों की निर्ममतायें,
गायक अमर रहा! धरती पर प्रतिदिन जलीं करोड़ चितायें.
महानाश में उठी गीत की लहर, सृजन की बाढ़ आ गयी,
गीत-पंचमी पतझड़ के घर पर बहार के गीत गा गयी!
गाते-गाते गीतकार की उखड़ी साँस, बयार बन गयी,
जग ने तिनका कहा; -लहर पाकर उसकी पतवार बन गयी!

इसिलिये कवि संघर्षों में सृजन-गीत लेकर ठहरा है,
एक दर्द का गीत तुम्हारे सात समुन्दर से गहरा है!

मेरे आँसू के गीत

मेरे आँसू के गीत ज़माना हँसकर गायेगा-
क़दम तो चलता जायेगा.
राह पर आँधी आयेगी, गगन में बादल छयेगा-
दीप तो जलता जायेगा!
डगरिया जलती है जलले, गगरिया छल-छल जीवन की-
कहानी गढ़ती जाती है.
नजरिया छलती है छल ले, गुजरिया पल-पल सावन की-
लहर पर बढ़ती जाती है!
उमड़ता आहों का आकाश, बनाते चाहों के इतिहास-
मुसाफ़िर पाँव बढ़ाना है.
पाँव पर आयेगा मधुमास, दाँव पर हो बिखरेगा हास-
तुम्हें तो चलते जाना है!
मेरे पथ का सन्देश, आदमी पथ पर पायेगा-
मुसाफ़िर पलता जायेगा.
मेरे आँसू के गीत, ज़माना हँसकर गायेगा-
क़दम तो चलता जायेगा!

माना

माना, जग ने रोका है जिसको भी चाहा;
गानेवाले को रोका हो तो हम जानें!
आनेवाले तो ठहर कहीं जाते ही हैं,
जानेवाले को रोका हो तो हम जानें!

होगा कोई जो बना गया है ताज़ महल-
मन पर भी कोई ताज़ बनाया जा सकता!
वह राजमहल तो राज चलाता सीमा पर,
मन पर भी कोई राज चलाया जा सकता!

खोनेवाले पर दुनिया तो हँसती ही है-
पानेवाले को रोका हो तो हम जानें!
माना, जग ने रोका है जिसको भी चाहा;
गानेवाले को रोका हो तो हम जानें!

मन्सूबों में तो आग सदा लगती आयी,
जीनेवाली आशा उसमें भी होती है.
हर एक मरण में सन्नाटा अक्सर छाता,
जीवन की भाषा मरघट में भी सोती है!

छाया भी लू में झुलस, ठूठ बन जाती है-
छानेवाले को रोका हो तो हम जानें!
माना, जग ने रोका है जिसको भी चाहा;
गानेवाले को रोका हो तो हम जानें!

ले जाये कोई लूट किसी की बस्ती भी,
मस्ती उसकी दो-चार घड़ी भर जाती है.
सम्बल भी कोई छीन मुसाफ़िर का रख ले-
आगे की उसकी राह नहीं मिट पाती है.

हर एक सत्य पर दो पर्दा, लेकिन उसके
लानेवाले को रोका हो तो हम जानें!
माना, जग ने रोका है जिसको भी चाहा;
गानेवाले को रोका हो तो हम जानें!

हर एक प्यार पर रोड़े तुम बरसाते हो-
भानेवाले को रोका हो तो हम जानें!

शूल मेरी ज़िन्दगी का

शूल मेरी ज़िन्दगी का मीत होने जा रहा है
ठोकरों का दर्द पथ का गीत होने जा रहा है!

दीप जलता ही रहा तूफ़ान कितनी बार आये
हिल गयीं डगरें न पल भर पाँव मेरे डगमगाये!

साधना बढ़ती रही जब अर्चना के स्वर सजाकर-
बढ़ रहे मेरे क़दम अंगार पथ के पार आकर!

क्यों मरण मेरी प्रगती से भीत होने जा रहा है?
ठोकरों का दर्द भी जय-गीत होने जा रहा है!

हैं नहीं अवकाश पलभर चोट भी सहला सकूँ मैं!
आँधियों को वक्ष पर रुककर ज़रा बहला सकूँ मैं!

पंथ के व्यवधान मुझसे बात करना चाहते हैं
आ रही मंज़िल निकट व्याघात करना चाहते हैं!

दूर सीमा पर गगन जब पीत होने जा रहा है
ठोकरों का दर्द भी मनजीत होने जा रहा है!

भोर के तारों ठहरना! मैं तुम्हारे पास आया
ज़िन्दगी की रीत का भींगा करुण-इतिहास लाया!

रात धरती पर सरस शबनम सुलाकर जा रही है
साधना को प्रात की अरुणिम-किरण दुलरा रही है…

पथ मुसाफ़िर के लिये संगीत होने जा रहा है!
ठोकरों का दर्द कवि का गीत होने जा रहा है!

ये गीत समर्पित हैं उनको

तुमने उलाहने बहुत दिये, इन्साफ हमारा दे न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

मैं पथ पर आया उसको भी तुमने ही उस दिन भूल कहा
मेरे हर एक दिशापथ पर बिखरे हैं लाखों शूल कहा.
रोका मुझको तुम रुको पथिक! मंज़िल पालेना खेल नहीं
सम्बल भी मेरा लूट लिया, अब शेष दीप में तेल नहीं.

मैं लहर पकड़कर चीख उठा, तुम कभी किनारा दे न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

जानेवाले का पथ रोका, मंज़िल का नाम विराम दिया
मैंने था पूछा पता किन्तु, तुमने पागल का नाम दिया.
मैं बढ़ने लगा मगर तुमने रुक जाने के संकेत किये-
मैंने माँगे गतिज्वार मगर तूने बालू के खेत दिये.

मंज़िल पाने के पहले हम आशीष तुम्हारा ले न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

जब पाँव बढ़े उपहास किया, पथ पर देखा जल गये बहुत
मुझको अब पीछे मत खींचो, चलना ही था- चल गये बहुत!
कट गयी उमर चलते-चलते, बस एक डेग अब बाकी है
राहों में चाहों की शराब का एक पेग अब बाकी है.

तय हुई सफ़र मझधारों पर, तिनके का सहारा ले न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

मैंने ख़ुद अपना पथ खोजा, अपनी मंज़िल के पास चला
आशीष-रूप में साथी सा बनकर तेरा उपहास चला.
सम्बल का दीन बना लेकिन, ये शूल राह के मीत बने
तुमने जो आँसू दिये मुझे, मेरी मंज़िल के गीत बने!

ये गीत समर्पित हैं उनको जो पथ का नारा दे न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

ये गीत समर्पित! उनको जो इस युग-धारा पर बढ़ते हैं
ये गीत समर्पित! उनको जो पथ अपना अपने गढ़ते हैं.
उनको ये गीत समर्पित हैं जिनको मुझ से कुछ प्यार नहीं
यह मंज़िल उनके लिये कि जो मंज़िल के ठेकेदार नहीं.

पूनम को तुमने ढ़ंका, मगर रजनी को तारा दे न सके
मंज़िल पाने में देर हुई, तुम एक इशारा दे न सके!

मानव गोदाम 

मानव का पेट क्या?
दुनिया का नक्शा है, नारंगी सा गोल-गोल!
मानव के पेट में
सबसे बड़ा एक, चमड़े का थैला है।
ऊपर से चिकना है,
भीतर में मैला है।
जिसमें हजारों समुन्दर समा जायें।
पेट भी हो ऐसा, हिमालय पचा जाय।
यानि दुनिया में जितनी भी चीजें हैं,
सबको पचाने की शक्ति है पेट में!
पेट देवता को मेरा नमस्कार है।
दुनिया में मानव का,
पेट ही पहाड़ है।
पेट एक झोला है।
जिसकी सिलावट में, ईश्वर के टेलर ने,
बुद्धि की सूइयों में,
अँतड़ी के धागों को रख-रख के,
सी-सी के,
अपने कमाल का परिचय दिखाया है।
टेलरिंग के नाम को आगरे के ताज़ से,
मिश्र के पिरामिड,
सिकन्दर के पंजे से,
बैवीलोन के बाग से भी उंचा उठाया है।
पेट है गोदाम एक!
जिसमें आसानी से टन के टन,
मन के मन, चावल समा जायें।
गेहूँ समा जायें।
मिर्चा-मलाई से हलुआ खटाई तक,
मरुआ-मिठाई तक,
दुनिया में जितनी पचाने की चीजें हैं,
ढ़ेर के ढ़ेर सड़ते हैं मानव गोदाम में।
फिर भी फिकर क्या? मानव गोदाम है न!
भरते चलो भरते चलो, भरना ही काम है न!
लेकिन गोदाम यह!
अचरज की बात है जो अभी तक खाली है,
टी.बी पेसेन्ट के, छूतवाले कमरे सा।
इसको न भरा देखा, बड़े-बड़े पुरूषों,
अवतारों ने,
लेनिन नेपोलियन ने,
मार्क्स ने,
बुद्ध ने या ईसा ने,
जर्मन-जापान या उड़ीसा ने,
गांधी ने या जिन्ना ने।
अब के जवाहर ने भी अभी तक भरा ही नहीं।
देखा किसी ने नहीं भरती गोदाम को।
क्या मजाल है कि कोई माई का लाल हो,
चाहे राम हो, गोपाल हो,
नृसिंह या कल्कि. कोई भी अवतार हो,
भरा हुआ देखा हो सपने में,
मानव गोदाम को।
मानव का पेट एक भीषण समस्या है,
ऐसी पहेली है जिसको सुलझाने में,
पंडित-धुरन्धर ने,
हिसाबी-किताबी ने,
खींसें निपोड़ दी।
चर्चा भी छोड़ दी।
कोई ऐसा हुआ नहीं, जिसने निकाला हो.
निदान इस समस्या का।
किसी भी फरमूले से, उत्तर दो हिसाब का,
तो जाने हम ईश्वर के बेटे हो।
ज्ञानी हो, पंडित हो।
सामने में पेट के तो, वेद सभी झूठे हैं।
शास्त्र सभी फीके हैं।
दुनिया की तड़क-भड़क, नाच-रंग,
सब पर जमाया है, रोब इसी पेट ने।
देखने में छोटा सा, यही पेट!
बाबन का अनुपम अवतार है।
बाबन ने नापी भी धरती थी डेग से,
लेकिन इस पेट को, रहने का ठौर नहीं।
मानव का पेट एक चलता कारख़ाना है,
जिसमें समाये हैं, हजारों चितरंजन,
असंख्य मील टाटा के।
दुनिया में पेट ही, ऐसा कारख़ाना है,
चलता है रोटी पर, दाल पर, पानी पर;
इसकी कमी का नाम, भूख हड़ताल है,
चूहे भी कूदते हैं तभी कारख़ानें में,
इसकी मशीन क्या, चमड़े की बिजली है,
पावर का हाउस है,
चाहे तो चूहे भी खा जाय।
बकरे को छोड़िये, नेवले के साथ ही,
गीदड़ पचा जाय।
पेट के ही कारण; ठना था महाभारत,
जिसमें भगवान ने भी हिस्सा बँटाया था।
ख़ुद भगवान ही जब, पेट नहीं भर सके,
औरों की बात क्या?
और यहाँ, दाने के लाले हैं,
शोषण का जमाना है।
जो भी हो!
सृष्टि को तो आदि से अन्त तक,
पेट ही, शरण देता आया है।
इसी के प्रमाण तो आप भी हैं,
मैं भी हूँ, और सारे लोग हैं।
मानव की बात तजें, झखते हैं पेट लिये,
दुनिया के कुत्ते भी, गीदड़ भी,
संशय हो आपको, तो देखने को,
पावर वाली बुद्धि का चश्मा लगाईयेगा!
अब के जमाने में, सबको सता रही,
पेट की समस्या है।
इसीलिये झगड़ा है स्वेज का,
पाक-कश्मीर का!
पेट का ही नया नाम, विनोबा का भूदान है।
देश की अकाली है।
नेहरु की माँग है।
कितना कहें, योजना-विकास है।
टोकरी भर बात है।
यह है तो वह है।
फलाँ है तो चिलाँ है।
सुना है कि राम राज,
फिर से बसेगा यहीं।
राम जाने पेट राज्य की भी कहीं चिन्ता है?
ऐसे गोदाम के भरने में देर है क्या?
फिर कभी पेट राज्य,
राम राज्य की तरह धरती पर आयेगा?
हो कोई जवाब तो कल्ह तक बताईयेगा।
मानव गोदाम की बातें बताने में,
कविजी का दोष क्या?
कवि जी के सामने तो,
सारा भूगोल है,
सूरज भी गोल है,
चन्दा भी गोल है,
दुनिया भी गोल है।
मामला भी गोल है।
मानव गोदाम का कमरा भी गोल है।
आपका भी गोल है,
हमारा भी गोल है।
चक्कर लगाईये तो फिर यहीं आईयेगा।
अनपच हो ज़्यादा तो,
पास की दूकान से,
मानव गोदाम को,
पाचक खिलाईयेगा।
अपनी जठराग्नि को,
दाना नहीं मिलने पर, करना हो शान्त तो,
साग ही उबालकर
चबा-चबा खाईयेगा।
तब कहीं कवि जी के,
शान्तिवाले लेक्चर को,
पावभर समझियेगा,
फौलो कर पाइयेगा।

उपालम्भ

मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?
तुम कली बनकर खिली थी, हार बनकर खो गयी क्यों?

मोम की प्रतिमे! बता क्यों संगमर्मर बन गयी हो?
दे किसी को तट, किसी के पास निर्झर बन गयी हो?
तारिके मेरे नयन की, झाँकती हो क्या गगन से?
धूल का मजनू तड़पता जा रहा तेरी जलन से?

तुम लहर बनकर मिली थी ज्वार बनकर सो गयी क्यों?
मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?

लालसा देकर मिलन की, स्वयं ही ठुकरा दिया क्यों?
मीत कहकर प्रीत के हर गीत को बिसरा दिया क्यों?
याद है तुमको मिलन की साँझ का वह एक मधु क्षण-
प्यास से कम्पित अधर की बेबशी, वे मौन चुम्बन?

बाँह जब बढ़ने लगी तो तुम विदा ही हो गयी क्यों?
मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?

सुप्त यौवन था कि उकसाकर लगायी आग तुमने,
मन तपोवन था कि गाया मेनका का राग तुमने,
छा गयी तस्वीर बनकर जब खुली मेरी पलक थी,
क्या पता था, वह किसी के प्यार की अन्तिम झलक थी!

प्यार के रंगीन सपनों को न जाने धो गयी क्यों?
मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?

बन गयीं पत्थर लकीरें, रूप की रेखा पुरानी,
धूल में मीना? सिसकती फूल की कोमल जवानी!
पाँव तो अभ्यस्त थे ही, आग सीने में दिया क्यों?
मधुर स्नेहासव कभी इस नीर पीने में दिया क्यों?

जब नशा आया पिलाते, तुम दृगों से रो गयी क्यों?
मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?

भूल जाने को किया यदि प्यार तुमने, तो बता दो!
छीन लेने को दिया उपहार तुमने, तो बता दो!
प्रणय का अभिनय? न जाना यह कभी बलिदान होगा,
यह मिलन का पथ, युगों के दर्द का आह्वान होगा,

सेज पर तुम से मिला फिर द्वार पर आ खो गयी क्यों?
मैं अकेला था, मिली तो प्यार मन में बो गयी क्यों?

तुम अगर पतवार देते

डूबती नैया न मेरी तुम अगर पतवार देते!

एक स्वर संकेत का जीवन चलाता,
कूल पर नैया नहीं पतवार जाता,
पथ न चलता,पाँव पंथी हीं बढ़ाता,

पार जाकर गीत गाता तुम अगर झंकार देते!

चाहिए इंसान को इंसान केवल,
है अगर भगवान तो इंसान केवल,
हो रहा मैं आज कातर देख पल- पल,

स्वयं मैं भगवान होता तुम अगर अधिकार देते!

आ रही है मौत की घाटी निकटतर,
जा रही है जिंदगी मेरी सरककर,
मानवों! मुझको पकड़ लो आज कसकर,

मैं मरण से जूझता यदि सांत्वना दो चार देते!

प्रीत की मंजिल

बस! प्रीत खींच कर लाती है,
हर पंथी को इस मंजिल पर।
पथ पर बढ़ जाता है पंथी,
आशा कुछ पाने की लेकर।

बच कर आना, आने वालों!
पथ पर कंटक की झाड़ी है।
चाँदनी चूमने के पहले,
चूमो! पथ की चिंगारी है।

पाथेय प्यार का लेने पर,
पंथी को जलना होता है।
लैला पाने के लिए मगर,
मजनू को चलना होता है।

रे! मरू प्रदेश में मजनू को,
लाती लैला की याद पकड़।
बस! प्रीत खींच कर लाती है,
हर पंथी को इस मंजिल पर।

मंजिल पाने के पूर्व यहाँ,
आ रही चुनौती बार- बार।
निर्मम शीरी ने देख लिया,
कितने फरहादों की पछाड़।

दीपक पाने की आशा में,
हर रोज पतंगे जलते हैं।
दिल की मजार पर लैला के,
मजनू के प्राण निकलते हैं।

फिर भी दीपक पर मरते हैं,
लाखों परवाने जल- जलकर।
बस! प्रीत खींच कर लाती है,
हर पंथी को इस मंजिल पर।

लख-लाख मोहब्बत वालों को,
यह मंजिल कैसे पलती है?
यह प्रीत-पंथ है ओ राही!
दुनिया ऐसे ही चलती है।

जल-जल कर स्वर्ण चमकता है,
जलने का नाम जवानी है।
फिर प्रीत नगर के राही का,
पथ पर रुकना नादानी है।

दिल में मंजिल की कसक रहे,
हँस पंथी आँसू पी-पीकर।
बस! प्रीत खींच कर लाती है,
हर पंथी को इस मंजिल पर।

हर जगह प्रीत की मंजिल पर,
बढ़ने वाले मतवाले हैं।
प्रेमी की प्यास न कम होगी,
आँसू पी जाने वाले हैं।

राही के प्रीत नगरिया की,
डगरें जानी पहिचानी सी।
मजनू को खोज रही अब भी,
लैला बनकर दीवानी सी।

रे! यही प्रीत की मंजिल है,
जो है सदियों से अजर-अमर।
बस! प्रीत खींच कर लाती है,
हर पंथी को इस मंजिल पर।

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