शिवराम की रचनाएँ

चाह 

वह
तट खोज रहा है
मैं
समन्दर
वह
दो गज ज़मीन
मैं
दो पंख नवीन
उसे शांति की चाह है
मुझे बगावत की

तृप्ति-अतृप्ति

आदर
उम्मीद से सौ गुना अधिक
प्यार
चाहत से बहुत-बहुत कम
यही तृप्ति-अतृप्ति
अपनी ज़िंदगी का दम-खम
पल-पल को जिया
विष भी-अमृत भी
यूँ नहीं
तो यूँ पिया
असंतुष्ट भी हूँ
संतुष्ट भी
जो पाना चाहा नहीं मिला
जो करना चाहा कर लिया

जैसा भी था वैसा ही हूँ

पंख नहीं थे
फिर भी मैंने भरी उड़ानें
पैर नहीं थे
फिर भी मैंने दौड़ लगाई
हाथ नहीं थे
फिर भी मैंने पर्वत खिसकाए
आंख नहीं थी
फिर भी मैंने देखी जग की गहराई
नापी-जानी
सिखलाया मुझे तैरना
थपेड़ों दर थपेड़ों ने लहरों के
डूबा नहीं
तैर-तैर कर करी सफाई
कीचड़-काई
जलकुंभी
छाई वनस्पति भांति-भांति की
बिना जड़ों की
बिना अर्थ की
बोईं बेल सिंघाड़े की
ह्र्दय नहीं था
फिर भी मैंने प्यार किया सृष्टि से
वक़्त नहीं था
फिर भी मैंने हर दायित्व निभाया
जितना खोया उतना पाया
जैसा भी था वैसा ही हूँ
निकट भविष्य आसन्न युद्ध हित
अस्त्र चलाना-शस्त्र चलाना
सीख रहा हूँ

यह कब पता चला

तेरे दिल में जहर भरा है
यह कब पता चला
मेरे दिल का घाव भरा है
यह कब पता चला
पानी नहीं बचा आंखों में
यह कब पता चला
थोथा जीवन बचा जगत में
यह कब पता चला
दरिया नहीं है दलदल है ये
यह कब पता चला
लाल नहीं वह नीला रंग है
यह कब पता चला
गली प्रेम की बहुत तंग है
यह कब पता चला
प्रेम नहीं यह दीर्घ जंग है
यह कब पता चला
इंतज़ार किसका पल-पल है
यह कब पता चला
मैं भी संग हूँ कहा था किसने
यह कब पता चला

तुम्हारे बाद

जैसे झक्क दोपहरी में
डूब जाए सूरज
जैसे सूख जाए अचानक
कोई कल-कल बहती नदी
जैसे किसी पर्वत की छाती से
देखते-देखते अदृश्य हो जाए
कोई उछलता हुआ झरना
जैसे दमकते चांद को
निगल जाए आसमान
पीठ थपथपाता कोई स्नेहिल हाथ
आंख पोंछती खुरदरी अंगुलियां
आगे-आगे चलते दृढ़ कदम
अचानक लुप्त हो जाएं जैसे
कुछ वैसा ही लग रहा है कामरेड़
तुम्हारे बाद
सब कुछ उदास-उदास
बाहर भीतर, दूर-दूर, आस-पास

व्यथा की थाह

किसी तरह
अवसर तलाशो
उसकी आँखों में झाँको
चुपचाप
गहरे और गहरे
वहाँ शायद
थाह मिले कुछ
उसकी व्यथा का
पूछने से
कुछ पता नहीं चलेगा।

जो चले, वे ही आगे बढ़े

जुए के तले ही सही
जो चले
वे ही आगे बढ़े
जिनकी गर्दन पर भार होता है
उनके ह्रदय में ही क्षोभ होता है
कैद होते हैं जिनके अरमान
वे ही देखते हैं मुक्ति के स्वप्न
जो स्वप्न देखते हैं
वे ही लड़ते हैं
जो लड़ते हैं
वे ही आगे बढ़ते हैं
जो खूँटों से बँधे रहे
बँधे के बँधे रह गये
जो अपनी जगह अड़े रहे
अड़े के अड़े रह गये।

महाभारत के कुछ सबक

धृतराष्ट्रों को
दुर्योधनों की
वैसी ही जरूरत होती है
जैसी कृष्णों को
अर्जुनों की
सत्ता की प्रतिबद्धता हो या निर्भरता
भीष्मों की भी वैसी ही
दुर्गति होती है
जैसी द्रोणाचार्यों की
अभिमन्यु
घेर कर ही मारे जाते हैं सदा
सदैव छले जाते हैं
कर्ण, एकलव्य और बर्बरीक
सत्ता पौरूष की हो या पूँजी की
कुन्तियाँ, गांधारी, राधाएँ और द्रोपदियाँ
समस्त पत्नियाँ, समस्त प्रेयसियाँ, समस्त स्त्रियाँ
होती हैं अभिशप्त
न्याय और सत्य
सिर्फ़ झंड़े पर लिखे होते हैं
लड़े जाते हैं सभी युद्ध
स्वार्थ और सत्ता के लिए
सभी पक्षों के होते हैं
अलग-अलग न्याय, अलग-अलग सत्य।

अनुभवी पिता के सीख

एक चुप्पी
हजार बलाओं को टालती है
चुप रहना सीख
सच बोलने का ठेका
तूने ही नहीं ले रखा है
दुनिया के फटे में टांग अडाने की
क्या पडी है तुझे
मीन मेख मत निकाल
जैसे और निकाल रहे हैं
तू भी अपना काम निकाल
जैसा भी है, यहां का तो यही दस्तूर है
जो हुजूर को पसंद आये वही हूर है
नैतिकता-फैतिकता का चक्कर छोड़
सब चरित्रवान भूखों मरते हैं
कोई धन्धा पकड़
एक के दो, दो के चार बना
सिद्वान्त और आदर्श नहीं चलते यहां
ये व्यवहार की दुनिया है
व्यावहारिकता सीख
अपनी जेब में चार पैसे कैसे आएं
इस पर नजर रख
किसी बड़े आदमी की दुम पकड़
तू भी किसी तरह बड़ा आदमी बन
फिर तेरे भी दुम होगी
दुमदार होगा तो दमदार भी होगा
दुम होगी तो दुम उठाने वाले भी होंगे
रुतबा होगा
धन-धरती, कार-कोठी सब होगा
ऐरों-गैरों को मुँह मत लगा
जैसों में उठेगा बैठेगा
वैसा ही तो बनेगा
जाजम पर नहीं तो भले ही जूतियों में बैठ
पर बड़े लोगों में उठ-बैठ
ये मूंछों पर ताव देना
चेहरे पर ठसक और चाल में अकड़
अच्छी बात नहीं है
रीढ़ की हड्डी और गरदन की पेशियों को
ढीला रखने का अभ्यास कर
मतलब पड़ने पर गधे को भी
बाप बनाना पड़ता है
गधों को बाप बनाना सीख
यहां खड़ा-खड़ा
मेरा मुंह क्या देख रहा है
समय खराब मत कर
शेयर मार्केट को समझ
घोटालों की टेकनिक पकड़
चंदे और कमीशनों का गणित सीख
कुछ भी कर
कैसे भी कर
सौ बातों की बात यही है कि
अपना घर भर
हिम्मत और सूझबूझ से काम ले
और, भगवान पर भरोसा रख

जिन्हें लौटना हो, वे लौट जाएँ

जिन्हें लौटना हो, वे लौट जाएँ
जिन्हें चलना हो, चलें साथ

जिनके ख़्वाबों में हो रंगीनियां
जो चले आए थे शौक-शौक में
लौट जाएँ वे

वे ही चलें साथ
जिनकी दृष्टि में हो मंज़िलें
जिन्हें सफ़र से हो इश्क़

जिन्हें चलना हो वे चलें हमारे साथ
जिन्हें लौटना हो, वे लौट जाएँ

माटी मुलकेगी एक दिन

नमीं नहीं रही धरती में
बादलों में नहीं रही हया

पानी के नाम पर
रह गया हमारे पास
मुट्ठी भर पसीना
और आँख भर आँसू

ऐसे हालात में भी
हमने बोये स्वप्नबीज

कुछ अंकुराये
कुछ अंकुराये भी नहीं
कुछ अंकुरों में निकली पत्तियां
कुछ में निकली ही नहीं
जिनमें निकली पत्तियां
उनमें से कुछ बढ़ने लगे
शेष मुरझा गये, बढ़े ही नहीं

कुछ लोग विमर्श में जुट गये
हम काम में लगे रहे
अपने पसीने से
धरती को तर करते रहे

हमें भरोसा है
बादल पसीजेंगे एक दिन
फसलें लहकेंगी एक दिन
माटी मुळकेगी एक दिन

दोनों मजे में हैं

शहंशाह
आतंकित है
भेडिये से
भेड़िया आतंकित है
शहंशाह से

सारा जहां आतंकित है
भेड़िये से भी
और शहंशाह से भी

भेड़िया शहंशाह को मारने निकलता है
और मार डालता है निरीह जन

शहंशाह भेड़िये को मारने का हुक्म देता है
मारे जाते हैं आमजन

शहंशाह का दावा है
तोड़ दी गई है
भेड़िये की कमर

भेड़िये का दावा है
खिसका दी गई है
हवा शहंशाह की

सच्चाई तो यह है
कि, अभी दोनों मजे में हैं

कविता के अलावा

जब जल रहा था रोम
नीरो बजा रहा था बंशी
जब जल रही है पृथ्वी
हम लिख रहे हैं कविता

नीरो को संगीत पर कितना भरोसा था
क्या पता
हमें ज़रूर यक़ीन है
हमारी कविता पी जाएगी
सारा ताप
बचा लेगी
आदमी और आदमीयत को
स्त्रियों और बच्चों को
फूलों और तितलियों को
नदी और झरनों को

बचा लेगी प्रेम
सभ्यता और संस्कृति
पर्यावरण और अन्तःकरण

पृथ्वी को बचा लेगी
हमारी कविता

इसी उम्मीद में
हम प्रक्षेपास्त्र की तरह
दाग रहे हैं कविता
अंधेरे में अंधेरे के विरुद्ध

क्या हमारे तमाम कर्तव्यों का
विकल्प है कविता

हमारे समस्त दायित्वों को
इति श्री

नहीं, तो बताओं
और क्या कर रहे हो आजकल
कविता के अलावा

साँप और चूहे 

साँप बिल नहीं बनाते
बिलों मे रहते हैं

बिल चूहे बनाते हैं
साँप चूहों को खाते हैं
और उनके बनाए बिलों में रहते हैं

साँप बिल नहीं बनाते

हम लड़कियाँ

हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ
तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियाँ

हम मुस्काएं जग मुस्काएं
हम चहकें जग खिल-खिल जाए
तपता सूरज बीच गगन में
पुलकित और मुदित हो जाए
तारों के झिलमिल प्रकाश में
चंदा मामा देख लजाए
रात्रि-दिवस के मध्य खुलें जो खिड़कियाँ
हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ
तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियाँ

स्वेद हमारा भूमंडल को स्वर्ग बनाए
श्रम हमारा वन-उपवन में फूल खिलाए
बिना पंख के उड़ें गगन में
तारों से झोली भर लाएं
चट्टानों का चुम्बन लें जो
पिघले और तरल हो जाए
ज्यों सावन में उमड़े-घुमड़े बदरियाँ
हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ
तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियाँ

दीवारों को घर में बदलें
संबंधों में हम रस घोलें
आँगन हमसे चहके-महके
धरती डोले जो हम बोलें
सारी दुनिया निकले उसमें
हम जो अपनी मुट्ठी खोलें
ज्यों झोंका ठंड़ी बयार भरी दोपहरियाँ
हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ
तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियाँ

हम रचें विश्व को सृजन करें हम
दें खुशी जगत को कष्ट सहें हम
पीड़ा के पर्वत से निकली
निर्मल सरिता सी सदा बहें हम
दें अखिल विश्व को जीवन सौरभ
प्रेम के सागर की उद्‍गम हम
फिर भी हिस्से आएं हमारे सिसकियां
हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ, हम लड़कियाँ
तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियाँ

झाडू ऊँचा रहे हमारा

झाड़ू ऊँचा रहे हमारा
सबसे प्यारा सबसे न्यारा

इस झाड़ू को ले कर कर में
हम स्वतंत्र विचरें घर भर में
अज़ादी का यह रखवाला
झाडू ऊँचा रहे हमारा

गड़बड़ करे पति परमेश्वर
पूजा करे तुरत ये निस्वर
नारी मान बढ़ने वाला
झाड़ू ऊँचा रहे हमारा..

झाड़ेगा ये मान का कचरा
फिर झाड़ेगा जग का कचरा
कचरा सभी हटाने वाला
झाड़ू ऊँचा रहे हमारा..

राज जमेगा जिस दिन अपना
झंडा होगा झाड़ू अपना
अपना राज ज़माने वाला
झाड़ू ऊँचा रहे हमारा

कोड़ा जमालशाही

कोड़ा जमालशाही
पीछे देखा मार खाई
आँखों पे पट्टी बांध
चलता ही चल भाई
घाणी के बैल जैसा
घूम चारों ओर भाई

उपजाओ अन्न खूब, घुटने तोड़ो रोज खूब
लोहू का पसीना कर, माटी मेँ रम जाओ खूब
जब भी रहे भूखा, तो मुंह से न बोल भाई
कोड़ा जमालशाही ….

बीमारी की क्या फिक्र, मरने का क्या गम
गाँव मेँ अस्पताल ना हो तो क्या गम
दवाइयाँ बेकार हैं, जोत भैरू जी की बोल भाई
कोड़ा जमाल साई ….

तन का न कपड़े देख, मन की न पीड़ा देख
चैन खुशहाली तेरी, टेलीविजन पै देख
कर्तव्योँ मेँ सार है, अधिकार न मांग भाई
कोड़ा जमालशाही…

आजादी भरपूर है, जीम रहे सारे लोग
व्यंजन छत्तीस हैं, हाजिर है छप्पन भोग
तेरे घर न्योता नहीं, मेरा क्या खोट भाई
कोड़ा जमालशाही …

वे महलोँ में रहें, ये बात मत बोल
वे क्या क्या करें, ये पोल मत खोल
चुप रह, चुप रह, इनके राज में बोल है अमोल भाई
कोड़ा जमालशाही…

कुछ दोहे

हे वारिद इस बार तो, बरसो कुछ इस ढंग
अंग-संग भीगे ह्रदय, धरती बदले रंग

रे मन तू है बावला, पत्थर ढूंढे गंध
वन उपवन की टोह ले, फूलों महके गंध

प्रेम-प्रेम सब ही कहें, प्रेम करे ना कोय
ढाई आखर घृणा का, धर्म सिखावै मोय

श्रम बेचन मैं जब गई, नहीं मिला कुछ मोल
राजी देह बेचन हुई, कंचन दीना तोल

पांच कोस से मूंड पर, रख मटकी श्रीमान
लाई हूँ बड़ जतन से, पीयो अमृत जान

इक का जीवन परिश्रम, एक का जीवन लूट
तू किसके संग है खड़ा, खुद अपने से पूछ

हवा में उड़ मत ए सखा, हवा में कर मत बात
हवा में जो ज्यादा रहे, हवा-हवा हो जात

कोई भी सुलतान हो, कोई होय वजीर
बिना लड़े बदले नहीं, जनता की तकदीर

तेरी मुक्ति के लिए, कर तू ही संघर्ष
ना सहाय कोई देवता, न कोई ईश-विमर्श

क्या है जग के कायदे, क्या है जग की रीत
कौन जनक अन्याय का, सोच समझ और चीत

जो मुक्ति तुमको मिले, मृत्यु के उपरांत
तो जीवन में क्या मिला, सोच रे मितवा भ्रांत

फूल संग खुशबू गई, प्राण देह के साथ
जीवन में ही मिले जो, ऐसी मुक्ति तलाश

पहले पड़ा अकाल अब, मंदी का तूफ़ान
श्रमिक-कृषक की ज़िंदगी, सदा दुखों की खान

ये कैसी मंदी सजन, मंदौ ना कछु होय
मंदौ केवल आदमी, मूंड पकरि कै रोय

पति पत्नी बच्चे सभी, जाएँ काम पर रोज
तब भी जीवन न चले, इसका कारण खोज

कैसे छुटकारा मिले, इस सिस्टम से सोच
दबा लिया जिसने तुझे, अब तू उसे दबोच

घर घुस आये भेड़िये, कुत्ते और सियार
देश तरक्की कर रहा, सोओ टांग पसार

जाओ जाओ रावरे, घूमो फिरो विदेश
सूटकेस ले हाथ में, रख थैले में देश

जब सत्ता के न्याय पर, उठ जाता विश्वास
होने लगती बगावत. बतलाता इतिहास

ऐसी दुनिया चाहिये, जहाँ न द्वेष-विकार
सबके सुख में हो जहाँ, निज सुख का विस्तार

ऐसा सोचा कीजिए, जब मन होय उदास
इक सुन्दर सा स्वप्न है, अब भी अपने पास

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