शिवशंकर मिश्र की रचनाएँ

ईश्वर का दास

आदमी ने
पत्थ रों को काटकर चेहरे गढ़े
पत्थ रों को समर्पित हुआ
लड़ाइयाँ लड़ीं और
समर्पण के बाद की प्रेरणाएँ लीं
और आदमी दुखी रहा हमेशा
ईश्वदर को अपने में लेकर भी
अपने को ईश्ववर को देकर भी
वह निष्कईरूण समाधान
आदमी पर फला नहीं आज तक।

आदमी यह और है जो
जंगली जितना है, उतना ही
ईश्वीर का दास है!

सन्नाटा

एक कोई सन्नाोटा
रात को बाँधता जाता हुआ
एक कोई सन्नाोटा
नींद को
लाँघता जाता हुआ
एक कोई सन्नाजटा गलियों में घूमता हुआ
एक कोई सन्नाजटा घर-घर कुछ ढूँढता हुआ
मैं इस सन्नाजटे में टूटता हुआ
एक कोई सन्नाजटा मुझ में ही
टूटता हुआ !

सभी के हाथ जले हैं

तुम सौ बार कहो—
मत छूओ आग, हाथ जलेगा
मेरा मन
आग छूने को
हजार बार करेगा!

लाल, सिंदूरी, रेशमी आग
कितना खींचती है हाथ—
मेरी मुद्ठी में नहीं आ जाएगी क्या
सब एक साथ?

क्या तुम्हारा भी हाथ कभी जाला था, माँ?
क्या तुम्हारा भी हाथ कभी
आग से छुआ था?
क्या तुम्हारा भी ऐसा ही मन हुआ था?
ओ पिता?
या तुम ने अपने बड़ों की बात मान ली?
आज तक क्या
वह बात उसी तरह मान रहे हो?

तुम झूठ नहीं बोलतीं, माँ!
सच ही कहते हो, ओ पिता!
आग के आसपास ही हम पले हैं और
और भी सब लोग जो मुझ से बड़े हैं—
सभी के हाथ जले हैं!

नामहीन 

तुम्हारा कोई नाम नहीं
तुम्हें सभी, सब जगह
समान रूप से पुकारते हैं, माँ
इसीलिए तुम्हें सभी ही प्रिय हैं
इसीलिए तुम्हें किसी की गाली नहीं लगती।

नामहीन, हृदय में तुम्हें ही लिए हुए, माँ
उस दिन मैं जुलूस में शामिल हो गया
मैं जुलूस में सब से पीछे था
मैं पीछे था, इस का मुझे दुख नहीं था
क्योंकि तब मेरी जिम्मेदारी सब से अधिक थी
मेरी आवाज में अनुशासन था
ओर सम्पू‍र्ण पंक्ति की शक्ति थी–
दर्प था।

मुझे दुख नहीं था-
क्योंदकि तब मेरा भी कोई नाम नहीं था।

बीच का पहाड़

हम लोगों ने वर्षों की मेहनत के बाद
एक पहाड़ बनाया
हम चोटी पर थे, नीचे देखा
सब कुछ बड़ा अविश्वसनीय लग रहा था
लोग बौने हुए।

हम नीचे आ गए, देखा
पहाड़ पर चलते-फिरते सभी उसी तरह
बौने हुए अब भी।

पहाड़ ने दूर-दूर तक खइयाँ बना दी थीं
जो नजर आ रहा था, गलत था
जो सही था, नजर नहीं आ रहा था
हम लोगों ने तय कर लिया है-
यह पहाड़ अब खड़ा नहीं रहेगा !

प्रश्नवेध 

मैं अपनी आँखें तुम्हें देता हूँ
तुम उसे दे दो
और उस से कहो
वह मेरी आँखों से तुझे देखे
और तब मैं उस की जबान से
तुम से पूँछूँ—
इस तरह रात भर वह जागता क्यों हैं?
क्या करता है वह?
अँधेरे की आँखों में
वह क्या पढ़ता रहता है?
सन्नाटे के होठों पर
आखिर वह क्या लिखता है?

गौरये का घर

गौरैया-
एक नर
और एक मादा
फागुन जो आया
तो जोड़ा जा बाँधा
चैत चढ़े
चिंतित, अधीर कढ़े
स्वतर:
बच्चेत रहेंगे कहाँ ?
कहाँ होगा घर ?

पास ही
बाबा का झोपड़ था एक
छप्प र में डाले थे
बल्लेक अनेक धूमिल और धूसर
सब देख- भालकर
बोला था नर:
यहीं हम बनाएँगे
अपना भी घर।

हामी भरी मादा ने
उल्लसित, हँसकर
बोली थी मृदुतर:
औचक के पानी की चोट से
धूप और ओस से
उन्मद बयारों की मार से
पत्थर से और पतझार से
संकट से सारे बचेंगे
होकर निरापद
सुख से रहेंगे
पालेंगे बच्चों को
हम अंडे देंगे।

चुन-चुनकर
चोंच में डालकर
कहाँ –कहाँ से लाया
एक-एक खर
बाहरी ओसारे के
भीतरी किनारे पर
अलग एक कोने में
जुड़े दो बल्लों के ऊपर
सटकर दीवार से
जोड़ा ही था घर
पड़ गयी तभी वहीं
बाबा की उड़ती नजर।
वहीं खड़ी लाठी से
खोद-खुचकारकर
बाबा ने गिरा दिया
गोरैये का घर
पल में सब बिखर गया
झर-झरकर
देखकर
बाबा की पत्नी ने
राहत की साँस ली
पास आ बोलीः
ठीक किया, गिरा दिया
जैसे निर्लज्ज हैं
वैसे ही थेथर!

साथ लगी कोठरी में
बाबा की नन्हीं-सी बिटिया
देख रही थी सब
दृष्टि बाँध टुकर-टुकर
छिपकर
कैसा तो जी उस का हो आया!
बाहर ओसारे के
चीं-चीं का विकलस्वर
सुनकर
दिल उस का थम गया
अदृश्य, अतरल कुछ आँखों में
ठहर गया, जम गया!?

कहाँ अब जाएँगे ये?
घर अब अपना
कहाँ जा बसाएँगे ये?
क्या होगा इन का?
क्या इसी अंत को
इतना था किया श्रम?
रात-दिन
जोड़ा था एक-एक तिनका?

जो कुर्सी पर बैठता है

जब आदमी जमीन पर नहीं बैठ सकता
कुर्सी पर बैठता है
कुर्सी उसे
जमीन से अलग
ऊपर उठाकर रखती है
जब वह चलता भी है
उसके पाँव
कुर्सी में ही चलते होते हैं।

जब आदमी कुर्सी पर बैठता है
जमीन पर फिर नहीं बैठता
जमीन को ही ऊपर उठा लेता है
अपनी मेज तक
चाहता है सब कुछ उस की मेज में ही आ जाए
अब जो भी वह करता है
मेज पर करता है।

मेज की टाँगों और पेट में
बनाता है वह
तरह-तरह की दराजें
और दराजों में
कई- कई जगहें सब अलग इस्तेामाल की
धीरे-धीरे सब कुछ तब
वह अपनी मेज में ही कर लेता है।

उस की मेज में ही
समा जाता है पूरा दफ्तर
कर्मचारी, चपरासी एक-एक
थाना, जिला, प्रदेश
और धीरे-धीरे मेज ही उसकी
तब देश पर आरूढ़ हो जाती है
और कुर्सी
उस की कुर्सी
जमीन से बहुत ऊपर उठ जाती है।

जमीन ऐसे एकदम नहीं छूती
हवा भी नहीं
कुछ भी जो जमीन पर है, हवा में है
उसे नहीं छूता
उस की कुर्सी भी
जमीन से और हवा से भी बहुत ऊपर
बहुत ऊँचे उछल जाती है।

और उस की मेज से सटे
उस के कर्मचारी, चपरासी
और दूसरे सब उस के लोग
जैसे आसमान चढ़ जाते हैं।

अकेली रह जाती है जमीन
हवा में धँसी हुई, नीचे
अकेले रह जाते हैं हम
नीचे, जमीन पर
और हमारा देश
हमारे ही भीतर
कब्रें बनाता जाता है
गहरे, और गहरे सब
कब्रों की कई-कई मंजिलें।

आदमी जब कुर्सी पर बैठता है
वह जान लेता है
उस का फर्ज
न कुर्सी से छोटा है
न कुर्सी से बड़ा है।

आदमी जो कुर्सी पर बैठता है
जानता है सब ठीक-ठीक किस तरह
उस का फर्ज
न कुर्सी के बिना है
न कुर्सी के बाहर है!

चिट्ठी

–बहुत दिनों से तुम्हारी चिट्ठी नहीं मिली।
इतनी दूर हो, ध्यान लगा रहता है।
बच्चे कैसे हैं ? बहू की
कमर का दर्द अब कैसा है ?
अपनी देह का ध्यान रखना।
मेरी चिंता मत करना।

–तुम्हारी ही चिंता मुझे लगी रहती है माँ!
कैसे बीतता होगा तुम्हारा समय?
कैसे क्या करती होगी?
देखने वाला भी है कोई गाँव में वहाँ?
सभी भाई हम दूर- दूर, जहाँ- तहाँ
बिखरे- बसे
उलझे- फँसे..
कौन क्या- करे कैसे?
डर लगा रहता है तुम्हारा ही…
बच गयीं पिछली बार, और क्या?
लेकिन इस बार का यह जाड़ा?
हाल-चाल की चिट्ठी देते रहना।

गोरी के गीत (सात भाग) 

(एक)
मन से मन लहराए,
नयन से नयन मिले, अरूझाए,
सजनिया, राम किसे ना भाए!

प्रेम न जाने बंधन- बाधा,
दीवानी जनमी ही राधा,
गली- गली फिर आए!
सजनिया, राम किसे ना भाए!

बीते माह-बरष, युग बीता,
सूना पनघट, उर घट रीता,
याद करेज दबाए!
सजनिया, राम किसे ना भाए!

(दो)
दिन भर कँगना बाजे, लेकिन
रतिया में जब बाजे रे-
गोरी रो- रो पिया पुकारे,
परदेसी के वचन विचारे,
लेकिन मन जब हहरे, बोले,
‘आए क्योंा ना आजे रे!’
‘कितना दरद भरा है तन में
कितना दरद भरा हे मन में,
किस से मैं लिखवाऊँ ये सब,
मर जाऊँगी लाजे रे।‘

(तीन)

तन तड़पे मछली-सा मरु में,
मन प्यासे मुरझाए!

तन का जहर जलाए तन को
अँग-अँग आग धधाए,
मन की सुधा न मिलती मन को,
मन बुझकर रह जाए!

तन की गाँठें गिनी न जाएँ,
पोर-पोर ऐँठाए,
खून चुए मन की गाँठों से,
थमने में ना आए!

परदेशी की बतियाँ झूठी,
वादे झूठे, पतियाँ झूठी,
रात-रात भर तड़पे गोरी,
दिन भर हा-हा खाए!

(चार)
सावन बीत गया, भादों पर जान जलाए,
सेंक लगाती ठंडी हवा पुरबिया वाली!

मन का मौसम गर्म जेठ-सा
धह-धह जैसे,
प्यासे प्रान सुखाएँ मरु में
रह-रह जैसे;
अब तो एको चले नहीं बरजोरी, सारा
जोर छीन ले ठंडी हवा पुरबिया वाली!

आग सही नहीं जाए तनिक अब
इस पानी की,
कितनी लड़ी लड़ाई, कितनी
मनमानी की;
बिफर बहुत उठती है छाती अँगिया में जब
फूँक लगाती ठंडी हवा पुरबिया वाली!

क्या जाने किस देस में जाके
अटके पिउवा,
तन टूटे, तड़पे मछली-सा,
भटके जिउवा;
धीर न थोड़ा आए, मन बौरा दे ऐसा,
यह डायन-सी ठंडी हवा पुरबिया वाली!

(पाँच)
ठंडी-ठंडी रात,
अंगड़कर रह जाए तन-गात,
कहूँ मैं किस से मन की बात,
कि मन अब टूटे रे!

पिया गए परदेस,
न भेजे एको तो संदेस,
कभी जो कल आ जाए लेस,
करम ही फूटे रे!

चदरी लगती भार,
भाड़ में जाए चुनरी हार,
कि तन के आगे आर न पार,
लहरिया छूटे रे!

मैं क्या जानूँ चोर,
सताएगा ले जियरा मोर,
कि मन अब खाए हाय मरोर,
बलमुवा झूटे रे!

(छह)
पीपर पर पुरवैया नाचे,
गोरी का मन नाचे रे!

चुनरी लहरे, उड़-उड़ जाए,
नाक उलटकर लट छू जाए,
कोई कैसे कहाँ छिपाए,
बतिया हो जब साँचे रे!

तरह-तरह के भेद जगत में,
बने रहे हैं भेद जगत से,
कैसे मन का भेद छिपे जब,
मन ही बोले बाँचे रे!

उलझी-उलझी अँखियाँ डोलें,
मन की छिपी हुई सब खोलें,
कैसे कोई खुद को रोके,
मन जब भरे कुलाँचे रे!

(सात)

गोरी गदगद इत-उत डोले,
मन ही मन पगुराए रे!

आएँगे कल साँवरिया घर,
भटेंगी गोरी भुज-भुज भर,
बह जाएगा तन लहरों पर,
सोचे गोरी, बात मिलाए,
खुश होए, इतराए रे!

मन मोंजर से लद कर लाल,
महके जयों अमिया की डाल,
महु आए गोरी के गाल;
आयी याद न जाने क्या जो,
गोरी चुप मुसकाए रे!

सूरज डूबा, आयी साँझ,
खनके कँगना, झनके झाँझ,
चुप्पी टूट गयी कि आज;
दीप जलाए गोरी घर में,
मन जोती में न्हाए रे!

जस्तेक के दिन

हफ्ते बीते ओर
अभी हफ्ते बाकी हैं!

जाने कैसे बीतेंगे दिन,
हार गया उँगली पर गिन-गिन,
चैन नहीं आए तो दो छिन ;
बिछुड़े जब से,
प्राण हुए ये एकाकी हैं!

नाम तुम्हा रा लिखा हृदय पर,
आँखों में चित्रित तुम सुंदर,
जागीं आहें तुम से छूकर;
साँसे जैसे
बनी बाँसुरी पीड़ा की हैं!

जाल तने हैं चारों रस्तें,
नहीं निकलना सम्भंव सस्ते ,
चाँदी के दिन निकले जस्ते्;
सीमाएँ सौ यहाँ

लौटा दिया शहर ने

लौटा दिया शहर ने, वापस
गाँव नहीं ले!

घर अपना है, सब अपने हैं,
फिर भी सब ही तने- ठने हैं,
कोने- कोने अलग बने हैं;
हर खिड़की की भौंह चढ़ी है,
कसे हुए मुँह दरवाजों के,
जबड़े ढीले!

पढ़- लिखकर बेकार गए हो,
बैठे- बैठे प्राण गए रो,
लड़-लड़कर थक-हार गए तो;
कहीं नहीं पहचान शेष कुछ,
गहरे बने गढ़े, या, केवल
ऊँचे टीले!

दाँतो की संधियाँ

प्या र जो शाम कभी दे गयी,
सुबह दबा ले गयी!

हर एक आँख घूम-नाच रही,
हर एक कंठ भरा चीख से,
खलनायक दिखा रहे मंच से
दृश्यक तवारीख के;
कुर्सियाँ ढीली हैं, गोल,
मंजिल जो मिली, वही–
राह चुरा ले गयी!

जला कभी दीप जो प्रलयी हवाओं में,
गुमसुम में खो गया,
पीड़ाएँ रहीं कभी जिस की धरोहर थीं,
दिल वही रो गया ;
संधियाँ ढँके हुए दाँतों की,
मुश्किल हैं नन्हेद दराँतों की,
और हर बार जली आग जो–
धुँआ उड़ाके गयी!

घोर जनरव

घोर जनवर,
और उत्सरव,
रोज चारों ओर!
ओर भटकी साँझ कोई,
और भूली भोर!

यही सब कुछ रोज-रोज,
खोखले, मुँहखुले सारे लोग,
नफरतों की तह लगी खामोश,
जिंदगी ज्यों बन गयी है रोग;
कौन किस की बात पूछे,
कौन किस की सुन जरा ले,
प्याकर जैसे हो लुटेरा,
मित्रताएँ चोर!

स्वारर्थ सब लम्बेट हुए, सिद्धांत बौने,
भावनाएँ ठगी- अटकी रह गयीं,
हो गए प्रतिमान नैतिकता के ढुलमुल,
मान्य ताएँ तेज जल में बह गयीं;
पथों पर मुहँजोर नारे,
और भूखे, बेसहारे,
हर सफल संघर्ष के मुँह पर नकाब,
ओर पीछे शोर!

सीढि़यों का भँवर

बात जो सब से जरूरी है,
सब बहस के बावजूद
छोड़ दी जाती अधूरी है!

आँख का चश्मा चढ़ा है नाक पर,
नाक छूती आ रही नीचे अधर,
कब्र में जीने, अगोचर
सीढि़यों का तेज, अंतर्मुख भँवर ;
और हर दो कब्र की
दो कदम की सिर्फ दूरी है!

बैठकर, मिलकर, कहीं पर खड़े होकर,
बात के जरिए उठा देना लहर,
बदल देना घड़ी भर में विश्वो को, फिर
खुद बदल जाना सभा से लौटकर  ;
पंक्तियॉं बँधती रहीं, अब भी वही
धँस रही पेटों में छूरी है!

मेरा देश महान

साँसों से आँधी उठती है, आहों से तूफान
और एक पत्ता न खड़कता, मेरा देश महान
राजनीति अलमस्त , प्रशासन भ्रष्टर, रीढ़ से हीन
कफन ओढ़कर सोयी जनता, मेरा देश महान
जो अतीत था, वर्तमान जो है, भविष्यो जैसा है
बस न काल का इस पर चलता, मेरा देश महान
आजादी की जय- जय बोलो, लोकतंत्र की जय-जय
गुंडाशाह फूलता-फलता, मेरा देश महान

वे लोग

वे लोग बड़े हैं, मत बोलो,
मत बोलो, उन को बुरा लगेगा!

वे जो करते हैं, करते हैं,
क्या तुम से कोई डरते हैं,
वे अपने मन के मालिक हैं,
जैसे जी चाहे चरते हैं;
सब के तुम्हारे भी उन का
कुछ बिगड़ न पाएगा, लेकिन
तुम नजर नहीं फिर आओगे,
जो उन का मन कल को बिगड़ेगा!

सब साधु-संत, गुंडे उन के,
बैठाए गली-गली चुनके,
मिट्टी चटवाते लोहे को,
सब लक्ष्यब्द्ध, पक्के धुन के;
यह लोकतंत्र तुम क्या जानो,
तुम क्या समझोगे राजनीति,
जो डरा वहीं मर गया और
मर जाएगा जो नहीं डरेगा!

वे माँगें मत 

वे माँगें मत, हम बदकिस्मत
भला उन्हें दे सकेंगे क्या?

वे मत आएँ पास हमारे,
दीन-हीन हम हैं दुखियारे,
किसी सड़के के दायें-बायें,
कहीं गली के एक किनारे:
किसी गढ़े के ऊपर-नीचे,
दिल को हाथों दिए सहारे,
कहीं अँधेरे में हम पसरे,
ताक रहे हैं नभ के तारे;
कहाँ उन्हें बैठाएँगे हम,
सेवा उन की करेंगे क्या?

वे कहते हैं, सच कहते हैं,
लोकतंत्र है जारी हम से,
हमीं मूर्ख हैं, हमीं न समझे,
देश हुआ है भारी हम से;
वे जो करते, सदा भले की,
उन की हर तैयारी हम से,
हम से चलती संसद-परिष्द,
गठित सभाएँ सारी हम से;
मत की कीमत हमीं न संझे,
वे फिर हम को भरेंगे क्या?

हम उन के हाथों के बल हैं,
फिर भी उन के पाँवों में हैं,
महानगर के राजकुवँर वे,
हम गलियारों- गाँवों में है;
वे छाँवों में हरे-हरे हैं,
हम दिन-रात अलावों में हैं,
हम हैं ढेले-पत्थर अब भी,
वे हर बार चुनावों में हैं;
वे नेता हैं, जो भी कर लें,
किसी का हम कर लेंगे क्या?

थोड़ी उन की पोल खुली है,
थोड़ा हम भी जान गए हैं,
वे हम को पहचान न पाए,
हम उन को पहचान गए हैं;
किस की खातिर वे लड़ते हैं,
या हम हो बलिदान गए हैं,
उम्मीदें सब पानी करके,
वे धोके ईमान गए हैं;
चाल न उन की बदली अब तक,
अपनी भी हम बदलेंगे क्या?

लोकतंत्र की डोर

नीचे सब के, सब से ऊपर,
नेताजी के हाथ,
गुंडे, पढ़े-लिखे, व्यापारी,
अफसर सारे साथ;

अफसर सारे साथ,
सभी मिलकर लूटेंगे देश,
क्यों अब कोई कष्ट रहेगा,
क्यों तो कोई क्लेश?

क्यों तो कोई क्लेश,
कहाँ तो जनता की क्या बात?
दो सूखी रोटी मिल जाए,
बासी थोड़ा भात;

बासी थोड़ा भात,
चाहिए क्या उसको भी और?
जैसा जिंदा, वैसा मुर्दा,
कोई भी हो दौर;

कोई भी हो दौर,
बहुत छोटी होती है भीड़,
बंदूकों के आगे चिड़िया
नहीं सेवती नीड़;

नहीं सेवती नीड़,
पुलिस है, हाजत है, है जेल,
अड़ना इन्हें नहीं है हरगिज
जरा-जरों का खेल;

जरा-जरों का खेल,
बाल-बच्चों का दारुण मोह,
भय है मंत्र अचूक,
हुए खुद मूक सभी विद्रोह;
मूक सभी विद्रोह,
मजे में दिन बीतेंगे यार,
अपना सारा देश,
देश में अपनी है सरकार;
अपनी है सरकार,
राज अपना चलता सब ओर,
अपने हाथों में आयी है
लोकतंत्र की डोर;

लोकतंत्र की डोर
लगाती जाती फंदे गोल,
लोकतंत्र तू बोल इसे, या
लोपतंत्र तू बोल!

डेमोक्रेसी में भरता
जाता है गलरा झोल,
डेमसक्रेसी बोल इसे, या
डेमनक्रेसी बोल!

देश मजे में 

देश मजे में चल रहा,
मस्ती में सरकार,
बाबू-अफसर सारे बम-बम,
वेतन कई हजार;

वेतन कई हजार,
कई ऊपर से आते,
चपरासी को
बड़े-बड़े आदाब बजाते;

बड़े-बड़े आदाब बजाते,
चक्कर काटें, घूमें,
पाँवों पर थैलियाँ चढ़ाएँ,
तलवे चाटें, चूमें;

तलवे चाटें, चूमें,
चलती बल खाती हर फाइल,
आँखों-आँखों लक्ष्य साधती,
होठों-होठों स्माइल;

होठों-होठों स्माइल,
चढ़ता पानी पेटों-पेटों,
ऊँचे जाता है बापों तक
चलकर बेटों-बेटों;

चलकर बेटों-बेटों,
लम्बा उन का मायाजाल,
लाल कलम से करते काला,
काली से सब लाल;

काली से सब लाल,
करें रेखाएँ छोटी,
लाठी उन की, भैंस उन्हीं की,
अपनी मुश्किल रोटी;

अपनी मुश्किल रोटी,
चाहे जिस की हो सरकार,
मस्त बाढ़-सूखे में वे हैं,
हम बेबस लाचार;

हम बेबस, लाचार,
नहीं अपना है कोई लाग,
जाने कब जागेगा भैया,
मिहनत कश का भाग!

मारो न इस को ऐसे, इस पर न खाक डालो 

मारो न इस को ऐसे, इस पर न खाक डालो
यह देश है तुम्हारा, इस देश को बचा लो

सीने में तेरे भी है, मेरे भी, उस के भी है
यह तीर जो गड़ा है, इस तीर को निकालो

उन कुर्सियों के गद्दों में बात कुछ है ऐसी
वे और भी चिपकते, जितना उन्हें उछालो

बेकस है, बेजबाँ है, रस्सी बँधी गले में
जनता है भींगी बकरी, मारो बनाओ खा लो

कानून रद्द करते, कानून हैं बनाते
कानून टूटता है, कानून को संभालो

जब इतना हो अँधेरा, हो राह जंगलों की
यों खाली हाथ हरगिज घर से नहीं विदा लो

भगवान है कहीं तो, जो मानते खुदा को
‘मिशरा’ दुआ करो, इन नेताओं को उठा लो

हो गए हम कत्ल या फिर बच गए इस बार हम 

हो गए हम कत्ल य़ा फिर बच गए इस बार हम
देखते हैं रोज उठकर सुब्ह का अखबार हम

क्या पता उन का भी अब, हैं भी कहीं या चल बसे
कर रहे हैं चिट्ठियों का कब से इंतेजार हम

और पुख्ता, और ऊँची रात-दिन होती गयी
तोड़ने को तोड़ते ही हैं रहे दीवार हम

गाल उन के फूले, तैरे मछलियाँ आस्तीनों में
डूबी आँखे, कंधे बैठे, पेट से लाचार हम

वे लड़ाएँ, हम लड़ें, मर जाएँ, वे मारें नहीं
ओहदों में वे थिरकते और हैं बेजार हम

खेल उन का , खेलें हम पर, उन की बाजी, जीत हर
रेस की घोड़ी नहीं बनने को अब तैयार हम

शब्द चलते हैं, पहुँचते ‘मिशरा’ जब संघर्ष तक
स्वपन कविता के तभी कर पाते हैं साकार हम

किसी की आँख में डोरे, किसी के आँख आती क्यों

किसी की आँख में डोरे, किसी के आँख आती क्यों
बिला मतलब तुम्हें पीड़ा यही दिन-रात खाती क्यों

हमारा देश है आजाद, हम आजाद हैं सारे
गला घुटता हमारा क्यों, जबाँ बाहर को आती क्यों

शहर में रोज होते खून हैं दस-बीस की दर से
अदालत दस बरस में एक को फाँसी सुनाती क्यों

जरा-सा डर था कोई, हो गया इतना बड़ा कैसे
अब अपने पाँव चलकर मौत भी आते लजाती क्यों

वही सोचो, वही बोलो, वही सब करना है तुम को
जरा-से फर्क पर दुनिया हमें काफिर बताती क्यों

गला भारी है, भारी चेहरा, भारी बदन उन का
उठाती बोझ क्यो इतना, न कुर्सी टूट जाती क्यों

उरेबी चाल है जिस की, चलन जिसका है फिरकाना
कि ऐसी शख्सियत ‘मिशरा’ वतन में सर उठाती क्यों

रात-दिन की बेकली है और मैं हूँ 

रात-दिन की बेकली है और मैं हूँ
लाश कोई अधजली है और मैं हूँ

सच जो है, जो भी है, जैसा है वही इस
जिंदगी का झूठ भी है और मैं हूँ

मुश्किलें हैं और सब आसानियाँ हैं
एक पुरानी-सी गली है और मैं हूँ

चाहते हैं, राहते हैं, क्या नहीं है
जेब में कुछ मूँगफली है और मैं हूँ

यादें थोड़ी, थोड़े-से गम, थोड़ी खुशियाँ
‘मिशरा’ थोड़ी शायरी है और मैं हूँ

मुनासिब तो नहीं है आप का ऐसे खफा होना 

मुनासिब तो नहीं है आप का ऐसे खफा होना
नहीं हँसना अगर आया तो रोने से ही क्या होना

हजारों लोग हम जैसे सिसकते जो दिलों में ही
बुरा लगता नहीं है अब हमें इतना बुरा होना

अजब लाचार हैं हम, है अजब लाचारियाँ अपनी
किसी भी दर्द का होना नहीं मतलब दवा होना

सितारे रात भर रोते रहे अपने मुकद्दर पर
सरासर धाँधली है आसमाँ में चाँद का होना

हमें तकलीफ आखिर क्या, हमें नाराजगी क्यों हो
रहे छोटे हमेशा जो उन्हें क्यों हो बड़ा होना

नहीं पर्दा है उन का या हमारा बीच में कोई
अलग वे हों को क्योंकर हों, हमें क्यों हो जुदा होना

किसी का प्यार भी ईमान पर बन आए जो कल को
कहेंगे हम यही ‘मिशरा’, बुरा है आश्ना होना

किसी के सामने खुलकर कभी में रो नहीं पाया 

किसी के सामने खुलकर कभी मैं रो नहीं पाया
करीब इतना भी कोई दोस्त मेरा हो नहीं पाया

हिचक कोई, शरम कोई, वहम कोई कि शक कोई
रहा कुछ दरमियाँ ऐसा, उठा जिस को नहीं पाया

उसे लूटेगा कोई क्या जिसे लूटा नसीबों ने
कभी बेफिक्र होकर ही किसी दिन सो नहीं पाया

लगा दी पीठ तो अपनी जमाने भर के बोझों को
अकेला लाश लेकिन कोई अपनी ढो नहीं पाया

मेरे पीछे रहा हरदम मेरे साये से भी ज्यादा
वहीं था साथ ही मौजूद, देखा तो नहीं पाया

बहुत चाहा कोई सीने से मेरा दिल अलग कर दे
नहीं पाया कोई कातिल ही ऐसा जो नहीं पाया

अगर जीना यही जीना, बुरा मरना ही क्या ‘मिशरा’
हुआ मेरा न कोई, मैं किसी का हो नहीं पाया

रो-रो के हँसना है ज़िन्दगी 

रो-रो के हँसना है जिंदगी
काय तेरा कहना है जिंदगी

काँटों के बीच किसी फूल-सा
खिलना-महकना है जिंदगी

जैसे पहाड़ों में दौड़ता
गीतों का झरना है जिंदगी

हारी बिसातें सहेजकर
बाजी पलटना है जिंदगी

मौत एक हकीकत है छूठ है
सच जो है, सपना है जिंदगी

‘मिशरा’ हदों की न बात कर
हद से गुजरना है जिंदगी

बू-ए-गुल, रंगे-हिना, कुछ भी नहीं 

बू-ए-गुल, रंगे-हिना, कुछ भी नहीं
वादा-शिकवा, हाँ कि ना, कुछ भी नहीं
तू नहीं तो जमाने में क्या रखा
जिंदगी तेरे बिना, कुछ भी नहीं

अब चाहे गोली हो, सूली, सलीब हो

अब चाहे गोली हो, सूली, सलीब हो
इतना भी कोई जो दिल से करीब हो
कौन उसे मारेगा, मर जाएगा वह?
मौत जब उस की चाहत का नसीब हो?

कभी दिल का तड़पना देखा नहीं

कभी दिल का तड़पना देखा नहीं?
कलेजे का तलफना देखा नहीं?
उदासियों में गढ़े बनते कैसे—-
कभी जी का डूबना देखा नहीं?

तुम से मिलना कि बिछड़ना तुम से 

तुम से मिलना, कि बिछड़ना तुम से
रूठ जाना, कि झगड़ना तुम से
चैन आया न कभी तेरे बिना
हारकर तुम से ही, लड़ना तुम से

मचलते हैं तेज धारे किस तरह

मचलते हैं तेज धारे किस तरह
टूटते जाते किनारे किस तरह
हदें दिल की डूबती जाएं सभी
हो रहे हम बेसहारे किस तरह

कभी हँस दे, कभी रो जाए है जी

कभी हँस दे, कभी रो जाए है जी
हाय कैसा कभी हो जाए है जी
कोई मंजिल न तो जुस्तजू कोई
कहीं यों ही कभी खो जाए है जी

दिन आता है, आकर गुजर जाता है 

दिन आता है, आकर गुजर जाता है
सिन चढ़ता है, चढ़कर उतर जाता है
हाल ले-देकर इतना ही है मुख्तसर
आदमी पैदा होता है, मर जाता है

लोग जो बड़े हैं, वे बड़े हैं

लोग जो बड़े हैं, वे बड़े हैं
आयतोच्च मंचों पर खड़े हैं
हम ही अभागे हैं, सड़कों पर
पैदा जो हुए कभी, पड़े हैं

बिजलियों के पंख लेकर मैं नहीं उड़ता 

बिजलियों के पंख लेकर मैं नहीं उड़ता
चल दिया जिस राह, उस से भी नहीं मुड़ता
सोचता हूँ जो कभी कुछ टूट जाता है
लाख जोड़ो भी, मगर वह फिर नहीं जुड़ता

दंड की धाराएँ उन के हाथ में हैं

दंड की धाराएँ उन के हाथ में हैं
सारी संहिताएँ उन के हाथ में हैं
आप बेगुनाह रहें कि हों शरीफ ही
आप की रेखाएँ उन के हाथ में हैं।

लड़ाइयाँ कैसी न जाने कर रहे हैं हम

लड़ाइयाँ कैसी न जाने कर रहे हैं हम
लड़ रहे वे अपनी खातिर, मर रहे हैं हम
हम हैं राजा और हम उन के गुलाम हैं
खाते अपना और उन का भर रहे हैं हम

तार-तार बाँधना है ज़िन्दगी

तार-तार बाँधना है जिन्दगी
सुरों की आराधना है जिंदगी
अर्पित हो जाना, मिट जाना है
वैरागी साधना है जिन्दगी

मरता नहीं है कोई किसी के लिए मगर

मरता नहीं है कोई किसी के लिए मगर
जी पाया भी कभी न अकेला कोई बशर
यों ही बने ये घर न तो यों ही बना समाज
यों ही बसे न गाँव, न यों ही बसे शहर

एक कोई तीर अब ऐसा लगाना चाहिए 

एक कोई तीर अब ऐसा लगाना चाहिए
जो लगे दिल पर कोई ऐसा निशाना चाहिए
अब नहीं जंगल, नहीं अब बाघ-चीते ही मगर
आदमी को आदमी से अब बचाना चाहिए

टूटा तुझ से या किसी ने तोड़ डाला फर्क क्या

टूटा तुझ से या किसी ने तोड़ डाला, फर्क क्या
टूटना था दिल तेरा, क्या इस तरह, क्या उस तरह
जो बुलाते तुम न तो आतीं न क्या ये मुसीबतें
था यही हासिल, तेरा, क्या इस तरह, क्या उस तरह

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