शिव मृदुल की रचनाएँ

पतंगों का मौसम 

मौसम आज पतंगों का है
नभ में राज पतंगों का है,
इंद्रधनुष के रंगों का है
मौसम नई उमंगों का है।

किनले सब ले डोर पतंगें।
सुंदर सी चौकोर पतंगे,
उड़ा रहे कर शोर पतंगें
नभ में गोताखोर पतंगें।

उड़े पतंगें बस्ती-बस्ती
कोई महँगी कोई सस्ती,
पर न किसी में फूट परस्ती,
उड़ा-उड़ा सब लेते मस्ती।

कुछ को लगती ‘नेट’ सरीखी
कुछ को ये ‘इन्सेट’ सरीखी,
कुछ को ये ‘राकेट’ सरीखी
कुछ को ‘सेबर जेट’ सरीखी।

चलें डोर पर बैठ पतंगें
इठलाती-सी ऐंठ पतंगें,
नभ में कर घुसपैठ पतंगें
करें ग्रहों से भेंट पतंगें।

मतवाली-सी झूम पतंगें
आसमान में घूम पतंगें,
चाँद-सितारे चूम पतंगें
मचा रही हैं धूम पतंगें।

हर टोली ले खड़ी पतंगें
कुछ छोटी, कुछ बड़ी पतंगें,
आसमान में अड़ी पतंगें
पेंच लड़ाने लड़ी पतंगें।

कुछ के छक्के छूट रहे हैं
कुछ के डोरे टूट रहे हैं,
मगर नहीं वे रूठ रहे हैं
कटी पतंगें लूट रहे हैं।

हमें खेलने जाने दो

मम्मी-पापा! रोको मत,
बाहर जाते टोको मत।
उम्र खेलने जाने की,
दूध-दही, घी खाने की।
खाया-पिया पचाने दो,
हमें खेलने जाने दो।

अभी न पढ़ना आता है,
खूब खेलना भाता है।
बस्ता अभी न उठता है,
कमरे में दम घुटता है।
खुली हवा में जाने दो,
लारा-लप्पा गाने दो।

कच्ची उम्र हमारी है,
बस्ता कितना भारी है।
नाहक बोझ बढ़ाते हो,
हमको क्यों दहलाते हो।
कुछ तो ताकत आने दो,
हमें खेलने जाने दो।

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