शिशु पाल सिंह ‘शिशु’की रचनाएँ

शिशु दोहावली 

(१)
जीव अनेकों में रमे, यद्यपि हो तुम एक,
नाथ! तुम्हे कितने कहे, एक कहें कि अनेक
(२)
रे जग- पथ के पथिक! तू तज विलास के चाव,
सरल ढाल ही लौट कर, होगा कठिन चढ़ाव
(३)
जग में जग कर सजग रहे, अपने चारों ओर,
चुरा न ले यह सुमति वन, कुविचारोंके चोर
(४)
आगा- पीछा देखकर, ऊँचारक्खो शीश,
पथ पर बाँये से चलो, दाएँ ये होंगे ईश
(५)
मिले कान दो, एक मुँह, इस का यही विवेक,
जब दो बातें सुन चुको, तब फिर बोलो एक
(६)
पवन- दूतको है, यही पुष्पों का आदेश,
देश- देश देते फिरो, सुरभि भरा संदेश
(७)
धरती पर तो धूल है, डाली पर हैं शूल,
दुहरे दुश्मनलगरहे, एक अकेला फूल
(८)
फूल! न फूलो गर्व से, अब भी समझो भूल,
उसके हँसने में झड़े, तुमसे अनगिन फूल
(९)
रे, गुलाब! निज वेश पर, तू इतना मत फूल,
जिस डाली में फूल हैं, उसी डाली में शूल
(१०)
अत्याचारी! समझ ले, अब भी अपनी भूल,
कहाँ दमन की डाल में, लगे अमन के फूल
(११)
रहे कुश – लता युक्त वे, जिनको माँ से द्रोह,
रहे कुशलता युक्तवे, जिनको माँ से मोह
(१२)
जो चाहो अमरत्व के, फल का सुन्दर स्वाद,
तो बनजाओ चाव से, राष्ट्र बेलिकी खाद
(१३)
मातृ- भूमि को नित यही, लगी हुई है आस,
बहने हों दुर्गावती, भाई दुर्गादास
(१४)
है अब भी भारतवही, यद्यपि है न विशेष,
चरण उठ गये, रह गये, चरण चिन्ह अवशेष
(१५)
रे तरु वर! क्यों रो रहा, तू मल– मल कर हाँथ,
तेरा ही तो काठ था, उस कुठार के साथ
(१६)
अभी जला ले काठ को, ए री ज्वाला ज्वलन्त!
हो जायेगा अन्त में, तेरा भी तो अन्त
(१७)
हेगोरे शशि! है तुम्हे, अति प्रिय काला रंग,
क्या जानो, तुम विश्व की, राजनीति के रंग
(१८)
उस तकली की शक्ति का किसे मिलेगा पार,
जिसके कच्चेतार से हिलता है संसार
(१९)
मातृ भूमि के नाम पर, नाथ रहो अनुकूल,
उसके पथ के शूल सब, कर दो कोमल फूल
(२०)
सदा किसानों से लगा , कर-कर के हैरान,
किसने हाय! लगन का, रक्खा नाम “ लगा न ”
(२१)
इधर अश्रु की धार है, उधर शास्त्र की धार,
कैसे दुहरी धार में, होगा बेड़ा पार
(२२)
रे नाविक! जानें तभी, तेरा शक्ति प्रभाव,
जब प्रतिकूल बहाव के, ले जाये तू नाव
(२३)
पिक से बढ़ कर जिस बाग में, हो कौवों का मान,
उसनन्दन वन से भला, मरघट या वीरान
(२४)
काट रहा है मौज से, अपने दिन संसार,
क्या भारत में ही हुआ, कलियुग का अवतार

नन्हें फूल

अरे गर्वीले नन्हें फूल!

दीन मधुप मधु पीने आये,
तेरे द्वारा जीने आये,
इन्हें विमुख लौटा देने से होगी भारी भूल
अरे गर्वीले नन्हें फूल!


यह वैभव है नहीं व्यष्टि का,
वास्तव में है सब समष्टि का,
जहाँ व्यक्तिगत- स्वार्थ अंकुरित हुआ वहीं है शूल
अरे गर्वीले नन्हें फूल!

यदि आवश्यकता से वंचित –
करके, रक्खा जाये संचित,
तो न पराग, पराग रहेगा हो जायेगा धूल
अरे गर्वीले नन्हें फूल!

मीरा 

तन्मय हो काली पुतली की भी तलीमें बैठ,
अखिलेश अलख ललाम देखलेती थी
द्वितीयाके चन्द्र से अमा का आवरण चीर,
अद्वितीयता का द्धुति धाम देख लेती थी
राई में सुमेर का विराम जानकार ‘शिशु’
रोम- रोम में रमा का राम देख लेती थी
जानेकौन- सा ममीरा मीरा थी लगाये हुये,
नैन मूँद के भी घनश्याम देख लेती थी
मैंने कहा- मीरे! जब व्योम विश्व- नयनों में,
श्याम- रंग की निखिल निधि भरता ही है
फिर क्यों तू एक उसी साँवले की गोपी बनी,
सीमाबद्ध रूप कभी कष्ट करता ही है
बोली- निराकार में निरा सर न मारो ‘शिशु’,
अगुन- सगुन बन देह धरता ही है
खांड औरखांडके खिलौने में न भेद कुछ,
किन्तु फिर भी खिलौना मन हरता ही है
जिसके चरण थे रसताल की सीमा तक,
व्योम तक अलक- समूहलहराया था
जिसके असंख्य श्वास वायु के विधायक थे,
उदधि उदरमें असीम घहराया था
जिसकी शिराएँ सरिताओं में बही थीं ‘शिशु’,
अस्थियों ने शैल- श्रेणियों का रूप पाया था
वही लीलाधाम श्याम मीरा की पुतलियों के,
तिल भर ठौरमें सदैव को समाया था

भूल

ओ दिवाली के दीपक सा हँसने वाले,
किसकी हैकैसी शाम तुझे मालूम नहीं,
मालूम न होने की नादानी करने का,
होगा क्या दुष्परिणाम तुझे मालूम नहीं
(१)
वह देख कि काल कोठरी की घुटती सासें,
सिकुड़े फेफड़े समेटे, तुझे गुहार रहीं
फसली सम्वत्में भी प्यासे ही प्राण लिये,
फसलों की झुलसी शहजादियाँ पुकार रहीं
गुहराने वालों ने गुहराया बार- बार,
तेरा सम्बोधन अपनी संज्ञा भूल गया
ताजे झोकों के पवन सघन- घन सावन के,
सब तेरे हीहैं नाम तुझे मालूम नहीं
(२)
काहिल हो जाना जीवन की रथ- यात्रा से,
गति- शील जुलूसों से बाहर हो जाना है
तुझको तो श्रम की मुरली अधरों पर धरकर,
निर्माणों के स्वर को संगीत दिलाना है
वीरान मांग को सेंदुर से वंदन करना,
रेगिस्तानों में गंगा का चन्दन भरना
नन्दन वन से धरती का अभिनन्दन करना,
सब तेरे ही हैं काम तुझे मालूम नहीं
(३)
दस्तूर यहाँ का यह कि चाँद का शीश- फूल,
पहले तो हर यौवन को पहनाया जाये
भरमा- भरमा कर उसे नशीली राहों में,
फिर काजल के कुण्डों में नहलाया जाये
गोरे- काले पहलु वाले शाही सिक्के,
युग- युग से चलते आये हैं बाजारों में
इन सिक्को की ही शक्लों में हर किस्मत का,
लगता आया है दाम तुझे मालूम नहीं
(४)
वे उजड़े मन जिसके सितार हैं तार- तार,
जिनमें समाधियाँ बनीं सुनहले गानों की
वे नयन जो नासूर बने रहते निसि दिन,
जिनसे तस्वीरें बहीं पिघल अरमानों की
वे घर जिनमें संझवाती के भी लाले हैं,
रो रहीं सुभद्रा बहन दर्द के आंगन में
उजड़े मन, सूने नयन बिहूने घर आँगन,
तेरे हैं चारों धाम तुझे मालूम नहीं
(५)
वह पानीदार जवानी या कुछ और कहूँ,
जो छज्जों पर ही इन्द्र- धनुष सी मुसकाये
पावन प्रणाम सी पड़ी हुई इस पृथ्वी की,
तड़पन निहारकर जिसकी आँख न भर आये
वह देख कि रेगिस्तान तरसते गोपों पर,
जठरानल में जल रही मसीहा की कुटिया
सुने हैं वृन्दावन, नंदगांव, बरसाना,
भूखे हैं सेवाग्राम तुझे मालूम नहीं

शिकायत

जब कार्य अधूरा छूट गया, कारण की शिकायत कर बैठे
साध की न देखीदुर्बलता, साधन की शिकायत कर बैठे

माँ के चरणों में शीश चढ़ा , किसने आशीष नहीं पाई
केवल भयभीत पुजारी ही, पूजन की शिकायतकर बैठे

जीवट वाले तो मर कर भी, युग- युग तक जीवित रहते हैं
मरने सेडरने वाले ही, जीवन की शिकायत कर बैठे

आखों की तिल सीपुतली में, काली आँधी भरने वाले
अपने मद की दवा न करके, यौवन की शिकायत कर बैठे

यद्यपि हांथो ने हँस- हँसकर, खुद ही हथकड़ियाँ पहनी हैं
फिर भी गलती स्वीकार न कर, बंधन की शिकायत कर बैठे

जिनकों न नाचना आता है, गति- ताल आदि का ज्ञान नहीं
वे टेढ़ा- मेढ़ा बतला कर, आँगन की शिकायत कर बैठे

आँचल उलझा कर शूलों में, फूलों का घर तक जान सके
असफलता की झुंझलाहट में उपवन की शिकायत कर बैठे

कोपल किसलय, किसलय कलिका, कलिका हँस-हँस कर कुसुम बनी
बस डंक उठाये काँटें ही, मधुवन की शिकायत कर बैठे

जबह्रदय हरा करने वाली, अम्बरसे बरसी हरियाली
तब जी के जले जवासे ही, सावन की शिकायत कर बैठे

जो चाटुकार है वह मुँह पर, मुँह देखी बात करेगा ही
तुम नाहक पीछे द्रष्टि डाल, दर्पण की शिकायत कर बैठे

सम्मोहन- मंत्रों में फँसकर, मायावी मोह न छोड़ सके
राधा सी उलटीधारा में, मोहन की शिकायत कर बैठे

तनिक और

तनिक और पतझार से खेल लूँ फिर,
तुम्हारी बहारों को आवाज दूँगा
अभी स्वावलम्बन से काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारे को आवाज दूँगा
(१)
हवा हरहराकर कंपाती दिशायें,
नदी से उठी सिन्धु की घोषणायें
उछलते हैं लहरों के फन तक्षकों से,
भंवर खोल मुँह हँस रहे दायें- बायें
मगर नाव अपनी नहीं डगमगाई,
भुजाओं से पतवार की है सगाई
तनिक और मँझधारसे खेल लूँ फिर,
तुम्हारे किनारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारोंको आवाज दूँगा
(२)
लगी दण्डकारण्य में घोर ज्वाला,
उड़ी शून्य पथ से वि हँगों की माला
अनल बाण से लपलपाती हैं लपटें,
पड़ा मेरे मृग को ही जौहर से पाला
मगर याद मुझको है गाथा पुरानी,
बुझी जैसे दावानलों की निशानी
अभी तक तो अपने में पानी है फिर,
तुम्हारी फुहारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा
(३)
जवानी का हुंकार मस्ती का स्वर है,
बियावान में एक हस्ती का स्वर है
जरूरी नहीं है की तन के ही संग में,
बुढा जाये मन जो अजर- अमर है
अभी तक तो अपना वही कार्यक्रम है,
नवागन्तुकों के लिये स्वागतम् है
पके अनुभवों से जरा काम लेकर फिर,
तुम्हारे कुमारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा
(४)
हिमालय से ज्यादा वजनदार जीवन,
का बोझ उठाये अ हँभाव का मन
यही मन का रावण पसारे दशानन,
लिये जा रहा हाँक करके मेरा तन
चढाओं- उतारों का पथ है भयंकर,
हजारों हैं काँटे करोड़ो हैंकंकर
अभी तक तो कंधों पे है पालकी फिर,
तुम्हारे कहारोंको आवाजदूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा
(५)
कहाँ चाँद दो- दो दमकते गगन में,
कहाँ सूर्य दो- दो दमकते भुवन में
इकाई की संज्ञा को लेकर पवन भी,
अकेला ही चलता नगर में विजन में
मगर एक होकर भी मैं एक कब हूँ,
विचारों का मेला लिये साथ जब हूँ
अभी तो चलूँगा अकेला ही फिर मैं,
तुम्हारे हजारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा
(६)
नहीं चाहता हूँ की घायल धरा हो,
कपाली का खप्पर रुधिर से भरा हो
प्रकति का महाबद्शक्ल पुत्र रण है,
बचे इससे धरती तो अंचल हरा हो
मगर व्यंग खोटे किये जा रहे हैं,
समर के निमंत्रण दिये जा रहे हैं
अभी सदविचारों से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे दुधारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा
(७)
जहां पर के तुलसी के श्री राम आये,
कछारों में सूरा के घनश्याम आये
जहाँ बुद्ध, नानक, महावीर जन्मे,
पिथौरा, शिवा देश के काम आये
जहाँ की सुबह रोज गाती प्रभाती,
जहाँ नित्य संध्या जलाती है बाती
उसी भूमि के कण प्रथम चूमकर फिर,
तुम्हारे सितारों को आवाज दूँगा
अभी स्वाबलम्बन से ही काम लूँ फिर,
तुम्हारे सहारों को आवाज दूँगा

मुक्तक

(१)
भोग की चाह में भगवान को बदनाम न कर,
अपने इंसान को शैतान का गुलाम न कर
बुद्ध के देश की मिट्टी से देह है बनी,
रूप की रात में मुसकान को नीलम कर
(२)
दीन के रक्त से जिनके चिराग जलते हैं,
और फिर चीटियाँ चुगाने को निकलते हैं
उनके धर्मात्मापने पर रहम आता है,
स्याहियां पीते और सोखता निगलते हैं
(३)
ठसक की चालें राह को नहीं जगा सकतीं,
धरा के घाव में मरहम नहीं लगा सकतीं
तुम्हारी ठोकरें यह धूल उड़ा सकती हैं,
किसी के खेत में फसलें नहीं उगा सकतीं
(४)
सर्प सी फुफकार लेकर आप आये हैं,
दीप के निर्वाण का संदेश लाये हैं
पर बुझाने से प्रथम यह तो कहो अब तक,
आपने कितने बुझे दीपक जलाये हैं
(५)
समय- समय को देखकर राग गाये जाते हैं,
करुण के बाद तरुण स्वर बजाये जाते हैं
पाखरे जाते कभी आसुओं से माँ के चरण,
कभी लहु की नदी में धुलाये जाते हैं
(६)
कला के पृष्ट- भूमि की अमर कहानी हूँ,
अतीत- काल की निखरी हुई निशानी हूँ
अदव से पेश आओ वर्तमान के पुतले,
कि आज तेरे लिये मैं भविष्यवाणी हूँ
(७)
चाँद का फीका फरेरा हो रहा,
शुक्र का सुनसान डेरा हो रहा
रात छोटी चार का घंटा बजा,
जान पड़ता है सवेरा हो गया
(८)
जिन्दगी का क्या ठिकाना कि जी सके कि न जी सके,
होश की चादर फटी फिर सी सके कि न सी सकें
चाह पीने की अगर है तो पियो पर शर्त है,
तुम पियो मदिरा मगर मदिरा तुमको न पी सके
(९)
गीत गाने से प्रथम मुक्तक पढूँगा,
राग गाने से प्रथम सप्तक पढूँगा
आप जो चाहें मुझे समझें मगर मैं,
इम्तहां से पेश्तरपुस्तक पढूँगा
(१०)
देश में जो खान लोहे की निकलती है,
दो तरह का वह यहाँ लोहा उगलती है
एक की खुरपी निराती गोड़ती खेती,
एक की रण क्षेत्र में तलवार चलती
(११)
आज तक सौन्दर्य के तो पाँव टिक पाये नहीं,
टिक सके होंगे कहीं,पर द्रष्टि में आये नहीं
अब बहार आयेगी तो उससे ये पूछेंगे जरुर,
फूल ऐसा है कोई जो खिल के मुरझाये नहीं
(१२)
जब कि एक ही शाख एक ही घर एक ही घराना,
मलय- पवन ने दुलारने में कोई भेद न माना
फिर भी एक भाव के अनमिल दो प्रभाव ये कैसे,
फूलों न मुसकाना सीखा,काँटों न चुभ जाना
(१३)
क्यों ऊषा की लालिमा इतनी निराली है,
क्योंकि उसकी रात कीपोशाक काली है
सौत- जैसा डाह आपस में लिये फिर भी,
मौत ने ही जिन्दगी में फिर जान डाली है
(१४)
लिये शक्तिका दीप जाते किधर हो,
अरे यह अकेला तुम्हारा नहीं है
दिया मान भी लें तुम्हाराअगर तो,
दिये का उजाला तुम्हारा नहीं है
(१५)
मानता हूँ नीड़ खग का एक सीमित वास है,
और मुट्ठी भर परों में प्राण का इतिहास है
किन्तु तुम इसकी उड़ाने व्यर्थ में मत छोड़ना,
मनचले की बाजुओं में ही छिपा आकाश है
(१६)
शोक होता ही नहीं मुझे किसी के शाप से,
किन्तु लगती आग अंतर में उसी क्षण ताप से
जब कि साढ़े तीन हाँथो की रची इस देह को,
नापता सिक्का किसी का एक इंची नाप से
(१७)
मानता हूँ दूर तीर्थों में गये तुम सर्वथा,
मन लगाकर भी सुनी भगवान की पूरी कथा
किन्तु उससे भी अधिक फल पा गये होते अगर,
ध्यान से तुमने पड़ोसी की सुनी होती व्यथा
(१८)
यत्नकण करता रहा पाषण होने के लिये,
लालसा पाषण की भगवान होने के लिये
कण तथा पाषण के तो लक्ष्य ये ही थे,
चाह थी भगवान की इन्सान होने के लिये
(१९)
तर हुई हैं बतियों ले आसुओं की बेकली,
जातारही हैं दग्ध ह्रदयों को समेटी खलबली
सावधान ! बचो- बचो इस आग के त्योहार से,
इन दियों से तुम मना सकते नहीं दीपावली
(२०)
तुम पूछते हो मुझसे मैं किसको खोजता हूँ,
मैं खोजता उसको जिसको कि खो चुका हूँ
फिर पूछने लगे तुम मैं किसको खो चुका हूँ,
मैं खो चुका हूँ उसको जिसका हो चुका हूँ
(२१)
नालिज पाने को कॉलेज में पढ़े हुये हैं,
रहन- सहन के शाही खर्चे बढ़े हुये हैं
किसी झोपड़ी में जाने को तो जी चाहता है,
मगर क्या करें यार ऊँट पर चढ़े हुये हैं
(२२)
ऐसा जग में कौन कि जिसमें कुछ भी नहीं बुराई,
क्या दृष्टि दोष दर्शन को ही विधि ने आँख बनाई
हम निकलें तो अच्छाई की ही तलाश में निकलें,
दाना चुगो चलें व्यर्थ क्यों कूड़ा- करकटनिकले
(२३)
यह मत सोचो कि कष्ट अनन्त हुआ करता है,
विपदाओं का भी तो अंत हुआ करता है
सुख ही दुःख का उच्चाधिकारी होगा,
पतझड़ के ही बाद बसन्त हुआ करता है
(२४)
अंगरक्षा के लिये ऐसा अंगरखा भी सियो,
अंत में जिसको पहन, अमरत्व का आसन पियो
अर्थ कहने का यही है, मृत्यु का विषकील दो,
संगनी उसको बनाओ किन्तु मर कर भी जियो
(२५)
तीव्र– तर नोकें लिये डाल में उगे हैं शूल,
जिनमे कि नाम- मात्र की भी नरमी नही
जड़ता के चूर्ण सी जड़ों के पास धूल पड़ी,
जिनमें कहीं भी अणु – मात्र की नमी नहीं
(२८)
इति के इच्छुक होकर, मत तुम अथ में बैठो,
मंजिल पाने के लिये न पथ में बैठो
सारथि बन , केशव निश्चित आयेगें,
तुम अर्जुन बन कर रथ में बैठो
(२९)
पाँच के पच्चानवे मोती लपेटे बाग में,
पाँच दाने ही पड़े पच्चानवे के भाग में
क्या अचम्भा बाँट की असमानता यों देखकर,
आज का कवि आग की फाग गाये राग में
(३०)
जिसने बाँधा बाँध,आंसुओं की घाटी का,
जिसने किया समर्थन, श्रम की परिपाटी का
वह नरकुल की कलम कल्पतरु बनकर फूले,
जिसने पहले पहल गीत गाया माटी का

आज (दुर्दशा) 

लक्ष्य हँस रहा तिरछा-तिरछा, क्योकि पार्थ पर तीर नहीं है
हाँथो पर गाण्डीव नहीं है, कंधे पर तुणीर नहीं है

दुशासन की दुष्ट भुजायें, थकने की क्यों चिंता लायें
आज पाण्डवों की द्रोपदियों पर, अंगुल भर चीर नहीं है

संतापों ने हिमगिर का हिम छीन लिया, सोते भी सोखे,
इसीलिये तो भागीरथ की गंगा में, अब नीर नहीं है

माँ की छाती चूस-चूस कर, भूखों मरे दुधमुँहे बच्चे,
शायद क्षीर सिन्धु शायी के क्षीर सिन्धु में क्षीर नहीं है

कहीं एक मुट्ठी दानों पर, प्राणों की होडें लगती हैं,
कहीं स्वर्ण भस्मों का खाना, कोई टेढ़ी खीर नहीं है

किसी समय मानव काया में, पेट ह्रदय के नीचे ही था,
लेकिन आज उदर के ऊपर, उर के लिये शरीर नहीं है

फुंनगी पर फूलेफूलों की, सेवा में फिरतें हैं भौरें,
मिट्टी में मिल जाने वाली, पंखुरियों के पीर नहीं हैं

कहीं एक की रंगरेली में, सौ- सौ इंद्र धनुष बन्दी हैं,
कहीं सैकड़ों रेखाचित्रों में, रंगीन लकीर नहीं है

मन के ठाकुर अपनी- अपनी, गढ़ी बनाये अकड़ रहे हैं,
सबकी रक्षा करने वाली, सामुहिक प्राचीर नहीं है

हमकों दो धारों में करने वाले, कुटिल दुधारें तो हैं,
पूजा और नमाज मिलाने वाला, संत कबीर नहीं है

भले महात्मा कोई आगे, सब धर्मों के ह्रदय मिला दे,
पर सीने पर गोली खाने वाला, आज फकीर नहीं है

आज चित्रशाला में अलियों, कलियों के चित्र टंगे हैं,
दबने पर चुभ जाने वाले, कांटों की तस्वीर नहीं है

किसी समय धीमे चलने का कारण, बेड़ी का बंधन था,
किन्तु आज गति ही जड़ है, जब पैरों में जंजीर नहीं है

मरघट 

नदिया का तट जहाँ बहुत से गाँवो का पनघट है,
वहाँ बहुत गाँवो का मरघट भी नदिया का तट है
कहीं पहुँचते हैं प्यासे घट जीवन- रस पाते हैं,
कहीं पहुँचते हैं सूने घट स्वाहा हो जाते हैं
कितने घट प्यासे पहुंचे हैं जीवन रस पाने को,
कितने घट सूने पहुंचे हैं स्वाहा हो जाने को
नदिया ने कुछ भी नहीं दिया है इन प्रश्नों का लेखा,
केवल कोरी बही लिये ही हरदम बहते देखा
उधर घाटों को भरते- भरते धारा नहीं चुकी है,
इधर चिता भी जलते- जलते अब तक नहीं बुझी है
विधना सृजन बंद कर दे तो विष्णु किसे पालेगें,
विष्णु जिसे पालेंगे उसको रूद्र न क्यों घलेगें
रूद्र न घालेगें तो फिर विधि का विधान क्या होगा,
विधि- विधान के बिना विष्णु का विश्व- मान क्या होगा
उत्त्पत्ति, पालन, लय की गति में राग- विरागबसा है,
इसी त्रिवेणी के संगम पर विश्व- प्रयाग बसा है
आओ थोड़ा इधर चलें यह महा- शान्ति का तट है,
जिसको लोग प्राण देकर पाते हैं वह मरघट है
एकाकी लगता है लेकिन लगता नहीं अकेला,
यहाँ बहुत ही खामोशी सेलगा हुआ है मेला
गुमसुम धारा मूक किनारा, दाह क्रिया के छाले,
भस्म-अस्थियाँ, जली लकड़ियाँ, टुकड़े काले- काले
कई चितायें बुझी पड़ी हैं, हाँ करती एक उजेला,
यहाँ बहुत ही ख़ामोशी से लगा हुआ है मेला
मानव घर में पैदा होकर धारती पर फिरता है,
सागर में तिरता है, नभ में मेघों सा घिरता है
सभी जगह जाता है लेकिन इधर न आ पाता है,
आता है तो चार जनों के कन्धों परआता है
सोच रहा हूँ घर से मरघट की कितनी थी दूरी,
जिसको तय करने में इसने उम्रगँवा दी पूरी
जहाँ- जहाँ भी गया वहां क्या मरघट की रहें थीं,
मरने की तैयारी को क्या जीने कीचाहें थी
इस दुनिया में पाँच तीलियों के अनगिन पिंजड़े हैं,
जिन्हें बहुत से हँस अनेकों रूपों में जकड़े हैं
अखिल गगन- गामी पंखों में बांधे दस- दस पत्थर,
सीमा में न सामने वाले सीमओं के अंदर
बंधन के माथे पर अपने मन का तिलक किया है,
बहुतेर्रो ने अपने को ही पिंजड़ा समझ लिया है
सोच रहे हैं रंगमहल ये कभी न छूट सकेगा,
ऐसा डाकू कौन यहाँ जो हमको लूट सकेगा
किंतु सुरक्षित रहन- सहन के साधन दृढ से दृढतर,
हरदम हाजिर रहने वाले ढेरों नौकर- चाकर
सावधानियों का जितना ही जोड़ा जाये मेला,
सभी झमेला छोड़ अन्त में उड़ता हँस अकेला
किसे पाता, जाने वाले को आना भी पड़ता है,
लेकिन आने वाले को तो जाना ही पड़ता है
हँस उड़ा तो फिर पिंजड़े की कीमत खो जाती है,
इसी जगह पर दीवाली की होली हो जाती है
देखत वो जल रही चिता धरती पर धूं- धूं कर,
कहाँ गये वे पलंग और वे शैय्या के आडम्बर
हांथो- हाँथ उठाने वाले इतना ही कर पाये,
नाड़ी छूट गयी तो घर से मरघट तक ले आये
जनक और जननी के चुम्बन, भैया के अभिनन्दन,
पुलकन भरी बहिन की राखी, तिरिया के आलिंगन
पास- पड़ोसी, पुरजन- प्रियजन इतना ही कर पाये,
नाड़ी छूट गयी तो घर से मरघट तक ले आये
नगर सेठ के नगर पिता के बहुत बड़े बेटे हैं,
मगर लक्क्ड़ो के नीचे चुप होकर चित्त लेटे हैं
सह न सके सर दर्द कभी उपचार बहुत करवाये,
आज किसी धन्वन्तरि के कल-कौशल काम न आये
जाड़े के मौसम में घर पर जेठ बुलाने वाले,
हीटर को दहका कर कमरे को गरमाने वाले
ठण्डे होकर इंधनबनकर अर्थी में लेटे हैं,
धन वाले के, बल वाले के बहुत बड़े बेटे हैं
स्वर्ण भस्म को खाने वाले इसी घाट पर आये
दाने बीन चबानेवाले इसी घाट परआये
गगनध्वजा फहराने वाले इसी घाट पर आए,
बिना कफ़न मर जाने वाले इसी घाट पर आये
सिरहाने से आग लगाई, केश जले पलछिन में,
लोहितजिह्वाओं सी लपटें, लिपटी सारे तन में
झुलस- झुलसकर खाल जल रही, फबक- फबक कर चर्बी,
सिकुड़- सिकुड़ कर माँस जल रहा, चटक- चटक कर हड्डी
लपटें उठ- उठ पंच फैसला अपना सुना रही हैं,
जिसकी थीं जो चीज जहाँ की उसको दिला रही हैं
बूंद सिन्धु को, किरण सूर्य को, साँस पवन को सौंपी,
शून्य शून्य के किया हवाले, भस्म धरिणी को सौंपी
कई चितायें बुझी पड़ी हैं, लिये राख की ढेरी,
उनके कण- कण बिखराने को पवन दे रहा फेरी
भस्म देखकर पता न लगता, नारी की न नर की,
किसी सूम की या दाता की, कायर या नाहर की
सोच रहा हूँ जिसने कंचन काया नाम दिया है,
उसने माटी की ठठरी पर कस कर व्यंग किया है
क्योंकि भस्म सोने की ऊँचे दामों पर बिकती है,
मगर राख कंचन काया की व्यर्थ उड़ी फिरती है
परमधाम में ऐसे ही आचरण हुआ करते हैं
वैश्वानरके सर्वस्वाहा हवन हुआ करते हैं
और ठीक भी है दुनियाँ से कोई अगर न जाता,
अपनी पाई हुई वस्तु पर चिर अधिकार जमाता
तो फिर अगला आने वाला बेचारा क्या पाता,
कर्मक्षेत्र की चहल- पहल का पटाक्षेप हो जाता
शायद इसीलिये नदिया के एक ओर पनघट है,
और दूसरी ओर दहकता हुआ घोर मरघट है

पखेरू

पखेरू! भले छत छुओ व्योम की, पर
धरापर तुम्हे लौट आना पड़ेगा
निराधार आधेय को अंत में तो,
सहारायहीं का दिलाना पड़ेगा
(१)

तुम्हे आज विश्वास है- देवतागण,
बसे हैं कहीं अन्तरिक्षी- निलय में
इसी से उड़ाने भरे जा रहे हो,
लिये लालसा दर्शनों की हृदय में
हटाये हुये ध्यान हरियालियों से,
तराना सुनाते हो अमरावती का
करो खूब कीर्तन सुरों के विपिन का,
मगर खेत का गीत गाना पड़ेगा
(२)
भले स्वर्ग में हो अजरता- अमरता,
यहाँ हों जरा मृत्यु की आपदायें
मगर देवता- लोग फिर भी लिये हैं,
यहीं पर ही अवतार की लालसायें
हुये बावले स्वर्ग की चाह में तुम,
उसे चाहते क्या यहीं खींच लाना
अमृत पुत्र होने के नाते तुम्हे तो,
अवनि को अमरपुर बनाना पड़ेगा
(३)
तुम्हारे यहाँ भूमि पर क्या कमी है ?
हिमालय का माथा गगन चूमता है
समानाधिकारों—से मैदान फैले,
महा-सिन्धुगाम्भीर्य में झूमता है
मगर क्षेत्र प्रत्यक्ष केछोड़ कर तुम,
अलक्षित महाशून्य मेंजारहे हो
तुम्हे तो महाकाश के अंचलों में,
घटाकाश का ध्वज उड़ाना पड़ेगा
(४)
मिलें है संदेशे तुम्हे कोपलों से,
मिली मंद मुसकान कलिकावली से
प्रसूनों से जी खोल हँसना मिला है,
सफलता मिली डाल फूली- फली से
तुम्ही अब करो न्याय ऐसी दशा में,
कृतन्धी बने हो की त्यागी बने हो
जिसे छोड़ सुनसान यों जा रहे हो,
उसी डाल को फिरबसाना पड़ेगा
(५)
यहाँ मंजूमकरन्द के कोश खोले,
सुगन्धें हैंमंहकी वसन्तीबयारें
बरसती रहीं सांवलेअंचलोंसे,
हरी चादरों पर गुलाबी फुहारें
शरद- शर्वरी हँस के पंख धोकर,
सदा शारदा को सजाती रही है
तुम्हे दृश्य से देखने के लिये फिर,
इधर ही निगाहों को लाना पड़ेगा
(६)
न आती है क्या याद उन कोपलों की ?
तुम्हारे परों के ही संग जो उगी थी
न क्या याद उन मंजु कलियों की आती ?
तुम्हारी प्रभाती जो सुन के जगी थी
वहीं कोपलें आज पत्ते हुई हैं,
विजय- हार के फूल कलियाँ बनी हैं
विकासों की तुम को भी है लालसा तो,
तुम्हे साथ उनका निभाना पड़ेगा
(७)
तुम्हे ज्ञात है- व्योम में कशिश कुछ!
भटकते जो दिन- रात रवि- चाँद तारे
उतरते वे फिर भी धरा के ही ऊपर ?
रुचिर—रेशमी रश्मियों के सहारे
झगड़ते हैं नीलम के आँगन में तारे,
मगर धूल में फूल हैं मुस्काते
तुम्हेशान्ति की खोज में मिट्टियों की,
महक को ह्रदय से लगाना पड़ेगा
(८)
यही चाहते प्राण-पंछी तुम्हारे,
की ऊँचे उठें हँस अवंतस हो लें
शुभाशीष मैं भी उन्हें दे रहा हूँ,
की वे हँसहो लें परम- हँस हो लें
परम हँस लेकिन ह्रदय- मुक्त लेकर,
सदा बन्धनों को सरस हैं बनाते
तुम्हे भोग के कुंज में योग वाला,
विमल रास- मण्डल रचाना पड़ेगा
(९)
भले स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाकर,
प्रखर बुद्धि बारीकभेदों को पाये
मगर यह है निश्चय कि निश्चय से हटकर,
अनिश्चय में कुछ हाँथ उसके न आये
नियम जो कि प्रत्यक्ष के हैं उन्ही से,
परोक्षों में चिंतन मनन कर सकोगे
त्रणों से बने नीड़ के ही पगों पर,
हवाई महल को झुकाना पड़ेगा
(१०)
महाक्षेत्र, क्षेत्रज्ञ कीयोग– माया,
किसी सेन छूटीतुम्ही क्या बचोगे
उलझते ही जाओगे उलझनमें उतना,
सुलझने को योंस्वांग जितने रचोगे
मिला मूल में बीज जो भी तुम्हे, वह,
तुम्हारे हीफल का तो है सूक्ष्म- कारण
असंगति हुये बिन वही बीज फिर से,
इसी क्षेत्र में ही उगाना पड़ेगा
(११)
अहम्मन्यता के नशे में मुसाफिर,
थकानों को हैशेखियों से छिपाना
मगर शेखियों की भी है एक सीमा,
हुआ क्षीण बल तो रिंगा भी न जाता
यही अंत में हाल होगा तुम्हारा,
अभी अंध–विश्वास में जा रहे हो
घड़ी एक ऐसी भी आयेगी जब इस,
अहम्भाव को डगमगाना पड़ेगा
(१२)
लिये शक्ति का दीप जाते किधर हो ?
अरे यहअकेला तुम्हारा नहीं है
दिया मान भी लें तुम्हारा अगर तो,
दिये का उजाला तुम्हारा नहीं है
अमावस के अभिशाप से स्याह होकर,
अँधेरीपड़ी पर्ण- कुटियाँ अनेकों
वहीं अंधकारों की छाती के ऊपर,
इसे लौलगाकरजलाना पड़ेगा
(१३)
यहीं पर ही अवतार श्री राम ने ले,
जनक केस्वयम्बर में सीता को पाया
यहीं पर ही अवतार घनश्याम नेले,
धनंजय के स्पन्दन में सीता को गाया
उतरना तो अवतार का अर्थ है, तुम,
त्रिकुटी में निगाहें चढ़ाये हुये हो
उठानों- चढ़ानों- उड़ानों का गौरव,
धरा परउतरकर सजाना पड़ेगा

पखेरू

पखेरू! भले छत छुओ व्योम की, पर
धरापर तुम्हे लौट आना पड़ेगा
निराधार आधेय को अंत में तो,
सहारायहीं का दिलाना पड़ेगा
(१)

तुम्हे आज विश्वास है- देवतागण,
बसे हैं कहीं अन्तरिक्षी- निलय में
इसी से उड़ाने भरे जा रहे हो,
लिये लालसा दर्शनों की हृदय में
हटाये हुये ध्यान हरियालियों से,
तराना सुनाते हो अमरावती का
करो खूब कीर्तन सुरों के विपिन का,
मगर खेत का गीत गाना पड़ेगा
(२)
भले स्वर्ग में हो अजरता- अमरता,
यहाँ हों जरा मृत्यु की आपदायें
मगर देवता- लोग फिर भी लिये हैं,
यहीं पर ही अवतार की लालसायें
हुये बावले स्वर्ग की चाह में तुम,
उसे चाहते क्या यहीं खींच लाना
अमृत पुत्र होने के नाते तुम्हे तो,
अवनि को अमरपुर बनाना पड़ेगा
(३)
तुम्हारे यहाँ भूमि पर क्या कमी है ?
हिमालय का माथा गगन चूमता है
समानाधिकारों—से मैदान फैले,
महा-सिन्धुगाम्भीर्य में झूमता है
मगर क्षेत्र प्रत्यक्ष केछोड़ कर तुम,
अलक्षित महाशून्य मेंजारहे हो
तुम्हे तो महाकाश के अंचलों में,
घटाकाश का ध्वज उड़ाना पड़ेगा
(४)
मिलें है संदेशे तुम्हे कोपलों से,
मिली मंद मुसकान कलिकावली से
प्रसूनों से जी खोल हँसना मिला है,
सफलता मिली डाल फूली- फली से
तुम्ही अब करो न्याय ऐसी दशा में,
कृतन्धी बने हो की त्यागी बने हो
जिसे छोड़ सुनसान यों जा रहे हो,
उसी डाल को फिरबसाना पड़ेगा
(५)
यहाँ मंजूमकरन्द के कोश खोले,
सुगन्धें हैंमंहकी वसन्तीबयारें
बरसती रहीं सांवलेअंचलोंसे,
हरी चादरों पर गुलाबी फुहारें
शरद- शर्वरी हँस के पंख धोकर,
सदा शारदा को सजाती रही है
तुम्हे दृश्य से देखने के लिये फिर,
इधर ही निगाहों को लाना पड़ेगा
(६)
न आती है क्या याद उन कोपलों की ?
तुम्हारे परों के ही संग जो उगी थी
न क्या याद उन मंजु कलियों की आती ?
तुम्हारी प्रभाती जो सुन के जगी थी
वहीं कोपलें आज पत्ते हुई हैं,
विजय- हार के फूल कलियाँ बनी हैं
विकासों की तुम को भी है लालसा तो,
तुम्हे साथ उनका निभाना पड़ेगा
(७)
तुम्हे ज्ञात है- व्योम में कशिश कुछ!
भटकते जो दिन- रात रवि- चाँद तारे
उतरते वे फिर भी धरा के ही ऊपर ?
रुचिर—रेशमी रश्मियों के सहारे
झगड़ते हैं नीलम के आँगन में तारे,
मगर धूल में फूल हैं मुस्काते
तुम्हेशान्ति की खोज में मिट्टियों की,
महक को ह्रदय से लगाना पड़ेगा
(८)
यही चाहते प्राण-पंछी तुम्हारे,
की ऊँचे उठें हँस अवंतस हो लें
शुभाशीष मैं भी उन्हें दे रहा हूँ,
की वे हँसहो लें परम- हँस हो लें
परम हँस लेकिन ह्रदय- मुक्त लेकर,
सदा बन्धनों को सरस हैं बनाते
तुम्हे भोग के कुंज में योग वाला,
विमल रास- मण्डल रचाना पड़ेगा
(९)
भले स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाकर,
प्रखर बुद्धि बारीकभेदों को पाये
मगर यह है निश्चय कि निश्चय से हटकर,
अनिश्चय में कुछ हाँथ उसके न आये
नियम जो कि प्रत्यक्ष के हैं उन्ही से,
परोक्षों में चिंतन मनन कर सकोगे
त्रणों से बने नीड़ के ही पगों पर,
हवाई महल को झुकाना पड़ेगा
(१०)
महाक्षेत्र, क्षेत्रज्ञ कीयोग– माया,
किसी सेन छूटीतुम्ही क्या बचोगे
उलझते ही जाओगे उलझनमें उतना,
सुलझने को योंस्वांग जितने रचोगे
मिला मूल में बीज जो भी तुम्हे, वह,
तुम्हारे हीफल का तो है सूक्ष्म- कारण
असंगति हुये बिन वही बीज फिर से,
इसी क्षेत्र में ही उगाना पड़ेगा
(११)
अहम्मन्यता के नशे में मुसाफिर,
थकानों को हैशेखियों से छिपाना
मगर शेखियों की भी है एक सीमा,
हुआ क्षीण बल तो रिंगा भी न जाता
यही अंत में हाल होगा तुम्हारा,
अभी अंध–विश्वास में जा रहे हो
घड़ी एक ऐसी भी आयेगी जब इस,
अहम्भाव को डगमगाना पड़ेगा
(१२)
लिये शक्ति का दीप जाते किधर हो ?
अरे यहअकेला तुम्हारा नहीं है
दिया मान भी लें तुम्हारा अगर तो,
दिये का उजाला तुम्हारा नहीं है
अमावस के अभिशाप से स्याह होकर,
अँधेरीपड़ी पर्ण- कुटियाँ अनेकों
वहीं अंधकारों की छाती के ऊपर,
इसे लौलगाकरजलाना पड़ेगा
(१३)
यहीं पर ही अवतार श्री राम ने ले,
जनक केस्वयम्बर में सीता को पाया
यहीं पर ही अवतार घनश्याम नेले,
धनंजय के स्पन्दन में सीता को गाया
उतरना तो अवतार का अर्थ है, तुम,
त्रिकुटी में निगाहें चढ़ाये हुये हो
उठानों- चढ़ानों- उड़ानों का गौरव,
धरा परउतरकर सजाना पड़ेगा

चम्बल घाटी 

(1)
मानव की धरती में लोहू हुआ प्रभावित जब से,
चम्बल रानी के बहने की चली कहानी जब से।
सागर ने गंगा द्वारा, जो सन्देश भिजवाया,
वह जमुना के हाथों उसके घर आंगन तक आया।

(2)
फिर क्या था सागर की थी जो खाई लम्बी चौड़ी,
उसको पानी से, माटी से, भरने को वह दौड़ी।
याचक की झोली भरना दाता की परिपाटी है,
माटी को कट कर बह जाना ही उसकी घाटी है।

(3)
उच्च भावना के घोतक से ऊँचे खड़े कंगारे,
खड्डों में गम्भीर हृदय के मानचित्र हैं सारे।
चट्टानों में अडिग प्रतिज्ञा के संकेत करारे,
धारा में बहते रहते हैं पानी दार दुधारे।

(4)
इसके तट भी अजब विरोधी कभी नहीं मिल पाते,
किन्तु साथी ऐसे वे अन्त तक साथ–साथ हैं जाते।
और किनारे की मिट्टी से बनने वाले पुतले,
जीने की सुविधा में पिछले मर मिटने में अगले।

(5)
विज्ञापन से दूर यहाँ का है इतिहास पुराना,
जिसका सिक्का जमा वीरता का वह यही खजाना।
निश्चल मन वाले शरीर में अविचल शक्ति रही है,
राज्य भक्ति के साथ–साथ ईश्वर की भक्ति रही है।

(6)
प्राण जांय पर बचन न जाहि यह तुलसी की चौपाई,
जहाँ अनेक बार बाँकुरे वीरों ने दौहराई.
देता है हथकांत गवाही कितने मुंड कटे हैं,
शुद्ध रक्त की लिये पताका कितने रुण्ड उठे हैं।

(7)
ये माई के लाल विषैला जुल्म न सह पाते हैं,
किन्तु अमृत की मधुर लोरियाँ सुनकर सो जाते हैं।
इसी लिये उस रोज विनोबा ने जो जादू डाले,
झुके अहिंसा के चरणों में हिंसा के मतवाले।

(8)
आत्म समर्पण की प्रतिमायें भक्ति भाव भरती थी,
उठी डंक-सी मूंछे दाढ़ी को प्रणाम करती थीं।
शान्त ह्रदय में वीर, करुण रस का संचार किये थे,
रौद्र रूप को त्याग सरलता का श्रंगार किये थे।

(9)
वे वीभत्स भयंकर आँखें आँसू से धोये थे,
बाबा के अद्भुत मुसकानों में खोये-खोये थे।
जब गौतम ने एक निष्ठुर के भाव कराल सुधारे,
अब भावे बन बीस उन्होने अंगुलिमाल उबारे।

(10)
आगे बढ़ने वाली दुनिया आगे बढ़कर आये,
उसे चुनौती आज कि ऐसा उदाहरण दिखलाये।
बड़े बड़े कानून जून से गरम जहाँ पर हारे,
वहाँ अहिंसा के सावन ने ठंडे किये अंगारे।

(11)
मैंने माना इस भारत में जब-जब अर्जुन आये,
तब तब यहाँ उन्होने रथ के बाँके सार्थी पाये।
किन्तु मौत पर काबू पाना अपने हाथ नहीं है,
शोक हमारे साथ आज जनरल यदुनाथ नहीं है।

पनघट 

आड़ गहरी ले, जीवन-श्रोत बहाने वाले ओ पनघट!
अदृश्‍यों का घूँघट-पट डाल, लजाने वाले ओ पनघट!
तनिक देखो मेरी भी ओर, मरू-स्‍थल से चल आया हूँ;
वहाँ की मृग-तृष्‍णा से भटक, दहकती प्‍यासें लाया हूँ।

तुम्‍हारे पास चूँकि है, तप्‍त समस्‍याओं का शीतल हल;
तुम्‍हारे पास चूँकि है, थके पथिक की गतियों का सम्‍बल।
तुम्‍हारे पास चूँकि है, रिक्‍त-घटों को भरने वाला जल;
तुम्‍हारे पास चूँकि है, अखिल तृप्‍तियों का संजीवन-बल।

मुझे भरने न तलैया ताल, नदी-नद नहीं बहाने हैं;
सिंधु या महासिंधु भी नहीं, तरंगों से लहराने हैं।
एक ही बूँद माँग कर तुम्‍हें बनाने आया हूँ दाता;
तृषा से त्राहि-त्राहि कर तुम्‍हें, बनाने आया हूँ त्राता।

अनेकों बार प्‍यास के पास, तुम्‍हारा पहुँचा है पानी।
भाग्‍य समझो जो जल के पास, जलन की आई हैरानी॥

पाटिया पार की 

है बहुत ग़मगीन व गमख्वार पटिया पार की,
आपने देखी कहाँ सरकार पटिया पार की।

बाजरे का या चने का है सादा भोजन यहाँ,
भोगती है पेट के आज़ार पाटिया पार की।

कुओं में पानी यहाँ मिलता है सत्तर हाँथ पर,
फिर भला हो किस तरह बीमार पटिया पार की।

इधर चम्बल उधर यमुना बीच में यह घिर गई,
छू रही दो नदियों की धार पटिया पार की।

धार पानीदार दोनों ओर इनके देख लो,
यों दुधारा हो गई तलवार पटिया पार की।

पुलिस पलटन में यहाँ के हैं जवान भरे पड़े,
है दिलेरी में बहुत दिलदार पटिया पार की।

रेल, तार, नहर न है कोई बड़ा इसमें शहर,
डाकखाने पा सकी दो चार पटिया पार की।

“शिशु” बुरा कहते अगर तुम धार और पचार से,
तो न फिर तुमसे करेगी प्यार पटिया पार की।

आव्हान

पधरो हलधर के सांवले! अन्नपूर्णा के अक्षत वर!
सगाई रधिया की है, इसी वर्ष के धनखर पर निर्भर।
पधारो वरुणदेव के केतु! पुरंदर की भेंटें ले कर,
बिना अरघों के सूखे पड़े, खेत की मिट्टी के शंकर।

पधारो नील-देश के पथिक! लिये रसधारें प्‍यारों की
शिखरिणी के मुरझाये प्राण जोहते बाट फुहारों की।
पधारो नभ-गंगा की लहर! उमंगें ले उद्धारों की,
बुलाती तुम्‍हें दहकतीं हुई चितायें सगर कुमारों की।

पधारो सिन्‍धु-सुता के बन्‍धु! मोतियों से भरकर झोली,
कुटी के निर्धन राम-रहीम तुम्‍हारे ही हैं हमजोली।
पधारो तप से ऊँचे उठे, परम पावन पानी वाले;
तपोवन के तन में पड़ गये, तपन से तप-तप कर छाले।

तुम्‍हारे आवाहन के लिये, साँस पुरवैया भरती है।
विनत हो आत्‍म-निवेदन लिये, दंडवत् धरती करती है॥

दीपक से 

और की संध्‍या अपनी सुबह समझकर मुसकाने वाले,
प्रभाती की बेला में आँख मूँद कर सो जाने वाले।
रूप की देख सुनहली धूप, न इतराओ अपने ऊपर;
आज तुमसे कुछ प्रश्‍न विशेष, चाहते हैं अपना उत्‍तर।

बताओ किस दाता ने तुम्‍हें मुसकराने का दान दिया,
स्‍याहियों में सोने के फूल, खिलाने का सामान दिया।
कौन-से प्रेम-पात्र ने पात्र समझकर, स्‍नेह प्रदान किया?
जिसे तुमने अपने में जला-जला कर हवन-विधान किया।

मान ले आत्‍म-प्रकाशन हेतु स्‍नेह का हवन-विधान किया,
किन्‍तु किस महा-लाभ के लिये पतंगों की-की दाह-क्रिया?
तुम्‍हारा शीश उड़ाने जब कि हवाई हमलावर आये,
कहो तब किस अंचल की ओट प्राण बाती के बच पाये?

मगर वे झोंके भी हैं याद? बड़े तड़के जो आते हैं।
गगन की दीपावली के दिये, एक पल में बुझ जाते हैं॥

बादल से

प्‍यास से सूखे तालू लिये, विकल थीं जब खाकी नसलें,
उस समय काटीं तुमने घोर घाम में सागर की फसलें।
उन्‍हीं फसलों के अब खलिहान, लगाये नीले आँगन में,
पधारे हो, लेकर सुरमई छटायें निर्मल जीवन में।

पधारो अभिनन्‍दन सौ बार तुम्‍हारी कठिन तपस्‍या के,
उच्‍चतम समाधान हो तुम्‍हीं हमारी गहन समस्‍या के.
आज धरती की दबी गुहार सतह के स्‍वर में गाती है,
मिट्टियों की शहजादी नई अदाओं से अँगडाती है।

टीस के कुछ कसकीले गीत, मलारें बन उर में घुमड़े,
पीर के कुछ तड़पीली गीत, कंठ से कजली बन उमड़े।
विरह के कुछ दर्दीले गीत, अधर से विरहा बन फूटे,
जिन्‍हें वाणी न मिल सकी, वही तपन से आंसू बन टूटे।

हम नहीं कहते हैं—बरसो न, किसी सोने की घाटी में।
बरसना किन्‍तु तुम्‍हें अनिवार्य, हार की प्‍यास माटी में॥

विद्युत

मेघ के अन्‍तराल से तड़प–तड़प कर, अब तड़िता झाँकी;
देखने वालों ने तब छटा, अनेक आँखों से आँकी।
किसी की सम्मति में उर्वशी हेरती नभ-वातायन से;
बिखरता उसका दिव्‍य-प्रकाश, नवोढा चंचल चितवन से।

किसी ने सोना लिये सुनार, शून्‍य में कहीं नहीं देखा;
कसौटी पर ही देखी, सिर्फ़ चमकती कंचन की रेखा।
किसी ने समझा मणिधर सर्प, घुसे हैं गहरी स्‍याही में;
तैरने लगते हैं जब कभी, मौज से गति मनचाही में।

किसी ने सोचा—पैने तीर पड़े, गंभीर कसमकश में;
दिखाते तमक तमककर तेज, बन्‍द हैं यद्यपि तरकस में।
किसी के दृष्‍टि-कोण में अनल-गान गंधर्वों ने गाया;
अन्‍तरा की उड़ान पर पहुँच, ताल का उजियाला छाया।

किसी ने कहा—अश्रु की धार क्रांति की लिये निशानी है।
पृष्‍ठ तो पानी का है, मगर आग की लिखी कहानी है॥

बिन बरसे वापसी

तुम्‍हारे बिना, हमारे अंग-अंग पर बरसे अंगारे;
लपलपाती लूकों ने तीर-जहर के कस-कस कर मारे।
अवा—सी आग दहक कर जला रही थी, घट की परिभाषा;
उस समय जिला रही थी, सिर्फ़ तुम्‍हारे आने की आशा।

आसरा था तुमसे घनश्‍याम, मसीहा बन कर आओगे;
आखिरी जमुहाई के समय, सुधा का घूँट पिलाओगे।
रूद्र के जटा-जूट से मंजु सुरसरी धार बहाओगे;
कपिल के अभिशापों पर हरी माँगलिक दूब उगाओगे।

भरोसा था तुमसे हे देव! परोसा प्राणों को दोगे;
डुबा कर जल में ज्‍वालामुखी, हमारी आशीषें लोगे।
मगर यह कैसी उल्‍टी हवा लगी, विश्‍वास पलटते हो;
प्रेम-सागर के से अध्‍याय बिना ही पढ़े उलटते हो।

अभी के बरसे जल का मोल, सुधा से भी बढ़ जाएगा।
बाद में बरसी चाहे अमृत, मगर पानी कहलायेगा॥

एक (हम

जहाँ पर टेका हमने भाल, वहीं पर मंदिर भव्‍य बना;
किया जो अपने हाथों कार्य, वहीं सबका कर्त्‍तव्‍य बना।
नियम जो विधिवत धारण किया, धर्म वह सबका कहलाया;
मनन करके पाया जो भेद, मर्म वह सबका कहलाया।

गुनगुनाई हमने जो पंक्‍ति, गायकों को वह गेय हुई;
सराही जो सुन्‍दरता, वहीं अलंकारों को श्रेय हुई.
जिस जगह पर हम सोये, वहीं रात की रानी मँहक उठी;
जहाँ पर जागे उषा वहीं, बिहंगों को ले चहक उठी।

जिधर चल पड़े मनचले चरण, उधर ही पीछे डगर चली;
न रूकने वाली गतियाँ देख, जमाने की गति निखर चली।
हमारे संकेतों से बदल गये, पन्‍ने इतिहासों के;
मरू-स्‍थल के आँगन में सुमन, मुसकराये मधुमासों के.

हुआ पूजित ही अपना भाल, किसी के भी अभिषेकों में।
क्‍योंकि झलका करता हर समय हमारा एक अनेक में॥

चन्‍द्र से

तुम्‍हारे शुक्‍ल-पक्ष में पूर्ण हास को पन्‍द्रह अंक मिले;
रुपहली मुसकानों को लिये कला के सोलह फूल खिले।
चकोरो-कुमुदों की मूर्छना, सुधा-सिंचन से जाग गई;
उठी सागर से एक हिलोर, उमंगें ले अनुरागमयी।

तुम्‍हारे कृष्‍ण-पक्ष में तिमिर-रूप का क्रमिक-विकास हुआ;
सांवले पाकर तीस दिनांक आयु में पूरा मास हुआ।
स्‍वयं-भू के मस्‍तक तक पहुंच, कीर्तियों से जो धवल हुआ;
वही बालेन्‍दु इसी क्षेत्र में, त्‍याग में, तप में सफल हुआ।

श्‍वेत अंचल फैलाकर साथ रही हैं अंधिकारी जितनी;
स्‍याह दामन फैलाकर साथ रही है उजियाली उतनी।
एक में सन्‍ध्‍या का अभिषेक किया, लेकर चंदन उज्‍जवल;
दूसरे में अनुरंजित किया, सांझ के नयनों में काजल।

तुम्‍हारी फिर भी तो यह पंक्‍ति शेष है सबके पढ़ने को।
“बढ़ा करते हो घटने को कि घटा करते हो बढने को॥

पीले पत्ते (दर्शन)

डालियों के मचान से उतर, धराशायी होने वाले;
मुद्दतों बाद बहिन-धूल के सगे भाई होने वाले।
व्‍यर्थ तुम पतझड़ से भय मान पड़ गये पीले बेचारे;
बदलते नहीं नियति के नियम, किसी के डरने के मारे।

यहाँ पर हर दिन की है साँझ, दीप जलता है बुझने को;
वाक्‍य को मिलता पूर्ण-विराम, पंथिक चलता है रूकने को।
व्‍योम में ऊँचे उठते मेघ, बरस कर नीचे गिरने को;
चाँदनी मुसकाती है सदा, अमावस्‍या से घिरने को।

किसी के भी आने के साथ लगा है जाने का बंधन;
पुलक कर खिलने के ही साथ लगा कुम्‍हलाने का बंधन।
जागरण को सोना ही पड़ा-होश ने बेहोशी पाई;
पुरातन होने पर परिधान—बदलने की नौबत आई.

सर्व-साधारण के मंच से व्‍यक्‍तिगत नाता मत जोड़ो;
पुराने हो इस कारण हटो, नये के लिए जगह छोड़ो।

पखेरू (उपालम्भ)

पखेरू का रोना है यही कि बिखरे तिनके चुन-चुन कर;
बनाया था जो मैंने नीड़, परिश्रम से सर धुन-धुन कर।
उसी ने मेरे उड़ते समय, एक भी बार न साथ दिया;
जिसे समझा था अपना सगा, उसी ने मुझसे दगा किया।

नीड़ का यह उलाहना है कि वृक्ष मैंने सम्‍पन्‍न किया;
जहाँ सब गूँगे फल थे, वहाँ चकहता, फल उत्‍पन्‍न किया।
किन्‍तु जब किसी क्रूर ने हाथ मार, तिनकों को बिखराया;
उस समय प्रतिशोधन तो दूर, वृक्ष प्रतिरोध न कर पाया॥

वृक्ष की यही शिकायत है कि छत्रवत मैंने छाया की;
अँगारे अपने सर पर झेल, धरा की शीतल काया की।
किन्‍तु भीषण आँधी के वेग, जब कि लाये दुस्‍सह बाधा;
उस समय पैर उखडते देख, धरा ने मुझे नहीं साधा।

सभी के उपालम्‍भ यों उतर रहे हैं, धरती के घर में।
किन्‍तु वह बेचारी क्‍या करे, पड़ी खुद दुहरे चक्‍कर में॥

नाविक (साहस)

दीखता है कि घटायें, घटाटोप, लेकर घन घुमड़े हैं;
मिलाने को मेघों से हाथ, ऊर्मियों के उर उमड़े हैं।
निशा के काले केश, हरेक दिशा पर परदा डाले हैं;
बिजलियों के मतवाले रोष, सँभाले भीषण भाले हैं।

प्रभंजन के झोंके वीभत्‍स, ठहाका भर हहराते हैं;
धार का जल उभार कर, घोर अमा में ज्‍वार उठाते हैं।
लिये भूकम्‍पों के आवेश, कगारों से टकराते हैं;
कज्‍जलों के शिखरों पर चढ़े, प्रलय के शंख बजाते हैं।

नेत्र मुँदने पर चारों ओर, तिमिर जैसे छा जाता है;
पलक खोले भी उसी प्रकार, न तम में कुछ दिखलाता है।
किन्‍तु नाविक कब शंकित हुआ, विघ्‍न की इन बौछारों से;
जुड़ गया पल भर में सम्बंध, बाहुओं का पतवारों से।

हठीले साहस ने दूसरे पार को, धावा बोल दिया।
ठान कर संगर तूफान से, नाव का लंगर खोल दिया॥

चरवाहा 

गाँव से दूर पूर्व की ओर, ढोर अपने ले जाता हूँ;
और सारे दिन, बन के घोर बिजन में उन्‍हें चराता हूँ।
विषम-थल होने से हैं सुगम नहीं, साधन संचरणों के;
चिन्‍ह कुछ पगडंडी ही लिये हुए बनचारी चरणों के.

उसे भी कहीं उतरना और कहीं पर चढ़ना पड़ता है;
कहीं खो कर अपने को, पुन: प्रकट ही बढ़ना पड़ना है।
क्‍योंकि मिट्टी के ढूहे उठे–लिये कूबड़-सी ऊँचाई;
दिखाई पड़ती खड्डों बीच, कहीं खाई-सी गहराई.

कहीं नोकीले कीले लिये पड़े हैं काँटे कर्कश-से;
प्रखर शर एकलब्य के बिखर गये हैं मानो तरकस से।
कुशों की पैनी सुइयाँ सदा, दिया करती गति को कसकन;
पगों के तलवों को है ज्ञात, व्‍यथाओं के पूरे विवरण।

किन्‍तु दुर्गमता का भूगोल, उस समय निपट भूलाता हूँ।
लताओं के मण्‍डप में बैठ, जबकि बाँसुरी बजाता हूँ॥

लेखक से 

अरे दोनों हाथों दिन-रात, कहानी को लिखने वाले;
कभी सोचा भी कितने पृष्‍ठ अभी तक तुमने लिख डाले।
रही है कितनी स्‍याही शेष? रहा कितना कागज बाकी;
कलम में कितनी दम है और कहाँ पर इति है गाथा की।

सजाने को शीर्षक, अधिकांश समय का तो उपयोग किया;
किन्‍तु क्‍या उसके ही अनुरूप विषय को समुचित रूप दिया।
हुईं जो पहली चूकें उन्‍हें बचा पाये फिर या कि नहीं;
पड़े जो काले धब्‍बे उन्‍हें धुला पाये फिर या कि नहीं।

बिना समझे बूझे तुम और कहाँ तक लिखते जाओगे;
क्रियाओं में क्‍या पूर्ण-विराम, शाम तक नहीं लगाओगे।
बहुत लिखने में अधिक न सार-लेखनी को अवरुद्ध करो;
लिखा जो कुछ भी अब तक, उसे पढ़ो पढ़ करके शुद्ध करो।

कथानक की लम्‍बाई में न कहानी का गौरव मानो।
फूल की पंखड़ियों में बसी हुई खुशबू को पहचानो॥

पीले पत्ते से

“सर्व-साधारण के मंच से, व्‍यक्‍तिगत नाता मत जोड़ो,
पुराने हो इस कारण हटो—नये के लिये जगह छोड़ो”।
बहुत संभव है—मेरे शब्‍द, तुम्‍हें ये तीक्ष्ण लगे होंगे,
और मेरे प्रति ज्वालामुखी रोष के भाव जगे होंगे।

मानता हूँ कि लूटी डाल में, तुम्‍हीं पहले कोंपल लाये,
द्रौपदी की रखने को लाज, लहलहाते अंचल लाये।
हरी चादर आदर से पिन्‍हा, सुरक्षित मर्यादायें कीं,
हाँफते हुए पथिक के दग्‍ध-प्राण को शीतलतायें दीं।

इन्‍हीं गति-विधियों में हो व्‍यस्‍त, तुम्‍हारा रूप रहा न नया,
लड़कपन यौवन की राह से, बुढ़ापे के घर पहुँच गया।
किन्‍तु आगे जायेगा कहाँ—विवश वापस ही आयेगा,
सांझ का पीताम्‍बर ही पलट उषा की चुनरी लायेगा।

साँझ के बदले जो दे प्रात—उसे इस भांति न देख डरो।
मृत्‍यु के बदले जो दे जन्‍म, उसी की गोदी में उतरो॥

चित्रकार से

तुम्‍हारा चित्र कह रहा है कि यही है गौ-धूली बेला;
पछाहीं पनघट पर कुछ लगा, डूबती किरणों का मेला।
जा रहा है सोने का थाल, खिसकता मिट्टी के घर में;
पीलिया के केवल आसार, रह गये नीलम के सर में।

हरी धरती दिन भर की तपी, पा रही है शीतल छाया;
लिये हलका केशरिया रंग, मगन हरियाली की काया।
खड़ा घर के मालिक–-सा पेड़, घास के चौड़े आँगन में;
डाल पर एक नीड़ की गोद, सफल है अपने जीवन में।

झाँकते हैं दो नीड़-कुमार, जिन्‍दगी के वातायन से;
भूख से नन्‍हीं चोंचें खोल, हेरते हैं आश्‍वासन से।
उन्‍हीं की ओर एक खग वायुलहर पर, पर तैराता—सा;
बँधा वत्‍सलता की डोर से, उड़ा जाता अकुलाता—सा।

चित्र तो सुन्‍दर है पर मित्र, हमारा मन तो तब माने।
जब कि पंछी अपनी चोंच में, दबाये भी हो दो दाने॥

दीपक से – 2

सुन्‍दरी संध्‍या का सिन्‍दूर-निशाचारियों ने जब लूटा,
तभी ‘तमसोमा ज्‍योतिर्गमय’ किसी की वाणी से फूटा।
उस समय ही तो अनल-किरीट, शीश पर तुमने अपनाया,
कसौटी के अंचल में लगी, दमकने सोने की काया।

किन्‍तु तुम अन्‍त: पुर में लगे देखने, मन्‍मथ की माया,
जहाँ मनचली कली से एक अली मिलने को ललचाया।
चाह ने आलिंगन के लिये, भुजायें अपनी फैलाई,
रूप ने “हाँ-नाँ” मिश्रित लाज भरी मुद्रायें दिखलाई.

और तुम भी उस रस के लिये, हुई व्‍याकुल दीवानों से,
प्राण घायल कर डाले, पंच-बाण के कोमल वाणों से।
समझकर विप्रलम्‍भ-श्रृंगार—हुए पीड़ित अरमानों से,
मौत के परवानों को भूल, लगे मिलने परवानों से।

मुबारक मस्‍ती हो-पर याद रहे निशि भर ही जीना है।
और उषा आने तक तुम्‍हें, जहर काला ही पीना है॥

लाल

जननि! तेरी गोदी के लाल, विविध कौशल दिखलाते हैं,
इन्कलाबी शक्‍लों को नये-नये जामे पहनाते हैं।
कभी राणा बनकर पच्‍चीस साल-शूलों से घिरते है,
बचाने को निज गौरव—मानसिंह से बन–बन फिरते हैं।

कभी कायर विराग को शस्‍त्र दिला, रण-नौका खेते हैं,
माण्‍डले की कारा से कर्म-योग की किरणें देते हैं।
कभी लक्ष्‍मीबाई के लिखे, पृष्‍ठ दुहराते झाँसी के,
वतन के बनते सच्‍चे भगत, पहनकर फन्‍दे फाँसी के.

कभी जलयानों से भी कूद, वीर सागर पर बहते हैं,
मृत्‍यु की लहरों पर तैर कर, अडिग निज प्रण पर रहते है।
कभी धार्मिक-वेदी के भेद मिटाने में मिट जाते हैं,
गोलियाँ सीने पर ले तीन अनमिले हृदय मिलाते हैं।

इस तरह एक डाल से तरह-तरह के पात निकलते हैं।
किन्‍तु सबके फूलों से एक स्‍वाद के ही फल फलते हैं॥

जलद से 

गगन में उड़ने वाले सिन्‍धु तुम्‍हारा सादर अभिनन्‍दन,
पधारो राधा के घनश्‍याम, हरित अंचल के जीवन-धन।
पिकी की सुनो सुरीली तान, मयूरी का देखो नर्तन,
दूब को अंकुर देकर नये, भरो संयोगिन में पुलकन।

करारे कजरारे धर वेश, बनो कजली मलार के स्‍वर,
तुम्‍हें पहनायेंगे बक-बृन्‍द, श्‍वेत-मालायें उड़-उड़ कर।
जुही की गुही मँहकती माल, फुही का सिंचन पायेगी,
केतकी की पिछली पहचान, दुबारा चुम्‍बन पायेगी।

बनो तुम मंदक्रान्ता छन्‍द, यक्ष के विरहातुर स्‍वर में,
दूत बन ले जाओ संदेश, सुन्‍दरी के अन्‍त: पुर में।
बना करके नदिया को नदी, नदी को वर देकर नद का,
भले ही परिचय दो तुम हमें, जलद होकर अपने मद का।

किन्‍तु उनका भी रखना ध्‍यान, जो कि निर्जला उपासे हैं।
तुम्‍हारी एक बूँद के लिये, एक संवत् से प्‍यासे हैं॥

कोयल से

देख री कोइलिया, यह बाग इसे हेमन्‍त कँपाता है,
क्रूर पतझर तो लाज उतार, दिगम्‍बर वेश बनाता है।
मँहकते फूलों का त्‍यौहार, अधिक दिन ठहर न पाता है,
आग के नाग नचाता हुआ, क्रुद्ध भस्‍मासुर आता है।

यहाँ की हर क्‍यारी है कैद, दिशाओं की प्राचीरों से,
गुलाबी अधरों की मुसकान, घिरी नोकीले तीरो से।
चाह की अनुरागिन बंशियाँ, बजातीं राम के सरगम हैं,
क्‍योंकि मधुपों की प्‍यासें बहुत और मधु की बूँदें कम हैं।

अरी नन्‍दन-बन की गायिके! यहाँ तुझको जिसने भेजा,
उसी के सुधा-सने संदेश, सिसकती मिट्टी को दे जा।
यहाँ के अस्‍थिर दृश्‍यों से न, जोड़ नाता स्‍वर का, लय का,
जिसे तू समझी अपना सदन, मंच वह तेरे अभिनय का।

मंच से पात्रों का सम्‍बन्‍ध, गमन के समय नहीं जुड़ता।
वृक्ष तो दूर, विहँग के साथ, डाल का नीड़ नहीं उड़ता॥

Share