शीतल बाजपेयी की रचनाएँ

समय उड़ रहा पंख लगाकर

समय उड़ रहा पंख लगाकर, दो पल तो जी लें, मुस्का लें।
जीवन की आपा-धापी से आओ थोड़ा चैन चुरा लें।

जाड़े में वो धूप गुनगुनी अपने आँगन में आती थी,
बारिश में छप्पर से बूँदें झरकर मोती बरसाती थीं,
गर्मी में पूनम की रातों में चलती थी जब पुरवाई
मुरझाई सी कलियाँ मन की फिर से खिलकर मुस्काती थीं,
मीठी-मीठी उन यादों से हम अपने मन को बहला लें ।
जीवन की आपा-धापी से आओ थोड़ा चैन चुरा लें।

चलो रेत गीली है उस पर चलकर कुछ अहसास संजोयें,
और समंदर की लहरों से अपने पद चिन्हों को धोयें,
हाथों से सहला-सहला कर एक घरौंदा आज बनायें
अरमानों के बीज आज कुछ हम अपने आँगन में बोयें
चौखट पर फिर खुशहाली की मिलकर बंदनवार सजा लें।
जीवन की आपा-धापी से आओ थोड़ा चैन चुरा लें।

मुस्कानों का सावन लेकर मन के बाग-बगीचे सींचें,
क्षितिज ओर दिख रहा उजाला फिर हम क्यूँ आखों को मीचें
स्वांसों की आवाजाही की लय को अंगीकार करें तो,
क्रूर काल के निष्ठुर पंजे हमें न फिर बाँहों में भीचें,
जीवन का अभिप्राय समझ हम सुधा-कलश थोड़ा छलका लें ।
जीवन की आपा-धापी से आओ थोड़ा चैन चुरा लें।

सिर्फ खिलौना समझा मुझको

सिर्फ़ खिलौना समझा हमको
कुल को दीपक देने वाले
कोई मन की पीर न जाना।
की किस्मत में है बुझ जाना।
सदियों से आबाद रहा है, .
अपने अंदर का वीराना।
झाँसी की रानी बन हमने

साहस का है पाठ पढ़ाया।
मुस्कानों का लगा मुखौटा
और त्याग की परिभाषा क्या
जीने को मजबूर हुये हम,
पन्ना बन सबको समझाया
केवल खुशियों की चाहत में
तुमने फूल चुने बगिया से
खुशियों से ही दूर हुये हम,
शूल हमारे हिस्से आये
जीवन के हर इक पड़ाव पर
लेकिन तुम ये भूल रहे हो
हमें वक्त ने सबक सिखाये
फूलों को पड़ता मुरझाना।
सीख लिया है अब इस दिल ने .
सबसे अपना दर्द छिपाना।

कोई दोष हमारा कब था
फिर भी हमको शिला बनाया।
हमें दाँव पर लगा सभा में
चीरहरण तुमने करवाया।
वृंदा को छलने की खातिर
ईश्वर तक पथभ्रष्ट हो गये
कितने ही युग बीते लेकिन
हरदम हमें पड़ा पछताना

हमने खुद को धरती कर के
तुमको ही आकाश बनाया
पर हमको कमजोर बताकर
तुमने बस उपहास उड़ाया
जिससे पाया जीवन तुमने
उसे कोख में मार रहे हो.

नफरतों की आँधियों ने 

नफ़रतों की आँधियों ने फिर चरागों को बुझाया,
और हमने बाग की कुछ तितलियों को मार डाला।

कौन है ये कौम जो इंसाँ स्वयं को कह रही है?
राख ये शमशान की उड़कर हवा में बह रही है
खौफ़ की ख़ामोश रातों ने अँधेरे को जगाया
कँपकपाती देह ने फिर सिसकियों को मार डाला।

पाँखुरी को नोच कर ताकत दिखाई जा रही है
और उसकी शौर्य-गाथा भी सुनाई जा रही है
पाप होगा उन दरिंदों को अगर हम छोड़ देंगे
दर्द भी देखा न जिसने हिचकियों को मार डाला।

आँसुओं का, वेदना का, चीख का मज़हब बताओ,
कुर्सियाँ संवेदना भी हैं समझतीं मत जताओ,
खेल खूनी ये दरिंदे खेलते कब तक रहेंगे
फिर किसी गुमराह ने कुछ बच्चियों को मार डाला।

फिर याद आये दिन बचपन के 

फिर याद आये दिन बचपन के –
जो पल- पल हमें परखती हैं।

मन फिर जी लेता उनको
मिट्टी की गुल्लक में हमने,
जो थे लम्हें अपनेपन के।
सपनों के सिक्के डाले थे।
फिर याद आये दिन बचपन के।
गुल्लक की खनक बताती थी,
हम कितने पैसे वाले थे ।
अपनी ही धुन में रहते थे,
चलते थे कितना तन- तन के।
फिर याद आये दिन बचपन के।

पीछे छुपकर दरवाजे के,
जब हमने मिट्टी खाई थी।
फिर पापाजी ने देखा था,
तो हमको डाँट लगाई थी ।
तब मम्मी ने समझाया था
तुम दिखला दो अच्छा बन के।
फिर याद आये दिन बचपन के।

वो मेले के सर्कस- झूले,
वो रंग- बिरंगे गुब्बारे ।
ठेले की चाट-बताशे वो,
इमली-चूरन के चटखारे।
जेबों में खुशियों की चिल्लर
हम राजा थे अपने मन के।
फिर याद आये दिन बचपन के।

ये स्मृतियाँ वो संबल हैं,
जो हमको ज़िंदा रखती हैं।
साँसे हैं एक कसौटी सी

यादों की तस्वीरे नम हैं 

यादों की तस्वीरें नम हैं।

चले बाँह में बाँहें डाले
लेकर अपने साथ उजाले
हर मंज़िल आसान लगी थी
फूलों से लगते थे छाले
तुम बिन है सावन आँखों में
मन में पतझर का मौसम है।

दर्द कचोट रहा है मन को
तरस रहा है आलिंगन को
सूनापन केवल सूनापन
भेद रहा मन के आंगन को
पलकों पर छाई जो बूँदें
कैसे मैं कह दूँ शबनम हैं

यूँ तो हरा भरा घर मेरा
पर तुमने जबसे मुँह फेरा
केवल मेरे ही कमरे में
तनहाई ने डाला डेरा
यादों ने ही दर्द दिये हैं
यादें ही उनका मरहम हैं

सच्चाई के पथ पर चलना

सच्चाई के पथ पर चलना मुश्किल है, आसान नहीं है.
पैरों के छालों को मिलता कोई भी सम्मान नहीं है.

मिले राह में मोड़ बहुत से लेकिन वो मंज़िल थोड़ी थी.
पग-पग पर जो काट रही थी,अपने जूतों की जोड़ी थी.
अपनी धुन में चलते रहना ही केवल मेरा मक़सद था.
भीड-भाड़ में चलने वाले हर राही का अपना कद था.
कोई आगे निकल गया तो कोई बैठ गया था थक कर,
क़िस्मत की हर एक किस्त का
वादा था, भुगतान नहीं है।

दुनिया को विश्वास जीतकर धोखा देने की आदत है.
पल-पल रंग बदलने वालों की अपनी-अपनी फितरत है.
दुनियादारी की मंडी में झूठों का
कीमत है ऊँची.
गाल बजाने वाली टोली ही केवल मंज़िल तक पहुँची.
ढोंग, दिखावा, आडम्बर को सारी दुनिया पूज रही है ,
सारी मानवता शापित है, क्या इसका उत्थान नहीं है?

है सागर का खारापन तो नदियों का है मीठा जल भी.
कुंठित मन के ताने हैं तो नेह-प्रेम का है संबल भी.
झूठ-कपट के अँधियारे ने माना दुनिया को लूटा है.
पर सच के दीपक के आगे दर्प तिमिर का भी टूटा है.
सच तो ये है-राहें सच की अंगारों से भरी हुईं हैं,
इन पर विरले चलते,सबको मिलता ये वरदान नहीं है.

वो कहते थे 

वो कहते थे हमें देश हित
दीपक बन कर जलना होगा।
अपना स्वार्थ किनारे रखकर,
कदम मिलाकर चलना होगा।

भारत माता की हालत पर
कवि मन फूट-फूटकर रोया।
फिर संसद के गलियारों में
उसने राष्ट्र धर्म को बोया।
पाञ्चजन्य को शंख बनाकर
धर्मयुद्ध का बिगुल बजाया।
फिर श्यामा प्रसाद जी के सँग
सुंदर ढँग से संघ सजाया।।
अंत समय वे उनसे बोले-
स्वप्न हमारे पूरे करना।
सत्ता की दलदल में भी तुम
कमल सरीखा हरदम खिलना।।
कुंदन सा बनने की खातिर
तुमको तपकर गलना होगा।
अपना स्वार्थ किनारे रखकर,
कदम मिलाकर चलना होगा

सच्चाई की लिये संपदा
वो फकीर राजा बन आया।
हाथ मिलाया जब कलाम से
शक्ति मिली जन-जन हर्षाया।
विश्व मंच पर हिंदी को पहचान
दिलाने वाले वो थे।
जन-जन के मन में हिंदी को
मान दिलाने वाले वो थे।
उनसे जाना संघर्षो से लोहा
लेना क्या होता है।
मझधारों में नाव फँसी जो
उसको खेना क्या होता है।
कहा उन्होंने हार नहीं अब,
हमें जीत में ढलना होगा।
अपना स्वार्थ किनारे रखकर,
कदम मिलाकर चलना होगा।

जब वो कहते ठनी मौत से,
तब-तब अक्सर वो ही हारी।
काल हुआ नतमस्तक बोला-
वाह हमारे अटल बिहारी।
उनके आदर्शों पर चलना ही
सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कविकुल के अधिपति के चरणों
में अर्पित काव्यांजलि होगी।
उनकी कविता,उनकी बातों
को आचरण बनाना होगा।
सपनों को साकार बनाकर
भारतवर्ष सजाना होगा।
अगर अटल सा बनना है तो
पीड़ाओं में पलना होगा।
अपना स्वार्थ किनारे रखकर,
कदम मिलाकर चलना होगा।

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