शीला तिवारी की रचनाएँ

गंगा की पुकार 

एक सुर में राग ये छिड़ने दे
मुझको मलिन मत होने दे
बहने दे, बहने दे मुझे
अविरल-अविरल बहने दे
मैं गंगा….।
बाँध-पे-बाँध बना डाला
अवरुद्ध हुई मेरी धारा
धीरे-धीरे सिमट रही
कुंठित प्रदूषित तड़प रही
मेरे नीर को मलिन मत होने दे
स्वछन्द पवन संग लहर-लहर गति करने दे
बहने दे, बहने दे,अविरल-अविरल बहने दे
मैं गंगा ….।
जलचर जीवन खो रहे
मेरे तट जल बिना रो रहे
दूषित नीर को झेलती
ऐ मनुष्य! पापों को तेरी धोऊँ क्या
अभिशप्त सी हो रही
मुझको मलिन मत होने दे
उच्चश्रृंखलता से पर्वत नदी से लहर-लहर गति करने दे
बहने दे, बहने दे, अविरल-अविरल बहने दे
मैं गंगा ….।।
धरती पर स्वर्ग मैं लायी हूँ
अलौकिक रूप दिखाती हूँ
दीपों से मुझे पूँजे तू
ऐ मनुष्य ! फिर मेरी पीड़ा न बूझे तू
मानव हित में सदा सोची
हाहाकार रही, चित्कार रही
मुझको मलिन मत होने दे
ले प्रण! मुझे निर्मल-निर्मल बहने दे
एक सुर में राग ये छिड़ने दे
मुझको मलिन मत होने दे
बहने दे, बहने दे, अविरल-अविरल बहने दे
मैं गंगा…।

अन्नदाता की त्रासदी 

अकाल की कराल त्रासदी
कृषकों को घाल रहे
हताश-निराश जिंदगी से
‘ख़ुदकुशी’ के सिलसिले हमें डरा रहे
धरा तड़प-दहक रही, दरारों से पटी है
खेत-खलिहान फसल बिना सुनी पड़ी है
पशुओं की गले की घंटी नहीं बज रहे
पक्षी के कलरव हमसे विलग हुए
भूख से बिलख रहा बचपन बेहाल है
शिक्षा छोड़, नन्हे हाथ को काम की तलाश है
औरों के जीवन को गति देने वाला कृषक
खुद अपनी सांसो की डोर ही तोड़ रहा।
धूप, हवा, बारिशों से तपा हुआ व्रज कृषक तन
हाय! ‘मन की पीड़ा’ से क्यों हार रहा
जीवन समर्पित था खेत, हल, पशु में
हर खुशी अर्पित था हरे- भरे फसल में
आज खुद भूखा, प्यासा लाचार है
शहर पलायन कर रहा काम की तलाश में
हताशा हो, निराशा हो, भाग्य को कोस रहा
कर्ज़ तले दबा जीवन नीलाम है
दलालो, सूदखोरों के नोच-खसोट आम है
अफसरों, नेताओं में मची लूट घमासान है
हम आधुनिकता के आलोढ़न के गीत गा रहे
कृषक हमारे दारुण विकट जीवन जी रहे
इनकी लाशें हमारी व्यवस्था पर अट्टहास है
समाज पर कठोर प्रहार है
विकास की पोल खोलती
क्यों ‘ख़ुदकुशी’ की राह चल पड़ा किसान
प्रश्न है समाज पर…….
सवाल पर सवाल है???

बूँद 

बादल से विलग जल की बूँदें
वसुधा तले आकार मिटे
सबमें समा, अपने को मिटा
नवजीवन संचार करे
सर-सरिता, नद-नाला संग
बह नीरनिधि में मिले
नए बूँद बनने की ओर
चक्र यह फिर चल पड़े
बूँद सा मानव तन
चक्र जीवन-मरण का
पुराने ढलते, नए गढ़ते
कहीँ-न-कही हम अपनों में बसे
आकार मिटे, अस्तित्व नहीं
जीवन का सार है ‘बूँद’।

बापू 

हे सहस्त्राब्द के नायक
कालखंड पर अमिट रेख
कोटि-कोटि नमन तुझको
परिधि बाँध न पाता जिसको
हे अर्द्ध नंगे फकीर
बुद्ध, महावीर संदेशों के वाहक
निरस्त्र, निःशस्त्र योद्धा, लड़ाका
जिसने दी युद्ध की बदल परिभाषा
दिया विश्व को पथ सत्य अहिंसा का
पराक्रम से थर्रा गया, चरमरा गयी
दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य
हिल गए सिंहासन, सोचने लगा दुर्दांत परेशान
ओजस्विता जिसके तेजस दिव्य बल
सत्याग्रह अखंड-प्रखंड ज्योति जिसकी
असहयोग, अनशन भरता शक्ति
विद्वेष, घृणा, अस्पृश्यता से देता जो मुक्ति
आत्मबल जिसमें कूट-कूट भरा
कर सकता वही मानव विश्व फतह
हिमालय सा शिखर जो अड़ा- डटा
अपने सिद्धांतों के लिए वही मरा
गाँधी तेरे विचारों के ज्वारों से
नव प्रवाह नवल हो उठा तिरंगा
जनमानस में आस्था पराकाष्ठा बन
जन सैलाब विकल प्रबल चल पड़ा
दासता अब स्वीकार न होगी
स्वराज बना जन-जन की आवाज
घर-घर चरखा चलता घन-घन
खादी में जागी जनता का प्यार
नया सवेरा जग उठा हिन्दुस्तान
वंदे मातरम नव ऊर्जा उदघोष प्राण
लड़ता जो अनीतियों, कुरीतियों से अंदर-बाहर
नैतिकता, आधुनिक विचारों को लिए जान
संस्कृति की श्रेष्ठता पर अहं गर्व
सर्वस्व त्याग, पर पीड़ राग
सर्व हित सम भाव लिए समर्पण
हुआ महान युग प्रवर्तक संत का अवतरण
युग दृष्टा, युग श्रेष्ठ, युग प्रवर्तक
काल खंड पर लिखता शिलालेख
युग-युग में आते ऐसे सपूत
इतिहास में बनाते स्वर्णिम आलेख
हे संत, क्या तेरा उद्येश्य मानवता
हर दृगों के पटल की आशा
राम राज्य में रचते आस्था, निष्ठा
रची विश्व की कालजयी व्याख्या
हे हाड मांस के पुतले,
तुझको कालखंड बाँध न सकता
एक दिन चलना पड़ेगा, आना पड़ेगा विश्व को
शांति, अहिंसा, विश्व कल्याण की राह।

सखि ये कैसा मंजर देखा

सखि ये कैसा मंजर देखा, वर्जनओं का अवतल देखा
मन घायल पंछी सा व्यथित, बातों के प्रहार से छलनी अंतस देखा
चले गए बैकुण्ठ धाम ‘वो’ श्रृंगार श्री को साथ लिए गए
क्यों समाज पीछे पड़ा मुझको श्रृंगार विहीन किए
मेरा सुहाग मिट गया पर नहीं मिटा दिल से उनकी छवि
आज भी मैं वहन कर रही, पति के अनगिनत सपनों की बही
रंगों से नाता मेरा तोड़ना, चूड़ियों को फोड़ना
सांसे थम गई थी मेरी, ऐसा विकृतियों को क्यों परोसना
क्यों मैं अचानक ‘उनके’ चले जाने से
श्रृंगार विहीना बन जाऊँ
कानों में तीक्ष्ण बाणों कहर कैसे सह पाऊँ
सब बनते मरहम मेरा पर यहाँ तो उलटा रीत है
सखि ये कैसा मंजर देखा, वर्जनाओं का अवतल देखा
मन घायल पंछी सा व्यथित, बातों के प्रहार से छलनी अंतस देखा
मैं पूछती हूँ प्रश्न आज समाज से
स्त्री ही क्यों देखे, ऐसे विभत्स कुरीति झेले
कर पाओं कुछ अच्छा ऐसा क्यों न नियम में ढले
समाज किंचित नहीं ढिगता अपने कुरीतियों के वहन को
कर रहे कुठाराघात मेरी बिंदियाँ, चूड़ी वहन को
क्यों मैं पायल विहीन हो जाऊँ, सादे वस्त्र में ढल जाऊँ
पुत्र, पौत्र से भरी पूरी हूँ क्यों मैं अबला बन जाऊँ
सखि ये कैसा मंजर देखा, वर्जनओं का अवतल देखा
मन घायल पंछी सा व्यथित, बातों के प्रहार से छलनी अंतस देखा
थी मैं नवयौवना सुदर गौर वर्णा
नहीं रखते थे ‘वो’ मुझे कभी श्रृंगार विहीना
रहती थी मैं सज सँवर, हर वक्त रहती थी उन्हें मेरी फ़िकर,
आज उनके जाने पर
ऐ सामाज, क्यों मैं हो जाऊँ बहरूपिया
जो उन्हें ना पसंद, क्यों करूँ वह काम मैं
क्यों सभी दे रहे दुहाई मुझे कुत्सित कुरीतियों, नीतियों की
तोड़ती हूँ मैं सारी वर्जनाएं जो मुझे हर पल और तोड़ती
पुरुष नहीं मानता कभी कठोर मान्यताएं
नारी को क्यों अपशकुन में झोकती
सखि ये कैसा मंजर देखा, वर्जनओं का अवतल देखा।
मन घायल पंछी सा व्यथित, बातों के प्रहार से छलनी अंतस देखा
चले गए वो क्या ये काफी नहीं था, मेरी हृदय की पीड़ा के लिए
सामाजिक कुरीतियों, कुसंस्कार का बोझा क्यों हम वहन करें
मैं बनी रहूँगी कुलिना मुझसे मत दूर करो चूड़ी, बिंदिया व गहना
मैं भरे पूरे परिवार की नारी
इन्कार करती हूँ कुरीतियों को मानना
अंगार बन बैठी समझ लो
कुत्सित कुरीतियों नीतियों को, नहीं मुझे नहीं ढोना
सखि ये कैसा मंजर देखा, वर्जनओं का अवतल देखा
मन घायल पंछी सा व्यथित, बातों के प्रहार से छलनी अंतस देखा

अरी धरा!

अरी धरा! तेरा श्रृंगार
अनुपम, मनोरम, सौंदर्य भरा
कानन वृक्ष-लता-वनस्पतियों वाली
वसुधा हरित आभा लिए भायी
नव कोपल, मंजर, पराग, पिक
रम्यक चितवन मनोहर संगीत
बहुरंग कुसुमपुंज मकरंद तेरे यौवन
परिमल मधुर उच्छवास भरे तन
वसंत फागुन हेमंत बयार में झूमे
रहती वसुधा तू मादक मौले-मौले
अरुण किरणों से नहा प्रभात में
रवि देता ऊष्मा-प्रकाश धरा में
चाँद- तारे दीप सामान नभ सारे
झिलमिल-झिलमिल तुझे संवारे
हिमाच्छादित रजत शैल-शिखर
मनोहर आभा बिखेरे तुहिन कण
अरी धरा! तेरा श्रृंगार
अनुपम, मनोरम, सौंदर्य भरा।

प्रदूषण

मानव कब जगेगी तेरी चेतना
शून्य हुई क्या प्रकृति प्रेम वंदना
प्रदूषण महात्रास बन खड़ा
हर जीव के जीवन में
हम गर्वित आलोढ़ित
भौतिकवादी प्रागंण में।
हवा श्वास बिन तड़प रही
हाय! ये कैसी विडम्बना
जहरीला धुआँ, विषैले धूलकण
लील रहा निलाम्बर प्रतिक्षण
प्रदूषित हवा मूल स्वभाव को खो रही
जीवन गति चल कैसे पाएंगे
वसंती हवा, सावन फ़िज़ा की
मनोरम गीत रचित न हो पाएंगे
धरा हरियाली बिन विकल रही
हाय! ये कैसी दुर्नीति
कटते पेड़, उजड़ते जंगल
छिनता पशु-पक्षी का शरण स्थल
हरियाली धरती का गहना
हर वृक्ष धरा का ललना,
वृक्षों की हत्याएं हो रहे नित्य
मानव खुद रच रहा बर्बादी के कृत्य
मिट्टी उर्वरता खो रही
बंजर भूमि, पोषित हो रही
श्रृंगार अचला से छिन रही
मानुज कृत्रिमता को ढो रहा
नदियाँ प्यास से जूझ रही
हाय!ये कैसी मुश्किल घड़ी
कल-कारखाने, शहरों के कचरे
नदियों में बह बनते विषैले
कल-कल निर्मल बहते जल
नौकायन मीठी गीत संग
नदी तीरे दार्शनिक, धार्मिक पाठें
भूल रही ये मधुर यादें
मत भूलो तुम मानव हो
प्रकृति के रचयिता नहीं
प्रकृति का दोहन शोषण कर
वापस करना हम भूल गए
आने वाली पीढ़ी को
प्रदूषण मुक्त संसार दो।

बचपन की यादें 

बचपन की यादें हर पल सुहानी
जीवन भर भूली न जाने वाली कहानी
बचपन शरारत का है एक पिटारा
उछल कूद मस्ती में बीतता दिन सारा
रहती न फ़िकर, न अपना-पराया
सारा जग अपना, हर खेल था निराला
बचपन की यादें हर पल सुहानी।
दादी-दादा के संग गुजरा वो ज़माना
दादी चश्में से दिखाती गुस्सा निराला
दादा के प्यार में छुपा खुशियों का खजाना
सुनाते रमायण, महाभारत का किस्सा पुराना
बचपन की यादें हर पल सुहानी।
सो जाते सुन कर चुपचाप नानी की कहानी
प्यार भरी थपकी के सपने लुभावनी
खाते रेवड़ी व मिठाई, मलाई व रसगुल्ले
खुशियों का नग़मा बचपन गुनगुनाए
बचपन की यादें हर पल सुहानी।
गिल्ली डंडा से खेलना, पतंगों का उड़ाना
आम की डाली पर झूलना, सरसों के फूलों में घूमना
धान के हरे-हरे खेतों सा लहलहाना
दौड़ते सुंदर पगडंडियों को रौंदना
बचपन की यादें हर पल सुहानी।
दोस्तों के संग यारी जम कर निभाई
करते कभी लड़ाई खूब डट भाई
पल भर में रूठते, पल में मान जाते
हँसता चेहरा ही था बचपन की मिठाई
बचपन की यादें हर पल सुहानी।

नवगीत

माँ भारती के चरणों में नवगीत लायी हूँ।
समवेत स्वर में गाओ नवगीत लायी हूँ।।
उठते हैं हर स्वर में बलिदान की गाथा
शब्दों को जो बो देती बन जाता तिरंगा
गाने लगते हैं भारत की गौरव गाथा
कलम की ताकत से आवाज उठाएंगे
हित में बुरा कुछ भी हो पटल देती लायेंगे
माँ भारती के चरणों में नव गीत लायी हूँ।
समवेत स्वर में गाओ नवगीत लायी हूँ।।
राम, कृष्ण की धरती, गाँधी-पटेल की भूमि
सत्य, अहिंसा के हथियारों से भागी दुश्मन की टोली
विश्व में भाईचारा, शांति का पाठ हम देते
देश को बाहर से ज्यादा भीतर ही लूटे
जात-पात, भ्रष्टाचार से हम टूटे
देश की प्रगति को हम तैयार आए हैं
माँ भारती के चरणों में नवगीत लायी हूँ।।
समवेत स्वर में गाओ नवगीत लायी हूँ।।
माँ शारदे, ताकत मेरी कलम में भर दे
शब्दों की तीक्ष्णता, विलक्षणता का वर दे
कलम चलती रहे अन्याय, अत्याचार हरण को
हर बुरे पापों के नाश व दमन करते
रावण, दु:शासन का रक्त बीज मिटा देंगे
माँ भारती के चरणों में नवगीत लायी हूँ।
समवेत स्वर में गाओ नवगीत लायी हूँ।।

माउंटेन मैन-दशरथ मांझी

पहाड़ो से ऊँचा आदमी
उसके थे दृढ़ इरादे
जिसकी ठन गई
पहाड़ों से ठन गई
पहाड़ों ने उसकी मोहब्बत
जीवन का मक़सद
हमसफ़र फगुनिया को छिन लिया
पीड़ा व विछोह में
ले डाला प्रण
पहाड़ का सीना चीरने का
पागल व जुनूनी बन
भूख जिसकी आदत
गरीबी जिसकी क़िस्मत
चल पडा़ छेनी व हथौड़ा लिए
घमंड में अकडा़ अड़ा
पर्वत के घमंड को तोड़ने-फोड़ने
चलता रहा हथौड़ा, छेनी
एक-दो साल नहीं
पूरे बाईस साल।
धूप की तपती गरमी
तूफान व बारिश
लड़ता रहा चट्टानों से,
बना डाला पहाड़ का सीना को चीर कर
एक सुगम, सुन्दर पथ
जिसे देख शर्माए शाहजहाँ का ताजमहल
ये गरीब की बादशाहत का ताजमहल था।
जहाँ न लुटी थी दौलत
लुटी थी तो बस अकेले
गरीब की मेहनत
अनजाने में चुनौती ताजमहल को
प्रेयसी को अनुपम भेंट।
ये था मुफ़लिसी का बादशाह
हमारे बिहार का माउंटेन मैन ‘दशरथ मांझी’

मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूंढता 

मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूंढता
सुनो ना, अपने व्यस्ततम पलों से दो पल मुझे दो ना
तुम्हारे गैर-मौजूदगी में
डोलती मेरे आस-पास चिलमन
तुम्हें हँसी आएगी जानोगे तुम
मैं बात करती हूँ दूधिया चाँद से
कहती मेरी पनाहों में उतर जाओ
कुछ बोलना चाहती हूँ, बातों के लिफ़ाफ़े से लपेटे
चाँद में मैं अपनी उदासी को हूँ पाती
चाँद मुस्कुराकर मेरे जेहन में उतरता
पर मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूंढता
सुनो ना, अपने व्यस्ततम पलों से दो पल मुझे दो ना
मैं खालीपन दूर करने को चिड़ियों को बुलाती
देखती उनका फुदकना, चहचहाना
मैं भी चहकना चाहती हूँ
उनसे बाते करते कहती हूँ, कैसे तुम इतना खुश रहते हो?
उड़ते हो स्वच्छंद आकाश में मेघों की छाँव लिए
बादलों के पन्नो पर लिखते जाते अपने कलरव गीत
उदासी को भंग करती चहकती आवरण के साये
कहती मेरे भीतर में उतरो
तन्हाई की कोलाहल मेरे मन से तोड़ो
पर मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूंढता
सुनो ना, अपने व्यस्ततमम पलो से दो पल मुझे दो ना
धूप से नहायी सुबह की स्वर्णयुक्त उजाला
नभ के ऊपर दिखता सुंदर केसरिया रंग में लिए सूरज
अंधकार को चीरने बैठ जाता लेकर अपनी मिज़ाज के गर्माहट से
धूप की प्रकाश रेखा पेड़ो के ओट से
मेरे घर के सूने बरामदे में हलचल करता
कहता मैं आया हूँ दस्तक देने
देखो तेरे लिए लाया हूँ केसरिया छटा
अंगुलियों के पोरो से महसूस करो मेरी उष्णता को
सींच देगी तेरे मन को मेरे रंगो से भरे नज़ारे
धीरे-धीरे मैं कहती मेरे अंतस में उतरो
पर मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूँढता
सुनो ना, अपने व्यस्ततम पलों से दो पल मुझे दो ना
मैं पेड़ो को झूमते देखती
हवाओं से सर-सर बातें करती सुनती
मैं डूब जाती सुनहले ख्वाब का डोर लिए
पेड़ों के पास जाती उनसे बातें करती
कहती, कैसे झूमते हो
अपनी हरियाली को समेटे खग वृंदों से बाते करते हो
हवाओं से दिन भर अटखेलियाँ में लहराते हो
मैं भी तेरे जैसा मायूसी को भगाना चाहती हूँ
हरियाली की सुंदर धूप में नहाना चाहती हूँ
तुम मेरे भावनाओं में बहो
हरियाली पर घना कोहरे सा लिए मेरा मन
मैं पेड़ो को उसकी नादानियों पे हँसती
पर मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूढता है
सुनो ना, अपने व्यस्ततम पलों से दो पल मुझे दो ना
मैं भी अपने भीतर चहकना चाहती हूँ
चंचलता को जिंदा करना चाहती हूँ
प्रेमल धूप में नहा कर
चाँदनी को अपने दिल में जमाना चाहती हूँ
पर मुख़्तसर सा मेरा मन तुझको ही ढूँढता है।
सुनो ना, अपने व्यस्ततम पलों से दो पल मुझे दो ना

सावन की बूँदें 

कितनी अभिलाषाएं लिए,
झरती सावन की बूँदें
गर्जना करता बादल उमड़-घुमड़
सारे संताप को चुनौती दे कर
तृष्णा, प्यास से व्याकुल तड़प रही
उष्णता घनघोर, तपन-छटपटाहट में अवनि
छाती पर बोझ लिए हजारों जीना क्या जीना
दूर करो ,मधुर रस अब पीना
धरती जो दरारों से पटी है,
छाती पर सूखे खर-पतवार लिए खड़ी है
चल पड़ा मेघ बिजली की झनकार लिए
धरती की उष्मा-संताप हरण को
फुहारों में सरस हो जाओ
विरह के बाद सुखद मिलन है
बरस पड़ी बूँदे झमझम, प्रकृति उत्सव में मगन।
मैं हथेलियों पर बूँदों को लेती, टप-टप कर गिरते
जमाना चाहती अपने हस्तरेखा पर
खुशनुमा एहसास को संजोते
प्रणय निवेदन के दरख़्त जो मुरझाए हैं
जीवंत हो उठा सावन के घन से
नव उल्लास, उछाह में झूम उठे
मौज की लकीरे, नव कोंपल, नव आशाएं
सावन के मनुहारी गीतों में
हँसते, खिलखिलाते जीवन की परिभाषाएं
हाथों की मेंहदी रंग में चढ़ा प्रेम
हरी चूड़ियो की छनछन, जीवंत हो रहा जीवन
सावन की झकोरों में बह गए हर शमन
हरीतिमा से सुसज्जित धरनी आँचल
कल-कल नदियाँ, सरिता निर्मल
दादुर के टर्र-टर्र, मोरनी के नृत्य अनुपम
प्रेम प्रलाप का आमंत्रण
अहा ! किल्लोल करता मन
सावन जो आया।

स्नेह की देह में 

स्नेह की देह में
मातृत्व रस से नहायी ज़िंदगी
पहली बार ‘माँ’ शब्द
शिशु के जन्म के साथ पनपी
ऐसा शब्द गढ़ गया पल
जिस पर नत मस्तक सारा जहान
हर कर्ज से भारी मातृ ऋण
उऋण होना मुश्किल
इस पद को पाकर मैं ‘माँ’ कहलाई
पर ‘दायित्व’ के पहाड़ ने भी तुरंत जन्म ले लिया
यह बोझ उमर के साथ बढ़ते रही पौधे से वृक्ष के भाँति
मन में ममता का सागर भर गया
आँचल मातृत्व से सराबोर हो गया
सुबह की सुनहली किरणों सी मनुहारी
शबनम की मोती सदृश
झरने से बहती स्नेह की धारा
जैसे मानों आकाश ने चाँद को पा लिया
मेघों ने बूँदो को मोती में ढाल, बरसा दिया हो मुझपर
चूमती शिशु को
बेटी है या बेटा
प्रकृति से कोई छेड़छाड़ नहीं
कोई मुझे सरोकार नहीं
मैं शिशु को अपने गोद में लिए
झूलती अमलतास के प्रेमिल फूलों सी
फेनिल दरिया सा मन अब स्थिरता को बाँधने लगा
मानों अचानक मेरा वजन एक
आम से लदे वृक्ष के समान हो गया
हर पल मेरे मन की डालें झूमती प्यार से
कभी आँखो को देखती शिशु की
कभी नन्हे कोमल हाथों को, कभी खूबसूरत पैरों को
अचानक एक फिकर नन्हीं सी जान की
सब कुछ निछावर दिन-रात, हर पल,हर सपना
सरसों के फूलों-सी कोमल
जब रोती चेहरा लाल हो जाता, मेरे अंदर अजीब सिहरन होती
दुनिया की हर खुशी सोचती उसको सीने से लगाते
मन में सुंदर स्पंदन
जवानी पकने लगी माया के संसार में
मस्तिष्क में स्निग्धता की धारा बहती
हमेशा शिशु की फिकर
स्नेह की देह में नहायी ज़िंदगी।

स्वागत नवल वर्ष

नूतन किसलय हो हर्ष
नव प्रभात स्वर्ण रश्मि लिए
जीवन पथ जगमग-जगमग
हर तमस, उर भर नव उमंग
नूतन स्वप्न उन्नत शिखर हो
उन्वान छूता नव विकास गौरव
नवल चेतना जन में प्रबल हो
स्वागत नवल वर्ष।
अन्तस ओजस्विता का अंचल
अटल कर्मों से सजा पथ हो
मिटा शत्रुता, बढ़ा मित्रता का हाथ
प्यार, भाईचारा का नव संचारण हो
स्वागत नवल वर्ष।
खग वृंदो के कोलाहल से गुंजरित
खुशियाँ जीवन की गाती हो
पुष्प गुच्छ छाए रंगो को सजाए
हर मानव सरल निश्छल हो
स्वागत नवल वर्ष।
खेतों में सोने से दाने जड़े हो
न कृषक खोए अपनी संतुलन
न भूखे तन रोए उनके बच्चे
खुशहाली की अनुपम संगम हो
स्वागत नवल वर्ष।
हर बच्चे के हाथ पुस्तक हो
न सिसके फुटपाथ पर बचपन
हर घर के चूल्हे में आग जले
रोटी की भूख से न विकल हो
स्वागत नवल वर्ष।
हर ले दुर्नीति मन से सभी के
नव उर्जा नव शक्ति विस्तार हो
हारे दुश्मन के हर बोल सदा
भारत की गाथा विश्व में प्रखर हो
स्वागत नवल वर्ष।

नमन वीर सपूतों 

राष्ट्र को तुझपर गर्व है।
प्रचंड बल, प्रचंड दल
काँपते धरा पटल, दहलते आकाश दल
शेर सा दहाड़, वज्र सा प्रहार
फौलाद में ढले, पर्वत से अड़े-खड़े
प्रबल दृढ़ शक्ति, प्रण है देश भक्ति का
प्रणय मातृभूभि, दंभ राष्ट्रध्वज है
नमन वीर सपूतों, राष्ट्र को तुझपर गर्व है।
प्रहरी सीमा पर अडिग बने, विकट कठोर बन डटे रहे
हुंकार दुश्मनों का खौफ, टंकार बाजुओं का रौब
विद्युत सी गति लिए, दुश्मनों के नाश का
कर्म देशप्रेम का, भीष्म प्रतिज्ञा हमारा राष्ट्र धर्म है
धर्म मानव प्रेम, भारत के संतान है
नमन वीर सपूतों, राष्ट्र को तुझपर गर्व है।
संकट विकट हो देश पर, अडिग हौसले लिए खड़े
धरती से गगन तक, बाज की नजर लिए
हथेलियों पे जान ले, रक्षक बने डटे रहे तत्पर
जान भी जाए तो, तिरंगों से लिपटे कफ़न रहे
तिरंगा की शान में, सर्वस्व जीवन अर्पण है
नमन वीर सपूतों, राष्ट्र को तुझपर गर्व है।

गृहिणी 

मन का विस्तार
क्षितिज के उस पार
दृग सपनों के सागर
उर करुणा के गागर
जीवन कलियों सा बंद कपाट
सुख-दुःख की पंखुड़ी झूलती साथ
मन में पीड़ा का नर्तन
अधर पर मुस्कान के मकरनंद
मखमली सपने मानस-पटल पर सजे
रहती अधर अक्सर सिले हुए
न खुद की सुधि, न खुद की ज़िंदगी
वात्सल्यमयी सुधा बन बरस रही
व्यथा जीवन की कसमसाहट भरी
स्वयं यथास्थिति से जकड़ी रही

ख़्वाब

निःशब्द आँखें
ख़्वाब बुनते बहुतेरे
कल्पना के पंख लगा
हौले-हौले लेते हिलोरे
मन नभ वारिद को देखो
अल्हड़ बन छा जाता
उच्चश्रृंखलता की विविध कला से
मन तारों को छेड़ जाता
ख़्वाबों के बुदबुद पर देखो
सजल सरोवर कमल खिले
लघु तरंग पैदा कर
जीवन में नई गति भरे
ख़्वाबों के उपवन को देखो
चित्रपटी पर रंग भर देते
ख्वाहिशों की रोली सजा
सुमन उपवन में बहुरंग इतराते
ख़्वाबों के श्रृंगों को देखो
पर्वत मालाओं से भी ऊँची
हिम शिखर सी तेजस आभा
दृढ़ हौसला भर देती
ख़्वाब सुन्दर ऊँचे उठते जाते
कर्म पथ में कमल खिल जाते
कठिन डगर सरल हो जाती
पथ पर कुसम रज-कण बिछ जाते।

शून्य से ज़िदगी शुरु 

एक कहानी जिसके हर शब्द तेज़ाब में डूबे
बाहर निकलने के पहले फिर डूब जाता पीड़ा व दर्द में,
जिस्म से ज्यादा आत्मा पर फफोले
सोचो, तेज़ाब मेरी ज़िन्दगी की कहानी लिख गई
बिल्कुल क्रूर और निर्मम
जहाँ मेरी कराह, चित्कार सुनोगे तेज़ाब के जलन से
मानो लाखों सूरज ने अपने धधकती ज्वाला में हमें नहला दिया हो
आत्मा जलन में सुख गई हो
लगा हजारों टन बारूद से भरा तन गोले की तरह फटने लगा हो,
अनगिनत तीलियाँ मेरे सीने पर, हाथ में, चेहरे पर जला दी गई।
पीड़ा की मेरी चित्कार से भूमि भी भयभीत, भाव विहल ,
जमीन पर लोटती, चिल्लाती, तड़पती
लग रहा था, मुझे कोई बचा ले
कोई आगे नहीं आया, भीड़ दर्शक थी
फट रहे थे चेहरे से मांस के लोथड़े
आँखो में अंगारे सी जलन से, मैं उबली जा रही थी
किसी तरह अस्पताल पहुँचाई गई
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था
सर्जरी पर सर्जरी
कष्ट का कोई अंत न था
मेरे बापू अपनी बिटिया के लिए घर बेच दिया
मेरी अम्मा जिंदा लाश बन चुकी थी
मेरे साथ मेरा पूरा परिवार तबाही में जी रहा था।
ओ अमानवीय कृत्य करने वाले प्रतिशोधी
देखो मुझे, शायद तुझे देखना चाहिए
आओ ना, तुझे मैं ‘हाँ’ कहती हूँ अब
अरे बुज़दिल, देख मेरे परिवार का हाल
अचानक सब कुछ कैसे बदल गया
मैंने उसके एकतरफा प्यार को नकारा ही तो था बस
और इतनी बेरहम सजा
उसके हाथों में बोतल देख, मैं न समझ पाई
मेरी तक़दीर का हिसाब तेज़ाब से लेगा
मेरा मन कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं
न यह जीवन, न कुरूपता, न अंधकार
सब कुछ बदल चुका
जिस्म, चेहरा, आवाज, दिमाग, आत्मा
तेज़ाब से ज़िदगी का हर लम्हा,
हर पल कैसे पीड़ा में कातर कराह करती
आओ मुझे देखो,
ऐसी सज़ा मुझे मिली जहाँ जुर्म किसी और का,
सज़ा किसी और को।
जहाँ आत्मा-जिस्म दोनों घायल, अचानक सब कुछ खत्म
ज़िन्दगी कुरूपता में ढल गई
ज़िन्दगी बिना मक़सद के, तीव्र अम्लीय गंध के घेरे में।
अंधेरा-ही-अंधेरा
डूब चुका उम्मीद का सूरज
अपने हिस्से की रोशनी बंद कर मेरी ज़िदगी ने अंधेरे की चादर ओढ़ ली।
शब्दों ने आत्महत्या को सोची पर कहानी बहादुर हो चुकी
मरने से इन्कार किया,
किसी के जुर्म की सजा अपने ज़िदगी को क्यों दें।
फिर ज़िन्दगी शून्य से शुरु
दुख में सुख की खोज
ज़िन्दगी ने सुखन को छुआ
सपनों की उड़ान को पंख मिल गयी
खुशियों की खिड़कियाँ खुल गयी,
कदम निकल पड़े
अपने जैसे तेज़ाब पीड़ितों की मदद को
उसके दर्द को अपने में समेट लेने को।
जीने की वज़ह मिल गई और शब्द नाचने, गाने लगे
एक तमाचा अपराधी को, दूसरा समाज को
अब मैंने रोशनी के सारी खिड़कियाँ खोल दिए।

मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना

मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना
नहीं, मझे नहीं लिखना दर्द, पीड़ा व विछोह
हर बार मैं अपनी पीड़ा में तुझे गढ़ती हूँ
अपने दिल में उठते तूफानों को
तुझमें समा, समझा लेती खुद को
आज तुम मेरे लिए प्यार में ढल जाना
जहाँ कण-कण शब्दों के रोमांचित प्रेम में डूबी हो
मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना।
डूबना चाहती हूँ मैं, तुझसे उस नटखट बालपन में
माखनचोर कान्हा के चितचोर मन में
जो जीता है खुल कर
जहाँ जाता, प्यार लुटाता जी भर
चाहती हूँ जाना उस प्रेम में
जहाँ राधा कान्हा के प्रेम में खोई
उस बंसी के सुर में जहाँ प्रेम सर्वस्व है
उस चाह में जहाँ गोपियाँ अपना सब कुछ भूल जाती
कविता, तुम कान्हा के बंसी में,
प्यार के मीठे सुर हो जाना बह जाना।
मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना।
दर्द में उतरते-उतरते थक गयी
इतंज़ार, तन्हाई से जूझते घूम रही हूँ तुम्हारे साथ
उदास चाँद का तिलक लिए
कविता, आज तू बन जा राधा के प्रेम की छवि
प्रेम के अर्थ को कण-कण में सिंचित कर जाना।
मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना।
मुझे नहीं तरस खाना अपने पर
उबकाई आती अब अपने अफ़सानों से
भूल जाना चाहती हूँ
नहीं उतारना कविता के सतह पर
तू बन मीरा के प्यार की पंक्ति
जहाँ शब्दों की आत्मा में प्रेम की पराकाष्ठा हो
पी डाला विष प्याला
दे डाली परिभाषा अलग शुद्ध प्रेम की
कविता तुम, कृष्ण रंग के जादू में रंग जाना
प्यार के उस अनंत गहराई में उतर, शब्दों में ढल
प्रेम के रस में डूबी तरुण कामिनी सी
मेरे दिल के पन्नों में उतर जाना
मेरी कविता, आज तुम प्यार में ढल जाना।

दक्षता खाती लाठी प्रहार

अपाहिज हो जाती मेधाविता
धिक्कारती उसकी सेवा भाव
विकलांगता जीवन में छाए
दक्षता खाती जब लाठी प्रहार
सफ़ेद कोट पर खून के छींटे
ख़तरे में हो चिकित्सक की जान
भीड़ का तांडव अस्पताल में
मरीज जब हो जाए स्वर्ग सिधार
आफ़त में चिकित्सक पड़ जाते
तैयार भीड़ करने को कोहराम
अपाहिज हो जाती मेधाविता
दक्षता खाती जब लाठी प्रहार
भगवान का महिमा मंडन छोड़ो
आम इंसान सा चिकित्सक को तोलो
लाख कोशिश हार ही जाती कभी
मृत्यु के लिखे बस अपने डोर
सदमे में आक्रामक परिजन
लेने पर उतारू चिकित्सक के प्राण
सर पर प्रहार, छाती पर वार
कुम्हलाती योग्यता क्लांत
अपाहिज हो जाती मेधाविता
दक्षता खाती जब लाठी प्रहार
लाखों मरीजों के दुआओं से टंकित
कठिन अध्ययन परिश्रम में जीवन अर्पित
चिकित्सा को अपना सर्वस्व कर्तव्य मान
रोगी उपचार में पाते सुख महान
पा गाली व अभद्रता
व्यर्थ हो जाती अथक परिश्रम व योग्यता
आहत होता उनका स्वाभिमान
खोने लगते आत्म सेवा भाव
राजनीति व मीडिया से हो जाते अक्रांत
अट्टहास कर रही मर्यादा
हमारी व्यवस्था पर है कटाक्ष
अपाहिज हो जाती मेधाविता
दक्षता खाती जब लाठी प्रहार।

Share