शीला पाण्डेय की रचनाएँ

अर्थ खोते जा रहे हैं

शब्द खोखे डुगडुगी हैं
अर्थ खोते जा रहे हैं

शौर्य की पनडुब्बियों को शेर खेते थे कभी
भट्टियों की धौंकनी में झोंक देते थे सभी
धू धू धधकता लौह तन-मन
उस त्वरा की चेतना पर
शर्म से बेशर्म लड़ते
भेड़ जोते जा रहे हैं

हुक्मरानों की मुनादी में भुनाते खास सारे
घर का दस्तावेज सारा बेंच आते मान सारे
घुड़सवारी पर है दूल्हे को
निकलना क्या करें सब
देश का जज्बात पहने
भाँड़ होते जा रहे हैं

सृष्टि के नायाब मोती घर रहे थे ईश के जो
बँट गए बाँटे गए कुछ वोटरों में बीस के वो
ताजपोशी के लिए सब
मारकर मानव गढ़े अब
तख्तियाँ हाथों में लेकर
भीड़ होते जा रहे हैं

शब्द खोखे डुगडुगी हैं
अर्थ खोते जा रहे हैं

बरखा गीत 

चट-चट पट-पट झम-झम झिम-झिम
अररर-हररर रिम-झिम सिम-सिम
तड़-तड़ भुड़-भुड़ टिप-टिप टुप-टुप
घरर-घरर घुम सनन सांय चुप

शीत मीत की ठुनका-ठुनकी
पवन गीत की हुमका-हुमकी
नीर कलश की गहमा-गहमी
डरी किरन की सहमा-सहमी

घुटुनू पइयाँ धड़म धाँय-धुप
घटा लिपटती घनन-घनन घुप।

बजी दिशा में तुरहा-तुरही
व्याकुल हारे विरहा-विरही
छंद बिखेरें भिलना-भिलनी
सभी ओर बस मिलना-मिलनी

बिजली झाँक रही है लुकछुप
लता, पेड़ चढ़-चढ़ कर गुप-चुप।

सोम रसों की छीना-झपटी
नदिया पीकर है फिर रपटी
अधोवस्त्र में झिनका-झिनकी
वस्त्रहीन हैं निनका-निनकी

नाच रहे हैं छप-छप छुप-छुप
कीच उड़ाये झप-झप झुप-झुप।

चहुुँदिश में फैले उजियारे

गिरकर उछलीं छम-छम बूँदें
चम-चम चमके अनगिन सारे
आसमान से डोर पकड़कर
धरती उतरे अम्बर-तारे।

जटा खोल शिव धरती उतरे
कारे, खारे दोष धुलाने
नदिया, पेड़, अवनि संग बच्चे
लेकर पर्वत चला घुमाने

थिरक-थिरक कर बूँदें फिसलीं
कंचन काया पर मिट प्यारे।

गोद थामते पत्ते लचके
पंखुड़ियाँ विहँसीं मदमाती
हवा रसीली चढ़ी नशीली
गोरी बहकी प्रेम थमाती

प्रियतम टूट-टूट कर बरसे
छिन्न-भिन्न कर बन्धन सारे।

बिजली फुर्ती बाँट रही है
बदली नजर डिठौना देती
बूँदें छुम-छुम नृत्य सिखातीं
घर-घर हवा पठौना देती

जीवन झूले झूम-झूम कर
चहुँदिश में फैले उजियारे

परों को तोल 

तोल मौसम की हवाओं के
परों को तोल।

रख शिराओं में कोई
नायाब-सा हो यंत्र रख ले
लख घटाओं के रसायन के
सभी बदलाव लख ले

सोख अमृत को नसों में
अनथके प्रण सोख भीतर
कोख में हर बूँद मोती
रोप उसकी कोख के तर

बो रहा जो है हरापन
हर दिशा में बिन कहे
बालता है दीप भी
अलमस्त भी अनमोल!
तोल मौसम की हवाओं के
परों को तोल।

भेद विष को अंत तक तू
लक्ष्य देकर भेद सागर
छेद नागों-नासिका
शर-विष बुझे से छेद नागर

साँस धर तन, तलहटी में
परिक्रमा कर साँस-सोई
प्यास रख रणभूमि की
फिर भर किसी में, प्यास कोई

जा रहा जो युद्ध में
बाँका धनुर्धर दूर तक
शंख, ध्वनियाँ प्रीति-माटी,
जय, लिये सँग डोल।
तोल मौसम की हवाओं के
परों को तोल।

देवदार

गिरि को दाबे अड़ा खड़ा नभ
में विशाल बहुखंडी
हवा, फूल, फल, छाँव, बटोरे
पर्वत के सिर झंडी

बोओ, रोपो, सींचों, पालो,
आस किसे है पगले!
स्वाभिमान का पौरुष तन में
पाल-पोष कर रख ले

आसमान की छतरी ताने
देवदार की डंडी॥

काली, धूसर, पीली साड़ी
रैन, दिवस, गह भोरे
अदल-बदल के पहन उतारे
चोर कहाँ से छोरे!

हरी चीर में प्राण बसे
आँचल नीचे पगडण्डी॥

है बुजुर्ग-सा बैठा गिरि पर
अनुभव, हुनर बढ़ाता
भारत की अगुवानी करता
श्रद्धा फूल चढ़ाता

जनम-जनम का देवदार
घर, औषधि, कागज मंडी॥

बूँद-बूँद सब भाप बटोरे
पगड़ी धरता जाए
हौले-हौले तभी निचोड़े
नीर बरसता जाए

शीतल बौछारें वर्षा की
फहराता है ठंडी॥

देवदार 

गिरि को दाबे अड़ा खड़ा नभ
में विशाल बहुखंडी
हवा, फूल, फल, छाँव, बटोरे
पर्वत के सिर झंडी

बोओ, रोपो, सींचों, पालो,
आस किसे है पगले!
स्वाभिमान का पौरुष तन में
पाल-पोष कर रख ले

आसमान की छतरी ताने
देवदार की डंडी॥

काली, धूसर, पीली साड़ी
रैन, दिवस, गह भोरे
अदल-बदल के पहन उतारे
चोर कहाँ से छोरे!

हरी चीर में प्राण बसे
आँचल नीचे पगडण्डी॥

है बुजुर्ग-सा बैठा गिरि पर
अनुभव, हुनर बढ़ाता
भारत की अगुवानी करता
श्रद्धा फूल चढ़ाता

जनम-जनम का देवदार
घर, औषधि, कागज मंडी॥

बूँद-बूँद सब भाप बटोरे
पगड़ी धरता जाए
हौले-हौले तभी निचोड़े
नीर बरसता जाए

शीतल बौछारें वर्षा की
फहराता है ठंडी॥

धरती बतियाती है

फूली सरसों वाली चादर
ओढ़े हरियाती है
धरती गुन-गुन, मह-मह गाती
क्या-क्या बतियाती है!

तन-मन रचती मीठी पाती
बाँच रहे हम सुबहो-शाम
चहुँदिश कुहरे से लिपटे जब
पेड़, बाग धुँधलाते आम

आँगन की मन कामिनी-पत्ती
कम—सी हरियाती हैै।

दूब घास पर मोती टाँके
कढ़ी रजाई जैसे
भरे कँपकँपी जाड़ा ऐसा
खेल-खेलाई कैसे

मुनिया बड़ी देर से रोये-रोये
रिरियाती है।

मदिर-मदिर दिन हुआ बसंती
धरती फिर अँगड़ाई
दूब सुनहरी धूप ओढ़ केे
मंद-मंद मुस्काई

तितली, भौरे घूँघट खोलें
चम्पा मिठियाती है

बादल रूई फाग उड़ाता
हवा लपक पड़ती है
रूप सुनहरा उषा धारती
निशा झगड़ पड़ती है

धरा कसीदाकारी चुनरी
पहने लड़ियाती है

घिरे अर्जुन अकेले /

घन हवाएँ चक्रवाती में
घिरे अर्जुन अकेले
लड़ रहे तुमसे तुम्हारे
विष बुझाये तीर ले ले

सामने सेना अपरिमित
है खड़ी तलवार ताने,
आँख की चिंगारियों में
घृणा का अंगार साने

हे धनुर्धर मौन तोड़ो
भाव को पीछे धकेले॥

कौन तेरा, कौन मेरा
सोचने का क्षण नहीं है
युद्ध से भयभीत होने का
तुम्हारा प्रण नहीं है

वीर तुम सन्नद्ध हो लो!
आ रहें रिपुओं के रेले।

यह तुम्हारी रीति है
हों लक्ष्य पर ही सधी-आँखें
बीच में आने न पाएँ
वृक्ष-पत्ते और शाखें

बढ़ो आगे व्यूह तोड़ो!
रौंद दो पापों के मेले॥

धर्म की स्थापना
करनी तुम्हें ही है यहाँ पर
द्रौपदी की पीर भी
हरनी तुम्हें ही है यहाँ पर

पार्थ! लो ब्रम्हास्त्र कर में
भस्म कर दो अरि झमेले॥

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