शेख़ अली बख़्श ‘बीमार’ की रचनाएँ

बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए

बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए
जो संग-ए-दिल हो तो क्या चाहिए जफ़ा के लिए

सवाल यार से कैसा कमाल-ए-उल्फ़त का
कि इब्तिदा भी तो शर्त इंतिहा के लिए

ख़ुदा से तुझ को सनम माँगते तो मिल जाता
मगर अदब ने इजाज़त न दी दुआ के लिए

अज़ाब-ए-आतिश-ए-फ़ुर्कत से काँपता था दिल
हज़ार शुक्र जहन्नम मिला सज़ा के लिए

न दिल लगा के हुआ मुझ से इश्क़ में परहेज़
बिगड़ गया जो किसी ने कहा दवा के लिए

मिला उन्हें भी तलव्वुन मुझे भी यक-रंगी
ख़ुसूसियत न रही सर सर ओ सबा के लिए

ख़ुदा ने काम दिए हैं जुदा जुदा सब को
सनम जफ़ा के लिए हैं तो हम वफ़ा के लिए

जहाँ-नवर्द रहे हम तलाश-ए-मतलब में
चले न एक क़दम ग़ैर-ए-मुद्दआ के लिए

मुशाइरा में पढ़ो शौक़ से ग़ज़ल ‘बीमार’
कि मुस्तइद है सुख़न-संज मरहबा के लिए

दख़्ल हर दिल में तिरा मिस्ल-ए-सुवैदा हो गया

दख़्ल हर दिल में तिरा मिस्ल-ए-सुवैदा हो गया
अल-अमाँ ऐ ज़ुल्फ-ए-आलम-गीर सौदा हो गया

गो पड़ा रहता हूँ आब-ए-अश्क में मिस्ल-ए-हबाब
सोज़िश-ए-दिल से मगर सब जिस्म छाला हो गया

ऐ शह-ए-ख़ूबाँ तसव्वुर से तिरे रूख़्सार के
चश्म का पर्दा बे-ऐनिहि लाल-ए-पर्दा हो गया

फ़र्क-ए-रिंदान-ओ-मलाइक अब बहुत दुश्वार है
मय-कदा उस के क़दम से रौशन ऐसा हो गया

दान-ए-अँगूर अख़्तर चाँदनी मय माह जाम
नस्र-ए-ताएर बत क़राबा चर्ख़ मीना हो गया

सुनते हैं ताइब हुआ उस बुत के घर जाने से तू
क्या तिरा ‘बिमार’ पत्थर का कलेजा हो गया

दम न निकला यार की ना-मेहरबानी देख कर 

दम न निकला यार की ना-मेहरबानी देख कर
सख़्त हैराँ हूँ मैं अपनी सख़्त-जानी देख कर

शाम से ता-सुब्ह-ए-फ़ुर्कत सुब्ह से ता-शाम-ए-हिज्र
हम चले क्या क्या न लुत्फ़-ए-ज़िंदगानी देख कर

यूँ तो लाखों ग़म्ज़दा होंगे मगर ऐ आसमाँ
जब तुझे जानूँ कि ला दे मेरा सानी देख कर

अब तप-ए-फ़ुर्कत से ये कुछ ज़ोफ़ तारी है कि आह
दंग रह जाती है हम को ना-तवानी देख कर

वास्ते जिस के हुए बहर-ए-फ़ना के आश्ना
वो पसीजा भी न अपनी जाँ-फिशानी देख कर

बाज़ आ ‘बीमार’ उस के इश्क़ से जाने भी दे
तर्स आता है ये तेरी नौ-ज़वानी देख कर

फ़स्ल-ए-गुल साथ लिए बाग़ में क्या आती है 

फ़स्ल-ए-गुल साथ लिए बाग़ में क्या आती है
बुलबुल-ए-नग़मा-सारा रू-ब-क़जा आती है

दिल धड़कता है ये कहते हुए उस महफिल में
याँ किसी को ख़फ़्काँ की भी दवा आती है

आज वो शोख़ है और कसरत-ए-आराइश है
देख किस वास्ते पिसने को हिना आती है

क्या खुले बाग़ में वो चश्म-ए-हिजाब-आलूदा
आँख उठाते हुए नर्गिस को हया आती है

जाँ-कनी हुस्न-परस्तों को गिराँ क्या गुज़रे
भेस में हूर-ए-बहिश्ती के क़ज़ा आती है

इस लिए रश्क-ए-चमन बाग़ में गुल हँसते हैं
कि उड़ाती तिरी रफ़्तार-ए-सबा आती है

मर्ज़-ए-इश्क से ‘बीमार’ जो घबराता है
यार कहता है मुझे ख़ूब दवा आती है

कौन बरहम है ज़ुल्फ-ए-जानाँ से

कौन बरहम है ज़ुल्फ-ए-जानाँ से
तंग हूँ ख़ातिर-ए-परेशाँ ये

मुज़्दा ऐ ख़ार-ए-दश्त दस्त-ए-जुनूँ
गुज़रे हम दामन ओ गिरेबाँ से

दाँत किस का है जाम पर साकी
मय टपकती है अब्र-ए-नेसाँ से

गर यही रंग है ज़माने का
बाज़ आया मैं कुफ्र ओ ईमाँ से

बैठ जाता है ओ के मेरे पास
जो निकलता है बज़्म-ए-जानाँ से

हूर आशिक़-नवाज़ है कोई
पहले पूछेंगे हम ये रिज़वाँ से

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा 

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा
चश्म-ए-तर अब्र-ए-नौ-बहार उठा

खा के ग़श गिर पड़े खड़े बैठे
बैठ कर इस अदा के यार उठा

आतिश-ए-इश्क़ देख कर मालिक
अल-अमाँ अल-अमाँ पुकार उठा

दर्द ताज़ीम-ए-मर्ग को दिल में
शब-ए-फ़ुर्कत हज़ार बार उठा

जीेते-जी दौर-ए-आसमानी में
न ज़मीं से ये ख़ाक-सार उठा

अब्र-ए-रहमत ने दे दिया छींटा
बाद मरने के जब ग़ुबार उठा

वहशत-ए-दिल ने फिर निकाले पाँव
फिर तहम्मुल का इख़्तियार उठा

फिर जुनूँ फ़स्ल-ए-गुल में लाया रंग
फिर मैं होने का शर्म-सार उठा

हाल-ए-‘बीमार’ जा-ए-रिक़्क़त है
मरहम-ए-दिल का ऐतबार उठा

चोर ज़ख़्म-ए-जिगर में बैठ गया
चारागर हो के शर्म-सार उठा

क्या क्या न तेरे सदमे से बाद-ए-ख़िजाँ गिरा 

क्या क्या न तेरे सदमे से बाद-ए-ख़िजाँ गिरा
गुल बर्ग सर्व फ़ाख़्तास का आशियाँ गिरा

लिखने लगी क़ज़ा हो हमारी फ़तादगी
सौ बार हाथ से क़लम-ए-दो-ज़बाँ गिरा

जब पहुँचे हम किनारा-ए-मक़सूद के क़रीब
तब नाख़ुदा जहाँ से उठा बादबाँ गिरा

मूबाफ़-ए-सुर्ख़ चोटी से क्या उन की खुल पड़ा
एक साइक़ा सा दिल पे मेरे नागहाँ गिरा

ता आसमाँ पहुँच के हुई आह सरनिगूँ
या रब हो ख़ैर फ़ौज-ए-अलम का निशाँ गिरा

उठ कर चला जो पास के उन के तो घर तलक
हर हर क़दम पे ज़ोफ़ से मैं ना-तवाँ गिरा

देखा जो दश्त-ए-नज्द में हाल-ए-तबाह-ए-कै़स
महमिल से लैला कूद पड़ी सारबाँ गिरा

दोज़ख़ पे क्यूँ न हो दिल-ए-‘बीमार’ ताना-ज़न
आतिश से इश्क़ की है पतिंगा यहाँ गिरा

न कहो ऐतबार है किस का

न कहो ऐतबार है किस का
बे-वफ़ाई शेआर है किस का

ऐ अजल शाम-ए-हिज्र आ पहुँची
अब तुझे इंतिज़ार है किस का

इश्क़ से मैं ख़बर नहीं या रब
दाग़-ए-दिल यादगार है किस का

दिल तो ज़ालिम नहीं तिरी जागीर
तो ये उजड़ा दयार है किस का

मोहतसिब पूछ मय-परस्तों से
नाम आमर्ज़-गार है किस का

बज़्म में वो नहीं उठाते आँख
देखना ना-गवार है किस का

पहने फिरता है मातमी पोशाक
आसमाँ सोगवार है किस का

चैन से सो रहो गले लग कर
शौक़ बे-इख़्तियार है किस का

आप सा सब को वो समझते हैं
मोतबर इंकिसार है किस का

यार के बस में है उम्मीद-ए-विसाल
यार पर इख़्तियार है किस का

आप ‘बीमार’ हम हुए रूसवा
सरनिगूँ राज़-दार है किस का

रंजिश तिरी हर दम की गवारा न करेंगे

रंजिश तिरी हर दम की गवारा न करेंगे
अब और ही माशूक़ से याराना करेंगे

बाँधेंगे किसी और ही जोड़े का तसव्वुर
सर ध्यान में उस ज़ुल्फ के मारा न करेंगे

इम्कान से ख़ारिज है कि हूँ तुझ से मुख़ातिब
हम-नाम को भी तेरे पुकारा न करेंगे

यक बार कभी भूले से आ जाएँ तो आ जाएँ
लेकिन गुज़र इस घर में दोबारा न करेंगे

क्या ख़ूब कहा तू ने जो खोलूँ अभी आग़ोश
मिलने से मिरे आप किनारा न करेंगे

गो ख़ाक में मिल जाएँ हम और वज्अ बदल जाएँ
पर तुझ से मुलाक़ात ख़ुद-आरा न करेंगे

उस नर्गिस-ए-‘बीमार’ से रखते हैं शबाहत
हरगिज़ सू-ए-अबहर भी इशारा न करेंगे

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