शैलेन्द्र शान्त की रचनाएँ

कि जैसे हो महाराजे

ई ससुरी रोटी-दाल
तेल तरकारी
चीनी चावल,
रोज़ी
निकली खोटी
भक्ति के आगे
दुम दबा कर
विकास है भागे
भई वाह !
काले ख़ाकी
मुसटण्डों के
क़िस्मत है जागे
जहाँ-तहाँ डण्डे हैं भाँजे
भई वाह !
माता के भाग्य विधाता
नए-नए बजा रहे
अपनी तुरही
अपने बाजे !
गुमान भी उनके देखें
कि जैसे हों महाराजे !

वर्षा 

बादल गरजा
बिजली चमकी
मगन हुई बरसा रानी
डूब गई राजधानी
दुखी हुए नागरिक
महानागरिक की बढ़ी परेशानी

ख़ुश हुआ खेतिहर
मन मोर-सा नाचा
सपने ने ली अंगड़ाई
इस मर्तबा
थोड़ा-बहुत कर्ज़
चुक ही जाएगा भाई।

शान्तिनिकेतन में 

1.

बहुत से फूल खिले
रंग-बिरंगे
हृदय उपवन में
भाव-कुँज में

बहे सुगन्ध
बहे हवा प्रेम की
करुणा बहे
मन हो गीला
नैन नम

दया की ज्योति जले
भाषा-जाति तजे
धरती का रूप धरे कवि मन।

2.

हे विश्व कवि
बरगद विशाल
बैठ लूँ
थोड़ी देर
तेरे द्वार
मन कहे पुकार
धरती हरी-भरी
मौसम रहे ख़ुशगवार
उमड़ता रहे प्यार
वृक्षों पर, कृषकों पर
बेशुमार, बेशुमार

पूजो-पूजो
वृक्ष पूजो, हल पूजो
ग्राम्य जन-बल पूजो
इनमें जीवन सुगन्ध अपार
कहाँ मानते हार
हलवाहे
ढोर हाँकते चरवाहे
बुनकर, दस्तकार
बैठ लूँ
थोड़ी देर
तेरे द्वार
मन कहे पुकार।

डर लगता है

कुछ कहते हुए
कुछ भी कहते हुए
डर लगता है
बढ़ जाती हैं धड़कने
जुबां से निकल जाती है
जब दिल की बात

सुनते-सुनते शोर
बढ़ जाता है सिरदर्द
कानों को डर लगता है
जब घुसती जाती हैं धमकियाँ
एतराज के एवज में

जगमग उजाले में छिपे
अन्धेरे से डर लगता है
आँखों को डर लगता है
दिख जाता है जब कभी
कोई नंगा सच।

कहाँ चले गए वे भद्र पड़ोसी 

गौरेयों ने बदल दिया
अपने अशियाने को
कई दिनों तक चहचह किया
पंख भी फड़फड़ाए थे
पुरज़ोर
फिर निकल पड़े
नए ठिकाने की तलाश में
न जाने किस ओर

मैने नीम के पेड़ से
बन्द खिड़की की ओर
टकटकी लगाए रहे कई रोज़
इसी तरह गुज़र गए कई भोर
तो मन मसोसते हुए
रोक दी आवाजाही

बेचारे कौवे ने तो ज़ख़्मी कर लिए
अपने चोंच
शीशे की खिड़की पर दस्तक देते-देते
नहीं खुली खिड़की
नहीं आई आवाज़
अन्दर से

चूहे राम भी रहे
परेशान कई दिनों तक
बड़ी मचाई उधम
मैदान साफ़ का साफ़
ख़ालीपन उनको भी ख़ूब खला
ऐसे में कैसे टिकते भला

छिपकलियों ने
खूब मचाई दौड़
इधर से उधर
कई-कई दिन
पर रात के अन्धेरे से हो गए परेशान
कीट-पतंगे भी न जाने कहाँ हो गए ग़ायब
घरवालों की तरह

चींटी, मच्छर, झींगुर…
सब के सब
हुए उदास
छोड़ दी आस
आख़िर में

कुत्ते-बिल्ली भी थे हत्चकित

कहाँ चले गए वे भद्र पड़ोसी।

अर्थ खोते शब्दों को बचाओ

इतने तो अविश्वसनीय
न हुए थे कभी
अर्थहीन न हुए थे
न हुए थे कभी
इतने बेअसर
बुजदिल न हुए थे
बेअसर-बीमार न हुए थे
न हुए थे इतने हल्के
बेशर्मी में न हुए थे
इतने अव्वल

बचाओ, ऐ शब्दकारो!
अर्थ खोते शब्दों को बचाओ!

उनको कहाँ पता था 

गर्वित थे
सीख कर हुनर
डूब-डूब कर
ख़ूब-ख़ूब
करते हुए भरोसा

हाथों के हुनर से
नहीं बढ़ता है देश आगे
पीछे छूट जाता है
उनको कहाँ पता था

कि जब आता है विकास
तो बदल जाता है मतलब
हास-परिहास का
उनको कहाँ पता था

हास को हंस के पंख लग जाते हैं

हाथ पर धरे हाथ
बैठे तकते हैं
सुनी आँखों से आकाश
हुनरमन्द हाथ

और उनकी तरफ
ईश्वर भी नहीं देखता
पलट कर
उनको कहाँ पता था।

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