शैलेय की रचनाएँ

या (कविता) 

हताश लोगों से
बस
एक सवाल

हिमालय ऊँचा
या
बछेन्द्रीपाल ?

पगडंडियां 

भले ही

नहीं लांघ पाये हों वे

कोई पहाड़

मगर

ऊंचाइयों का इतिहास

जब भी लिखा जाएगा

शिखर पर लहराएंगी

हमेशा ही

पगडंडियां।

इतिहास

ढाई साल की मेरी बिटिया

मेरे लिखे हुए पर

कलम चला रही है

और गर्व से इठलाती

मुझे दिखा रही है

मैं अपने लिखे का बिगाड़ मानूं

या कि

नये समय का लेखा जोखा

बिटिया के लिखे को

मिटाने का मन नहीं है

और दोबारा लिखने को

अब न कागज है

न समय।

बातचीत 

मोड़ के इस पार
सिर्फ इधर का दृश्य ही दिखाई दे रहा है
उस पार
सिर्फ उसी दिशा की चीजें

ठीक मोड़ पर खड़े होने पर
दृश्य
दोनों तरफ के दिखाई दे रहे हैं
किन्तु सभी कुछ धुंधला

दृश्यों के हिसाब से
जीवन बहुत छोटा
दोनों तरफ की यात्राएं कर पाना कठिन

काश !
किसी मोड़ पर
दोनों तरफ के यात्री
मिल-बैठकर कुछ बातचीत करते।

इस बस में हिचकोले नहीं लगते

बस की जिस सीट पर मैं बैठा हुआ हूँ
गई होंगी
कितनी ही सवारियाँ इस सीट पर

बच्चे-
चंचल आँखों से बाहर कुलाँचते
नवोढ़ाएँ-
पति और प्रकृति के प्रेम में डूबी
रोज़गारी लोग-
जेबों की कोरें कुरेदते अनमने
बूढ़े-
खिड़की थोड़ा खोल साँस खगालते

सबके
अपने-अपने हिचकोले हैं
थिर है तो सीट

तो क्या इस बस को कभी कोई हिचकोला नहीं आता

नहीं आता तो
इतना ख़ुश क्यों है वह कबाड़ी
जो हर आती-जाती हुई बस को
अन्तत:
ठेले पर चढ़ा हुआ महसूस कर रहा है

शायद
इस सड़क पर कबाड़ी ही है
जिसके लिए
ज़िन्दगी का दूसरा नाम हिचकोला है
और
जिसके पास कोई सीट नहीं है।

बात-1

लोग कहते हैं – रात गई
बात गई

लेकिन
मैं गाता हूँ
जैसा कि पाता हूँ
हमेशा ही
रात ढह जाती है
बात रह जाती है

बात-2 

रात क्या हुई
जैसे कोई बात हो गई
गर्वित ईमानदारी से
दिन भर पसीना जीता
फिर न जाने क्यों
शाम को
मजूरी में मात हो गई।

पुलोवर

इस स्वेटर में
इतने सारे घर हैं कि
मुझे
यह एक पूरा देश
नज़र आता है

मैं इसे पहनता हूँ
और
ग़र्म महसूस करता हूँ

जाड़े के मौसम में
हर एक देश को
हर एक नागरिक के लिए
एक पुलोवर जैसा होना चाहिए

परिचय 

ये हज़ारों-हज़ार फूल
फूलों में बुराँस
उदासियों में ओज भरता हुआ…

ये हज़ारों-हज़ार फल
फलों में काफ़ल
रास्तों को चंगा करता हुआ…

ये हज़ारों-हज़ार हवाएँ
हवाओं में सबसे पवित्र और शीतल
घाम को मुँहतोड़ जवाब देती हुई…

इसीलिए यहाँ दिलों में भी एक झरना है
आक्षितिज प्यास बुझाता हुआ…

दर‍असल यह दुनिया की सबसे ऊँची ऊँचाई
यानी हिमालय
और मैं यहीं से बोल रहा हूँ…

कारोबार

ये फूलों-फूलों भरी-भरी थालियाँ
ये च्यूड़े-आशीषों से भरी-भरी थालियाँ
ये प्यार-पुचकार से भरी-भरी थालियाँ
ये थालियाँ बच्चों का संसार हैं
फूल हैं, फूलों का कारोबार हैं

किंतु जो उदास मन बैठा है रसोई में
क्या दे बच्चों को सोचता हुआ
उठने की लाचार कोशिश कर रहा है
ये कौन है ?

बच्चो !
जमकर खड़ा होना ही बड़ा होना होता है

फूल से सुगंध हो जाना होता है
चलो, देखो तो वहाँ कौन काँटा गड़ा है
उसे खड़ा करें
फूलदेई-छम्मोदेई[1] हासिल करें

जागर

औरतें जो भर-भर कर घास-पानी लाती हैं
हलवाहे जो ऊसर को भी हरा-भरा करते हैं
बच्चे जो सपनों के पंख होते रहते हैं
अक्सर यही लोग होते हैं
भूत-प्रेत, छल, बुरी नज़र के शिकार

कुलदेव की मनौती ख़त्म नहीं होती
ख़त्म हो जाती है
ज़िन्दगी की बघार…

मगर दाढ़ी में तिनके और नींद में स्वप्न की तरह
कुछ बिगड़ैल बच्चे
एक रोज़ / असलियत की भी ख़बर ले आते हैं

पुरोहित / पटवारी
परधान के ख़िलाफ़
धीरे-धीरे लामबंदी हो रही है

खेत

यहाँ सीढ़ीदार खेत हैं / लेकिन
खेतों में ऐसी कोई सीढ़ियाँ नहीं कि
भकार
सदैव ही भरा-पूरा रहे

हलवाहे भी क्या करें
सब जानते हैं कि गधेरे का पानी
बिना उपाय कैसे ऊपर चढ़े
दून से दिल्ली
एक और चढ़ाई है पहाड़ के लिए

पानी ही क्यों
फिर सभी कुछ तो सरसब्ज़ है

यात्राएँ 

अब हम यात्राएँ नहीं किया करते
अब हम दुनिया तय किया करते हैं
फिर चाहे अपने ही पड़ोस भर से
दुनिया जहान तक जहाँ भी कोई काम पड़ जाए

जी हाँ,
अब काम ही निकालता है हमें बाहर
वरना तो यों हम
घर में भी ख़ुद को कहाँ महफ़ूज़ पाते हैं

सच कहूँ तो
‘कब तक लौट कर आओगे’ या
‘टाइम से घर लौट आना’ सुनने में या
‘जाम-वाम के कारण ही सही
थोड़ देर लग सकती है’ कहने में
कितना तो घर वाले और
कितना तो मेरा ही दिल
न चाहते हुए भी
एकबारगी को धक्क हो जाता है

क्या पता रस्ते में कहाँ पर क्या हो जाए
चाकू चल जाए कि
आग लग जाए कि
यकायक कोई बम ही फूट बैठे और
देखते ही देखते
हम सैकड़ों-हज़ारों वहीं जमींदोज़ हो जाएँ

कुछ न भी हो तो भी
कोई आपकी सुन्दरता पर मुग्ध भाव यकायक मुस्करा उठे
या कोई अपने ही किसी तनाव
अपनी ही कोई हारी-बीमारी की उलझन में
आपसे हल्का-सा सहारे की माँग कर उठे
आपकी रीढ़ थरथरा उठती है और
एक घटाटोप में
आप अपने ही भीतर
किसी चीथड़े-सा जाने कितनी दूर छिटक चुके होते हैं
उस आदमी से भी कहीं अधिक
तीखे दर्द से कराहते हुए
या कुछ नहीं भी तो
रीढ़ सूँघ गई उस मुस्कान के अर्थ बिसूरते हुए

वैसे भी यदि दरअसल
दूरियाँ किसी तरह तय हो भी जाएँ
यात्राएँ ठीक-ठीक तय कर पाना सचमुच बड़ा मुश्किल
एकदम तलवार की धार पार करना है

अब आप ही सोचिए
यदि आप में क़ायदे का ज़रा भी वज़न है
तो ऐसी आड़ी खड़ी तीखी तलवार पार करना
वह भी बिना किसी चोट-चुभने के
अजी कैसी बात करते हो
हँसी-मज़ाक हर जगह नहीं चलती
वैसे भी ‘आ बैल, मुझे मार’
किसी मूख ने भी ऐसा कभी शायद ही कहा हो

हाँ, यह और बात है कि
लूट-हत्या-बलात्कार कोई भी ज़ख़्म
हमें नियति या नसीब ही लग जाए

तो ख़ुद पर
एक करुणार्द्र अफ़सोस के सिवाय और हो भी क्या सकता है
कि अब ज़िन्दगी बचाने को
जिन्दगी लगाने के सिवाय कुछ नहीं है।

जितने ही उत्साह और उम्मीद के साथ

जितने ही उत्साह और उम्मीद के साथ मेरा दिन गुज़रता है
शाम अक्सर उतनी ही उदास और स्याह हो आती है
खाना ख़राब हो आता है कि
रात कुछ और अधिक भारी हो आती है
तो क्या
इसके लिए मैं ख़ुद ज़िम्मेदार हूँ
या कि घर वाले
जो बिना मेरे
अपने हिस्से का कौर तक ग्रहण नहीं करते
जो मेरे मुद्दों से सहमत होते हुए भी
मेरी भलाई को मुझसे झगड़ते ही रहते हैं

झगड़ते ही रहते हैं कि
रोज़ाना ही देर रात तक मेरा असह्य इन्तज़ार करते हुए या
इसी गाँव-कस्बा-शहर में मीटिंग दर मीटिंग से लेकर
जुलूस-धरना-प्रदर्शन की दौड़ भाग करते हुए
जब तीन-तीन चार-चार दिनों तक भी
मैं घर नहीं आ पाता हूँ तो
उनके लिए दिन
किस तरह घटाटोप में डूबे हुए होते हैं कि
उनकी खुली आंखों को कैसे-कैसे दुःस्पप्न घेरे रहते हैं कि
रात किस तरह उन्हें थर-थर कँपाती है

मैं जब उन्हें कुछ समझाने लगता हूँ तो
पहले तो वे पूरी बात सुन भी लिया करते थे
दुनिया-समाज को लेकर मेरे साथ मगजमारी भी करते थे किंतु
अब तो जैसे वे चिढ़ ही जाते हैं

इतना चिढ़ जाते हैं कि
मैं घर का न होता तो
बाहर के बहुतेरों की तरह
वे भी मुझसे कोई बात नहीं करते
बल्कि मुझे सनकी भटका हुआ आत्मघाती कहकर
खुद अपने लिए भी सबसे ज़्यादा ख़तरनाक ठहरा देते
कि वे पर्चे-वे अख़बार-वे पत्रिकाएँ
जिन्हें हम कैसे-कैसे तैयार किया करते हैं
कि एक-एक समझा बुझाकर पढ़ने को कहते हैं
बहुतेरी की तरह
वे भी अब इनसे विमुख हो आए हैं

इतना ही नहीं
वे दुनियादार लोग
जो हमारी किताबों
हमारी मीटिंगों
हमारे नुक्कड़ नाटकों
हमारे जलूस-धरान-प्रदर्शन में शिरकत तो दूर
हमारे ज़िक्र से तक मुँह चुराते खिसक लेते हैं
वे अब घरवालों को ज़्यादा समझदार लगने लगे हैं और
मुझे भी उन जैसा ही बना देने को व्यग्र
इन्होंने अपना एड़ी-चोटी एक किया हुआ है

यों मैं कोई निराला प्राणी नहीं हूँ
न मेरी सोच में ही कोई ऐसी नई बात है
आँखें सकून भरी नींद से जागें
सुबह के उजाले में
ज़रूरत का खान-पान
रहन-सहन
ज़मीन-आसमान
ख़ुशी-ख़ुशी सबको बराबर मिले
ऐसा भला
कौन भला आदमी
कौन भला घर नहीं चाहेगा?

बस, इतनी सी बात
कि जिस पर बात करना इतना संगीन अपराध बना हुआ है
कि अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारना भी कहाँ
अपनी गर्दन ही नश्तर के तख़्त पर रख देना है

क्या हमें अपने
अपने बच्चों
अपने आने वाली तमाम नस्लों की ख़ातिर
इस बात का ख़ुलासा नहीं करना चाहिए
यदि ना
तो क्या यह आत्महत्या नहीं है
यदि हाँ
तो फिर ऐसी चिन्ता का आख़िर क्या सबब कि
कौन तुम्हारी बात सुनने वाला है
कि दो-चार लोगों से भी दुनिया कहीं बदली
जबकि घर वाले ही नहीं
बाहर वाले भी सभी जानते हैं कि
दो और दो का जोड़ हमेशा चार नहीं होता है।

किसी एक वक़्त के लिए

किसी एक वक़्त के लिए
यहाँ कोई एक विश्वास प्रमाणिक नहीं है
इसलिए नहीं कि
एक ही चाल
एक ही चरित्र के भीतर
यहाँ कई सारे चेहरे एक साथ रहा करते हैं
जो अपने-अपने वक़्त-ज़रूरत के मुताबिक
व्यावहारिक हो लेते हैं
बल्कि वहाँ जहाँ कोई रँग नहीं है
यहाँ तो चीज़ें पारदर्शी मिलें
पानीदार

चपलता
जिसे चतुर सुजान का प्रबल पर्याय कहा गया है
यहाँ अपने न्यूनतम आवेग में है
पता नहीं गहराई ही है या कि
भीतर सभी कुछ उथला है
सपाट किन्तु कैसे बताएँ कि
बीच की जो रँगीली पर्दानशीनी है
ताज्जुब होता है कि
कब उतरी केंचुल
कब विश्वास का नवीनीकरण हो लिया

तब भी
कुछ तो होते ही हैं
बता ही देते हैं कि
कम से कम
अपने बिल में तो साँप सीधा ही गया है
हाँ, प्रायः ऐसा भी होता है कि
वह अपने अण्डे तक ख़ुद ही खा जाता है

अब
सुदूर यात्रा पर निकला कोई बौद्ध
करुणा का चाहे जितना सन्देश दे
आँखों में पानी आने के लिए
पहले दिल का भर आना ज़रूरी है
और कोई भी दिल केवल तभी भर सकता है
जबकि कम से कम
उसके अपने लिए तो वह पानीदार हो कि
अन्ततः उसका विश्वास तो प्रामाणिक हो।

जाने किस कंकड़-रोड़े पर पाँव 

जाने किस कँकड़-रोड़े पर पाँव
ऐसा गचका खा गया
नई-नई चप्पल का फीता टूट गया है
जबकि
घर को मैं बहुत पीछे छोड़ आया हूँ
और बाज़ार अभी खासा दूर है

वापसी
अब बेमतलब की ही नहीं
ठीक भी नहीं है
क्योंक घर की अनिवार्य ज़रूरतों का सामान
लेने जो निकला हूँ
यानी
मुझे बस आगे और आगे ही बढ़ते चले जाना है

टूटी चप्पल से
अब और अधिक आगे चल पाना मुश्किल
इसलिए इसे मैंने पैर से उतार हाथ में ले लिया है

अद्भुत दृश्य है
काँधे पर झोला है किन्तु
ज़मीन पर एक पाँव चप्पल
एक नँगा ही है

यही नहीं
जब तक दोनों पाँवों में चप्पल थी
रास्ते की ओर तो जैसे मेरा ध्यान ही नहीं था
किन्तु अब
जबकि एक पाँव तले काँटे-कँकड़-पत्थर चुभ रहे हैं
ध्यान बराबर
कभी निजी घर
कभी समूचे देश की ओर चला जा रहा है

दोनों चेहरों के बीच
फँसा हुआ मेरा चेहरा
जिसे अभी कठिन बाज़ार भी करना है
लाख चाह कर भी
दोनों में से
किसी की भी तरह का नहीं हो पा रहा है
कि
निपट दोस्तों की मुझे रह-रह याद आ रही है

हालाँकि क्या कहूँ
दोस्त भी तो आख़िर अपने ही जैसे गोत्र के होते हैं
इधर मेरी चप्पल का फीता टूट गया है
उधर उनकी भी ज़िन्दगी में
कुछ न कुछ ज़रूर ही टूट गया होगा / टूट रहा होगा
यों ही न हम दोस्त
कभी-कभी न चाहते हुए भी कह ही उठते हैं —
काश! हम लोगों ने शादी नहीं की होती!

मगर प्रेम!
इस पर तो हम साले ऐसा मदमा उठते हैं
जैसे कि
हमारा तो जन्म ही बस इसी के लिए हुआ
फिर धीरे-धीरे जाने क्या हो जाता है
एक उदासी हमें घेर लेती है कि
अपने से ज़्यादा खीझ
भला, और किस पर आए

किन्तु
बिछड़ते-बिछड़ते भी
एक बात तो हममें होती ही होती है
बशर्ते कि
हमारी कुछ कमज़ोरियों को लेकर हमारी पत्नियाँ
हमारे कानों को
किसी बर्र के डंक-सी लाल न करें तो
हमारी आहों में
बरसों पुरानी उन आँखों का वह भीना शहद

आज भी
जब-तब
रह-रह कर ऐसे-ऐसे गमक उठता है कि
कोई भी बाज़ार हो
कोई भी सरकार
निपट लेने का हौसला
फिर से एक नई क़सम बन ही जाता है।

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