शोभनाथ शुक्ल की रचनाएँ

अनारकली, जॉब कार्ड और सूरजकली

कई-कई दिन
लौटी है अनारकली…………
जॉब कार्ड
दिखाकर
काम की तलाश में भटकी है
आज-कल के चक्कर में
अधिकारियों की बातों में
हफ्तों से अटकी है अनारकली..
खाली हाथ/घर लौटती
सोच में डूबी अनारकली
भाग्य को कोसती है
अपनी माँ पर खीझती है
आख़िरकार क्यों नहीं रखा
उसका नाम करमजली……….
सोचती जाती है
चलते-चलते आँखों में
आ जाती है बेटी सूरजकली……
फुदकती आ रही होगी
स्कूल से
हजार नखड़े उठाने
पड़ते हैं उसके
कभी ये, कभी वो
चाहिए तो चाहिए ही
पर पढ़ाई से कभी
मुँह नहीं मोड़ती है
सूरजकली………..
इसी पर तो जी रही है
अपने सपने को पलता
देख रही है अनारकली…….

चौथी क्लास में
पढ़ती सूरजकली
स्कूल से घर आती है
खाना खाने के पहले हाथ धोने के लिए जब साबुन माँगती है
सुनते ही क्या हो जाता है
माँ को
कि उसका थप्पड़
कुछ इस तरह पड़ता है
झनझना उठता है
उसका पोर-पोर
और गाल टमाटर-सा
लाल हो जाता है………
उँगुलियाँ माँ की
चिपक जाती हैं
उसके चेहरे पर
यह देख
अपने किये पर
खीझती है अनारकली……………
अपना बाल दोनों हाथों
नोचती है
एक छोटी सी माँग
बेटी की कहाँ
पूरा कर पाती है, अनारकली.

सन्न….एक दम सन्न
खड़ी रहती है सूरजकली
समझना चाहती है
अपने कसूर को
वह तो जानती/सुनती है
इस बात को रोज-रोज
खाने से पहले
हर बच्चा साबुन से हाथ धोता…….,
फिर माँ
आखिर क्यों………?
इत्ती छोटी बात
नहीं समझती है…..

माँ
कैसे बताये उसे
बेटी के सर से
जब से उठा है
पिता का साया
तब से कितने ज़ुल्म
सहे हैं उसने
अपनों व गैरों के
कई-कई बार मथ डाला है
उसके शरीर को
कभी जेठ ने
तो कभी ससुर ने…….
फिर भी इस जु़ल्म को
डर-डर कर सहती रही
घर से बेदख़ल होने से
हमेशा बचती रही……।
जब बगावत कर निकली घर से
ज़ाँब कार्ड के सहारे
अपने पैरां पर खड़े होने की
आस लिए……..।
क्या पता था
सरकारी जाल में फँसना
कितना भारी पड़ता है
हफ्तों-हफ्तों बाद
कहीं एक दिन काम मिलता है……..।।
शायद इसी तरह हर गरीब का
सपना मरता है।

सोचते-सोचते
अचानक वह बेहोश सी
ज़मीन पर गिरती है
आँखें
खुलती हैं तो
देखती है
अपने हाथों से
माँ के आँसू
पोंछ रही होती है सूरजकली……..।
माँ की हालत देख
अपराध-बोध की
पीड़ा लिये
गिड़गिड़ाती है
“माँ मुझे
खाने से पहले
हाथ नहीं धोना है साबुन से
मैं
खाने से पहले
हाथ धो लूँगी
रगड़-रगड़ कर माटी से
पानी से………।।
पर मुझे स्कूल जाना है
स्कूल जाना है….
स्कूल जाना है….
स्कूल जाss नाss हय….
कहते-कहते
सिसकियाँ भरने लगती
है सूरजकली……..।।

स्कूल, बच्चे और मीनू

स्कूल की
दीवाल पर चस्पा है।
हफ्ते भर का मीनू
ग्राम प्रधान से
स्कूल प्रधान तक
सभी को पता है
क्या-क्या बनना चाहिए
किस-किस दिन……….।
बच्चे भी रोज इसी
इंतजार में रहते हैं
सुबह-सुबह आकर
पढ़ते हैं/आज
मीनू में क्या-क्या है
बच्चे भी चखना चाहते हैं
हफ्ते भर के मीनू का
स्वाद अलग-अलग……………।

दोपहर को
स्कूल प्रधान की डपट में
गायब हो जाती है
चेतना बच्चों की……………..
और थाली-कटोरी लेकर
बैठ जाते हैं
गरीब परिवारों के अधनंगे/भूखे बच्चे
बिना टाट-पट्टी के
फिर आ गिरता है
खिचड़ी का लोंदा
सामने थाली में
और हल्दी की महक में
खो जाता है
गडमड्ड हो जाता है
पूरा का पूरा मीनू…………।
पीले चावल में
कंकड कम, कीड़े ज्यादा हैं
बच्चे चुप हैं
पर आँखों में
तैर रहा है पानी……………
और होठों में दबा है
प्रतिरोध का स्वर……………
बच्चो की सुगबुगाहट पा
प्रधान डपट लेता है
और/बच्चे चुपचाप
निगल जाते हैं चावल
जो न कच्चा होता है, न पक्का
गटक लेते हैं उसे
पानी के साथ………….
और पी जाते हैं मन की खीझ
और आँखो का पानी
एक साथ…………..।
समने खड़ा प्रधान
उन्हें कसाई लगता है
उसके साथ
चपर-चपर बतियाता
स्कूल प्रधान
बकरे की गर्दन पर
गिरता बुगदा दिखता है
लाभ-हानि की बतकही में
कसाई और बुगदा का रिश्ता
और/मजबूत होता जाता है
कटते तो बच्चे ही हैं
बकरों की तरह………..।
स्कूलों का मिड डे मील
अब बच्चों के लिए
गले की हड्डी बन गया है
बच्चे इस हड्डी को
फेंकना चाहते हैं
कुत्तों की ओर………देखना चाहते हैं
उनकी कुत्तई
और/आपसी लड़ाई का जोर………..।।

रामफल, सरकार और पट्टा

रामफल……….
सरकार के पीछे भाग रहा है
गले में सरकारी पट्टा लटकाये
सरकारें कहाँ मुड़ती हैं
पीछे/उसे देखने के लिए………..।

आज तक बेदख़ल है/अपनी ज़मीन से
जो उसकी होकर भी/उसकी नहीं है…….।
पट्टा तो सरकारी
मिला है, पाँच बीघे का
काबिज़ होने की
जद्दोजेहद जारी है अब तक
दस साल से ऊपर
का समय निकल चुका है
पानी सर के ऊपर/बह चुका है
इसी बीच सरकारें आईं
और गईं
पर उसकी फाइल/और कब्जे की अप्लीकेशन
नहीं चली तो नहीं चली……….।
सरकारें कहाँ क्या
करतीं है……..।

वह विबस है/परबश है
ठकुराने/वभनाने पुरवा
से त्रस्त है……….।
इनमें से ही कुछ की
दबगई ही है/कि
कब्जे से वह वेदख़ल है……।
ठाकुर पुरवा से मदद
माँगने जब जाता है
हर-घर में गुहार लगाता है
अपनी फरियाद लिये
तो वाभन पुरवा नाराज़गी दिखाता है……।
पिस रहा है/इन्हीं के बीच
तब धूम-फिर बात अड़ती है
आ विरादरी की
पंचायत बीच/कहाँ क्या तय हो पाता है
कई-कई बार
तो बैठी है पंचायत
पर अपनों के बीच में
वह हर बार खुद को
दुबिधाग्रस्त पाता है………..।

क्योंकि…………..
भटक जाती है पंचायत
खुद व खुद जेनुइन मुद्दों से
सरक जाते हैं मुद्दे
दूसरे की ओर धीरे-धीरे
बहस में आ जाती हैं/औरतें
सरकने लगती है जुबान
बड़े, बूढ़े-बूढ़ों की
‘लच्छमनियाँ‘ के लच्छन
अच्छे दिखते नहीं है इधर……..।
उधर ‘राम पियारी‘ की खाट
खड़ी करने पर/तुल जाती है पंचायत
भगा कर लाया है/राम लवटन का बेटा……..।
उसे………जाने कहाँ से
कुजात को घर में/रखा है।
विरादरी का सत्यानाश
कर रहा है नालायक
बिना भात दिये/हुक्का पानी पिलाये…….
इतनी बड़ी हिम्मत
हमारी छाती पर/मूँग दल रहा है।
सरपंच बाबू
की मूँछे अचानक/ताव खा जाती हैं
चेहरा अंगारे सा/चमक उठता है
लच्छमनियाँ के बगल
बैठने को मन करता है-।
कोई न कोई/बहाना चाहते है सरपंच बाबू
दूर से घेरना
शुरू करती है पंचायत
राम लवटन को………..।
‘गाँव की इज्जत पर पानी/
न डालो भाई……..।
ऐसी छम्मक-छल्लो बहू
तेरे नालायक बेटे के
पास/कहाँ से आई……….। ‘

बहक गई है पंचायत………..।
रामफल…….।
सरपंच बाबू को
फिर से खींचता चाहता है
अपनी जमीन की तरफ
कैसे और कब
कब्जा पायेगा वह……..।
वह जानता है
सरपंच बाबू विरादरी के होते हुए भी
बैठकी देते हैं/हर साँझ
ठाकुर पुरवा में तो कभी वाभन पुरवा में।
चौपालों में/चल जाती हैं दारू
बोतलें खुल जाती हैं और फिर
चर्चा में लच्छमनियाँ के साथ
और भी कई युवतियाँ
शामिल हो जाती हैं……।

उसकी जवानी
और बेफिक्र हँसी…
एक साथ/तेजाब भर देती है
गलफड़ों में/और सरपंच बाबू
की मूँछों की नोंक
अचानक……..
उनकी उँगुलियों में चुभ जाती है।

और………
रामफल
इनके-उनके…………..सबके पास
दौड़-दौड़ कर
हाँफ- हाँफ कर
चकनाचूर हो जाता है
एक क्षण के लिए
कौंध जाती है आत्महत्या
की बात……..फिर अचानक
सँभल जाता है……….।

रामफल……..
न्याय के लिए लड़ना चाहता है
हक के लिए
लड़ते-लड़ते
वह मर जाना चाहता है
मुक्ति की कामना लिए
अन्याय के खि़लाफ
जड़ होते समाज में
उसकी जड़ता के खिलाफ……।
दो कदम/आगे बढ़ता है
फिर मुड़ कर पीछे देखता है
तो गाँव के कुछ युवकों का हाथ
एक ताकत की तरह/अपनी ओर
उठा हुआ पता है…..।
रामफल
न्याय की उम्मीद लिए
न्यायालय की ओर
आगे बढ़ जाता है………।।।

मोहल्ले की औरतें

मोहल्ले की औरतें
गली के अगले मोड़ पर
एक भीड़ बन कर
खड़ी हैं………..
हमारे मोहल्ले की औरतें……….।

मिलती हैं जब भी
भूलती नहीं हैं/जताना ‘अपनापन‘
बात-बात में खबर देती हैं
उसी अनुपात में/खबर लेती भी हैं
ताने भी मारती हैं,
तो ‘मिसरी‘ की मिठास सी,
हर दंद में, हर फंद में
एक रंग हैं, ये ऽऽ……
मोहल्ले की औरतें….।।
प्रतियोगी भाव लिये
अन्दर से टीसती हैं
पर सहज बनीं/ऐसी मुस्कराती हैं
सूप तो सूप है
चलनी को भी छलनी कर जाती हैं
खाते-पीते घरों की/हट्टी-कट्टी औरतें
पल्लू सरका कर/बाहें दिखाती हैं
हर गली-हर मोड़ पर
नुमाइश बन जाती हैं ।
ऊँचे- ऊँचे ओहदों वाले मर्दो
की झूठी शान बन
यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ
तितलियों सी इतराती हैं, ये ऽ……..
मुहल्ले की औरतें……..।।

अखबारों से/कम ही रिश्ता इनका होता
टीवी पर हर शो……….सीरियल
कहाँ छूटता
समाचार से डर लगता है -।
उसमें कहाँ/कौन-सा रस मिलता है
‘गोधरा काण्ड‘ की सच्चाई
का कहाँ पता है
‘नंदी ग्राम‘ में किसका बेटा…….
किसका पति हैं कत्ल हुआ
‘देव प्रयाग‘ में कहाँ गिरी
पर्वत-खाईं में
बस में कितने मरें
कौन जनावें…….क्यों जानेंगी
‘निठारी काण्ड‘ पर क्षण भर ही
हतप्रभ होती हैं…..।
पढ़ी-लिखी हैं
खूब-खूब अच्छी हैं
बस-थोड़ी सी ‘गड़बड़‘ है
अपने तक ही ‘सोच‘ लिए
संघर्षों से डरती हैं
पर फिर भी अच्छी ही हैं, ऽऽऽ….
ये मोहल्ले की औरतें……।।

सासू माँओं पर………
खर्चे की, पाई-पाई/जोड़ लगातीं
अपने बच्चों की खातिर
झूठ बोलतीं-ताना सुनतीं
कोल्ड ड्रिंक से फास्ट फूड तक
इनकी इच्छा पूरी करतीं
औरों के बच्चों/की ब्रिलियंसी पर
अक्सर चिढ़-चिढ़ जातीं
अन्दर-अन्दर रोती रहतीं
ये गठियाँ, वो गर्दन
भारी कूल्हों का दर्द झेलतीं
कथा सुनतीं-पूजा करतीं
कलश उठातीं
गहने खरीदती/महँगे सोफा-बेड़ बनवातीं
बाल कटातीं/मेकप करतीं
भिखमंगों को दुरियाती……..।
घर-घर की बातें करतीं
महगाँई का रोना रोतीं/फिर भी
मस्त-मस्त रहती हैं, ये ऽऽ……..
मोहल्ले की औरतें…..।।
इन्हें ‘इनके‘ नामों से
जानने की जरूरत नहीं होती
ये हर वक्त फलां की मम्मी,
फलां की वीवी, फलां की आन्टी……
बन कर रहतीं
स्वेटर बुनती……
सीरियल देखतीं……
अध्दी-कट्टी इनको भाती
फैशन के हर नाजुक कपड़े
कड़ी ठन्ड में उसे पहनतीं
बहू-बेटियों औ‘ बेटों की
हर अन्दरूनी बात छुपातीं
गिरती-पड़ती/चलती चलतीं
कब्ज बात की शिकार होती
हरदम पस्त पस्त रहती
महरिन से दुगुना काम करातीं
किसी तरह काम निपटाती, ये ऽ ऽ….
मोहल्ले की औरतें……।

कोई बबुआइना, कोई सहिबाइन
कोई ‘ये‘ जी, कोई ‘वो‘ जी
आदर सूचक शब्द लगा कर
बड़े प्यार से बतियाती हैं
पर चर्चा में शामिल होते /औरों के बच्चे-बच्ची ही
‘अपना तो
‘अच्छा ही है/अच्छा ही होगा‘
कर्ज में डूबीं
उन्हें डाक्टर-इंजीनियर बनातीं
ढ़ंीग हाँकतीं/ढ़ोल पीटती
झूठ बोलतीं
गम में डूबी……….हँसती जातीं
पिसती रहतीं
अपनों की खातिर/हर दम-हर पल
फिर भी………….
ज़िन्दा दिल लगती हैं
बहुत-बहुत अच्छी लगती हैं,
ये sss…..मोहल्ले की औरतें…..

प्यार बचाना इस धरती से

प्रिये
आज तुम्हारे लिए
हमारे शब्द मतंग से
मतवाले हो
जाने कहना क्या चाह रहे हैं..
’……शब्दों को पाकर
तुम मेरे दिल को
पा जाओ………..
अर्थ खोलने से पहले ही
मेरे ज़ज्बात
समझ जाओ…….
आज तुम्हारे लिए
हमारे शब्द
बहुत व्याकुल
मुझको तुम तक
पहूँचाने को
शायद ऐसा चाह रहे हैं………..।

अपनत्व कहाँ
खामोशी में है
फिर क्यों ऐसे
रूठ रहे हो…………….।
सुबह हुई फिर
फिर शाम आ गई
क्यों समय छीजता
देख रहे हो…….
तुम/कल कहाँ रहेगा आने का
गया साल
नव वर्ष आ गया
हर करवट पर
याद आ गया
साँसांे में है देह गमकती
बीते दिन
पल प्रति पल
व्याकुल हैं
तुम तक जाने को……
शब्द हमारे मचल रहे हैं…
यही बात पहुँचाने को……………..।

नववर्ष
तुम्हारे लिए बने पर्याय हर्ष का
आशाओं की ज्योति जगे
पथ प्रशस्त हो उन्नति का
हर प्रकाश की किरण
झुके तेरे पग पर
इससे बढ़ कर क्या
सुखद और मेरे मन का
शब्द
हमारे कहना इतना ही
शायद चाह रहे हैं………….।
प्रिये
आज तुम्हारे लिए
हमारे शब्द मतंग से
मतवाले हो
भरी हुई हो।
यादों में तुम रमी हुई हो
महक उठी अमराई जैसी
तेरी साँसें
खुल गया गेसुओं का गुच्छा/जब
भर गया बसन्त की खूशबू से
सारा दिगन्त
तब कूक उठा मेरा मन
रह-रह कर कोयल जैसा
चल पड़ी हवा, चढ़ गया रंग
हो गया गाल गुलाल गुलाबी
बहका मन, चल पड़े कदम
तेरे दर पर/शायद
दस्तक देना चाह रहे हैं
अब की होली में
शायद/तेरी
चोली रंगना चाह रहे हैं ।
शब्द हमारे
तेरे दिल की कमल पंखुडी में
भाैंरे सा बसना चाह रहे हैं………..।
रति,क्रीड़ा में लिप्त हो गई
कामदेव की बाहों में
पतझड़ में गिरते पत्तों सा
मन में संशय बना रहा
नंगी डालों सा मेरा तन
रह-रह कर झूला झूल रहा
झोंके पछुँआ के
हाय राम। चुभते काँटों से
फिर से तुझको पाने को
बुन कर फिर से संजो रहा
कुछ-कुछ बीती बातों को……..
देख-देख कर मन ललचाया
यादें भरती आहों में
शब्द/हमारे इसी भाव को
तुझ तक पहुँचाना चाह रहे हैं…………
शब्द हमारे बार-बार ऐसे ही छूना
चाह रहे हैं……………..।।
शब्द
हमारे शायद तुमको
याद दिलाना चाह रहे हैं……….।
टपक रही तरूओं से बूँदें
जब वर्षा में झीसी पड़ती
घन घिरी घटाएं मोर नाचते
जब कलियाँ आपस में लड़ती
गूँ गुटर गूँ दौड़ कबूतर
पंख फड़फड़ा कर कबूतरी के
करता आगे -पीछे
देख मानुष को आँख लड़ाता
फिर करता आँखें नीचे
घूम-घूम कर
घूम-घूम कर
इक दूजे को /शायद ये
प्यार जताना चाह रहे हैं………
प्यार बचाना इस धरती से
शब्द
हमारे चाह रहे हैं…………..।
प्रिये
आज तुम्हारे लिए
हमारे शब्द मतंग से
मतवाले हो
जाने कहना क्या चाह रहे हैं।

कागा

का रे कागा
कहाँ रहा तू इतने दिन तक
बैठ रहा मैं इंतजार में तेरे अब तक। कहाँ गया तू
कौन नगरिया
क्या लाया तू
कौन खबरिया………..।
‘………रे भाई मैं
ठहरा पंक्षी
रमता जोगी
बहता पानी
यहाँ उड़ा, उस डाल पर बैठा
मैं अनशन हड़ताल पर बैठा
घूर पर बैठा, गाल पर बैठा
मैं मस्जिद की छत पर बैठा
राम जानकी रथ पर बैठा
इस तरह टहल-टुहुल कर
दुनिया देखी…………….
हर नेता की हर मानुष की
नजरें परखी…..।’

ओ रे कागा
और सुना कुछ और बता कुछ
किस मुड़ेर पर ,
किसको-किसको पहुँचाया
मेहमानों की सूची
चोंच मार कर
कितनी चीजें जूठी की
तूने अब तक…….।
क्या-क्या देखा,
क्या-क्या परखा,
कहाँ गया तू
कौन नगरिया
क्या लाया तू
कौन खबरिया……………।।
‘…..दिल्ली वाला ठलुआ देखा
हम देखंेगे-देख रहे हैं
चाभी वाला-बबुआ देखा
तेरह मनई गार रहे थे
संविधान का नेबुआ देखा
घपला देखा, घलुआ देखा
दंगा और कमीशन देख ।
संपादक की मेज पर मैंने
तरह-तरह का हलुआ देखा
लाल किले से फर-फर उड़ती
कविता देखी
गिट-पिट, गिट-पिट
खिट-पिट, खिट-पिट
अऊर फिल्म हिट/
इसी तरह हर काम हुआ फिट
टाई और सूट की कविता
आपै बोलौ कौन सुनोगे……….?
ना रे कागा,
कविता-वबिता बाद में पहले
खबर सुना तू, और क्या देखा……..?
किसकी पाती/कहाँ ले गया
कहाँ दिया/किसका मन तोड़ा
नन्हंे बच्चे की दूध कटोरी
चम्मच किसके घर छोड़ा।
रे कागा तू
नहीं छोड़ पाया अब तक
क्यों ढ़ीठ और चतुराई……….।
कंकड़ डाल बढ़ाया पानी
खुद की प्यास बुझाई।
मेहनत करती रही गिलहरी
तू खाता चुपड़ी रोटी
हिस्सा छोड़ा नहीं कभी
तेरा घर होता नहीं कभी
बरसा पानी जब
धरी रह गई तेरी चतुराई
और बता/आगे क्या होगा
भूत, भविष्य की बता
वर्तमान में क्या-क्या देखा
ओ रे कागा…
खबर सुना तू क्या-क्या देखा
कुछ भी कह लो
रे मेरे भाई
गया जमाना,बात गई
काम और स्वभाव हमारा
मेरे वश में अब भी है
तभी तेरे/पितरों को तारा
फिर भी आगे
सुन रे भैया………..
’………….इटली वाला चद्दर देखा
करघे पर बलभद्दर देखा
सिंगापुरी तौलिया देखी
प्रगति विश्व मेला में मैने
गाँधी जी का चरखा देखा
किसी विदेशी सूट पर मैंने
पहली बार अगरखा देखा
दर दर ठोकर खाती मैंने
अस्सी की शहवानों देखी
धँू-धूँ करती कँवर को देखा
धरम-करम का चँवर भी देखा
सिक्ख भी देखा,
तमिल भी देखा/मुस्लिम देखा और ईसाई
हिन्दू रोवै भाई-भाई
जो बोले सो पाकिस्तानी
जो न बोले खालिस्तानी/
बाकी सब हैं हिन्दुस्तानी
मीठा-2 गप्प
कड़ुवा-कड़ुवा थू
कभी तोे दुर-दुर
कभी तो आ तू।‘
का रे कागा
काहे को तू चुप गया
कौन बात तूू छुपा गया
सुन रे कागा
‘सुना बहुत माहौल गरम है
लगता है चुनाव निकट है’
‘……..हाँ भैया माहौल गरम है
राजनीति की तौल गरम है
शहर-शहर में रैली देखी
एक अजीब उदासी मैंने
बंजर अरमानों की चादर मैली
हरदम होती मैंने देखी ।
सूखा देखा, रूखा देखा
लाचारी की फसल उगा के
काट रहे राहत की चाँदी
मौत-महोत्सव, सूखा-उत्सव
अल्लम देखा, गल्लम देखा
लोकतंत्र का बल्लम देखा
टी.वी. का अगवाड़ा देखा
संसद का पिछवाड़ा देखा
पूँछ उठाया जिस किसी का
हर कोई को मादा देखा
मीलों लम्बी पगडंडी सी
मंत्री जी का नाड़ा देखा………।
जूता-चप्पल चलते देखा
वोट की कालीनों पर लड़ते
फ्री स्टाइल कुश्ती देखा
इसे उखाड़ा उसे पछाड़ा
हर ने अपना
झण्डा गाड़ा
संविधान में संशोधन पर
अपनी-अपनी राय पोंकते
नये अधिनियम, नये विधेयक
पर हर किसी को ताल ठांेकते
मैंने सबको बहुत निकट से
अपना काम साधते देखा
मैंने अपने जैसा ही
इन सबकी चतुराई देखा…….।‘
वाह! रे कागा
तू तो अब विद्वान देहातों से लेकर
लेकिन कागा
अरे अभागा
वा तो मैं, सब जान रहा हूँ
पढ़ी-पढ़ाई, सुनी-सुनाई।
कुछ राजा की
कुछ परजा की
पद यात्रा की रपट है आई।
मेरे भाई
आखिर तूने क्या टकटोरा?
अच्छा ये बतला
तूने क्या लोगों की आँखों में झाँका
बोल कहाँ
तूने क्या देखा?
जलती हुई झोपड़ियां देखी
टूट रही हथकड़ियां देखी
नदियां देखी
सूरज देखा
चिटकी धरती
धीरज देखा?
फूट रहा
कोई कल्ला देखा
उबल रहा
कोई सपना देखा ,
राजनीति की वेश्यागिरी में
फँसे हुए की हालत देखी
दिन-दूनी रात-चौगुनी
मरते जन की
हालत देखी…?
तू भी ससुरा
विद्वान हो गया……….
संदेशा कब लायेगा तू
इंतजार की जान हो गया……….।
ले, कुछ खा ले
फिर जा कागा
अबकी आना, हमें सुनाना
नई खबरिया,
हमें दिखाना नईं डगरिया
फिर तू आना
तुझे मिलेगा दूध-भात
खा-खा के फिर उड़ जाना
फिर-फिर आना
हमें सुनाना, नई खबरिया……………
जा रे कागा…. ’
‘……अब कहाँ को जाऊँ
दिल टूटा मन मार के बैठा
इस डाल उड़ा उस डाल पे बैठा
जहाँ तक पहुँची
नजर हमारी
क्या बतलाऊँ क्या-क्या देखा
जिस गोबर के दाने खाकर
काँव-काँव करता हूँ भाई
उसी जगह पर/उसी तरह
भूखे नंगों को मैंने/दाना बीन-बीन कर
खाते देखा …………..।
और कहूँ क्या
क्या हाल बताऊँ
कूड़े बीन रहे बच्चों के
धार-धार रोते देखा….
फिर भी प्यासा
रहा मैं कागा
मन की पीड़ा
बँध कर देखा….

का रे कागा
कहाँ रहा तू इतने दिन तक
बैठ रहा मैं इन्तजार में
तेरे अब तक…….
का रे कागा……..।

माँ

(एक)

दिन, महीने, साल
गुजर गये/पर
अभी भी/कहाँ लगता है
माँ का हमारे
बीच से चले जाना
सच नहीं लगता है
अभी भी
अचानक ही हुआ था
यह सब
नित्य की तरह/आज भी
उठना, नहाना, धोना
और चाय पीना
सब कुछ चला था
नित्य की तरह/आज भी
वे कहाँ तैयार थीं
जाने के लिए खुदभी………।
क्षण भर भी नहीं लगा होगा
लुढ़क गई
बैठे-बैठे
बिना सहारा लिए
किसी का………..
जीते जी भी नहीं
चाहा/सहारा लेना कभी भी
किसी का……….।
प्राणपखेरू का उड़ना
कहीं किसी ने
देखा है भला………..?
घर में घुसते ही
एक छाया सी चलती
नजर आती है/हमें
ममत्व की बयार बहाती हुई
माँ
अभी भी/घर के इस छोर से
उस छोर तक
सब कुछ जाँचती-परखती
डोलती सी महसूस
होती है/हमें………………।
किसी एक के
चले जाने से
कहाँ क्या रूका है ?
सब कुछ/चलता रहता है
वैसे का वैसे ।
संसार और समय भागता है
अपनी गति से
आपाधापी में लाख
धुँधली हो जाती हों यादंे
पर क्या कभी
भूल पाता है कोई
माँ का
क्षणभर के लिए
माँ का
बीच से चले जाना…………….।
उनके प्रति
अपने भले-बुरे बरताव का
भूल जाना
क्या कभी सम्भव है भला ?
अचानक
छोड़ साथ जाना
दूर-बहुत दूर/उनका
कितना वे चैन करता है/कभी-कभी
दूर-बहुत दूर/उनका
कितना वेचैन करता है/कभी-कभी
काल
शायद जरूरत से भी
ज्यादा होता है
क्रूर……….बहुत क्रूर ………..।

(दो)

माँ का आँचल
धरती बन जाता है
बच्चे के लिए
नरक झेल-झेल
स्वर्ग का निर्माण करती है
वह हमेशा/उसके लिए
धरती और माँ
अपने विस्तार में
अपनत्व देती है सभी को
बदले में
ठ़गी जाती है अपनों से
बार-बार
पर माँ इसी तरह
धरती बन जाती है
सोख लेती है पानी
और बरस जाती है
भाप की बदली बन
सबको तृप्ति करती है।
वह लाला-पटवारी
तो कभी दरोगा बाबू
बनाना चाहती है/बच्चे को
इससे बड़े पद की
कहाँ सोच पाती है बात
काश/उसे पता होता
तो माँगती दुआ।
ऊँचें से ऊँचें पद के लिए।
माँ
कभी पहाड़ सी कठोर
तो कभी
गंगा की भीगी रेत सी
नरम लगती है
मन में अथाह
दुःख समेटे-समेटे
खुद में
सागर की विस्तार भी दिखती है………। माँ
पराई जरूरतों पर
अचानक
वट वृक्ष की छाया सी
शीतल हो जाती है
जिस छाँव में
जाने कितनों को
तपन से तृप्ति मिलती है………….।।
माँ
इसी तरह जीती है
रोज-‘रोज
अपनों के लिए………….
परायों के लिए ……..
हम सब के लिए……………।।

(तीन)

लटकती खालांे में
सूखी हड्डियाँ अब भी तनी हैं
काम पर
रोटियाँ सेंकती है
गोल-गोल
महकती है/स्वाद से भर जाता है
घर/पूरा का पूरा
पसीने से तर-बतर
माँ
परोसती है थाली
काँपते हाथों से
अपने बच्चों को
अलग से डाल देती है
घी का लोंदा दाल में
पूरा का पूरा
चम्मच गिरा देती है
थाल में……….
औरों पर विश्वास
जम नहीं पाता/उसका……….
बहू पर भी…………
खाने में कोई
समझौता नहीं कर
पाती वह…………………..।
पर और जगह
विश्वास करती है खूब-खूब
अपनों पर/सब पर………………..।
उसे लगता है
विश्वास टूट गया
आदमी-आदमी के बीच
तो क्या बचेगा
आदमी फिर क्या रचेगा………?
कुछ नहीं……..कुछ भी नहीं।

बच्चों से एक-एक
गिनाती है/व्यंजनों की सूची
विस्तार से/पूरी व्याख्या के साथ
कचौड़ी उरद की, या आलू भरी पूड़ी
बरिया, पकौड़ी या कि रिकबंछ की कढ़ी
सैंईधा की लपेटन में
पूरी कला दिखाती है माँ
महुआ की लप्सी, बरिया या ढ़ोकवा मकई/ज्वार-बाजरा की
मोटी-मोटी रोटियाँ
या साग-भात
दूध/दही या छाछ भात
कोरवर, भुजिया और दही बड़ा
में रम जाती थी
माँ
पूरी की पूरी……………।
महक उठती थी/उनकी
उपस्थिति से ही रसोई
गमक उठती थी………..।
रसोई/उनके लिए
देवस्थली से कभी कम नहीं रही
रसोई में ही खाती
सफाई में चाक-चौबन्द रहती थी
माँ/हमेशा-हमेशा
पूजती थी अन्न को
अगराशन निकाल/खिलाती थी
गाय को/कौवे को
रसोई को रोज-रोज……..
पूजती थी माँ……………।
इसके बाद
कोई शौक नहीं रहा
पूजा का कभी/उन्हें………….।
माँ/सजग प्रहरी थी
रसोईं की
उसके अस्तित्व की रक्षक थी/माँ………..।।
कंजूसी भी दिखती थी
कभी-कभी उनमें
झुझँला जाती थीं
अनाप-सनाप खर्च पर
बेवजह
नाकारा लोगों की मदद में
कभी कोई रूचि
नहीं रही उनकी………..।
चाहे भिखारी ही क्यों न हो ……..।
लाग-लपेट से दूर
साफ-साफ बोल देती
अच्छा लगे या बुरा
कभी चिन्ता नहीं रही उनकी………….।
वे बिछ जाती थी
हमेशा/दूसरों के हित में
अपना एकाकी दुःख
पीते हुए…………………
सबके लिए………।।

(चार)

मुझे याद है
उनका बिरवे रोपना
बरसात के मौसम में
रोज-रोज देखना
सींचना-निराना
पेड़ों की टहनियाँ
छूँ-छूँ कर उनका
गद्गद हो जाना
मुझे याद है/अब भी……………।
मैं सोचता हूँ
कौन सी अदम्य प्यास रही होगी
उनकी
इन बिरवों के पीछे
इनके लहलहाने तक
माँ ने/जाने कितने लम्हें ,
दिन-महीने-बरस
होम कर दिया है।
अपनी जिन्दगी के………………।

कुछ न कुछ/करते रहना
एक खास हिस्सा था
उनके स्वभाव का……..
सिल-सिल कर
खुद पहनती रहीं/कपड़े
देखती रही खेत-जवार
तोड़ती रही मटर की फलियाँ
खोटती रहीं
चना और सरसों का साग
भूनती रही हरा चना
खिलाती रही ………..
ध्यान रखती रहीं सबका…………..।
आम में लगते ही टिकोरे
आ जाते थे उनकी सिल-बट्टे के नीचे
पिस उठते थे पुदीने के साथ
चटनी बन………………….।
श्रम के प्रति/इतनी गहरी आस्था
सोच-सोच कर अब
हैरानी होती है हमें…………।
दऊरी, मौनी, बेना और मोरपंखी
बनाती रहीं
जाने कितनी-कितनी
डिजाईनों में
रंग भरती रहीं
जिन्दगी में दूसरों के…………..।
और खुद
भागती रहीं
हमेशा-हमेशा
इससे दूर-दूर……………..।
माँ को पहचान पाना
बहुत कठिन होता है
एक बच्चे के लिए
जो खुदगर्ज होता है
उसके लिए तो/और भी
कठिन होता
बहुत-बहुत कठिन होता है
ऐसे बच्चों के लिए
माँ को जानना……….।
माँ
फिर भी भला ही सोचती है
बच्चा
आवारा निकल जाय
फिर भी………।।

(पाँच)

मैं कभी-कभी
झँुझला जाता था
माँ की हरकतों पर
क्यों नहीं छोड़ पाती थीं
इन्हंे
औरों के लिए
हम सबके लिए……..।
भला हो सकता है
एक परिवार का
इतने भर से…………..।
बहू चाहती थी/साथ रहें
सुख-सुविधाओें के बीच
पर/शहर में रहते
गाँव-घर नहीं भूल पाईं कभी
ऊब जाती थी जब कभी
निकल जाती थी गाँव
खेत-खलिहान की, पेड़-बाग की,
घर-जबार की/पता लगा लेती थीं
हाल चाल सबकी/ एक साथ
परजा-पवन की , पंडित -पुरोहित की तीज-त्यौहार में
होली-दिवाली की
खुशियाँ बाँटती
अपने साथ कंजूसी भी करती
पर उत्साह के साथ…………..।
मार खाई औरतों की
वकालत करतीं
विदा होती लड़कियों के
आँसू पोंछती……
जमीन से जुड़ी थी
हकीकत में……..
बहुत-बहुत महान थी
अपनी अकीदत में……………….।
पर मैं देखता हूँ
बनाये आदर्श को
तोड पाना/कितना कठिन होता है।
संस्कार और नैतिकता
की चढ़ते-चढ़ते सीढ़ियाँ
बँध जाती है/उसकी हर साँस से
उनकी चाल से/गति से
उसे तेज/या धीमा कर पाना
अब बहुत कठिन है
उनकी जड़ से/उन्हें/बड़ा मुश्किल था अलग कर पाना………………..
उनकी करनी और कथनी में
अन्तर बहुत कम ही रहा है
शायद इसी लिए……………..।
परम्परा का निर्वाह
भी जरूरी होता है
आदमी के लिए……………।

मैं/महसूसता हूँ
माँ
आती है रोज
स्वप्न में नहीं, जागती आँखों में
निहारती है एकटक
‘बहू ठीक से
देखभाल नहीं कर रही होगी
शायद
तेरे कमजोर होने का
क्या कारण हो सकता है भला ?
बुदबुदाती है…………।
उठा कर हाथ
फेरती है/गाल
चूम कर माथा/
गायब हो जाती है आश्वस्त करती,
आह भरती हुई ……….।
मैं/स माँ/अच्छी थी या बुरी
पर इतना जानता हूँ
वह जो भी थी
गुणों-अवगुणों के बीच
सम्पूर्णता में
वह छाया थी,
बदली थी/ धूप के खिलाफ
रोशनी थी/ चाँद थी
अँधेरे के खिलाफ
माँ
घर में/घर के लिए
आश्वस्ति भाव भी/डर के खि़लाफ
श्रम और संघर्ष की
अद्भुत मिसाल थीं/
आलस्य और कायरता के खिलाफ
एक जंग थीे
एक संस्था थी
सम्बल थी/किसी भी कमजोरी के
खि़लाफ
माँ
इसी तरह
ईकाई थीं………….
दहाई थीं……………
सैकड़ा थीं…………..
हजार………………।

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