शोभना ‘श्याम’ की रचनाएँ

गजलें

हसरतों का चला रतजगा रात भर

हसरतों का चला रतजगा रात भर
धड़कनों का सफ़र साथ था रात भर

भागता अजनबी-सा रहा दूर दिन
ख्वाब भरते रहे फांसला रात भर

ताकि तेरे लिए इक सुबह मांग लूं
तीरगी से लड़ा हौंसला रात भर

भाषणों में बटीं रोटियाँ तो बड़ी
पेट तो पट्टियों से बंधा रात भर

ख्वाहिशों के दिए भोर तक ना बुझे
आंधियों ने जतन तो किया रात भर

गम न सोया कभी न ही सोने दिया
शोर दिल में मचाता रहा रात भर

बात ही बात में बात यूं बढ़ गयी
आशियाँ ख़ाक होता रहा रात भर

दिल यूं राधा बना नाचता ही रहा
श्याम’ वंशी बजता रहा रात भर

वो जिनके पास क़िस्मत की हसीं सौगात होती है

वो जिनके पास क़िस्मत की हसीं सौगात होती है
वो जब चाहे तभी तो दिन तभी तो रात होती है

कहाँ बसती हैं वह बस्ती जहाँ पर प्यार बसता है
यहाँ तो मुस्कुराने में छिपी इक घात होती है

सफर में ज़िन्दगी के हमसफ़र तो रोज़ मिलते है
सभी में दिल लुभाने की कहाँ वह बात होती है

ये क्या तूने अजब दुनिया बनाई है खुदा मेरे
जो शह देते हैं नेकी को उन्ही की मात होती है

बड़े विश्वास से दादी सुखा आई बढ़ी-पापड़
अगर जो श्याम हो बादल नहीं बरसात होती है

झूठ की तर्जुमानी नहीं चाहिए

झूठ की तर्जुमानी नहीं चाहिए
आपकी महरबानी नहीं चाहिए

कुछ नयी निस्बतें चाहती ज़िन्दगी
याद वह अब पुरानी नहीं चाहिए

खिड़कियाँ खोल दो ज़हनों दिल की सभी
वहशतों की कहानी नहीं चाहिए

जो बहा दे सभी बस्तियाँ प्यार की
खून में वह रवानी नहीं चाहिए

दिल से महसूस हो है, तो बेहतर यही
दोस्ती आज़मानी नहीं चाहिए

बात ये जान ले हर किसी को यहाँ
पीर अपनी सुनानी नहीं चाहिए

खुद नुमायाँ सभी पर ये हो जायेगी
खुद से नेकी गिनानी नहीं चाहिए

इस जहाँ में वफ़ा सबको मिलती नहीं
जो मिले तो गवांनी नहीं चाहिए

तेरे रुख़सार पर हो ख़ुशी ही ख़ुशी
गम की कोई निशानी नहीं चाहिए

छीन ले ख़्वाब आँखों से आके सभी
सुबह ऐसी सुहानी नहीं चाहिए

रूठ कर मुझ से भला तू कब तलक तरसाएगी

रूठ कर मुझ से भला तू कब तलक तरसाएगी
जिंदगी किस दिन भला तू पास मेरे आएगी

ख़त्म होने को है आया नेह का जो तेल था
इन चिरागों से कहाँ अब रौशनी मिल पाएगी

चाँद रुक जाना नहीं तू पोंछने आंसू मेरे
ख्वामखा ये रात लम्बी और भी हो जायेगी

पाँव बाहर देहरी के रख ना पायी उम्र भर
अब बुढ़ापे में सूना है धाम चारों जायेगी

सीख लो गिरगिट के जैसी रंग बदलने की कला
जीतना है ये जहाँ तो काम ये ही आएगी

शर्म आती है के जिन्दा आज भी ये सोच है
बेटी तो वन की लता है ख़ुद ब ख़ुद पल जायेगी

एक पन्ना और कोरा सुबह फिर पकड़ा गयी
बेबसी की इक कहानी शाम फिर लिख जाएगी

रात का ये ‘श्याम’ आँचल ढांक लेगा प्यार से
रौशनी के वार से जब ज़िन्दगी घबरायेगी

अपना कल हम आप सवारें 

अपना कल हम आप सवारें
क्यों हम अपने हाथ पसारें

किसके पीछे भाग रहे हैं
रुक के कुछ पल आज विचारें

धरती माँ है आस लगाए
आओ इसका क़र्ज़ उतारें

यादों की वीथी में भटके
दिल को सुबहोशाम पुकारें

नेह न रिश्तों से रिस जाए
मन की अपने पाट दरारें

कोई तो ख़्वाबों से कह दे
चादर जितने पाँव पसारें

पर उपदेश कुशल बहुतेरे
अपने को भी कभी सुधारें

खुदगर्ज़ी का आलम ऐसा
नेकी का सब दाम नकारें

कौन हरा सकता है किसको
मन के हारे ही सब हारें

चलन ये कैसा बेढब आया
धन के दर पर प्रेम को वारें

कौन खिलाये उस गुलशन को
रूठी जिससे रहें बहारें

श्याम बजा फिर बासुरी ऐसी
सुन के जिसको तन मन वारें

अपने रुख से ये बेहिसी कम कर

अपने रुख से ये बेहिसी कम कर
ज़िंदगी मुझसे बेदिली कम कर

मुद्दतों से मूंदी नहीँ पलकें
अपनी यादों की रौशनी कम कर

दुश्मनों से तो दुश्मनी है ही
दोस्तों पर यक़ीन भी कम कर

हाथ से ये निकल न जायें कहीँ
ख्वाहिशें तो हैं मनचली, कम कर

चुप रहा जब बहार आने पर
हादिसों के बयान भी कम कर

माँगने से ख़ुशी नहीँ मिलती
अपनी आँखों से बेबसी कम कर

शोखियों की मुरीद हैं दुनिया
अपने चेहरे से सादगी कम कर

रौशनी मिल रही है अश्कों से
चाँद अपनी ये चाँदनी कम कर

लुत्फ जो ज़ीस्त का उठाना हो
हर घड़ी रस्म अदायगी कम कर

श्याम मंज़िल उफ़क़ पर तेरी है
दोस्ती मुझ हक़ीर की कम कर

ये जीवन तो मधुवन सा हैं

ये जीवन तो मधुवन-सा हैं
सांसो का ये गुंजन-सा हैं

वीणा के तारों का घर्षण
प्राणों का स्पंदन-सा हैं

इच्छाओं का नर्तन मन में
पीड़ा के आमंत्रण-सा हैं

फीका फीका मुख उषा का
सूरज आया बेमन-सा हैं

महके महके रात दिवस हैं
प्यार तुम्हारा चंदन-सा हैं

बादल में छिप चाँद जो झांकें
लगता प्रिय की चितवन-सा हैं

सांसों में तो जलता मरुथल
आँखों में पर सावन-सा हैं

सीता जैसी मति हर लेता
मोह हठीला रावण-सा हैं

सुख के फूल दुखों के काँटे
ये जीवन भी उपवन-सा हैं

हवाओं के सम्भलने की शिलाओं के पिघलने की

हवाओं के सम्भलने की शिलाओं के पिघलने की
तमन्ना आज फिर जागी मुक़द्दर के बदलने की

हुई हैं देह से अनबन सुलगती साँस की जबसे
वो जिद-सी ठान बैठी हैं न उसके साथ चलने की

शिकायत आज सूरज से करेंगे सोच रक्खा हैं
के आदत धूप की अच्छी नहीँ हैं सर पर चढ़ने की

चलो इक राह मिल कर आज फिर से हम बनायेंगे
दुआएँ साथ लेकर के उमीदों के गुजरने की

जगा के नींद से मुझको मिरी क़िस्मत ये कहती हैं
कभी तो कोशिशें कर लें तू मेरे भी सँवरने की

हजारों ख़्वाब आँखों में शरारों से चमकते हैं
दियों को क्या ज़रूरत थी हवाओं से उलझने की

ख्वाब में वो ज़रा आ गए हैं 

ख़्वाब में वह ज़रा आ गए हैं
शब को कैसे गुमाँ हो रहे हैं

छू लिया है नज़र से ज़रा-सा
आप यूं ही ख़फ़ा हो रहे हैं

क्यों भटकता फिरे दर बदर तू
लौट आ अब दिए जल गए हैं

ए धनक आ उफ़क़ से उतर आ
रंग मुझसे जुदा हो चुके हैं।

ओ सितमगर नए ज़ख़्म दे जा
जो पुराने थे वह भर चुके है।

जिसका खाएँ, गिराएँ उसी को
लोग यूं बेहया हो चले हैं।

देख ले ख़ुद ही आ के खुदा अब
नाम पर जो तेरे बलबले हैं।

यूं ही पाई नहीं मंजिले ये
श्याम ये पाँव मीलो चले है।

दिल में तो रहा सहरा आँखों से बहा सावन 

दिल में तो रहा सहरा आँखों से बहा सावन
उम्मीद पर पहरा था ख़्वाबों में मिला सावन।

जीवन के झमेलों में दम तोड़ गयी हसरत
भीगे भी नहीं हम तो लो बीत गया सावन।

ये पाँव मुसाफिर है इन धूप के रस्तों पर
दो चार क़दम मेरे बस संग चला सावन।

जब ज़िक्रे वफ़ापनी वह करने लगे हमसे
कर याद सितम उनके क्या ख़ूब हंसा सावन।

तन्हाई के जंगल में इक याद सुलगती है
जलती हुई आँखों में दिन रात चुभा सावन।

डूबी थी धरती में कुछ बीजों की साँसें
जीवन की डोरी से फिर जोड़ गया सावन।

अटका था देहरी पर इक रिश्ता बरसों से
हाथ पकड़ आँगन में कल छोड़ गया सावन।

वो चूम गए फंदे तब हमको मिला सावन
बलिदानों का हमने पर बेच दिया सावन।

मदमस्त हवाओं ने जब वंशी बजाई तो
पत्तों पर ताशे-सा क्या ख़ूब बजा सावन।

कवितायेँ

ऐसे भी रची जाती है कविता 

सिर्फ शब्दों से ही नहीं
रची जाती कविता
वह रची जाती है
तिनकों से भी
उसे रचती है चिड़िया
जब बना रही होती है
अपना घोंसला…

तिनकों के ढेर से
कभी यहाँ, वहाँ से
चुन-चुन कर लाती है
एक-एक तिनका
कुछ होते हैं अस्वीकृत
कुछ गिर जाते हैं
बीच रस्ते
कुछ बिखर जाते हैं
घोंसले में लगते-लगते
और यूँ बनती है
घोेंसले की कविता
छंदमुक्त कविता…
कविता तब भी होती है
जब चीटियों की क़तार
गंध संकेतों के सहारे
निकलती है ढूँढने भोजन
उसी क़तार में लौटती है
ढोते हुए अपना आहार
अक़्सर बीच में आता है
कोई व्यवधान
एक क्षण को टूटती है क़तार
बिखर जाती है
घंटों की कमाई
दूसरे ही क्षण
ज़्ारा-सा घूमकर
फिर सरकने लगती हैं
पंक्तिबद्ध चीटियाँ…

कविता रचती हैं मधुमक्खियाँ भी
जब एकत्र करती हैं
मेहनत से पराग
गाते-गुनगुनाते लगाती हैं
अनगिनत चक्कर
फूलों से छत्ते तक
इस तरह बनता जाता है
गीत-सा शहद…

आकर तो देखते

स्वयं नदी होते हुए भी
रेत-सी बिछी रही
अपने ही किनारों पर
सुखाती रही ख़ुद को
तन्हाई की धूप में
कि ज़्ारा-सी भी नमी
मेरे वजूद की घाटी में
आँसू तुम्हारे रोक न ले
तुम लौट न जाओ बादल

तुमने तो एक बार भी
आकर देखा ही नहीं
कितना सूख चुका मेरा जल

लगा लिया अनुमान
कि लायी हूँ पर्वतों से
अथाह जलराशि
कि बहते हैं मुझमें
पिघले ग्लेशियर
नहीं देख पाए तुम
कितनी लम्बी थी मेरी यात्रा
नहीं गिन पाए
मेरे पाँवों में चुभते
कंकड़, पत्थर
मेरा रास्ता रोकती
असंख्य चट्टानें
क्या नापा तुमने कभी
भिगोया कितना मैंने
धरती का आँचल

मैं सींचती रही
राह में आने वाला हर खेत
छीजती रही खुद
मुझमें बढ़ती रही रेत
पलता रहा दुःख
तुम एक बार आकर तो देखते।

चलन पेड़ों का

पेड़ कभी नहीं करते एकत्र
फूल, पत्ते, फल या कोपलें
पतझड़ के लिए
उन्हें विश्वास है बसंत पर
और बसंत को नाज़्ा है
उनके विश्वास पर

कितने ही अवरोध
पार कर वसंत
आ ही पहुँचता है
हर बार
पेड़ों ने कभी नहीं दिया
उलाहना देर से आने का
या कम लाने का

जितना आता है जिसके हिस्से
खिला उठता है उतना पाकर
न कोई जलन, न कुढ़न
न प्रयत्न एक दूसरे से छीनने का
काश हम सीख पाते
यह चलन पेड़ों का।

जिंदगी का घर 

कुछ टूटी-फूटी, रंग-बिरंगी वस्तुएँ
पड़ी रहत है बरसों
छोटी-बड़ी दराज़्ाों में
यादों की तरह…

अनुभवों की तरह
इकट्ठी होती रहती हैं
कुछ नुस्खों की कतरनें
कुछ विजिटिंग कार्ड
अलमारी में बिछे
अख़बारों के नीचे…

आकांक्षाओं की तरह
झाड़ दी जाती है
दराज़्ाों से मिट्टी
और झड़ी-पुछी दराज़्ाों में
फिर से डेरा जमा लेते हैं
नगर पालिका द्वारा भगाए गए
फुटपाथियों से
ये यादों के टुकड़े…
हालाते की तरह
बदल जाते हैं
अलमारी में बिछे अख़बार
और नए बिछे अख़बारें के नीचे
सरका दिए जाते हैं फिर से
पूर्वाग्रहों से ये कागज़्ा के टुकड़े…

क्यों नहीं फेंक पाते इन्हें
यह जानते हुए कि बरसों से
काम नहीं आये ये सब
हाँ इतना तो काम आये हैं
कि भरा-पूरा लगता है इनसे
जिंदगी का घर।

आदान-प्रदान

शहर की लड़की
चुराती है जी घरेलू काम से
करती है जिम में ‘वर्क-आउट’

गाँव की लड़की
सुबह से साँझ ढले तक
करती है चौका, चूल्हा, बासन, कटका
आँगन की मिट्टी के साथ
बुहार देती है शरीर से एकस्ट्रा कैलरी

शहरी लड़की पढ़ और फारवर्ड कर
डिलीट कर देती है एस.एम.एस.
गाँव की जब उखाड़ रही होती है
खेत से खरपतवार

एक के कंधे पर झूलता है
वर्साचे का बैग
समेटे हुए कॉस्मेटिक्स, फेस वाश, कॉम्ब
कभी-कभी शेल्फ़ से लेटेस्ट नॉवल
दूसरी की पीठ पर बँधा है झोला
जिसमें लटका है कोई
दुधमुँहा भाई या बहन

गाँव की लड़की बुनती है स्वेटर
फंदों में जैसे बाँध रही हो रिश्ते
शहर की बुनती है करियर
जिसके फंदे में उलझ कभी-कभी
दम तोड़ देते हैं रिश्ते

गाँव की बाला जब लाती है
पनघट से पानी
शहर की ले आती हैं
एक और डिग्री
वह करती है बिजनेस मैनेजमेंट
पर कर जाती है कभी-कभी
घर में मिस-मैनेजमेंट

गाँव की जब हँसती है
तो अजाने ही चला जाता है
मुँह पर हाथ मानो
लग न जाये किसी की नज़्ार
शहर की हँसती है
बेबाक और बेलौस
ओ शहर की बाला
जब करने जाओ तुम
गाँव में फोटोग़ाफी
मिल लेना अपने गँवई प्रतिरूप से
सीख लेना कुछ गुर गृहस्थी के
बदले में याद से दे आना उसे
अपनी उन्मुक्त हँसी।

पाषाण युग 

ईंटें ही ईंटें
महानगर के वज़्ाूद में
मानो कुछ और नहीं
बस ईंटें ही ईंटें
ईंटें नीवों में
ईंटें दीवरों में
ईंटें छतो-मुंडेरों में
ईंटें मकानों के अंदर
ईंटें मकानों के बाहर हैं

ईंटों के बोझ तले
दब गए हैं घर
रह गए है मात्र रैन-बसेरे
ईंटें उतर चुकी हैं
इंसान के ज़्ोहन में
मन कर्म वचन में
नगर के चरित्र में
ईंट का जवाब
पत्थर से देने की प्रवृति
बजा रही है
ईंट से ईंट
मानवीय मूल्यों की

कुंठाओं की ईंटें ढोता
इंसान ख़ुद भी
बन गया है ईंट जैसा
क्या यह आरंभी है
एक और पाषाण है
एक और पाषाण युग का।

यज्ञ

एक वेदी वह थी
जिसकी अग्नि के गिर्द
लेकर फेरे
मैंने सौंप दिया था तुम्हें
अपना जीवन
एक वेदी यह है
जिसकी अग्नि में
जलता रहा जीवन

दोनों ही यज्ञों में
समिध बनी
मेरी ही आकांक्षाएँ
मंत्रोच्चार
मेरी संवेदनाएँ
आहुति बने
मेरे ही सपने
होम हुई मैं
पूरी की पूरी
काश तुम तक पहुँच पाती
इनमें से किसी आँच की
जरा-सी तपिश
इनसे उठे धुएँ की
एक क्षीण-सी लकीर
ये यज्ञ पूर्ण हो गए होते।

तुम्हारी याद 

तुम्हारी याद को
अच्छी तरह तहा कर
रख दिया था
अलमारी के सबसे
ऊपर वाले खाने में
कि खोला करूँगी
सिर्फ़ फ़ुर्सत के पलों में
लेकिन हुआ यह
कि जब भी
अति व्यस्ततम क्षणों में
हड़बड़ा कर
झटके से खोली अलमारी
वह तहाई हुई याद
ठीक मेरे सामने
पट से गिरी
खुल गयीं तहें
और बंद हो गयी मैं
अतीत की तहों में।

तुम्हारा आना

तुम्हारे आने से
भरा नहीं
खाली हो गया जितना तुम्हारे जाने से
मेरा घर,
ज़रा चेक कर लो
अपना सामान समेटते समय
कहीं गलती से
तुमने समेट तो नहीं ली
लापरवाही से घर में इधर उधर पड़ी
मेरी कुछ चीज़ें
जैसे तुम्हारे आने से पहले
वहाँ ताक पर रखी थी एक घड़ी इंतज़ार की
जिसकी टिक-टिक से
भरा भरा-सा लगता था मेरा दिन,
उधर दराज़ में रखी थी उम्मीद की एक टार्च
जिसकी रौशनी में घने अँधेरे के बीच भी
देख लिया करती थी
भावी मिलन की कुछ तस्वीरें
कुछ यक़ीन रखे थे
अवचेतन के रेफ्रिज्रटर में
जिनसे तर हो जाता था प्यास से सूखता गला
मेज़ पर रखी थी एक अतीत की डिब्बी
जिसमें से एक स्मृति उठा कर
अक्सर चबा लिया करती थी इलायची की तरह
यूं सुवासित हो जाते थे कुछ लम्हों के मुख
एक गुल्लक भी रखी थी शेल्फ पर
जिसमें डाल दिया करती थी
रोज़ के ख़र्च से बचे एक आध दर्द
गुल्लक को उठाते और रखते
जब खनखना उठते थे उसमें पड़े दर्द
तब संगीतमय हो जाते थे कुछ पल
एक प्रिज्म भी पड़ा रहता था यहाँ वहाँ
जब हाथ आ जाता था
तो दिखा देता था
वक्त की तीखी धूप में छिपे
खुशियों के कुछ रंग
बुरा न मानना अब इनमें से कुछ नहीं यहाँ
आखिर
तुम्हारा आना क्यों न हो पाया वैसा
जैसा होना था तुम्हारा आना

एक और सिंड्रैला

शहर में शाम
आती तो है
धूप की थिगलियाँ लगे
बदरंग से परिधान में
भिखारन सी ..
पर देखते ही देखते
बिजलियों से लकदक
शानदार पोशाक पहन
बन जाती है राजकुमारी
सिंड्रैला की तरह

एक बार जो आया तो

फिर कभी नहीं गया पतझड़ यहाँ से
दिन ब दिन झड़ते ही गए पत्ते

हर दिन हर पल
मैने याद किया तुम्हें
हर पत्ते के झड़ने पर मैंने
फिर से गिने बचे हुए पत्ते
फिर से जड़ों में उंडेल दी
थोड़ी-सी उम्मीद
चल रहा है ये क्रम
आज तक अनवरत

गिरे हुए पत्ते चरमराते रहे
इंतज़ार के पाँव तले

हर पत्ते ने
शाख से झड़ने से पहले
पुकारा तुम्हें
पीली पड़ी आँखों से
सूखे हुए मुँह से
कि शायद सहेज लो तुम उसे

कैसे हो गए तुम इतने निष्ठुर
आखिरी पत्ती भी झड़ने को है
तुम कहाँ हो …
ओ बसंत! तुम कहाँ हो

बिसात 

मैं बनी रही
सिर्फ एक बिसात
और तुम खेलते रहे
चाल पर चाल

तुमने समझ लिया
इतनी ही बिसात है मेरी
कि बनी रहूँ तुम्हारी बिसात
और तुम खेलते रहो
चाल पर चाल …

लेकिन …
जिसे समझते हो तुम
मेरी कमजोरी
वे तो संस्कार हैं मेरे
और शक्ति सहने की
जो मिली है
माँ और धरती से

वर्ना …
क्या बिसात थी तुम्हारी
कि बना के रखते मुझे
बिसात अपने खेल की
मेरी ज़रा-सी जुम्बिश
पलट सकती है
सारे मोहरे तुम्हारे

देखा है न …
शोषण से
अघाई हुई पृथ्वी को
एक हलचल उसकी
कर देती है कितना विध्वंस
वही हाथ जो करते रहे
उसका चीर हरण
उठ जाते हैं याचना कि मुद्रा में
धराशायी हो जाते हैं
अहम के ऊँचे-ऊँचे भवन
मलबे के ढेर में बदल जाते हैं
उनके सारे चातुर्य

याद रखना …
वही धरती
बसती हैं मुझमें भी
मैं सिर्फ़ बिसात नहीं
तुम्हारे खेल की

बावरी

आज फिर मुंडेर पर बोला है कागा
आज फिर बायीं आँख फड़की है
आज फिर गाय रम्भा गयी
दरवाजे पर सवेरे सवेरे
फिर कोई नीर भरी गागर छलकी है।
आज फिर प्रतीक्षा के दीप में
उम्र की सुलगती बाती को
उचका कर थोड़ा सा
आस का तेल भरकर विरहिन बैठी है।
आज फिर सारे शकुन गा रहे है मंगलाचार
आज तो आओगे ना निर्मोही
कि आंखों में प्रीत का काजल आँज कर
एक बावरी बैठी है।

वैष्वीकरण

वे भारत में
बेटा-बहु अमेरिका में
बेटी-दामाद दुबई में
पोता ऑस्ट्रेलिया में
और पोती पढ़ रही है
न्यूज़्ाीलैंड में
न्वासा करता है जॉब
इंग्लैंड में
वैश्वीकरण के चलते
सिमट रही है दुनिया
बिखर रहे हैं परिवार।

दुष्कर्मियों के अट्टहास

औरतों और बच्चियों के आर्तनाद
बेशर्म राजनीति के बयान
तमाशबीन और कायर व्यवस्था की चुप्पी

सब दफ़न हो रहा है उस मिटटी में
जहाँ जहाँ बहा है किसी प्रताड़िता का लहू
जहां जहां दागा गया है गर्म सलाखों से
किसी मासूम कली का बचपन
जहाँ रौंदा गया है शैशव

सदियों बाद इतिहास के खोज में
जब खोदी जाएगी ये मिट्टी
कालपात्रों की तरह निकलेंगी वहां से
ये गूंगी चीखें
ये बेशर्म बयान
ये कायर चुप्पियाँ
ये क्रूर अट्टहास

इस युग के माथे पर लगेगा शायद
लेबल एक बलात्कारी युग का
कौन जाने विज्ञान के वर्चस्व की बजाय
न्याय के बौनेपन के लिए जाना जाये ये युग
तकनिकी की चमक दमक से नहीं
हवस के अंधेरों से होगी
समय के इस चेहरे की शिनाख्त

क्या हमारे वंशज कहेंगे फख्र से कि देखो
बर्बरता में इतना समृद्ध था हमारा समाज

दोहे

दोहे – 1

ना धन के अम्बार है, नहीं गुणों की खान।
पास बांटने के लिए, छोटी-सी मुस्कान॥

बेटी घर की आन है, बेटी घर की शान।
घर जैसे इक देह है, बेटी उसकी जान॥

नारी भी करती रहे, बाती जैसा काम।
स्वयं जले पर रौशनी, करे दीप के नाम॥

शाख शाख़ पर गिद्ध हैं, नहीँ सुरक्षित छाँव।
बिटिया रख सम्भाल के, घर से बाहर पाँव॥

सिद्ध हुआ है आज फिर, देश में जंगल राज।
तड़प तड़प मैना मरे, जश्न मनाये बाज॥

जिस घर में पूजे गए, देवी के नव रूप।
कन्या मारें कोख में, ऐसे कूप मण्डूक॥

वहशीपन में जुड़ रहे, नए-नए अध्याय।
कन्या कि चीखें बनी, बदले का पर्याय॥

बनी कमाऊ तो हुई, दशा और भी दीन।
घर बाहर के फेर में, औरत बनी मशीन॥

नारी मन की कामना, कब चढ़ती परवान।
मर्यादा के नाम पे, हुई सदा कुर्बान॥

रावण ने सीता हरी, धर साधू का वेश।
अब साधू में हो रहा, रावण का उन्मेष॥

दोहे – 2

जन-सेवा के नाम पर, सत्ता को है छूट।
करदाता के खून से, चाहे जितना लूट॥

हिंसा का किस धर्म ने, दिया बताओ साथ।
दस्ताने बस धर्म के, राजनीति के हाथ॥

राजनीति का तंत्र है, जात-धरम का मंत्र।
सम्मोहित जनता सहे, सत्ता का षड्यंत्र॥

बूढ़ी माँ जैसा हुआ इस धरती का हाल
बुरी दशा कर फेंकते, जिसके अपने लाल।

धरा द्रौपदी की तरह, भर आँखों में नीर।
कातर हो कर मांगती, हरियाली का चीर॥

चुप रहते हैं आजकल, सारे रोशनदान।
गए शहर को छोड़ के, नन्हे से मेहमान॥

तपते जलते ज्येष्ठ ने, लिखा मेघ को पत्र।
सावन लेकर आगया, बारिश वाला सत्र॥

छप-छप करती भीगती, कहाँ गयी वह शाम।
सावन का मतलब बचा, घंटों ट्रैफिक जाम॥

यादों जैसी हो गयी, अब तो ये बरसात।
चाहो तो बरसे नहीं और कभी बिन बात॥

मिला नहीं जिनको कभी, सघन प्रेम का पाश।
उन अँखियों की कोर से, बरस रहा आकाश॥

जब जब बोली ज़िंदगी, खाली मेरे हाथ।
हँसकर बोला दर्द ये, मैं हूँ तेरे साथ॥

दोहे – 3

बसंती इस भोर का, खिला खिला-सा रूप।
झुके झुके से मेघ हैं, शरमाई-सी धूप॥

नयी सदी तो बन गयी, पीपल का वह पेड़।
खंडित मूल्यों का लगा, जिसके नीचे ढेर॥

उतना ऊंचा पद मिले, जितना छोटा ज्ञान।
ऊपर पानी के तिरे, जैसे थोथी धान॥

शीशे के शो पीस सी, महानगर की शान।
रात जगे दिन सो रहे, उल्लू-सा इंसान॥

देखी रौनक शहर की, पीछे दौड़ा गाँव।
ठोकर खा औंधा गिरा, ज़ख़्मी हो गए पाँव॥

न शुभ दर्शन सूर्य का, ना ही भजन सुहाय।
सुबह शहर की मांगती, सबसे पहले चाय॥

न शुभ दर्शन सूर्य का, ना ही भजन सुहाय।
सुबह शहर की मांगती, सबसे पहले चाय॥

रात बिचारी ऊँघती, हुई नींद से पस्त।
व्हाट्सएप के फेर में, सभी फ़ोन में मस्त॥

मन्दिर अब जाते नहीं, मोबाइल टू मीट।
सुबह देव प्रेषित हुए, रात्रि हुए डिलीट॥

विह्वल होकर शहर ने, लिया कलेजा थाम।
इक्कल-दुक्क्ल खेलती, मिली उसे इक शाम॥

रिश्ते ताज़े फूल से, घर में भरे सुगंध।
सड़ें यही जब पात्र में, फैलाएँ दुर्गन्ध॥

दोहे – 4

स्वेटर हैं बाज़ार में, पहले से तैयार।
गृहिणी अब बुनती नही, रिश्तों का संसार॥

जीवन से माँ बाप को, हमने दिया निकाल।
कविता उनके नाम पर, रोज़ बजाए गाल

डगमग करते पाँव हैं, कँपन करते हाथ।
जन्म दिया, पाला जिन्हें, छोड़ गए वह साथ॥

एक भूख के रूप दो, बचपन गया बताय।
खिड़की से इक फेंकता, दूजा चुग के खाय॥

ज्ञान उसी को दीजिये, जो सुनता हो बात।
बीच सड़क ब्लिंकर लगे, चमके केवल रात॥

विपदा घिरती देख के, होना नहीं उदास।
अंधियारे की कोख में, पलती सदा उजास॥

मिट्टी के इक दीप की, अल्प नहीं औकात।
ये बदले उजियार में, घनी अमावस रात॥

बुढापा ज्यों गिलास के, तले दूध का झाग।
सुड़क सुड़क के अंत तक, पीने का बैराग॥

व्यर्थ सभी पुरुषार्थ है, हो जो दैव ख़िलाफ़।
जीवन बने सलेट सा, आज लिखो कल साफ॥

उम्र भर है सालता, अनकहा उस वक्त।
उससे ज़्यादा सालता, बोला जो बेवक्त॥

हिंदी तुलसी सूर है, हिन्दी ग़ालिब मीर।
हर भाषा को साथ ले, कल-कल बहता नीर॥

ताक रही बच्चों तुम्हें, राष्ट्र की तकदीर।
आओ नव निर्माण की, बन जाओ शमशीर॥

हों कितनी भी बोलियाँ, हो कितने भी वेश।
बस दिल में बसता रहे, अपना भारत देश॥

हाइकू

1
बीता जीवन
तिनके जुटाते ही
बना न नीड़

हठी है मन
अब तक इसने
न खोया धीर

2
ज़िन्दगी मेरी
तड़पती ही रही
याद में तेरी

दिल के संग
धड़कती ही रही
आस में मेरी

3
नैन कावड़
मन गया भरने
एक सागर

सब खोकर
लौट आया अकेला
आंसू लेकर

4
रात बरसा
सुधियों का सावन
तकिया नम

दिन ने कहा
जाना है काम पर
समेटो ग़म

5
उड़ाने चला
सपनो की पतंग
अनाड़ी मन

कच्चा निकला
जो जतन का मांझा
कटी पतंग

6
दर्द सागर
कुछ पल सहारा
यादों के द्वीप

निकले खाली
बहला तो गए
वादों के सीप

7
यादों के द्वार
आसुओं ने सजाई
बंदनवार

बाहें पसार
तकती रही रस्ता
मौन पुकार

8
आँख मिचौली
उमंगें उम्र भर
मुझसे खेली

क्या कहे मन
कितनी गुरबतें
इसने झेलीं

9
जीवन मेरा
बना रात का डेरा
दर्द घनेरा

आये सवेरा
ज्यों का त्यों मगर
रहे अँधेरा

10
एक परी सी
रात के आँगन में
उतरी याद

रात बीतते
निठुर कसक में
बदली याद

हाइकू – 2 

11.
फिर से खिली
मन की बगिया में
याद की कली

मिली न कभी
नयन के राही को
नेह की गली

12
बारहा बढ़ी
नप गयी सड़कें
मैं वहीँ खड़ी

टूटी जो कड़ी
जीवन और सुख की
जोड़े न जुडी

13
चाहा था जीना
बदले में लुटाया
ख्वाब नगीना

तुम्हारे बिना
जिंदगी हो गयी ज्यों
टूटा सफीना

14
लिखा न पता
बेरंग पत्र मन
हुआ लापता

है सुलगता
सपना पल पल
है झुलसता

15.
उमंगें सारी
रस्सी पर भाग की
टंगी बेचारी

आस हमारी
कागज़ की नाव में
करे सवारी

16.
हम यूं जिए
सजाये मौत पाके
ज्यों कैदी जिए

जीते ही गए
खून के घूँट आंसू
पीते ही गए

17.
देर सवेर
सूरज चमकेगा
आँगन तेरे

पी के अँधेरे
समय उगलेगा
शुभ्र सवेरे

18.
नए वर्ष में
नवेच्छाओं की रोटी
मन रे बेल

बीते ग़मों की
यादें करकट सी
बाहर ठेल

19
घर ही नहीं
गली मोहल्ला सूना
बेटी बिना

बेटी है माना
लहू तो तुम्हारा है
मत बहाना

20
आधुनिकता
यंत्रों से भरा घर
मन है रीता

जागरूकता
जागृत अधिकार
दायित्व सोता

21
सच बेचारा
मुँह छिपाये बैठा
झूठ से हारा

सीना फुलाये
घूमता है फ़ख़्र से
झूठ आवारा

22
हारा है गाँव
विकास की चालों का
मारा है गाँव

जीता शहर
भावनाओं से मगर
रीता शहर

23
भ्रष्ट आचार
भारत में बैठा है
पाँव पसार

शैतानियत
अब तो कर चुकी
सीमाएँ पार

24
नन्ही गौरैया
दिल्ली से रूठकर
बैठी हो कहाँ

हाथ में रोटी
ले के मुन्ना बुलाये
चिया री आजा

25
सुर न ताल
आजकल ज़िन्दगी
है भेड़चाल

सब बुनते
एक दूजे के लिए
मकड़जाल

26
सजी हुई हैं
सुबह की पलकें
ओस कणों से

भरी हुई हैं
प्रभात के मन में
रात की यादें

27
नवेली धूप
छत से उतरती
संभाले रूप

बुजुर्ग धूप
आँगन में पसरी
फटके सूप

28
मृदुल गात
चांदनी का मधु पी
खोयी है रात

सोई है रात
फुसफुसा के तारे
करते बात

29
प्रेमी सूरज
रचाये महावर
उषा के पांव

चाँद रसिया
बिछाता हैं चांदनी
रात के गाँव

30
मस्त मगन
नदी में सारा दिन
तैरा गगन

जी भर खेली
चंचल लहरों से
सखी पवन

31
चंचल साँझ
गुदगुदा रही है
रात का गात

उदास रात
नहीं करेगी आज
किसी से बात

32
ओढ़ सन्नाटा
सो जाती है जल्दी
गाँव की रात

नाइट क्लब
देर तक थिरके
शहरी रात

33
सुबह शाम
जीवन गुलज़ार
कॉलोनी पार्क

करे विश्राम
सूनी दुपहरिया
कॉलोनी पार्क

34
गाँव का घर
दिन भर ताकता
सूनी डगर

रात को सोता
ओढ़ उम्मीद की
नयी चादर

35
धरा तपती
बादल के नाम की
माला जपती

जलते रस्ते
पल छिन वर्षा की
बात जोहते

36
स्वयं तो कूदा
समुद्र में सूरज
जला के धरा

चाँद ले आया
चांदनी मरहम
है चैन ज़रा

37
आखिरकार
पिघल है आसमाँ
सुन पुकार

धरा पी रही
भर भर अंजुरी
नभ का प्यार

38
जरा-सी नेकी
कमा के ले आएगी
बड़ी-सी दुआ

लाख बलाएँ
बचा के ले जायेगी
छोटी-सी दुआ

39
आँख मिचोली
उमंगें उम्र भर
मुझसे खेली

क्या कहे मन
कितनी गुरबतें
इसने झेलीं

40
राजा बसंत
हुक्म हरियाली का
दिग दिगंत

मीत मन का
जब भी आया, लगा
आया बसंत

41
पिया बसंत
लगाए उबटन
धरा दुल्हन

मुग्ध नयन
बासंती धरा देखे
निज अयन

42.
पाणिग्रहण
खुशियों पर नारी की
लगे ग्रहण

गठबंधन
कर्त्तव्य का बंधन
नारी के लिए

43.
जले स्वयं
फिर भी तो छँटा न
दुर्भाग्य तम

ढूँढता मन
निराशा के तम में
प्रकाश कण

44
बादल राही
रोक पर्वतराज
करें उगाही

नदी ले जाएँ
पानी मैदान तक
नियम शाही

45
घटता नीर
कैसे दिखाए धरा
कलेजा चीर

बढ़ेगी पीर
टूटेगा एक दिन
धरा का धीर

46
न वातायन
न खिड़की नेह की
अंधा शहर

न किलकारी
न आत्मीय पुकार
गंगा शहर

47
समय धारा
बहना ही नियति
छोड़ किनारा

बह न पाया
तोड़ा वह पत्थर
बनाया गारा

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