शोरिश काश्मीरी की रचनाएँ

अब जी रहा हूँ गर्दिश-ए-दौराँ के साथ-साथ

अब जी रहा हूँ गर्दिश-ए-दौराँ के साथ-साथ
ये नागवार फ़र्ज़ अदा कर रहा हूँ मैं

ऐ रब्ब-ए-ज़ुल-जलाल तिरी बरतरी की ख़ैर
अब ज़ालिमों की मद्ह-ओ-सना कर रहा हूँ मैं

‘षोरिष’ मेरी नवा से ख़फ़ा है फ़क़ीह-ए-शहर
लेकिन जो कर रहा हूँ बजा कर रहा हूँ मैं

इस कशाकश में यहाँ उम्र-ए-रवाँ गुज़रे है

इस कशाकश में यहाँ उम्र-ए-रवाँ गुज़रे है
जैसे सहरा से कोई तिष्ना-दहाँ गुज़रे है

इस तरह तल्ख़ी-ए-अय्याम से बढ़ती है ख़राष
जैसे दुश्नाम अज़ीज़ों पे गिराँ गुज़रे हैं

इस तरह दोस्त दग़ा दे के चले जाते हैं
जैसे हर नफ़अ के रस्ते से ज़ियाँ गुज़रे हैं

यूँ भी पहुँचे हैं कुछ अफ़्साने हक़ीक़त के क़रीब
जैसे काबे से कोई पीर-ए-मुगाँ से गुज़रे है

हम गुनहगार जो उस सम्त निकल जाते हैं
एक आवाज़ सी आती है फ़लाँ गुज़रे है

रास्ते पुर-पेच राही रूस्तगार

रास्ते पुर-पेच राही रूस्तगार
रहबरों के नक़्श-ए-पा गुम हो गए

ज़बेत-ए-अम्वाज तेरा शुक्रिया
नाव डूबी ना-ख़ुदा गुम हो गए

शैख़ साहब हम-रह-ए-पीर-ए-मुग़ाँ
मय-कदे में क्या हुआ गुम हो गए

ख़ंदा-ए-महर-ए-दरख़्शाँ की क़सम
इस सहर के आश्ना गुम हो गए

अब कहाँ शेर-ओ-सुख़न की रौनक़ें
शाएर-ए-शोला-नवा गुम हो गए

सुरमई रातों से छिनवा कर सहर की रौनक़ें 

सुरमई रातों से छिनवा कर सहर की रौनक़ें
नाला-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ बेचता फिरता हूँ मैं

मौज बरबत मौज मौज सबा के साथ साथ
निकहत-ए-गेसू-ए-ख़ूबाँ बेचता फिरता हूँ मैं

दीदनी है अब मिरे चाक-ए-गिरेबाँ का मआल
कज-कुलाह हो के गिरेबाँ बेचता फिरता हूँ मैं

शोला-ए-तारीख़ की ज़द पर है ताज-ए-ख़ुसरवी
ग़र्रा-ए-तक़दीर-ए-सुल्ताँ बेचता फिरता हूँ मैं

कलबा-ए-मेहनत-कशाँ को दे के ग़ैरत का चराग़ ष्
शौकत-ए-क़स्र-ए-ज़र-अफ्शाँ बेचता फिरता हूँ मैं

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