‘शोला’ अलीगढ़ी की रचनाएँ

ऐ हज़रत ईसा नहीं कुछ जा-ए-सुख़न अब 

ऐ हज़रत ईसा नहीं कुछ जा-ए-सुख़न अब
वो आ गए रखवाइए तह कर के कफ़न अब

सींचा गया फूला है नए सिरे से चमन अब
अश्कों ने किए सब्ज़ मिरे दाग़-ए-कुहन अब

वो शौक़-ए-असीरी खुले गेसू के शिकन अब
तरसेंगे क़फ़स के लिए मुर्ग़ान-ए-चमन अब

ख़ामोशी ने मादूम किया और दहन अब
तुम ही कहो बाक़ी रही क्या जा-ए-सुख़न अब

यारान-ए-वतन को है ग़रीबों से किनारा
गुर्बत का तक़ाज़ा है करो तर्क-ए-वतन अब

सुन लीजिए कुछ क़िस्सा-ए-बे-ताबी-ए-दिल को
जो जी में हो कह लीजिए फिर मुश्फ़िक़-ए-मन अब

सीमाब बनाया बुत-ए-हिज्राँ ने जिगर को
दिल ठहरने देती नहीं सीना की जलन अब

आख़िर कोई हद भी तिरी ऐ दूरी-ए-ग़ुर्बत
मायूस हुए जाते हैं यारान-ए-वतन अब

क्या फ़िक्र है ऐ ‘शोला’ पियो बादा-ए-रंगीं
डालो भी कहीं भाड़ में ये रंज ओ मेहन अब

दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुगाँ रहा

दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुगाँ रहा
घर में ज़रा सी आग का कितना धुआँ रहा

शब भर ख़याल-ए-गेसू-ए-अम्बर-फिशाँ रहा
महका हुआ शमीम से सारा मकाँ रहा

क्या क्या न काविशों पे मिरी आसमाँ रहा
बिजली गिराई मुझ पे न जब आशियाँ रहा

महशर भी कोई दर्द है जो उठ के रह गया
शिकवा भी कोई ग़म है जो दिल में निहाँ रहा

ख़ुर्शीद आसमाँ पे रहा तू ज़मीं पे है
मीज़ान-ए-हुस्न में तेरा पल्ला गिराँ रहा

जीने में क्या मज़ा जो नहीं मौत का यकीं
मरने में लुत्फ़ क्या है जो वो बद-गुमाँ रहा

कसरत हिजाब-ए-दीदा-ए-आरिफ़ कभी नहीं
ज़र्रों में एक मेहर का जलवा अयाँ रहा

बीमार-ए-हिज्र मौत से उठ कर लिपट गया
वादे पे आया जब कोई तेरा गुमाँ रहा

दिल भी गया जिगर भी गया जान भी गई
मैं फिर भी देखता ही तिरी शोख़ियाँ रहा

ऐ ‘शोला’ क्या तबीअत-ए-नाज़ुक पे ज़ोर दूँ
क़द्र-ए-सुख़न रही न कोई क़द्र-दान रहा

दिल की इक हर्फ़ ओ हिकायात है ये भी न सही

दिल की इक हर्फ़ ओ हिकायात है ये भी न सही
गर मिरी बात में कुछ बात है ये भी न सही

ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें
इक बरस दिन की मुलाक़ात है ये भी न सही

दिल में जो कुछ है तुम्हारे नहीं पिन्हाँ मुझ से
ज़ाहिरी लुत्फ़ ओ मुदारात है ये भी न सही

ज़िंदगी हिज्र में भी यूँ ही गुज़र जाएगी
वस्ल की एक ही रात है ये भी न सही

मेरी तुर्बत पे लगाते नहीं ठोकर न लगाओ
ये ही बस उन की करामात है ये भी न सही

काट सकते हैं गला ख़ुद भी न कीजिए हमें क़त्ल
आप के हाथ में इक बात है ये भी न सही

क़त्ल-ए-क़ासिद पे कमर बाँधी हैं ‘शोला’ उस ने
ख़त किताबत की मुलाक़ात है ये भी न सही

हुजूम-ए-यास में लेने वो कब ख़बर आया 

हुजूम-ए-यास में लेने वो कब ख़बर आया
अजल न आई तो ग़श किस उमीद पर आया

बिछे हैं कू-ए-सितम-गर में जा-ब-जा ख़ंजर
रग-ए-गुलू का लहू पाँव में उतर आया

दिखाई मर्ग ने क्या क्या बुलंदी ओ पस्ती
चलें ज़मीं के तले आसमाँ नज़र आया

हमेशा अफ़ू तिरा है गुनाह का हामी
हमशो रहम तुझे मेरे हाल पर आया

बुतों में कोई भलाई भी है सिवाए सितम
बुरा हो तेरा दिल ना-सज़ा किधर आया

बनाई बात बिगड़ने ने रोज़-ए-महशर भी
उठे हैं खाक से हम जब वो गोर पर आया

कहाँ की आह ओ बुका बात बन गई ‘शोला’
ज़बाँ के हिलते ही फ़रीयाद में असर आया

कौन है तुझ से दा-चार नहीं 

कौन है तुझ से दो-चार नहीं
एक मैं ही ये गुनाह-गार नहीं

हाए फ़स्ल-ए-बहार ओ जोश-ए-जुनूँ
याँ गिरेबाँ में एक तार नहीं

सैंकड़ों दर्द इक नहीं दरमाँ
लाख ग़म कोई ग़म-गुसार नहीं

वस्ल क्या जब न हिज्र के हों मज़े
वादा क्या जिस का इंतिज़ार नहीं

हात आ जाए आप का दामन
हश्र का भी कुछ इंतिज़ार नहीं

क्या सबात दो-रोज़ा पर मर के
ज़िंदगी का कुछ ऐतबार नहीं

उस के कुश्तों का क्या पता ‘शोला’
कहीं तुर्बत नहीं मज़ार नहीं

मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का

मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का
काबा जहाँ जवाब न पाए सलाम का

सिक्का रवाँ है किस बुत-ए-महशर-ख़िराम का
नक़्श-ए-क़दम नगीं है क़यामत के नाम का

क्या पास-ए-ग़ैर-ए-क़सद है गर क़त्ल-ए-आम का
इक मुर्दा दूर रख दो मसीहा के नाम का

ऐ रह-रवाँ-ए-मंज़िल-ए-मक़सूद मरहबा
चमका कलस वो रौज़ा-ए-दारूस-सलाम का

ख़ंजर सँभालिये प-ए-तस्लीम ख़म हैं हम
गर्दन जवाब ले के उठेगी सलाम का

ग़श कैसा मैं तो तर्ज़-ए-तकल्लुम पे मर गया
मूसा ने कुछ भी लुत्फ़ न पाया कलाम का

मुझ से हुआ है वादा-ए-रोज़-ए-जज़ा अभी
देते हो क्या जवाब अदू के पयाम का

ऐ ‘शोला’ कह दो बुलबुल-ए-ख़ुल्द-बरीं से अब
गुलदस्ता बाँध ले मेरे रंगीं कलाम का

मुँह से तिरे सौ-बार के शरमाए हुए हैं 

मुँह से तिरे सौ-बार के शरमाए हुए हैं
क्या ज़र्फ़ हैं गुंचो का जो इतराए हुए हैं

कहते हैं गिनों मुझ पे जो दिल आए हुए हैं
कुछ छीने हुए हैं मिरे कुछ पाए हुए हैं

ख़ंजर पे नज़र है कभी दामन पे नज़र है
कौन आता है महशर में वो घबराए हुए हैं

लब पर है अगर आह तो आँखों में हैं आँसू
बादल ये बहुत देर से गरमाए हुए हैं

मय पीने में क्या ज़िद थी कोई ज़हर नहीं है
है तेरी क़सम ‘शोला’ क़सम खाए हुए हैं

न ख़ून-ए-दिल है न मय का ख़ुमार आँखों में

न ख़ून-ए-दिल है न मय का ख़ुमार आँखों में
बसी हुई है तुम्हारी बहार आँखों में

फिरी हैं पुतलियाँ बे-गाना-वार आँखों में
छुपा हुआ है कोई पर्दा-दार आँखों में

उम्मीद-ए-जलवा-ए-दीदार बाद-ए-मर्ग कहाँ
भरी है यास ने ख़ाक-ए-मज़ार-ए-आँखों में

दिए बग़ैर तिरे बाग़ में गुलों ने दाग़
चुभोए नर्गिस-ए-शहला ने ख़ार आँखों में

इलाही दीदा-ए-हैराँ खुला न रह जाए
ठहर न जाए कहीं इंतिज़ार आँखों में

वो रोने वाला हूँ ‘शोला’ कि बाद-ए-मर्ग मिरा
बनाएँ मर्दुम-ए-दीदा-ए-मज़ार आँखों में

शुक्र को शिकवा-ए-जफ़ा समझे

शुक्र को शिकवा-ए-जफ़ा समझे
क्या कहा मैं ने आप क्या समझे

हम तिरी बात नासेहा समझे
कोई समझै हुए को क्या समझे

मरज़ुल-मौत को शिफ़ा समझे
दर्द को जान की दवा समझे

इस तड़पने को मुद्दआ समझे
दिल-ए-बद-ख़ू तुझे ख़ुदा समझे

कर दिए इक जहाँ के बुत-ए-ख़ुद-बीं
ऐ सिंकदर तुझे ख़ुदा समझे

‘शोला’ कल ही तो मय-कदे में थे
आज तुम किसी को पारसा समझे

ज़ब्त-ए-फ़ुगाँ से आ गई होंटों पे जाँ तलक

ज़ब्त-ए-फ़ुगाँ से आ गई होंटों पे जाँ तलक
देखोगे मेरे सब्र की ताक़त कहाँ तलक

ग़फ़लत-शेआरहा के तग़ाफुल कहाँ तलक
जीता रहेगा कौन तेरे इम्तिहाँ तलक

वो मेरी आरजू थी जो घुट घुट के रह गई
वो दिल की बात थी जा ेन आई ज़बाँ तलक

गुलशन में आ के तुम तो अजब हाल कर गए
भूले हुए हैं मुर्ग़-ए-चमन आशियाँ तलक

पामाल करने ख़ाक उड़ाने से फ़ाएदा
ऐसे चलो कि मेरा मिटा दो निशाँ तलक

याद आए छुट के दाम से सय्याद के करम
पहुँचा दो मुझ को कोई मिरे मेहरबाँ तलक

‘शोला’ के बाद ख़त्म है ईजाद-ए-तर्ज़-ए-नौ
कुछ लुत्फ़ था सुख़न का उसी ख़ुश-बयाँ तलक

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