श्यामसुन्दर घोष की रचनाएँ

ये दिन आए

ये दिन आए ।

धूप करूँ नीलाम
न कोई बोली बोले,
आस-पास सूना-सूना
सन्नाटा डोले,
हवा हाँक दे,
कोई नहीं तनिक पतियाए ।

रंग-बिरंगे फूलों का
बाज़ार लगाऊँ,
और शाम तक कुछ न
बेच पाऊँ, पछताऊँ
देखे दुनिया,
ताना मारे हँसी उड़ाए ।

अब गीतों के होठों-कंठों
बसी उदासी,
सपने कवाँरे ही घर छोड़
हुए संन्यासी,
युग बीते
कलियों पर नहीं मधुप मँडराए ।

ये दिन आए ।

गया है घुन सभी कुछ

गया है घुन सभी कुछ
दूर तक गहरे, बहुत गहरे ।

बहुत चिनका हुआ शीशा
किसी ने रँग दिया जैसे,
बहुत चमका दिया हो या कि
घिसकर पुराने पैसे,

हुईं नज़रें सभी धुँधली
हुए हैं कान सब बहरे ।

बिवाई भरे पाँवों से
घिसटता चल रहा हर क्षण,
रुलाई रोककर सँभला
हुआ ज्यों-ज्यों सभी का मन,

ज़बां गूँगी सभी की
और उस पर हैं कड़े पहरे ।

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