श्याम कश्यप की रचनाएँ

क्रांतिकारी विचार 

तुम दफ़ना आए थे उन्हें
पहाड़ों के पार
गहरी क़ब्रों के भीतर

लेकिन वहाँ हरी-हरी घास उग आई है

भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ
भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़ कर
बाहर फूट रही हैं

आज नहीं तो कल यहाँ फूल खिलेंगे
उड़ेगी सुगंध चारों ओर दिगंत में ।

सृजन

क्या गढ़ रहे हो
ओ लुहार
मेरे तन की
इस भट्टी में
कच्चा लोहा ढल रहा है

पुलटस के नीचे
जैसे पकता है घाव
धीरे-धीरे
लहू की आँच में सिकता हुआ

इस कोख में
मिट्टी का अस्तर लगा है
जड़ें धरती में दूर तक
गई हुई हैं गहरी
अनंत-असंख्य जड़ों के साथ गुँथी हुई ।

मेहनतकशों का कोरस

बिजलियाँ भरी हैं इनमें
भड़कती बिजलियाँ
ये हमारे हाथ….

अनंत गतियाँ प्रवाहित हैं इनमें
तीव्रतम गतियाँ
ये हमारे पाँव….

मशालें जलती हैं इनमें
रेडियम की लौ
ये हमारी आँखें….

हमारे हाथ, हमारे पाँव, हमारी आँखें
बिजली की गति में गति को रोशनी में बदल रहे हैं
मस्तिष्क के परमाणुओं को तेज़ सक्रिय रश्मियों में

हम रोशनी की नदी हैं
प्रकाश के प्रपात
जहाँ अँधेरे के कगार घुल रहे हैं…
कितने कल-कारख़ाने इमारतें टैक्टर बन रहे हैं ।

अगर हमारे हाथ रूक जाएँ
पाँव थम जाएँ
आँखें फेर लें हम
तो बताओ किस अजायबघर में चली जाएगी
तुम्हारी दुनिया ?
हमें आँखें मत दिखाओ
गुर्राओ, धमकाओ नहीं मोटे सूअर
अपनी घड़ी की ओर देखो ज़माना क्या बजा रहा है !

काली हिरनी

श्रृंघश्चे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम ।।
-अभिज्ञान शाकुंतलम्‌; ६ : १७

मेरे दिल में कुलाँचें
भरती है एक काली हिरनी
मन करता है मेरा कि मैं
बन जाऊँ हिरन चितकबरा

अपने सुन्दर सींग की नोक से
खुजलाऊँ धीरे से हिरनी की
बड़ी-बड़ी आँखों की कोर-
नाभि से उड़ाता कस्तूरी-गंध !

प्रणय राग

तुम्हारे सीने के नर्म
घोंसले से बाहर फुदक
चहकने लगे हैं नन्हे दो तीतर

तीखी चोंच उनकी
नुकीली बर्छी-जैसी
मेरे दिल में अटक गई है बिंधकर ।

मेरी बाँहों में बंधी कसकर
चिपकी होठों से निश्शब्द
कुछ ऊपर उठ आई हो विकंपित

जहाँ आत्मा की परछाईं
दो जिस्मों के भीतर गिर रही है
काँपती हुई लौ में थरथराती-सी !

जैसे दूर किसी जल-प्रपात का शोर
बह रहा हो धीमा-
असंख्य-अनंत बूँदों में
टूट कर बिखरने से पेश्तर ।

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