श्रीकांत वर्मा की रचनाएँ

कुछ का व्यवहार बदल गया

कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह
काले निकले।

सिर्फ अभी रुख बदला है, आँखे बदली है,
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है,
क्या क्या नहीं होता।
अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसिआरे पुकारे जाओगे
अभी एक एक करके
सभी खिड़कियाँ बन्द होंगी
और तब भी तुम अपनी
खिड़की खुली
रखोगे,
इस डर से कि
जरा सी भी अपनी
खिड़की बन्द की तो
बाहर से एक पत्थर
एक घृणा का पत्थर
एक हीनता का पत्थर
एक प्रतिद्वन्दिता का पत्थर
एक विस्मय का पत्थर
एक मानवीय पत्थर
एक पैशाचिक पत्थर
एक दैवी पत्थर
तुम्हारी खिड़की के शीशे तोड़ कर जाएगा
और तुम पहले से अधिक विकृत नजर आओगे
पहले से अधिक
बिलखते बिसूरते नजर पड़ोगे
जैसा कि तुम दिखना नहीं चाहते
दिखाई पड़ोगे।

यह कोई पहली बार नहीं है
जब तुम्हें मार पड़ी है
कम से कम तीन तो
आज को मिला कर
हो चुके
मतलब है तीन बार,
मार।
और ऐसी मार कि तीनों बार
बिलबिला गया
निराला की कविता याद आती है
“जब कड़ी मारे पड़ीं,
दिल हिल गया।”

राजनीतिज्ञों ने मुझे

राजनीतिज्ञों ने मुझे पूरी तरह भुला
दिया।
अच्छा ही हुआ।
मुझे भी उन्हें भुला देना चाहिये।

बहुत से मित्र हैं, जिन्होंने आँखे फेर
ली हैं,
कतराने लगे हैं
शायद वे सोचते हैं
अब मेरे पास बचा क्या है?

मैं उन्हें क्या दे सकता हूँ?
और यह सच है
मैं उन्हे कुछ नहीं दे सकता।
मगर कोई मुझसे
मेरा “स्वत्व” नहीं छीन सकता।
मेरी कलम नहीं छीन सकता

यह कलम
जिसे मैंने राजनीति के धूल- धक्कड़ के बीच भी
हिफाजत से रखा
हर हालत में लिखता रहा

पूछो तो इसी के सहारे
जीता रहा
यही मेरी बैसाखी थी
इसी ने मुझसे बार बार कहा,
“हारिये ना हिम्मत बिसारिये ना राम।”
हिम्मत तो मैं कई बार हारा
मगर राम को मैंने
कभी नहीं बिसारा।
यही मेरी कलम
जो इस तरह मेरी है कि किसी और की
नहीं हो सकती
मुझे भवसागर पार करवाएगी
वैतरणी जैसे भी
हो,
पार कर ही लूँगा।

कोसल में विचारों की कमी है

महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !

युद्ध नहीं हुआ –

लौट गये शत्रु ।

वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !

चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं

दस सहस्र अश्व

लगभग इतने ही हाथी ।

कोई कसर न थी ।

युद्ध होता भी तो

नतीजा यही होता ।

न उनके पास अस्त्र थे

न अश्व

न हाथी

युद्ध हो भी कैसे सकता था !

निहत्थे थे वे ।

उनमें से हरेक अकेला था

और हरेक यह कहता था

प्रत्येक अकेला होता है !

जो भी हो

जय यह आपकी है ।

बधाई हो !

राजसूय पूरा हुआ

आप चक्रवर्ती हुए –

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं

जैसे कि यह –

कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता

कोसल में विचारों की कमी है ।

कलिंग

केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं

केवल अशोक सिर झुकाए हुए है
और सब
विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल अशोक के कानों में चीख़
गूँज रही है
और सब
हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं
केवल अशोक
लड़ रहा था ।

आस्था की प्रतिध्वनियां 

जीवन का तीर्थ बनी जीवन की आस्था।
आंसू के कलश लिए
हम तुम तक आती हैं।
हम तेरी पुत्री हैं, तेरी प्रतिध्वनियां हैं।
अपने अनागत को
हम यम के पाशों से वापस ले आने को आतुर हैं।
जीवन का तीर्थ बनी ओ मन की आस्था!
अंधकार में हमने जन्म लिया
और बढी,
रुइयों-सी हम, दैनिक द्वंद्वों में धुनी गईं।
कष्टों में बटी गईं,
सिसकी बन सुनी गईं,
हम सब विद्रोहिणियां कारा में चुनी गईं।
लेकिन कारा हमको
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है!
जन-जन का तीर्थ बनी ओ जन की आस्था!

मीरा-सी जहर पिए
हम तुझ तक आती हैं।
हम सब सरिताएं हैं।
समय की धमनियां हैं,
समय की शिराएं हैं।
समय का हृदय हमको चिर-जीवित रखना है।
इसीलिए हम इतनी तेजी से दौड रहीं,
रथ अपने मोड रहीं,
पथ पिछले छोड रहीं,
परम्परा तोड रहीं।

लौ बनकर हम युग के कुहरे को दाग रहीं।
सन्नाटे में ध्वनियां बनकर हम जाग रहीं।
जीवन का तीर्थ बनी, जीवन की आस्था।

टूटी पडी है परम्परा

टूटी पडी है परम्परा
शिव के धनुष-सी रखी रही परम्परा
कितने निपुण आए-गए
धनुर्धारी।
कौन इसे बौहे? और कौन इसे
कानों तक खींचे?
एक प्रश्नचिह्न-सी पडी रही परम्परा।
मैं सबमें छोटा और सबसे अल्पायु-
मैं भविष्यवासी।
मैंने छुआ ही था, जीवित हो उठी।
मैंने जो प्रत्यंचा खींची
तो टूट गई परम्परा।
मुझ पर दायित्व।
कंधों पर मेरे ज्यों, सहसा रख दी हो
किसी ने वसुंधरा।
सौंप मझे मर्यादाहीन लोक
टूटी पडी है परम्परा।

महामहिम 

महामहिम!
चोर दरवाज़े से निकल चलिए !
बाहर
हत्यारे हैं !

बहुक़्म आप
खोल दिए मैनें
जेल के दरवाज़े,
तोड़ दिया था
करोड़ वर्षों का सन्नाटा

महामहिम !
डरिए ! निकल चलिए !
किसी की आँखों में
हया नहीं
ईश्वर का भय नहीं
कोई नहीं कहेगा
“धन्यवाद” !

सब के हाथों में
कानून की किताब है
हाथ हिला पूछते हैं,
किसने लिखी थी
यह कानून की किताब ?

ऊब

स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं
पालने में शिशु।
चौंक या खिसिया रहे या पेड़ पर फन्दा लगा कर
आत्महत्या कर रहे हैं
शहर के मैदान।

उमस में डूबे हुए हैं घर सबेरा
घोंसले और घास
आ रहा या जा रहा है बक रहा या झक रहा है
निरर्थक कोई किसी के पास।
मृत्युधर्मी प्रेम अथवा प्रेमधर्मी मृत्यु;
अकारण चुम्बन तड़ातड़
अकारण सहवास।
हारकर सब लड़ रहे हैं
हारकर सब पूर्वजों से
झगड़ते पत्तों सरीखे झर रहे हैं
घूम कर प्रत्येक छत पर
उतर आया शहर का आकाश
हर दिवस मौसम बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं
हर घड़ी दुनिया बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भाग कर त्यौहार में
हैं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त
एक दुनियाँ से निकल कर दूसरी में जा रहे हैं
युद्ध, चुम्बन, पालने ले।
स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं।

भद्रवंश के प्रेत

छज्जों और आईनों, ट्रेनों और दूरबीन
कारों और पुस्तकों
यानी सुविधाओं के अद्वितीय चश्मों से
मुझे देखने वाले
अपमानित नगरों में सम्मानित नागरिकों
मुझे ध्यान से देखो
जेबी झिल्लियाँ सब उतार
मुझे नंगी आँखों देखो
पहिचानो।

मैं इस इतिहास के अँधेरे में, एक सड़ी और
फूली लाश सा
घिसटने वाला प्राणी कौन हूँ
ओ विपन्न सदियों के प्रभुजन, सम्पन्न जन।
मुझको पहिचानो
कुबडे, बूढे, कोढी, दैत्य सा तुम्हारे
हॉलो, शेल्फों, ड्रायर या ड्रेसिंग टेबल में
छिपने वाला प्राणी मैं कौन हूँ
पहिचानो, मुझको पहिचानो।

मेरी इस कूबड़ को जरा पास से देखो
मेरी गिलगिली पिलपिली बाँहें अपनें
दास्तानों से परे
अँगुलियों से महसूस करो
शायद तुमने इनको ग्रीवा के गिर्द कभी
पुष्प के धनुष सा भेंटा हो।

मुझसे मत बिचको
मुझे, घृणा की सिकुड़ी आँखों मत देखो
मुझसे मत भागो।
मेरे सिकुड़े टेढे ओठों पर ओठ रखो।
शायद तुमने इनमे कभी
किसी का
पूरा माँसल अस्तित्व कहीं भोगा होगा।
मेरी बह रही लार पर मत घिन लाओ
यह तुम हो
जो मुझसे हो कर गुजरे थे।
मेरी गल रही अंगुलियाँ देखो
पहचानो।
क्या मेरे सारे हस्ताक्षर धुंधला गये?
क्यों तुम मुझसे हरदम कटते हो?
क्यों मैं तुम्हारे सपनों में आ धमकता हूँ?
क्यों मैं तुम्हारे बच्चों को नहीं दिखता?
तुमको ही दिखता हूँ
जाओ
अपने बच्चों से पूछो।

एक और ढंग 

भागकर अकेलेपन से अपने
तुममें मैं गया।
सुविधा के कई वर्ष
तुमने व्यतीत किए।
कैसे?
कुछ स्मरण नहीं।

मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
पृष्ठ पर
अंकित थे
एक संयुक्ताक्षर!

क्या कहूँ! लिपि को नियति
केवल लिपि की नियति
थी –
तुममें से होकर भी,
बसकर भी
संग-संग रहकर भी
बिलकुल असंग हूँ।

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है
– लेकिन! क्यों लगता है मुझे
प्रेम
अकेले होने का ही
एक और ढंग है।

काशी का न्याय

सभा बरखास्त हो चुकी
सभासद चलें

जो होना था सो हुआ
अब हम, मुँह क्यों लटकाए हुए हैं?
क्या कशमकश है?
किससे डर रहे हैं?

फैसला हमने नहीं लिया –
सिर हिलाने का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया

बहसियों ने बहस की
हमने क्या किया?

हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं
न फैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार
काशी आते हैं –
सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला
जन्म के पहले हो चुका है।

काशी में शव

तुमने देखी है काशी?
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव –
उसी रास्ते
आता है शव!

शवों का क्या
शव आएँगे,
शव जाएँगे –

पूछो तो, किसका है यह शव?
रोहिताश्व का?
नहीं, नहीं,
हर शव रोहिताश्व नहीं हो सकता

जो होगा
दूर से पहचाना जाएगा
दूर से नहीं, तो
पास से –
और अगर पास से भी नहीं,
तो वह
रोहिताश्व नहीं हो सकता
और अगर हो भी तो
क्या फर्क पड़ेगा?

मित्रो,
तुमने तो देखी है काशी,
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव
उसी रास्ते
आता है शव!
तुमने सिर्फ यही तो किया
रास्ता दिया
और पूछा –
किसका है यह शव?

जिस किसी का था,
और किसका नहीं था,
कोई फर्क पड़ा ?

घर-धाम

मैं अब हो गया हूँ निढाल
अर्थहीन कार्यों में
नष्ट कर दिए
मैंने
साल-पर-साल
न जाने कितने साल!
– और अब भी
मैं नहीं जान पाया
है कहाँ मेरा योग?

मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं जंगलों
पहाड़ों में
खो जाना चाहता हूँ
मैं महुए के
वन में

एक कंडे सा
सुलगना, गुँगुवाना
धुँधुवाना
चाहता हूँ।

मैं जीना चाहता हूँ
और जीवन को
भासमान
करना चाहता हूँ।
मैं कपास धुनना चाहता हूँ
या
फावड़ा उठाना
चाहता हूँ
या
गारे पर ईंटें
बिठाना
चाहता हूँ
या पत्थरी नदी के एक ढोंके पर
जाकर
बैठ जाना
चाहता हूँ
मैं जंगलों के साथ
सुगबुगाना चाहता हूँ
और शहरों के साथ
चिलचिलाना
चाहता हूँ

मैं अब घर जाना चाहता हूँ

मैं विवाह करना चाहता हूँ
और
उसे प्यार
करना चाहता हूँ
मैं उसका पति
उसका प्रेमी
और
उसका सर्वस्व
उसे देना चाहता हूँ
और
उसकी गोद
भरना चाहता हूँ।

मैं अपने आसपास
अपना एक लोक
रचना चाहता हूँ।
मैं उसका पति, उसका प्रेमी
और
उसका सर्वस्व
उसे देना चाहता हूँ
और
पठार
ओढ़ लेना
चाहता हूँ।
मैं समूचा आकाश
इस भुजा पर
ताबीज की तरह
बाँध
लेना चाहता हूँ।
मैं महुए के बन में
एक कंडे-सा
सुलगना, गुँगुवाना
धुँधुवाना चाहता हूँ।
मैं अब घर
जाना चाहता हूँ।

टूटी पड़ी है परंपरा

टूटी पड़ी है परंपरा
शिव के धनुष-सी रखी रही परंपरा
कितने निपुण आए-गए
धनुर्धारी।
कौन इसे बौहे? और कौन इसे
कानों तक खींचे?
एक प्रश्नचिह्न-सी पड़ी रही परंपरा।
मैं सबमें छोटा और सबसे अल्पायु –
मैं भविष्यवासी।
मैंने छुआ ही था, जीवित हो उठी।
मैंने जो प्रत्यंचा खींची
तो टूट गई परंपरा।
मुझ पर दायित्व
कंधों पर मेरे ज्यों, सहसा रख दी हो
किसी ने वसुंधरा।
सौंप मुझे मर्यादाहीन लोक
टूटी पड़ी है परंपरा।

नकली कवियों की वसुंधरा 

धन्य यह वसुंधरा! मुख में
इतनी सारी
नदियों का झाग,
केशों में अंधकार!
एक अंतहीन प्रसव-पीड़ा में
पड़ी हुई
पल-पल
मनुष्य उगल रही है,
नगर फेंक रही है,
बिलों से मनुष्य निकल रहे हैं,
दरबों से मनुष्य निकल रहे हैं…
टोकरी के नीचे छिपे
मुर्गों के मसीहा कवि
बाँग दे रहे हैं
सुबह हुईऽऽ
धन्य! धन्य! कवियों की ऐयाशी झूठ में
लिपटी
वसुंधरा!
– वसुंधरा! सूजा हुआ है क्यों
उदर?
नसें क्यों
विषाक्त हैं?
साँसों में
सीले – जंगल – जैसी
यह कैसी
बास है
कवियों की झूठ में लिपटी हुई
वेश्या – माँ
अपनी संतानों का स्वर्ग देख रही है…

बरस रहा हैं अंधकार इस कुहासे पर
भुजा पर,
मसान पर,
समुद्र पर,
दुनिया-भर के तमाम
सोए हुए
बंदरगाहों पर
डूबती हुई अंतिम
प्रार्थना पर
बरस रहा है
अंधकार –
मगर वेश्याई स्वर्ग में
फोड़ों की तरह
उत्सव फूट रहे हैं।

बरस रहा है अंधकार!
मगर उल्लू के पट्ठे!
स्त्रियाँ-रिझाऊ कविताएँ
लिख रहे हैं।
भेड़ियों के कोरस की तमाच्छन्न अंध-रात्रि!
मनुष्य के अंदर
मनुष्य,
सदी के अंदर
एक सदी
खो रही है –

मगर इससे क्या! वसुंधरा
सोए मसानों में
जागते मसान
बो रही है।
आदमी का कोट पहन
चूहे
निर्वसन मनुष्य की
पीठ कस रहे हैं;
चुहियों के कंधों पर
पंख
फूट रहे हैं और कंठ में
क्लासिक संगीत!
अंधकार में सबके सब
बिल्लियों की तरह
लड़ रहे हैं।

नकली वसंत के
गोत्रहीन पत्ते
झड़ रहे हैं।
धन्य! धन्य! ओ नकली कवियों के वसंत में
लिपटी वसुंधरा !
– वसुंधरा! तेरे शरीर पर
झुर्रिया हैं
अथवा
दरार

होठों पर उफन रहा
पाप!
छटपट कर
टूट रहे
चट्टानी हाथ!
धो-धो जाता है
कौन
बार-बार आँसू से
कीचड़ से लथपथ
इस
पृथ्वी के पाँव?
नदियों पर झुका हुआ काँपता है कौन:
कवि
अथवा
सन्निपात?

जिज्ञासाहीन अंधकार में
कीचड़ की शय्या पर
स्वप्न देखी हुई
सुखी है वसुंधरा! मनुष्य
उगल रही है
नगर
फेंक रही है।
टोकरी के नीचे कवि बाँग दे रहे हैं।

प्रक्रिया 

मैं क्या कर रहा था
जब
सब जयकार कर रहे थे?
मैं भी जयकार कर रहा था –
डर रहा था
जिस तरह
सब डर रहे थे।
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘अजीज मेरा दुश्मन है?’

मैं भी कह रहा था,
‘अजीज मेरा दुश्मन है।’
मैं क्या कर रहा था
जब
सब कह रहे थे,
‘मुँह मत खोलो?’
मैं भी कह रहा था,
‘मुँह मत खोलो
बोला
जैसा सब बोलते हैं।’
खत्म हो चुकी है जयकार,
अजीज मारा जा चुका है,
मुँह बंद हो चुके हैं।

हैरत में सब पूछ रहे हैं,
यह कैसे हुआ?
जिस तरह सब पूछ रहे हैं
उसी तरह मैं भी
यह कैसे हुआ?

बुखार में कविता

मेरे जीवन में एक ऐसा वक्त आ गया है
जब खोने को
कुछ भी नहीं है मेरे पास –
दिन, दोस्ती, रवैया,
राजनीति,
गपशप, घास
और स्त्री हालाँकि वह बैठी हुई है
मेरे पास
कई साल से
क्षमाप्रार्थी हूँ मैं काल से
मैं जिसके सामने निहत्था हूँ
निसंग हूँ –
मुझे न किसी ने प्रस्तावित
किया है
न पेश।

मंच पर खड़े होकर
कुछ बेवकूफ चीख रहे हैं
कवि से
आशा करता है
सारा देश।
मूर्खो! देश को खोकर ही
मैंने प्राप्त की थी
यह कविता
जो किसी को भी हो सकती है
जिसके जीवन में
वह वक्त आ गया हो
जब कुछ भी नहीं हो उसके पास
खोने को।

जो न उम्मीद करता हो
न अपने से छल
जो न करता हो प्रश्न
न ढूँढ़ता हो हल।
हल ढूँढ़ने का काम
कवियों ने ऊबकर
सौंप दिया है
गणितज्ञ पर
और उसने
राजनीति पर।

कहाँ है तुम्हारा घर?
अपना देश खोकर कई देश लाँघ
पहाड़ से उतरती हुई
चिड़ियों का झुंड
यह पूछता हुआ ऊपर-ऊपर
गुजर जाता है : कहाँ है तुम्हारा घर?
दफ्तर में, होटल में, समाचार पत्र में,
सिनेमा में,
स्त्री के साथ एक खाट में?
नावें कई यात्रियों को
उतारकर
वेश्याओं की तरह
थकी पड़ी हैं घाट में।

मुझे दुख नहीं मैं किसी का नहीं हुआ।
दुख है कि मैंने सारा समय
हरेक का होने की
कोशिश की।
प्रेम किया।
प्रेम करते हुए
एक स्त्री के कहने पर
भविष्य की खोज की और एक दिन
सब कुछ पा लेने की
सरहद पर
दिखा एक द्वार: एक ड्राइंगरूम।
भविष्य
वर्तमान के लाउंज की तरह
कहीं जाकर खुल
जाता है।
रुको,
कोई आता है
सुनाई पड़ती है
किसी के पैरों की
चाप।

कोई मेरे
जूतों का माप
लेने आ रहा है।
मेरे तलुए घिस गए हैं
और फीतों की चाबुक
हिला-हिला
मैंने आसपास की भीड़ को
खदेड़ दिया है,
भगा दिया है।
औरों के साथ
दगा करती है स्त्री
मेरे साथ मैंने
दगा किया है।

पछतावा नहीं; यह एक कानून था जिसमें से होकर
मुझे आना था।
असल में यह एक
बहाना था
एक दिन अयोध्या से जाने का
मैं अपने कारखाने का
एक मजदूर भी
हो सकता था
मैं अपना अफसोस
ढो सकता था
बाजार में लाने को
बेचैन हो सकता था कविता
सुनाने को
फिर से एक बार इसे और उसे और उसे
पाने को
लेकिन एक बार उड़ जाने के बाद
इच्छाएँ
लौटकर नहीं आतीं
किसी और जगह पर
घोंसले बनाती हैं।

विधवाएँ बुड़बुड़ाती हैं
रँडापे पर
तरस खाती हैं
बुढ़ापे पर
नौजवान स्त्रियाँ
गली में ताक-झाँक करती हैं
चेचक और हैजे से
मरती हैं
बस्तियाँ
कैन्सर से
हस्तियाँ
वकील
रक्तचाप से
कोई नहीं
मरता
अपने पाप से
धुँआ उठ रहा है कई
माह से।
दिन चला जाता है
मारकर छलाँग एक खरगोश -सा।
बंद होनेवाली
दुकानों के दिल में
रह जाता है
कुछ-कुछ अफसोस-

माया-दर्पण 

देर से उठकर
छत पर सर धोती
खड़ी हुई है
देखते-ही-देखते
बड़ी हुई है
मेरी प्रतिभा
लड़ते-झगड़ते
मैं आ पहुँचा हूँ
उखड़ते-उखड़ते
भी
मैंने
रोप ही दिए पैर
बैर
मुझे लेना था
पता नहीं
कब क्या लिया था
क्या देना था!
अपना एकमात्र इस्तेमाल यही किया था –
एक सुई की तरह
अपने को
अपने परिवार से निकालकर
तुम्हारे जीर्ण जीवन को सिया था।
(दोनों हाथों में सँभाल
अपने होठों से
छुलाकर)
बहते हुए पानी में झुलाकर
अपने पाँव
मैं अनुभव कर रहा हूँ सबकुछ
बस छूकर
चला जाता है
छला जाता है
आकाश भी
सूर्य से
जो दूसरे दिन
आता नहीं है
कोई और सूर्य भेज देता है।

विजेता है
कौन
और
किसकी पराजय है –
सारा संसार अपने कामों में
फँसाए अपनी उँगलियाँ
उधेड़बुन करता है।
डरता है
मुझसे
मेरा पड़ोस।

मैं अपनी करतूतों का दरोगा हूँ।
नहीं, एक रोजनामचा हूँ
मुझमें मेरे अपराध
हू-ब-हू कविताओं-से
दर्ज हैं।
मर्ज हैं
जितने
उनसे ज्यादा इलाज हैं।
मेरे पास है कुछ कुत्ता-दिनों की
छायाएँ
और बिल्ली-रातों के
अंदाज हैं।

मैं इन दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मैं अपने दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मेरे लिए तुमसे भी बड़ा
यह सवाल है।
यह एक चाल है;
मैं हरेक के साथ
शतरंज खेल रहा हूँ
मैं अपने ऊलजलूल
एकांत में
सारी पृथ्वी को बेल रहा हूँ।

मैं हरेक नदी के साथ
सो रहा हूँ
मैं हरेक पहाड़
ढो रहा हूँ।
मैं सुखी
हो रहा हूँ
मैं दुखी
हो रहा हूँ
मैं सुखी-दुखी होकर
दुखी-सुखी
हो रहा हूँ
मैं न जाने किस कंदरा में
जाकर चिल्लाता हूँ : मैं
हो रहा हूँ। मैं
हो रहा हूँऽऽ

अनुगूँज नहीं जाती!
लपलपाती
मेरे पीछे
चली आ रही है।
चली आए।
मुझे अभी कई लड़कियों से
करना है प्रेम
मुझे अभी कई कुंडों में
करना है स्नान
अभी कई तहखानों की
करनी है सैर
मेरा सारा शरीर सूख चुका
मगर साबित हैं
पैर!
मैं अपना अंधकार, अपना सारा अंधकार
गंदे कपड़ों की
एक गठरी की तरह
फेंक सकता हूँ।
मैं अपनी मार खाई हुई
पीठ
सेंक सकता हूँ
धूप में
बेटियाँ और बहुएँ
सूप में
अपनी-अपनी
आयु के
दाने
बिन
रही
हैं।
सारे संसार की सभ्यताएँ दिन गिन रही हैं।
क्या मैं भी दिन गिनूँ?
अपने निरानंद में
रेंक और भाग और लीद रहे हैं गधे से
मैं पूछकर
आगे बढ़ जाता हूँ –
मगर खबरदार! मुझे कवि मत कहो।
मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ
ईजाद करता हूँ
गाली
फिर उसे बुदबुदाता हूँ।
मैं कविताएँ बकता नहीं हूँ।
मैं थकता नहीं हूँ
कोसते।
सरदी में अपनी संतान को
केवल अपनी
हिम्मत की रजाई में लपेटकर
पोसते
गरीबों के मुहल्ले से निकलकर
मैं
एक बंद नगर के दरवाजे पर
खड़ा हूँ।
मैं कई साल से
पता नहीं अपनी या किसकी
शर्म में
गड़ा हूँ!
तुमने मेरी शर्म नहीं देखी!
मैं मात कर
सकता हूँ
महिलाओं को।
मैं जानता हूँ
सारी दुनिया के
बनबिलावों को
हमेशा से जो बैठे हैं
ताक में
काफी दिनों से मैं
अनुभव करता हूँ तकलीफ
अपनी
नाक में!
मुझे पैदा होना था अमीर घराने में।

अमीर घराने में
पैदा होने की यह आकांक्षा
साथ-साथ
बड़ी होती है।
हरेक मोड़ पर
प्रेमिका की तरह
मृत्यु
खड़ी होती है।

शरीरांत के पहले
मैं सबकुछ निचोड़कर उसको दे जाऊँगा
जो भी मुझे मिलेगा।
मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ
किसी के न होने से कुछ भी नहीं होता;
मेरे न होने से कुछ भी नहीं हिलेगा।
मेरे पास कुरसी भी नहीं जो खाली हो।
मनुष्य वकील हो, नेता हो, संत हो, मवाली हो –
किसी के न होने से
कुछ भी नहीं होता।
नाटक की समाप्ति पर
आँसू मत बहाओ।
रेल की खिड़की से
हाथ मत हिलाओ।

हस्तक्षेप 

कोई छींकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाय,
मगध को बनाए रखना है, तो,
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए

मगध है, तो शांति है
कोई चीखता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाय
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए

मगध में न रही
तो कहाँ रहेगी?

क्या कहेंगे लोग?

लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है,
रहने को नहीं

कोई टोकता तक नहीं
इस डर से

कि मगध में
टोकने का रिवाज न बन जाय
एक बार शुरू होने पर

कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप –
वैसे तो मगधनिवासियो
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से –
जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुजरता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है –
मनुष्य क्यों मरता है?

हस्तिनापुर का रिवाज 

मैं फिर कहता हूँ
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा –
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता!
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं –

जो सुनते हैं
बहरे हैं या
अनसुनी करने के लिए
नियुक्त किए गए हैं

मैं फिर कहता हूँ
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा –
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियो! होशियार!
हस्तिनापुर में
तुम्हारा एक शत्रु पल रहा है, विचार –
और याद रखो
आजकल महामारी की तरह फैल जाता है
विचार।

तीसरा रास्ता 

मगध में शोर है कि मगध में शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण
इस लायक
नहीं रहे
कि उन्हें हम
मगध का शासक कह सकें

लगभग यही शोर है
अवंती में
यही कोसल में
यही
विदर्भ में
कि शासक नहीं
रहे

जो थे
उन्हें मदिरा, प्रमाद और आलस्य ने
इस
लायक नहीं
रखा

कि उन्हें हम अपना शासक कह सकें
तब हम क्या करें?

शासक नहीं होंगे
तो कानून नहीं होगा

कानून नहीं होगा
तो व्यवस्था नहीं होगी

व्यवस्था नहीं होगी
तो धर्म नहीं होगा

धर्म नहीं होगा
तो समाज नहीं होगा

समाज नहीं होगा
तो व्यक्ति नहीं होगा

व्यक्ति नहीं होगा
तो हम नहीं होंगे

हम क्या करें?

कानून को तोड़ दें?

धर्म को छोड़ दें?

व्यवस्था को भंग करें?
मित्रो-
दो ही
रास्ते हैं :
दुर्नीति पर चलें
नीति पर बहस
बनाए रखें

दुराचरण करें
सदाचार की
चर्चा चलाए रखें

असत्य कहें
असत्य करें
असत्य जिएँ

सत्य के लिए
मर-मिटने की आन नहीं छोड़ें

अंत में,

प्राण तो
सभी छोड़ते हैं

व्यर्थ के लिए
हम
प्राण नहीं छोड़ें
मित्रो,
तीसरा रास्ता भी
है –

मगर वह
मगध,
अवन्ती
कोसल
या
विदर्भ
होकर नहीं
जाता।

एक मुर्दे का बयान 

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ।
मेरे पास कुछ भी नहीं है-
न मेरी कविताएँ हैं, न मेरे पाठक हैं
न मेरा अधिकार है
यहाँ तक कि मेरी सिगरटें भी नहीं हैं।
मैं ग़लत समय की कविताएँ लिखता हुआ
नकली सिगरेट पी रहा हूँ।
मैं एक अदृश्य दुनिया में जी रहा हूँ
और अपने को टटोल कह सकता हूँ
दावे के साथ
मैं एक साथ ही मुर्दा भी हूँ और ऊदबिलाव भी।
मैं एक बासी दुनिया की मिट्टी में
दबा हुआ
अपने को खोद रहा हूँ।

मैं एक बिल्ली की शक्ल में छिपा हुआ चूहा हूँ
औरों को टोहता हुआ
अपनों में डरा बैठा हूँ
मैं अपने को टटोल कह सकता हूँ दावे के साथ
मैं ग़लत समय की कविताएँ लिखता हुआ
एक बासी दुनिया में
मर गया था।

मैं एक कवि था। मैं एक झूठ था।
मैं एक बीमा कम्पनी का एजेन्ट था।
मैं एक सड़ा हुआ प्रेम था
मैं एक मिथ्या कर्त्तव्य था
मौक़ा पड़ने पर नेपोलियन था
मौक़ा पड़ने पर शही द था।

मैं एक ग़लत बीबी का नेपोलियन था।
मैं एक
ग़लत जनता का शहीद था!

ट्राय का घोड़ा 

पहला बड़ी तेज़ी से गुज़रता है,
दूसरा बगटूट भागता है–
उसे दम मारने की
फुर्सत नहीं,
तीसरा बिजली की तरह गुज़र जाता है,
चौथा
सुपरसौनिक स्पीड से !

कहाँ जा रहे हैं, वे ?
क्यों भाग रहे हैं ?
क्या कोई उनका पीछा कर रहा है ?
क्या उनकी ट्रेन छूट रही है ?
मैं अपने बगल के व्यक्ति से पूछता हूँ !

‘कहीं नहीं जा रहे हैं, वे’,
मेरे पास खड़ा व्यक्ति कहता है,
‘वे भाग भी नहीं रहे हैं,
कोई उनका पीछा नहीं कर रहा है
उनकी ट्रेन बहुत पहले छूट चुकी है।’

‘फिर वे क्यों इस तरह गुज़र रहे हैं ?’
‘क्योंकि उन्हे इसी तरह गुज़रना है !’
‘कौन हैं, वे ?’
‘घोड़े हैं !’
‘घोड़े ?’

‘हाँ, वे घुड़दौड़ में शामिल हैं ।
पहला दस हजार वर्षों में
यहाँ तक पहुँचा है ।
दूसरा
एथेंस से चला था,
उसे वॉल स्ट्रीट तक पहुँचना है ।
तीसरा
नेपोलियन का घोड़ा है,
एल्प्स पर चढ़ता, फिर
एल्प्स से उतरता है ।
चौथा बाज़ारू है, जो भी चाहे,
उस पर दाँव लगा सकता है ।’

यह कहकर मेरे पास खड़ा व्यक्ति
घोड़ की तरह हिनहिनाता है,
अपने दो हाथों को
अगले दो पैरों की तरह उठा
हवा में थिरकता
फिर सड़क पर सरपट भागता है ।

चकित में दूसरे व्यक्ति से कहता हूँ,
‘पागल है !’
‘नहीं, वह घोड़ा है।’ तमाशबीन कहता है ।
‘वह कहाँ जा रहा है ?’
‘उसे पता नहीं’
‘वह क्यों भाग रहा है ?’
‘उसे पता नहीं’
वह क्या चाहता है ?’
‘उसे पता नहीं’ ।

इतना कह हमसफ़र
अपने थैले से ज़ीन निकाल
मेरी पीठ पर कसता है !
चीखता हूँ मैं,
जूझता हूँ मैं,
गुत्थम गुत्थ, हाँफता हूँ मैं !

मेरी पीठ पर बैठा सवार
हवा में चाबुक उछाल, मुझसे कहता है–
‘इसके पहले कि तुम्हें
शामिल कर दिया जाय दौड़ में,
मैं चाहता हूँ,
तुम ख़ुद से पूछो, तुम कौन हो ?’
‘मैं दावे से कह सकता हूँ, मनुष्य हूँ ।’
‘नहीं, तुम काठ हो !
तुम्हारे अंदर दस हज़ार घोड़े हैं,
सौ हजार सैनिक हैं,
तुम छद्म हो ।

जितनी बार पैदा हुए हो तुम,
उतनी बार मारे गये हो !
तुम अमर नहीं,
इच्छा अमर है, संक्रामक है ।
बोलो, क्या चाहते हो ?’ मुझसे
पूछता है, सवार ।

अपने दो हाथों को अगले दो पैरों की तरह
उठा,
पूँछ का गुच्छा हिलाता,
कहे जाता हूँ मै,
‘मैं दस हजार वर्षों तक चलना
चाहता हूँ,
मैं एथेंस से चलकर
वॉल स्ट्रीट तक पहुँचना चाहता हूँ,
मैं एल्प्स पर चढ़ना
फिर एल्प्स से उतरना चाहता हूँ,
मैं, जो चाहे, उसके,
दाँव पर लगना चाहता हूँ ।’

उमंग में भरा हूआ मैं, यह भी नहीं पूछता,
अगला पड़ाव
कितनी दूर है ?
हैं भी, या नहीं हैं ?

प्रतीक्षा

दीख नहीं पड़ते हैं अश्वारोही लेकिन
सुन पड़ती है टाप;
— झेल रहा हूँ शाप।

मगध के लोग 

मगध के लोग
मृतकों की हड्डियां चुन रहे हैं

कौन-सी अशोक की हैं?
और चन्द्रगुप्त की?
नहीं, नहीं
ये बिम्बिसार की नहीं हो सकतीं
अजातशत्रु की हैं,

कहते हैं मगध के लोग
और आँसू
बहाते हैं

स्वाभाविक है

जिसने किसी को जीवित देखा हो
वही उसे
मृत देखता है
जिसने जीवित नहीं देखा
मृत क्या देखेगा?

कल की बात है –
मगधवासियों ने
अशोक को देखा था
कलिंग को जाते
कलिंग से आते
चन्द्रगुप्त को तक्षशिला की ओर घोड़ा दौड़ाते
आँसू बहाते
बिम्बिसार को
अजातशत्रु को
भुजा थपथपाते

मगध के लोगों ने
देखा था
और वे भूल नहीं पाये हैं
कि उन्होंने उन्हें
देखा था

जो अब
ढ़ूँढ़ने पर भी
दिखाई नहीं पड़ते

फागुन

फागुन भी नटुआ है, गायक है, मंदरी है।
अह। इसकी वंशी सुन
सुधियां बौराती हैं।

अपनी दुबली अंगुली से जब यह जादूगर
कहीं तमतमायी
दुपहर को छू देता है,
महुए के फूल कहीं चुपके चू जाते हैं
और किसी झुंझकुर से चिड़िया उड़ जाती है।
अह। इसकी वंशी सुन….।।

जब फगुनी हवा कहीं
मोरों के गुच्छ हिला
ताल तलैया नखा तीर पर टहलती है
ऋतु की सुधियां शायद
टेसू बनकर, वन वन
शाख पर सुलगती हैं।

दिन जब टूटे पीले पत्ते सा कांप कहीं
ओझल हो जाता है
संझा जब उमसायी, किसी
ताल-तीर बांस झुरमुट से झांक मुंह दिखाती है,
सरसों के खेतों में पीली
जब एक किरन
गिर गुम हो जाती है,
मेड़ों पर जब जल्दी-जल्दी
कोई छाया
आकुल दिख पड़ती है,
दूर किसी जंगल से मंदरी यह आता है
धिंग धिंग धा धा धिंग धा
धा धिंग धा धा धिंग धा
मांदल धमकाता है,
हौले हौले घर-आंगन में छा जाता है।
इस सूने जीवन में बांसुरी बजाता है।
अह! आह इसकी वंशी सुन…।

स्वरों का समर्पण 

डबडब अँधेरे में, समय की नदी में
अपने-अपने दिये सिरा दो;
शायद कोई दिया क्षितिज तक जा,
सूरज बन जाए!!

हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे,
अगर कहीं शीश झुका
बैठे हों मेड़ों पर
पंथी पथहारे,
अगर किसी घाटी भटकी हों छायाएँ,
अगर किसी मस्तक पर
जर्जर हों जीवन की
त्रिपथगा ऋचाएँ;

पीड़ा की यात्रा के ओ पूरब-यात्री!
अपनी यह नन्हीं-सी आस्था तिरा दो
शायद यह आस्था किसी प्रिय को
तट तक ले जाए!!

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