श्रीकृष्ण तिवारी की रचनाएँ

नवगीत – 1

क्या हुए वे रेत पर उभरे
नदी के पांव
जिन्हें लेकर लहर आई थी
हमारे गाँव

आइना वह कहाँ जिसमें
हम संवारे रूप
रोशनी के लिए झेलें
अब कहाँ तक धूप
क्या हुई वह
मोरपंखी बादलों की छाँव

फूल पर नाखून के क्यों
उभर आये दाग
बस्तियों में एक जंगल
बो गया क्यों आग
वक्त लेकर जिन्हें आया था
हमारे गाँव

नवगीत – 2

भीलों ने बाँट लिए वन
राजा को खबर तक नहीं

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं

नवगीत – 3

मीठी लगने लगी नीम की पत्ती -पत्ती
लगता है यह दौर सांप का डसा हुआ है

मुर्दा टीलों से लेकर
जिन्दा बस्ती तक
ज़ख्मी अहसासों की
एक नदी बहती है
हारे और थके पांवों ,टूटे चेहरों की
ख़ामोशी से अनजानी पीड़ा झरती है
एक कमल का जाने कैसा
आकर्षण है
हर सूरज कीचड़ में
सिर तक धंसा हुआ है

अंधियारे में
पिछले दरवाजे से घुसकर
कोई हवा घरों के दर्पण तोड़ रही है
कमरे -कमरे बाहर का नंगापन बोकर
आंगन -आंगन को
जंगल से जोड़ रही है
ठण्डी आग हरे पेड़ों में सुलग रही है
पंजों में आकाश
धुंए के कसा हुआ है

नवगीत – 4 

कुछ के रुख दक्षिण
कुछ वाम
सूरज के घोड़े हो गए
बेलगाम

थोड़ी- सी तेज हुई हवा
और हिल गई सड़क
लुढ़क गया शहर एक ओर
ख़ामोशी उतर गई केंचुल -सी
माथे के उपर बहने लगा
तेज धार पानी सा शोर
अफ़वाहों के हाथों
चेक की तरह भूनने लग गई
आवारा सुबह और शाम

पत्थर को चीरती हुई सभी
आवाज़ें कहीं गईं मर
गरमाहट सिर्फ राख की
जिन्दा है इस मौसम भर
ताश -महल फिर बनने लग गया
चुस्त लगे होने फिर
हुकुम के गुलाम |

नवगीत – 5

वक्त की आवाज़ पर
फिर फेंकने दो एक पत्थर और
शायद
बन्द शीशे के घरों में लोग
बाहर निकल आएं|

देखता हूँ —
रोपकर पीछे अँधेरा,
बहुत आगे बढ़ गया है सूर्य का रथ
उसे मुड़ना चाहिए अब|
छोड़कर आकाश
टूटे गुम्बदों में रह रहे हैं जो कबूतर
उन्हें उड़ना चाहिए अब|
सनसनाती हवा की ऊँगली पकड़कर
घूमने दो आईने को फिर शहर में
कौन जाने आज के ये सभी चेहरे
कल सुबह तक बदल जाएँ|

जानता हूँ –
आंधियां जिस राह से होकर गयी हैं,
उस तरफ़ साबूत कोई मील का
पत्थर नहीं है|
और यह भी जानता हूँ —
हाथ फिर से जो हवा में तन रहे हैं|
उन्हें कन्धों से अलग करना
किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं है|
इसलिए अब
धुंआ बनकर छा रही खामोशियों से
फूटने दो आग के स्वर
बहुत मुमकिन है
धमनियों में जमे कतरे खून के
फिर पिघल जाएँ|

नवगीत – 6

बांस वनों से गूंज सीटियों की आयी,
सन्नाटे की झील पांव तक थर्रायी|

अनदेखे हाथों ने लाकर चिपकाये
दीवारों पर टूटे पंख तितलियों के,
लहर भिगोकर कपड़े पोंछ गयी सारे
दरवाजे पर उभरे चिन्ह उँगलियों के,
खिड़की पर बैठे -बैठे मन भर आया
द्वार बन्द कमरे में तबियत घबरायी|

शीशे के जारों में बन्द मछलियों ने
सूनी आकृतियों में रंग भरे गहरे,
शब्दों को हिलने -डुलने न कहीं देते
नये -पुराने अर्थों के दुहरे पहरे,
एक प्रश्न जो सारे बंधन खोल गया
उत्तर की सीमा उसको न बांध पायी|

कमरे के कोने में पत्र पड़े कल के
हवा उड़ा ले गयी साथ गलियारों में,
सारा का सारा घर -आंगन भींग गया
गली सड़क को धोती हुई फुहारों में,
टकराकर बंट गयी हजारों कोणों में
आदमकद दर्पण में मेरी परछाईं|

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