श्वेता राय की रचनाएँ

हम तुम

प्रिय चाँद बनो तुम रजनी के, मैं फूल बनी मुस्काऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना,मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥
तुम बाँह धरे हो प्रिय जबसे, उर उपवन सा महके मेरा।
हिय धड़कन में है ताल नई, अब अंग अंग दहके मेरा॥
तुम भँवरा बन गुंजन करना, मैं तितली बन इतराऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे…
तुमसे उजियाली भोर हुई, तुमसे है संझा मतवाली।
तुमसे भावों को रंग मिले,तुमसे जगमग जीवन पाली॥
तुम सागर से लहराना प्रिय, मैं नौका बन बलखाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना…
जग की सुंदरता है तुमसे, तुमसे ही जग है सब मेरा।
जीना है अब तो साथ मुझे, दृग द्वार बसेरा अब तेरा॥
तुम पंचम सुर का राग लिये,मैं सरगम बन सज जाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना, मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥

साथी! अपना प्यार

साथी! अपना प्यार, लगे है नभ का तारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

सर्दी की तू धूप, लगे फागुन सी प्यारी।
धर के रूप अनूप, खिले तू हिय की क्यारी॥
मैं मरुथल हूँ थार, नदी की तू है धारा।
प्रेम लिए संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

मेरे मन की चाह, घटा बन तुम ही छाओ।
जीवन की हर राह, प्रेम सागर छलकाओ॥
मन से मन को हार, बसे हम दृग के कारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

जीवन की हर श्वास, कहे है एक कहानी।
पूरी कर दो आस, बनो तुम मेरी रानी॥
जीवन मधुपल चार, प्यार का मैं हूँ मारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगे जीवन सारा॥

फूले फूल बसंत /

फूले फूल बसंत, प्रिये जब से तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
तुमसे ही दिनरात, महकती हिय की क्यारी।
सपनोँ की सौग़ात, लगे ये दुनिया प्यारी॥
हिय तो पंख पसार, गगन में उड़ता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
मीठी तेरी बात, हृदय में मिसरी घोले।
बनके पीपर पात, सरस मन मेरा डोले॥
कोयल से ले राग, गीत उर गाता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
सतरंगी है साथ, खिले सुमनों सा प्यारा।
सुख दुःख सबके साथ, सजेगा जीवन प्यारा॥
नीरव काली रात, भोर स्वर्णिम ले आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
फूले फूल बसंत, प्रिये जबसे तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥

सावनी गीत

नभ ने अपने अमृत घट से, प्रेम अमिय छलकाया।
रिमझिम लड़ियाँ रूप धरे प्रिय, देखो सावन आया॥
खिली खिली है हरित वसन को, पहने तरुणी लतिका।
धुली धुली लगती है सारी, तरु आच्छादित पतिका॥
कोयल छेड़े राग पंचमी, मन भौरा भरमाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
फूलों से ले गंध प्रीत की, बहती है पुरवाई।
अंतस में मेरे बजती है, मधुर मिलन शहनाई॥
अलसाये नयनों में तेरे, सपनोँ ने घर पाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
हरे हो रहे बाग़ लता वन, नदी बनी नखरीली।
दादुर झींगुर पिक की बोली, छेड़े तान सुरीली॥
हर्ष प्रीत का मधुमयी आँचल, धरती पर लहराया।
रिमझिम लड़ियाँ…

साथी मेरे

लहरें जो सागर से करती और हवायें मधुवन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

गीतों में छंदों सा तुम हो
अधरों पर सजते हरदम
अंतस के धड़कन सा तुम हो
श्वासों पर बजते थम थम
पायल जो पैरों से करती और कलाई कंगन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

प्रातकाल की आभा तुम हो
सृष्टि में जो जान भरे
चाँद रात की शोभा तुम हो
मन के जो संताप हरे
कलियाँ जो भौरों से करती और घटायें सावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

वेद ऋचा से पावन तुम हो
मंत्र हो पूजा में मेरी
आस दीप सा जलते तुम हो
आती जब भी रात अँधेरी
मीरा जो कान्हा से करती और शिव गंगा पावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से…

बहता है बन प्राण प्रिये 

धरा-गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन के गान प्रिये।
मन से मन को जोड़ करे जो जगती से अनजान प्रिये।

पावस की रिमझिम बूंदों से, बहता सरिता में कलकल।
निर्झर के झर झर में घुल कर, छलके है ये छल छल छल।
बढ़ता जाता नित प्रतिदिन ये, निज से प्रिय के आनन तक,
भावों के इस प्रबल वेग से, मच जाती मन में हलचल।

पात डाल तरु लता तृणों में, बहता है बन प्राण प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत अधर जब छू जाते तब, चमके तन बन कर सोना।
हुलसित होती हिय की धरती महके मन का हर कोना।
दृग गागर सागर छलकाता, फूलों से ले के मधु जल,
प्यारा लगता है फिर जग में, चैन रैन का भी खोना।

लघुता को भी अमर करे जो, ऐसा ये वरदान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत रीत में डूबी दुनिया,लगती है वैसी प्यारी।
घने तिमिर को हर लेती है, जैसे किरणें उजियारी।
मधुर मिलन से पुष्पित होती,मन उपवन की हर डाली,
गंगा मीरा राधा तुलसी, प्रेम सुधा की है क्यारी,

कान्हा की बंसी में बसता, बन भावों की खान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

स्मृतिशेष शिवांगी

(बहन की स्मृति में)

एक नाजुक थी कली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मन कनक सम वो सुहाई।
माघ में जब गोद आई।
उर्मियोँ से दीप्ति लेकर,
जग हृदय पर खूब छाई।
श्वास में सबके घुली वो।
झर गई है अधखिली जो॥

थी प्रथम कुरुक्षेत्र में वो।
नेह रखती नेत्र में वो।
छू गई सोपान पहला,
रुग्णता के क्षेत्र में वो।
चाँदनी मधु से जली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मलयनिल जब बह रही थी।
ताप वो अति सह रही थी।
जूझती थी आस से पर
मृत्यु उसको गह रही थी।
हाथ नियति के तुली वो।
झर गई है अधखिली जो।

सेज पर लेटी सुहागन।
स्वप्न दृग में भर सुहावन।
बन गई निष्ठुर जगत से,
छोड़ कर सुत एक पावन।
मोड़ मुँह सबसे चली वो।
झर गई है अधखिली जो।

(कोई भरपाई नहीं है समय के पास अपनी क्रूरता की)

15 नवम्बर 2016

सुनो कवि!

सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।
सहला जाये जो तन मन को, मान लिखो मनुहार लिखो।

लिखो नदी क्यों बहती कलकल, कोयल कैसे गाती है।
कैसे करते शोर पखेरू, भोर किरण जब आती है।
बहका सहका मन क्यों होता, ऋतुओं के इतराने से,
क्यों खिलती हैं कलियाँ सारी, भ्रमरों के मुस्काने से।

छुअन लिखो तुम पुरवा वाली, बहती मस्त बयार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।

शब्दों में तुम लिखो खिलौने, रंग भावना का लिख दो।
बालू मिट्टी से रचने का, ढंग अल्पना का लिख दो॥
लिख दो बच्चे क्यों रोते हैं, माँ का आँचल पाने को।
क्यों जगती सबकी तरुणाई, अम्बर में छा जाने को॥

करता है जो जड़ को चेतन, ऐसी मस्त फुहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

लिखो चाँदनी कैसे आकर, सोये ख्वाब जगाती है।
कैसे काली नीरव रजनी, मन को भय दिखलाती है॥
कैसे होती रात सुहावन, धड़कन सरगम बनती हैं।
संझा को अंतस में आकर, सुधियाँ कैसे ठनती है॥

मकरागति सूरज को कर के, आती मस्त बहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

मैं प्यार चाहती हूँ

है रात आज काली, घनघोर है अँधेरा।
बेचैनियाँ हृदय में, करने लगी बसेरा॥
भीगी हुई हवायें, बंसी बजा रही हैं।
आँसू भरे नयन में, सपने सजा रही हैं॥
तुम दूर जा रहे हो, या पास आ रहे हो।
इतना मुझे बता दो, तुम क्यों सता रहे हो॥
प्रिय! प्रेम का सदा मैं, श्रृंगार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

मन में जगी उमंगें, प्रिय साथ हो हमारा।
मझधार में फंसे हो, या दूर हो किनारा॥
उर भाव की नदी में, संचार भाव भर दो।
हिमशीत से पलों में, अभिसार भाव भर दो॥
अपने अधर कमल से, संजीवनी पिला दो।
मृतप्राय हो रही मैं, नव प्राण पुंज ला दो॥
सौभाग्य पर तुम्हारे, अधिकार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

ठहरी लगे धरा ये, आकाश घूमता क्यों।
दृग झील के कँवल को, ये चाँद चूमता क्यों॥
हर राह खिल रही है, गलियाँ महक रही क्यों।
बिन वात के बसंती, पीहू चहक रही क्यों॥
प्रिय! साथ से तुम्हारे, हर रात जगमगाती।
परिजात से महक ले, हर बात महमहाती॥
आकाश से धरा तक, विस्तार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ!!

पतझड़ की रात

रश्मियाँ शशि की गगन से, ओस मधु बरसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

झर रहे हैं पात सारे, तरु अकेले हैं खड़े।
खो गईं हैं कोयलें भी, शीत के पहरे पड़े॥
डालियाँ गुमसुम हुईं हैं, कण सजल सारे हुये।
पंखुरी चुपचाप झरती, स्वप्न भी खारे हुये॥

धुंध में लिपटी दिशायें, गीत अविरल गा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

शोभती है चाँदनी भी, दूब पर बन जल अभी।
झिलमिलाती यामिनी भी, लग रहीं निर्मल अभी॥
ये सुखद पल अब शिशिर का, दे रहा विश्वास है।
बाँध कर धरती गगन को, भर रहा इक आस है॥

तारिकाएं श्वेत आँचल, शून्य से ढलका रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

कब सवेरा हो रहा है, रात कब बीती कहो।
उर्मियाँ भी कह रही हैं, दूरियाँ प्रिय की सहो॥
याद बन कर हूक उठती, सेज पर सोई हुई।
भोर में लगती धरा ये, रात भर रोई हुई॥

आग बन कर ये हवायें, अब मुझे झुलसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रही॥

थामते थे तुम प्रिये जब 

श्वेत होती मालती थी, चाँदनी बरसात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में॥

नींद में खोया जहां था कामना पर थी जगी।
अधमुँदे से नैन में प्रिय प्रीत अपनी थी पगी।
ताल ले कर श्वास से फिर बढ़ रही थी धड़कने,
चाह में पागल हृदय को भा रही थी ये ठगी।
मधु छुअन से कौंधती थी दामिनी प्रिय गात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में॥

मिट रही थीँ दूरियाँ सब, आ रहे थे पास हम।
आँजुरी में भर रहे थे साथ का विश्वास हम।
चाँद देता था गवाही तारिकाएं लिपि बनी,
अश्रु से मन भूमि पर प्रिय सींचते थे आस हम।
रैन जगती भोर तक फिर, भाव भींगे बात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में।

छू अधर को तुम अधर से झांकते थे नैन में।
बोलते थे प्रियतमा तुम घोल कर मधु बैन में।
पूर्ण फिर दोनों हुये थे, प्रीत के अधिकार से
देह का अवलम्ब लेजब चैन पाये रैन में।
छा गये थे रंग प्यारे तरु लता हर पात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

खो गई सम्वेदना अब खो गये अहसास क्यों।
प्यार में भीगे हुये पल कर रहे परिहास क्यों।
यत्न सारे बह गये हैं क्यों समय की धार में,
दूरियाँ आ छीनती हैं विगत पल के हास क्यों।
उलझती थी कब सहजता प्रिय समय के घात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

ज़िन्दगानी

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेज दिनकर का भरो तुम।
धीर सागर का धरो तुम॥
चंद्र सम शीतल बनो तुम।
तरु बने जिद पर तनो तुम॥
ले नदी से फिर रवानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

छल कपट से दूर रहना।
मत किसी को शत्रु कहना।
मित्र बन संताप हरना।
राह में बढ़ हाथ धरना॥
भूल कर बातें पुरानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

राग हिय में तुम भरो सब।
प्रीत जीवन में करो सब॥
मन बनाओ भाव सुरभित।
छेड़ दे जो गीत मधुरित॥
भूल के निदियाँ सुहानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेरी यादें 

 

तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

रातों की नीदें हुई गायब
तारे गिनकर कटती रैन
दिन में भी आराम नहीं है
कर जाती संझा बेचैन
विरह से तपते मेरे मन को हौले से सहलाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

कोयल की बोली में लगता
छुपे हुये हैं तेरे स्वर
कंठ से उसके कंठ मिला फिर
गाने लगते मेरे अधर
मुरझाये से मन बगिया में बन बहार ये छाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

प्रीत तुम्हारी धड़कन बनकर
साथ रहे हरदम पल पल
नदियों की लहरों में सरगम
रहती है जैसे कल कल
मरुथल में बदरी की रिमझिम साथ ये अपने लाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं…

मन की सुन के मनमीत चुनी

तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मनकी सुनके मनमीत चुना कर बाँह पिया तुम ही धरते।

जब नैन मिले महि आप प्रिये खिल फूल उठा मन आंगन था।
चहकी धरती लगती सगरी हिय गूँजित कोकिल कानन था॥
बहती तब सौरभ वात लिए मनमीत सुनो रसिका मन था।
हँसती निरखूं लखि रूप पिया महका लहका तन पावन था॥
तुम याद रहे सब भूल गई नित प्रीत रचूँ तुमको गहते।
तुम दूर बसे…

भर भाव हिया निरखे तब थे बरखा बन थे मुझमे सरसे।
फिर चैन हरे तुम रैन पिया, बन चंद्र प्रभा चित पे बरसे॥
चित चोर सुनो मन पीर प्रिये जब दूर रहो तन ये तरसे।
अब आन मिलो पहिचान मिले बन गीत सजो रसना हरसे॥
कहती कब बात पिया हिय की रहती हँसती चुपके सहते।
तुम दूर बसे…

अब साथ जियें अब साथ मरें मत दूर करो मुझको मन से।
बिन बोल सुने कब चैन मिले बरसे बदरा नित नैनन से॥
तज के अब मैं सब दूर खड़ी नहि मोह रहा मुझको तन से।
अनमोल कहे पिय थे मुझको मत मोल करो अब साधन से॥
कहती रजनी तुम आन मिलो जग देख रहा सपने ढहते।
तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मन की सुन के मन मीत चुनी कर बाँह पिया तुम ही धरते।

कौन यहाँ है अपना 

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

खेल मेल ये जग के सारे, केवल हैं इक माया।
नीर धार भी दे जाती है, पत्थर को इक काया॥
हँसती रहती दूर्वा हरदम, अलग पात तरु होते।
बिछड़ बिछड़ इक दूजे से सब, कितना कितना रोते॥
छूट गये सब संगी साथी, पीर हृदय है जपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

बांच कहाँ कब कोई पाये, नियती के ये लेखे।
जो होना है होता ही है, मूक हृदय बस देखे॥
सह जाता है घाव सभी मन, हठ करना कब जाने।
जीते जीते आ जाता है, मरना ये भी माने ॥
भूल गया तन शीतल छाया, याद रहा बस तपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

पाकर तुमको रोई थी मैं, खो कर तुमको रोई।
लगता है बरसों से मेरी, आँखें कब हैं सोई॥
पथ को देखूं आस करुँ मैं, पर सच को पहचानू।
जाकर आता है कब कोई,बातें ये मैं जानू॥
भूल गई हूँ नीत प्रीत मैं, सीख रही हूँ खपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना।

समय की गति

समय की गति बदलती जब,पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख,,उलट कर पाँव जाते हैं।

सुहानी भोर की किरणें, चमक लेकर नहीँ उगती।
सुनहरी सांझ की लाली, दमक देकर नहीं बुझती॥
गले मिलने बजारों से, बढ़े सब गाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब …

कहीं फीकी हुई होली, कहीं मद्धम दिवाली है।
कि रहते साथ सब फिर भी, मिले कोई न खाली है॥
ख़ुशी की चाह में भटके, नये सब ठाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब सुख…

नयन से बात नयनों की, पुरानी हो गई शायद।
जियेंगें साथ जन्मों तक, कहानी हो गई शायद॥
लिये सब देह की चाहत, पलक की छाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख…

यादें

तेरी यादों के सूरज की, किरणों से जब जलती हूँ।
तब मैं छंदों में अपने मन के भावों को लिखती हूँ॥
कभी सवैयों कभी गीत औ, ग़ज़लों में सब कहती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

निशा निमंत्रण दे जाती हैं, आँखों में भर लाली को।
दीपक बन कर जलते रहना, फैलाना उजियाली को॥
सपनो की शैय्या पर झिलमिल, चंदा से तुम मिल आना।
भोर सुहानी आये जब तक, आँसू बन कर ढल जाना॥

शब्दों के अवगुंठन से मैं, सहज स्वंय को करती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

गुलमोहर सी दहकी यादें, तन मन को दहकाती है।
फूलो से होकर सुरभित ये, आकुल उर बहकाती हैं॥
पुरवाई भी छू कर देती, तेरा ही आभाष प्रिये।
जल थल नभ सब मिलकर करते, मुझसे क्यों परिहास प्रिये॥

सूरज को शीतल लिख कर मैं, चंद्र प्रभा से चिढ़ती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ…

जाने कब??

जाने कब मन प्रमुदित होगा, मेघ गगन में छायेंगें।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

रिमझिम बूंदों की बारिश से, अंतस भीगा जायेगा।
प्रेम जलज मन नयनो में, सौरभ को बिखरायेगा॥
जाने कब कोयल कूकेगी, झींगुर शोर मचायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

सूख रही मन की सरिता अब, पंकिल जीवन धारा है।
सुमनों पर झिलमिल करती जो, बूँदें वही सहारा है॥
जाने कब पुरवा बहकेगी, विद्युत कब डरवायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

उर उमंग उन्मादित होगा, प्रेम लिए जब आओगे।
शीतल आलिंगन देकर प्रिय, प्रीत अंग सरसाओगे॥
जाने कब बदरा नभ आकर, मधु बूँदें बरसायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

सावन

घिर रही काली घटायें, मधु धरा सरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

बाग़ में झूले पड़े हैं, मेघ अम्बर छा रहे।
बूँद रिमझिम है बरसती,देख सब हरसा रहे॥
बह रही पुरवा निगोड़ी, गीत कोयल गा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

हरित वसना बन धरा ये, सज गई नव रूप में।
बावली बन घूमती है, छनकती है धूप में॥
द्युति दमक कर मन धरा पर, मधु कहर बरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

भूल कब पाती प्रिये मैं, पावसी पल प्यार में।
आ रहे थे पास जब हम, प्रेम के संसार में॥
हो सुगंधित फूल बगिया, श्वास को महका रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद तेरी ला रही॥

रेशमी अहसास

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

मेदिनी भी खिलखिलाती, मद हवाओं से पिये।
चाँदनी भी है जलाती, ताप सूरज का लिये॥
पवन चूनर में सरसती, ले प्रिये आभास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

तन हुआ है दीप्ति कंचन, उर छिड़ा इक राग है।
आभ हीरक मन समाया, हिय बसा अनुराग है॥
फूल सब बहका रहे हैं, अधर पंकज हास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

दिन पखेरू बन गये हैं, स्वप्न सी हर रात है।
शब्द सारे खो रहे हैं, नयन से अब बात है॥
हो मुदित मन झूमता है, सुन सखी परिहास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को
अंग में खिलते हुये इस…

प्रेम पाती

पाँखुरी पर जब लिखूं मैं, प्रेम पाती भोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बह रही पुरवा सुहानी, घोलती है गंध को।
घोल कर फिर गंध को ये,बाँधती मधु बंध को॥
बंध कोई जुड़ गया जब, आस अन्तस् में जगे।
आस में डूबे सभी दिन, साथ प्रिय के ही पगे॥

बहकती जब सपन चूनर, वात के इस जोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

झूमती हैं सब दिशायें, उर्मियोँ के प्यार से।
प्यार से धरती खिली फिर, मृदु छुअन मनुहार से॥
मृदु छुअन में कामना है, प्रीत की आराधना।
प्रीत मन्दिर में बसे तुम, पूर्ण करते साधना॥

गूँजती जब स्वर लहरियाँ, मधुमयी हर ओर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बातें करूँ सुनो मैं

बातें करूँ सुनो!! मैं, अपने उदास मन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

हर साँझ याद आये, पल साथ जो बिताये।
अमृत समझ गरल को, थी कण्ठ से लगाये॥
वो दंश सह रही हूँ, पीड़ा सुनो तपन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

जिसकी मधुर हँसी पर, दुनिया भुला रही थी।
बाहें पकड़ उसी की, खुशियाँ बुला रही थी॥
जलती विगत पलों से, मैं ताप बिन अगन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की।

यादें हुई पुरानी, बातें हुई पुरानी।
पर साथ चल रही, बीती हुई कहानी।
भूले न भूलती हूँ, मैं आँच उस छुअन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

प्रीत का बिरवा

रोप दिया था प्रीत का बिरवा अपने मन के आँगन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

प्रेम नाम है इस पौधे का
सुन सखियाँ थी इठलाईं
लगी बताने गुन इसके सुन
मन ही मन मैं हरषाई

सहकर सारी धूप छांव ये बढ़ता जाये हर क्षण में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

नन्हा पौधा बड़ा हुआ यूँ
जैसे सूरज चढ़ता है
भोर लालिमा से संझा तक
रूप अनेको धरता है

नेह लदी सब शाखायें हैं भरे जो खुशियाँ दामन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

डाल डाल कुसुमित मंजरियाँ
सौरभ का ही दान करे
अंग अंग बहकाये ऐसे
जैसे मद का पान करे

तरसायेगा भ्रमरों को अब रूप रंग लिए यौवन में
झूम झूम के लहराये ये अबकि बरस के सावन में…

तुम्हारी याद

सितारे जब चमकते हैं, तुम्हारी याद आती है।
कभी मुझको हँसाती है, कभी मुझको रुलाती है॥

पकड़ कर हाथ मेरा ये, नज़ारे क्यों दिखाये थे।
चले जाना तुम्हें जब था, गले फिर क्यों लगाये थे॥
दिलों का हाल आँखें ये, ज़माने से छुपाती हैं।
कभी मुझको…

तुम्हारे साथ की बातें, बनी कलियाँ चटकती है।
तुम्हारे साथ की खुशबू, हवायें ले मटकती हैं॥
गले लग चाँदनी मेरे, विरह के गीत गाती है।
कभी मुझको…

मिलोगे जब कभी हमदम, समय के पार आकर तुम।
महकते ख़्वाब में मेरे, भरोगे रंग लाकर तुम॥
चलूँगी साथ में दिल की, जहाँ तक राह जाती है।
कभी मुझको…

प्रेयसी

जीवन में रसधार तुम्हीं से, तुम हो अमृत धारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी!, अपना तन मन हारा॥

मेरे मधुमय जीवन की तुम, हो इक कविता प्यारी।
तनते तरु से मेरे मन पर, लिपटी लतिका न्यारी॥
तुम हो कुसुमित पुष्प प्रिये मैं, हूँ तेरा अनुरागी।
हृदय द्वार पर खिल तुम मेरे, बना रही बड़भागी॥

पायल की रुनझुन पर तेरे, न्यौछावर जग सारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन हारा॥

मलयानिल अलकों पर ढ़ोती, पलकें मद से भारी।
नयनों के शीतल झरने में, खोई दुनिया सारी॥
बाँध लिया कुन्तल में अपने, मेघों का मँडराना।
कटि के बल पर भूलीं नदियाँ, अपना तो बलखाना॥

कंगन की खनखन पर तेरे, रचूँ छंद मैं प्यारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन वारा।

द्वार हृदय का खोलो

प्रिय प्रियवर प्रियतम तुम मेरे,द्वार हृदय के खोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

मैं धरती की तरुणाई तुम,उन्नत भाल दिवाकर।
रति की शोभा रूप लिए मैं, तुम हो ज्योत प्रभाकर॥
मन में बहती प्रेम नदी तुम, महुआरी मद घोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम लगते हो अलि के गुंजन,मैं कुसुमित सी क्यारी।
अधरों पर मधु चुम्बन पाकर, खिल जाती मैं प्यारी॥
बहती मैं बन वात सुरमयी, तरु बनकर तुम डोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम तट हो पनघट के प्रिय मैं, हूँ पायल की छमछम।
मधुर मिलन के अपने पल में, साँसे चलती थमथम॥
मनभावों की किलकारी को, शब्दों से मत तोलो।
शुष्क कंठ हैं मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो।

होते जब तुम पास प्रिये

जेठ की तपती छाया भी लगती मुझको मधुमास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

सूनी सुनी दुपहरिया में
नयन जोहते तेरी बाट
संझा में होकर के बेकल
भटके सुधियाँ घाट घाट
पछुआ भी लहरा कर भरती फागुन के रंग रास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

चंपा चमेली की खुशबू से
साँसे रहती पगी मेरी
रात चाँद अकुलाहट से
रहती आँखे जगी मेरी
आवारा बादल दे जाते सावन का आभास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

भोर अरुणिमा का सूरज जब
कण कण में आ ताप भरे
डाल डाल तब गाकर कोयल
मन के सब संताप हरे
चिड़ियों की चह चह बिखराती अधरों पर मधु हास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

प्रेम श्रृंगार

आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आस का दीपक जला कर
गीत अधरों पर सजा कर
श्वास की लय में तुम्हारा नाम लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

नेह शब्दों में बसा कर
भावना को भी मिला कर
प्रेम में डूबा हुआ इक गीत लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आँधियों में मुस्कुरा कर
भग्न तारों को सजाकर
आने वाले कल का मैं इतिहास लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ…

चाह तुम्हारी

जीवन में बस चाह तुम्हारी

मन से मन की नातेदारी
महके जीवन की फुलवारी
रात अँधेरी भी लगती है संग तेरे उजियारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

भरी भाव से हिय पिचकारी
रंगती है जो प्रीत हमारी
बाहों में तेरी पाती मैं अपनी दुनिया सारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

जब भी मैं जीवन में हारी
करुण हो गई हर सिसकारी
सुधियाँ तेरी आ तब कहती मुझको प्राण प्यारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी…!

मुस्कान

प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

साथ परस्पर हरदम करते
रहते भावों का श्रृंगार
आने वाले हरइक क्षण में
करते हैं ऊर्जा संचार
सम्बन्धों की बगिया में करती सौरभ दान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

चिरपरिचित इस जग में जब भी
लगूं खोजने मेरा कौन
झट आकर अन्तस् में मेरे
कर देती हो गुँजित मौन
जीवन के सारे दुःख से भटकाती है ध्यान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

अम्बर के आनन में जैसे
चँदा करता है विचरण
हँसी तेरी भी मुख पर तेरे
करती वैसे ही नर्तन
मन के मेरे सूनेपन में भर देती है गान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

जेठ की दुपहरी

इस सुलगती दुपहरी से, मिल रही जो शाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

खग विहग सब आ रहे हैं, लौट अम्बर छोर से।
मालती भी झूमती है, खिल रही जो भोर से॥
गुलमुहर भी अब दहक प्रिय, छीनते आराम हैं।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

पात सारे हिल रहे हैं, कोयलें छुपती फिरें।
वात के सुन जोर से ही, दृग भँवर तत्क्षण तिरे॥
बाग़ में बन मन गिलहरी, घूमता अविराम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

तुम मिले थे जब प्रिये तब, तप्त मेरा रंग था।
था महीना चैत का वो, रुत रूमानी अंग था॥
छू गई तब प्रीत पागल, हिय हुआ बेकाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

हृदय वेदना

प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

गगन आसरा दे ना पाये
सागर में भी वो न समाये
हाय पीर बिछडन की अब बन नीर नयन से बहती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

हो गया सूना जीवन मेरा
सपनो का अब रहा न डेरा
जाते तेरे पग की ध्वनि अब बन लय धड़कन बजती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

सुन के विरही मन की पुकारें
दर्द की राहें बाँह पसारे
काली नीरव तम भरी रजनी अब बन नागिन डसती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है…

दीप और मैं 

मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना।

किरण डूबती जब सँझा को
तब जगती मेरी तरुणाई
खुद हो जाती छिन्न भिन्न मैं
करता जब अँधियार लड़ाई
शर्वरी के गहरे साये में तय है एकाकी जल जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

रातों को तो फ़ैल चाँदनी
है बस प्रीत का राग सुनाती
देहरी और सूने आँगन में
मैं ही आस का दीप जलाती
ऊषा की किरणों संग जिसको पलभर में है मिट जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

आस यही विश्वास यही कि
व्यर्थ नही मेरा जीवन
तिल तिल खुद को जला जला कर
किया अमर अपना यौवन
मेरे प्राण निराश न हो तुम, तमिस्रा से है बैर पुराना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

काश! कभी

काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

याद तुम्हारी वनफूलों सी
महकाती है अंतर्मन को
भावों की कोमल अंगड़ाई
बहकाती है कोमल तन को
काश! कभी अपनी पलकों से हम तेरा अर्चन कर लेते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

तेरी साँसों की वीणा पर
सजना चाहूँ सरगम बनकर
तेरे अंतस के आँगन में
बसना चाहूँ धड़कन बनकर
काश! कभी मेरे सपनोँ को तुम अपना अवलम्बन देते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

मेरे सपनोँ की नियति ज्यूँ
लहरों का तट से टकराना
हरपल टूटे पागल मन से
तेरे छल को प्रीत बताना
काश! कभी मेरी बाँहों में तुम अपना सब अर्पण करते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते…

गीत मेरे मीत

गीत नही समझो इनको, ये मेरे मन के मीत हैं।

चटक फागुनी रंग लिये कभी
शरद सा सकुचाते हैं
गर्मी का आतप दिखे कभी
सावन सा लहराते हैं
मौसम के आने जाने का दिखलाते ये रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

माटी की है गंध कभी तो
चूल्हे की है आग भी
चिड़ियों की चहचह है इसमें
रुनझुन पायल राग भी
जग में बहते जीवन का ये सुनवाते संगीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

हँसी लिए कभी भाभी की तो
कभी सास फटकार है
चाँद रात मनुहार पिया कभी
कनखी साजन प्यार है
नैनों से मिल नैनों में ही रचवाते ये प्रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं।

हम तुम

प्रिय चाँद बनो तुम रजनी के, मैं फूल बनी मुस्काऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना,मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥
तुम बाँह धरे हो प्रिय जबसे, उर उपवन सा महके मेरा।
हिय धड़कन में है ताल नई, अब अंग अंग दहके मेरा॥
तुम भँवरा बन गुंजन करना, मैं तितली बन इतराऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे…
तुमसे उजियाली भोर हुई, तुमसे है संझा मतवाली।
तुमसे भावों को रंग मिले,तुमसे जगमग जीवन पाली॥
तुम सागर से लहराना प्रिय, मैं नौका बन बलखाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना…
जग की सुंदरता है तुमसे, तुमसे ही जग है सब मेरा।
जीना है अब तो साथ मुझे, दृग द्वार बसेरा अब तेरा॥
तुम पंचम सुर का राग लिये,मैं सरगम बन सज जाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना, मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥

साथी! अपना प्यार

साथी! अपना प्यार, लगे है नभ का तारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

सर्दी की तू धूप, लगे फागुन सी प्यारी।
धर के रूप अनूप, खिले तू हिय की क्यारी॥
मैं मरुथल हूँ थार, नदी की तू है धारा।
प्रेम लिए संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

मेरे मन की चाह, घटा बन तुम ही छाओ।
जीवन की हर राह, प्रेम सागर छलकाओ॥
मन से मन को हार, बसे हम दृग के कारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

जीवन की हर श्वास, कहे है एक कहानी।
पूरी कर दो आस, बनो तुम मेरी रानी॥
जीवन मधुपल चार, प्यार का मैं हूँ मारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगे जीवन सारा॥

फूले फूल बसंत /

फूले फूल बसंत, प्रिये जब से तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
तुमसे ही दिनरात, महकती हिय की क्यारी।
सपनोँ की सौग़ात, लगे ये दुनिया प्यारी॥
हिय तो पंख पसार, गगन में उड़ता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
मीठी तेरी बात, हृदय में मिसरी घोले।
बनके पीपर पात, सरस मन मेरा डोले॥
कोयल से ले राग, गीत उर गाता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
सतरंगी है साथ, खिले सुमनों सा प्यारा।
सुख दुःख सबके साथ, सजेगा जीवन प्यारा॥
नीरव काली रात, भोर स्वर्णिम ले आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
फूले फूल बसंत, प्रिये जबसे तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥

सावनी गीत

नभ ने अपने अमृत घट से, प्रेम अमिय छलकाया।
रिमझिम लड़ियाँ रूप धरे प्रिय, देखो सावन आया॥
खिली खिली है हरित वसन को, पहने तरुणी लतिका।
धुली धुली लगती है सारी, तरु आच्छादित पतिका॥
कोयल छेड़े राग पंचमी, मन भौरा भरमाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
फूलों से ले गंध प्रीत की, बहती है पुरवाई।
अंतस में मेरे बजती है, मधुर मिलन शहनाई॥
अलसाये नयनों में तेरे, सपनोँ ने घर पाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
हरे हो रहे बाग़ लता वन, नदी बनी नखरीली।
दादुर झींगुर पिक की बोली, छेड़े तान सुरीली॥
हर्ष प्रीत का मधुमयी आँचल, धरती पर लहराया।
रिमझिम लड़ियाँ…

साथी मेरे

लहरें जो सागर से करती और हवायें मधुवन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

गीतों में छंदों सा तुम हो
अधरों पर सजते हरदम
अंतस के धड़कन सा तुम हो
श्वासों पर बजते थम थम
पायल जो पैरों से करती और कलाई कंगन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

प्रातकाल की आभा तुम हो
सृष्टि में जो जान भरे
चाँद रात की शोभा तुम हो
मन के जो संताप हरे
कलियाँ जो भौरों से करती और घटायें सावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

वेद ऋचा से पावन तुम हो
मंत्र हो पूजा में मेरी
आस दीप सा जलते तुम हो
आती जब भी रात अँधेरी
मीरा जो कान्हा से करती और शिव गंगा पावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से…

बहता है बन प्राण प्रिये 

धरा-गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन के गान प्रिये।
मन से मन को जोड़ करे जो जगती से अनजान प्रिये।

पावस की रिमझिम बूंदों से, बहता सरिता में कलकल।
निर्झर के झर झर में घुल कर, छलके है ये छल छल छल।
बढ़ता जाता नित प्रतिदिन ये, निज से प्रिय के आनन तक,
भावों के इस प्रबल वेग से, मच जाती मन में हलचल।

पात डाल तरु लता तृणों में, बहता है बन प्राण प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत अधर जब छू जाते तब, चमके तन बन कर सोना।
हुलसित होती हिय की धरती महके मन का हर कोना।
दृग गागर सागर छलकाता, फूलों से ले के मधु जल,
प्यारा लगता है फिर जग में, चैन रैन का भी खोना।

लघुता को भी अमर करे जो, ऐसा ये वरदान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत रीत में डूबी दुनिया,लगती है वैसी प्यारी।
घने तिमिर को हर लेती है, जैसे किरणें उजियारी।
मधुर मिलन से पुष्पित होती,मन उपवन की हर डाली,
गंगा मीरा राधा तुलसी, प्रेम सुधा की है क्यारी,

कान्हा की बंसी में बसता, बन भावों की खान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

स्मृतिशेष शिवांगी

(बहन की स्मृति में)

एक नाजुक थी कली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मन कनक सम वो सुहाई।
माघ में जब गोद आई।
उर्मियोँ से दीप्ति लेकर,
जग हृदय पर खूब छाई।
श्वास में सबके घुली वो।
झर गई है अधखिली जो॥

थी प्रथम कुरुक्षेत्र में वो।
नेह रखती नेत्र में वो।
छू गई सोपान पहला,
रुग्णता के क्षेत्र में वो।
चाँदनी मधु से जली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मलयनिल जब बह रही थी।
ताप वो अति सह रही थी।
जूझती थी आस से पर
मृत्यु उसको गह रही थी।
हाथ नियति के तुली वो।
झर गई है अधखिली जो।

सेज पर लेटी सुहागन।
स्वप्न दृग में भर सुहावन।
बन गई निष्ठुर जगत से,
छोड़ कर सुत एक पावन।
मोड़ मुँह सबसे चली वो।
झर गई है अधखिली जो।

(कोई भरपाई नहीं है समय के पास अपनी क्रूरता की)

15 नवम्बर 2016

सुनो कवि!

सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।
सहला जाये जो तन मन को, मान लिखो मनुहार लिखो।

लिखो नदी क्यों बहती कलकल, कोयल कैसे गाती है।
कैसे करते शोर पखेरू, भोर किरण जब आती है।
बहका सहका मन क्यों होता, ऋतुओं के इतराने से,
क्यों खिलती हैं कलियाँ सारी, भ्रमरों के मुस्काने से।

छुअन लिखो तुम पुरवा वाली, बहती मस्त बयार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।

शब्दों में तुम लिखो खिलौने, रंग भावना का लिख दो।
बालू मिट्टी से रचने का, ढंग अल्पना का लिख दो॥
लिख दो बच्चे क्यों रोते हैं, माँ का आँचल पाने को।
क्यों जगती सबकी तरुणाई, अम्बर में छा जाने को॥

करता है जो जड़ को चेतन, ऐसी मस्त फुहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

लिखो चाँदनी कैसे आकर, सोये ख्वाब जगाती है।
कैसे काली नीरव रजनी, मन को भय दिखलाती है॥
कैसे होती रात सुहावन, धड़कन सरगम बनती हैं।
संझा को अंतस में आकर, सुधियाँ कैसे ठनती है॥

मकरागति सूरज को कर के, आती मस्त बहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

मैं प्यार चाहती हूँ

है रात आज काली, घनघोर है अँधेरा।
बेचैनियाँ हृदय में, करने लगी बसेरा॥
भीगी हुई हवायें, बंसी बजा रही हैं।
आँसू भरे नयन में, सपने सजा रही हैं॥
तुम दूर जा रहे हो, या पास आ रहे हो।
इतना मुझे बता दो, तुम क्यों सता रहे हो॥
प्रिय! प्रेम का सदा मैं, श्रृंगार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

मन में जगी उमंगें, प्रिय साथ हो हमारा।
मझधार में फंसे हो, या दूर हो किनारा॥
उर भाव की नदी में, संचार भाव भर दो।
हिमशीत से पलों में, अभिसार भाव भर दो॥
अपने अधर कमल से, संजीवनी पिला दो।
मृतप्राय हो रही मैं, नव प्राण पुंज ला दो॥
सौभाग्य पर तुम्हारे, अधिकार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

ठहरी लगे धरा ये, आकाश घूमता क्यों।
दृग झील के कँवल को, ये चाँद चूमता क्यों॥
हर राह खिल रही है, गलियाँ महक रही क्यों।
बिन वात के बसंती, पीहू चहक रही क्यों॥
प्रिय! साथ से तुम्हारे, हर रात जगमगाती।
परिजात से महक ले, हर बात महमहाती॥
आकाश से धरा तक, विस्तार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ!!

पतझड़ की रात

रश्मियाँ शशि की गगन से, ओस मधु बरसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

झर रहे हैं पात सारे, तरु अकेले हैं खड़े।
खो गईं हैं कोयलें भी, शीत के पहरे पड़े॥
डालियाँ गुमसुम हुईं हैं, कण सजल सारे हुये।
पंखुरी चुपचाप झरती, स्वप्न भी खारे हुये॥

धुंध में लिपटी दिशायें, गीत अविरल गा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

शोभती है चाँदनी भी, दूब पर बन जल अभी।
झिलमिलाती यामिनी भी, लग रहीं निर्मल अभी॥
ये सुखद पल अब शिशिर का, दे रहा विश्वास है।
बाँध कर धरती गगन को, भर रहा इक आस है॥

तारिकाएं श्वेत आँचल, शून्य से ढलका रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

कब सवेरा हो रहा है, रात कब बीती कहो।
उर्मियाँ भी कह रही हैं, दूरियाँ प्रिय की सहो॥
याद बन कर हूक उठती, सेज पर सोई हुई।
भोर में लगती धरा ये, रात भर रोई हुई॥

आग बन कर ये हवायें, अब मुझे झुलसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रही॥

थामते थे तुम प्रिये जब 

श्वेत होती मालती थी, चाँदनी बरसात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में॥

नींद में खोया जहां था कामना पर थी जगी।
अधमुँदे से नैन में प्रिय प्रीत अपनी थी पगी।
ताल ले कर श्वास से फिर बढ़ रही थी धड़कने,
चाह में पागल हृदय को भा रही थी ये ठगी।
मधु छुअन से कौंधती थी दामिनी प्रिय गात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में॥

मिट रही थीँ दूरियाँ सब, आ रहे थे पास हम।
आँजुरी में भर रहे थे साथ का विश्वास हम।
चाँद देता था गवाही तारिकाएं लिपि बनी,
अश्रु से मन भूमि पर प्रिय सींचते थे आस हम।
रैन जगती भोर तक फिर, भाव भींगे बात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में।

छू अधर को तुम अधर से झांकते थे नैन में।
बोलते थे प्रियतमा तुम घोल कर मधु बैन में।
पूर्ण फिर दोनों हुये थे, प्रीत के अधिकार से
देह का अवलम्ब लेजब चैन पाये रैन में।
छा गये थे रंग प्यारे तरु लता हर पात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

खो गई सम्वेदना अब खो गये अहसास क्यों।
प्यार में भीगे हुये पल कर रहे परिहास क्यों।
यत्न सारे बह गये हैं क्यों समय की धार में,
दूरियाँ आ छीनती हैं विगत पल के हास क्यों।
उलझती थी कब सहजता प्रिय समय के घात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

ज़िन्दगानी

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेज दिनकर का भरो तुम।
धीर सागर का धरो तुम॥
चंद्र सम शीतल बनो तुम।
तरु बने जिद पर तनो तुम॥
ले नदी से फिर रवानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

छल कपट से दूर रहना।
मत किसी को शत्रु कहना।
मित्र बन संताप हरना।
राह में बढ़ हाथ धरना॥
भूल कर बातें पुरानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

राग हिय में तुम भरो सब।
प्रीत जीवन में करो सब॥
मन बनाओ भाव सुरभित।
छेड़ दे जो गीत मधुरित॥
भूल के निदियाँ सुहानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेरी यादें 

 

तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

रातों की नीदें हुई गायब
तारे गिनकर कटती रैन
दिन में भी आराम नहीं है
कर जाती संझा बेचैन
विरह से तपते मेरे मन को हौले से सहलाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

कोयल की बोली में लगता
छुपे हुये हैं तेरे स्वर
कंठ से उसके कंठ मिला फिर
गाने लगते मेरे अधर
मुरझाये से मन बगिया में बन बहार ये छाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

प्रीत तुम्हारी धड़कन बनकर
साथ रहे हरदम पल पल
नदियों की लहरों में सरगम
रहती है जैसे कल कल
मरुथल में बदरी की रिमझिम साथ ये अपने लाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं…

मन की सुन के मनमीत चुनी

तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मनकी सुनके मनमीत चुना कर बाँह पिया तुम ही धरते।

जब नैन मिले महि आप प्रिये खिल फूल उठा मन आंगन था।
चहकी धरती लगती सगरी हिय गूँजित कोकिल कानन था॥
बहती तब सौरभ वात लिए मनमीत सुनो रसिका मन था।
हँसती निरखूं लखि रूप पिया महका लहका तन पावन था॥
तुम याद रहे सब भूल गई नित प्रीत रचूँ तुमको गहते।
तुम दूर बसे…

भर भाव हिया निरखे तब थे बरखा बन थे मुझमे सरसे।
फिर चैन हरे तुम रैन पिया, बन चंद्र प्रभा चित पे बरसे॥
चित चोर सुनो मन पीर प्रिये जब दूर रहो तन ये तरसे।
अब आन मिलो पहिचान मिले बन गीत सजो रसना हरसे॥
कहती कब बात पिया हिय की रहती हँसती चुपके सहते।
तुम दूर बसे…

अब साथ जियें अब साथ मरें मत दूर करो मुझको मन से।
बिन बोल सुने कब चैन मिले बरसे बदरा नित नैनन से॥
तज के अब मैं सब दूर खड़ी नहि मोह रहा मुझको तन से।
अनमोल कहे पिय थे मुझको मत मोल करो अब साधन से॥
कहती रजनी तुम आन मिलो जग देख रहा सपने ढहते।
तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मन की सुन के मन मीत चुनी कर बाँह पिया तुम ही धरते।

कौन यहाँ है अपना 

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

खेल मेल ये जग के सारे, केवल हैं इक माया।
नीर धार भी दे जाती है, पत्थर को इक काया॥
हँसती रहती दूर्वा हरदम, अलग पात तरु होते।
बिछड़ बिछड़ इक दूजे से सब, कितना कितना रोते॥
छूट गये सब संगी साथी, पीर हृदय है जपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

बांच कहाँ कब कोई पाये, नियती के ये लेखे।
जो होना है होता ही है, मूक हृदय बस देखे॥
सह जाता है घाव सभी मन, हठ करना कब जाने।
जीते जीते आ जाता है, मरना ये भी माने ॥
भूल गया तन शीतल छाया, याद रहा बस तपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

पाकर तुमको रोई थी मैं, खो कर तुमको रोई।
लगता है बरसों से मेरी, आँखें कब हैं सोई॥
पथ को देखूं आस करुँ मैं, पर सच को पहचानू।
जाकर आता है कब कोई,बातें ये मैं जानू॥
भूल गई हूँ नीत प्रीत मैं, सीख रही हूँ खपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना।

समय की गति

समय की गति बदलती जब,पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख,,उलट कर पाँव जाते हैं।

सुहानी भोर की किरणें, चमक लेकर नहीँ उगती।
सुनहरी सांझ की लाली, दमक देकर नहीं बुझती॥
गले मिलने बजारों से, बढ़े सब गाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब …

कहीं फीकी हुई होली, कहीं मद्धम दिवाली है।
कि रहते साथ सब फिर भी, मिले कोई न खाली है॥
ख़ुशी की चाह में भटके, नये सब ठाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब सुख…

नयन से बात नयनों की, पुरानी हो गई शायद।
जियेंगें साथ जन्मों तक, कहानी हो गई शायद॥
लिये सब देह की चाहत, पलक की छाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख…

यादें

तेरी यादों के सूरज की, किरणों से जब जलती हूँ।
तब मैं छंदों में अपने मन के भावों को लिखती हूँ॥
कभी सवैयों कभी गीत औ, ग़ज़लों में सब कहती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

निशा निमंत्रण दे जाती हैं, आँखों में भर लाली को।
दीपक बन कर जलते रहना, फैलाना उजियाली को॥
सपनो की शैय्या पर झिलमिल, चंदा से तुम मिल आना।
भोर सुहानी आये जब तक, आँसू बन कर ढल जाना॥

शब्दों के अवगुंठन से मैं, सहज स्वंय को करती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

गुलमोहर सी दहकी यादें, तन मन को दहकाती है।
फूलो से होकर सुरभित ये, आकुल उर बहकाती हैं॥
पुरवाई भी छू कर देती, तेरा ही आभाष प्रिये।
जल थल नभ सब मिलकर करते, मुझसे क्यों परिहास प्रिये॥

सूरज को शीतल लिख कर मैं, चंद्र प्रभा से चिढ़ती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ…

जाने कब??

जाने कब मन प्रमुदित होगा, मेघ गगन में छायेंगें।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

रिमझिम बूंदों की बारिश से, अंतस भीगा जायेगा।
प्रेम जलज मन नयनो में, सौरभ को बिखरायेगा॥
जाने कब कोयल कूकेगी, झींगुर शोर मचायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

सूख रही मन की सरिता अब, पंकिल जीवन धारा है।
सुमनों पर झिलमिल करती जो, बूँदें वही सहारा है॥
जाने कब पुरवा बहकेगी, विद्युत कब डरवायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

उर उमंग उन्मादित होगा, प्रेम लिए जब आओगे।
शीतल आलिंगन देकर प्रिय, प्रीत अंग सरसाओगे॥
जाने कब बदरा नभ आकर, मधु बूँदें बरसायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

सावन

घिर रही काली घटायें, मधु धरा सरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

बाग़ में झूले पड़े हैं, मेघ अम्बर छा रहे।
बूँद रिमझिम है बरसती,देख सब हरसा रहे॥
बह रही पुरवा निगोड़ी, गीत कोयल गा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

हरित वसना बन धरा ये, सज गई नव रूप में।
बावली बन घूमती है, छनकती है धूप में॥
द्युति दमक कर मन धरा पर, मधु कहर बरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

भूल कब पाती प्रिये मैं, पावसी पल प्यार में।
आ रहे थे पास जब हम, प्रेम के संसार में॥
हो सुगंधित फूल बगिया, श्वास को महका रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद तेरी ला रही॥

रेशमी अहसास

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

मेदिनी भी खिलखिलाती, मद हवाओं से पिये।
चाँदनी भी है जलाती, ताप सूरज का लिये॥
पवन चूनर में सरसती, ले प्रिये आभास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

तन हुआ है दीप्ति कंचन, उर छिड़ा इक राग है।
आभ हीरक मन समाया, हिय बसा अनुराग है॥
फूल सब बहका रहे हैं, अधर पंकज हास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

दिन पखेरू बन गये हैं, स्वप्न सी हर रात है।
शब्द सारे खो रहे हैं, नयन से अब बात है॥
हो मुदित मन झूमता है, सुन सखी परिहास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को
अंग में खिलते हुये इस…

प्रेम पाती

पाँखुरी पर जब लिखूं मैं, प्रेम पाती भोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बह रही पुरवा सुहानी, घोलती है गंध को।
घोल कर फिर गंध को ये,बाँधती मधु बंध को॥
बंध कोई जुड़ गया जब, आस अन्तस् में जगे।
आस में डूबे सभी दिन, साथ प्रिय के ही पगे॥

बहकती जब सपन चूनर, वात के इस जोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

झूमती हैं सब दिशायें, उर्मियोँ के प्यार से।
प्यार से धरती खिली फिर, मृदु छुअन मनुहार से॥
मृदु छुअन में कामना है, प्रीत की आराधना।
प्रीत मन्दिर में बसे तुम, पूर्ण करते साधना॥

गूँजती जब स्वर लहरियाँ, मधुमयी हर ओर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बातें करूँ सुनो मैं

बातें करूँ सुनो!! मैं, अपने उदास मन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

हर साँझ याद आये, पल साथ जो बिताये।
अमृत समझ गरल को, थी कण्ठ से लगाये॥
वो दंश सह रही हूँ, पीड़ा सुनो तपन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

जिसकी मधुर हँसी पर, दुनिया भुला रही थी।
बाहें पकड़ उसी की, खुशियाँ बुला रही थी॥
जलती विगत पलों से, मैं ताप बिन अगन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की।

यादें हुई पुरानी, बातें हुई पुरानी।
पर साथ चल रही, बीती हुई कहानी।
भूले न भूलती हूँ, मैं आँच उस छुअन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

प्रीत का बिरवा

रोप दिया था प्रीत का बिरवा अपने मन के आँगन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

प्रेम नाम है इस पौधे का
सुन सखियाँ थी इठलाईं
लगी बताने गुन इसके सुन
मन ही मन मैं हरषाई

सहकर सारी धूप छांव ये बढ़ता जाये हर क्षण में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

नन्हा पौधा बड़ा हुआ यूँ
जैसे सूरज चढ़ता है
भोर लालिमा से संझा तक
रूप अनेको धरता है

नेह लदी सब शाखायें हैं भरे जो खुशियाँ दामन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

डाल डाल कुसुमित मंजरियाँ
सौरभ का ही दान करे
अंग अंग बहकाये ऐसे
जैसे मद का पान करे

तरसायेगा भ्रमरों को अब रूप रंग लिए यौवन में
झूम झूम के लहराये ये अबकि बरस के सावन में…

तुम्हारी याद

सितारे जब चमकते हैं, तुम्हारी याद आती है।
कभी मुझको हँसाती है, कभी मुझको रुलाती है॥

पकड़ कर हाथ मेरा ये, नज़ारे क्यों दिखाये थे।
चले जाना तुम्हें जब था, गले फिर क्यों लगाये थे॥
दिलों का हाल आँखें ये, ज़माने से छुपाती हैं।
कभी मुझको…

तुम्हारे साथ की बातें, बनी कलियाँ चटकती है।
तुम्हारे साथ की खुशबू, हवायें ले मटकती हैं॥
गले लग चाँदनी मेरे, विरह के गीत गाती है।
कभी मुझको…

मिलोगे जब कभी हमदम, समय के पार आकर तुम।
महकते ख़्वाब में मेरे, भरोगे रंग लाकर तुम॥
चलूँगी साथ में दिल की, जहाँ तक राह जाती है।
कभी मुझको…

प्रेयसी

जीवन में रसधार तुम्हीं से, तुम हो अमृत धारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी!, अपना तन मन हारा॥

मेरे मधुमय जीवन की तुम, हो इक कविता प्यारी।
तनते तरु से मेरे मन पर, लिपटी लतिका न्यारी॥
तुम हो कुसुमित पुष्प प्रिये मैं, हूँ तेरा अनुरागी।
हृदय द्वार पर खिल तुम मेरे, बना रही बड़भागी॥

पायल की रुनझुन पर तेरे, न्यौछावर जग सारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन हारा॥

मलयानिल अलकों पर ढ़ोती, पलकें मद से भारी।
नयनों के शीतल झरने में, खोई दुनिया सारी॥
बाँध लिया कुन्तल में अपने, मेघों का मँडराना।
कटि के बल पर भूलीं नदियाँ, अपना तो बलखाना॥

कंगन की खनखन पर तेरे, रचूँ छंद मैं प्यारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन वारा।

द्वार हृदय का खोलो

प्रिय प्रियवर प्रियतम तुम मेरे,द्वार हृदय के खोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

मैं धरती की तरुणाई तुम,उन्नत भाल दिवाकर।
रति की शोभा रूप लिए मैं, तुम हो ज्योत प्रभाकर॥
मन में बहती प्रेम नदी तुम, महुआरी मद घोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम लगते हो अलि के गुंजन,मैं कुसुमित सी क्यारी।
अधरों पर मधु चुम्बन पाकर, खिल जाती मैं प्यारी॥
बहती मैं बन वात सुरमयी, तरु बनकर तुम डोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम तट हो पनघट के प्रिय मैं, हूँ पायल की छमछम।
मधुर मिलन के अपने पल में, साँसे चलती थमथम॥
मनभावों की किलकारी को, शब्दों से मत तोलो।
शुष्क कंठ हैं मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो।

होते जब तुम पास प्रिये

जेठ की तपती छाया भी लगती मुझको मधुमास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

सूनी सुनी दुपहरिया में
नयन जोहते तेरी बाट
संझा में होकर के बेकल
भटके सुधियाँ घाट घाट
पछुआ भी लहरा कर भरती फागुन के रंग रास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

चंपा चमेली की खुशबू से
साँसे रहती पगी मेरी
रात चाँद अकुलाहट से
रहती आँखे जगी मेरी
आवारा बादल दे जाते सावन का आभास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

भोर अरुणिमा का सूरज जब
कण कण में आ ताप भरे
डाल डाल तब गाकर कोयल
मन के सब संताप हरे
चिड़ियों की चह चह बिखराती अधरों पर मधु हास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

प्रेम श्रृंगार

आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आस का दीपक जला कर
गीत अधरों पर सजा कर
श्वास की लय में तुम्हारा नाम लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

नेह शब्दों में बसा कर
भावना को भी मिला कर
प्रेम में डूबा हुआ इक गीत लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आँधियों में मुस्कुरा कर
भग्न तारों को सजाकर
आने वाले कल का मैं इतिहास लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ…

चाह तुम्हारी

जीवन में बस चाह तुम्हारी

मन से मन की नातेदारी
महके जीवन की फुलवारी
रात अँधेरी भी लगती है संग तेरे उजियारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

भरी भाव से हिय पिचकारी
रंगती है जो प्रीत हमारी
बाहों में तेरी पाती मैं अपनी दुनिया सारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

जब भी मैं जीवन में हारी
करुण हो गई हर सिसकारी
सुधियाँ तेरी आ तब कहती मुझको प्राण प्यारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी…!

मुस्कान

प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

साथ परस्पर हरदम करते
रहते भावों का श्रृंगार
आने वाले हरइक क्षण में
करते हैं ऊर्जा संचार
सम्बन्धों की बगिया में करती सौरभ दान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

चिरपरिचित इस जग में जब भी
लगूं खोजने मेरा कौन
झट आकर अन्तस् में मेरे
कर देती हो गुँजित मौन
जीवन के सारे दुःख से भटकाती है ध्यान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

अम्बर के आनन में जैसे
चँदा करता है विचरण
हँसी तेरी भी मुख पर तेरे
करती वैसे ही नर्तन
मन के मेरे सूनेपन में भर देती है गान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

जेठ की दुपहरी

इस सुलगती दुपहरी से, मिल रही जो शाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

खग विहग सब आ रहे हैं, लौट अम्बर छोर से।
मालती भी झूमती है, खिल रही जो भोर से॥
गुलमुहर भी अब दहक प्रिय, छीनते आराम हैं।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

पात सारे हिल रहे हैं, कोयलें छुपती फिरें।
वात के सुन जोर से ही, दृग भँवर तत्क्षण तिरे॥
बाग़ में बन मन गिलहरी, घूमता अविराम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

तुम मिले थे जब प्रिये तब, तप्त मेरा रंग था।
था महीना चैत का वो, रुत रूमानी अंग था॥
छू गई तब प्रीत पागल, हिय हुआ बेकाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

हृदय वेदना

प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

गगन आसरा दे ना पाये
सागर में भी वो न समाये
हाय पीर बिछडन की अब बन नीर नयन से बहती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

हो गया सूना जीवन मेरा
सपनो का अब रहा न डेरा
जाते तेरे पग की ध्वनि अब बन लय धड़कन बजती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

सुन के विरही मन की पुकारें
दर्द की राहें बाँह पसारे
काली नीरव तम भरी रजनी अब बन नागिन डसती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है…

दीप और मैं 

मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना।

किरण डूबती जब सँझा को
तब जगती मेरी तरुणाई
खुद हो जाती छिन्न भिन्न मैं
करता जब अँधियार लड़ाई
शर्वरी के गहरे साये में तय है एकाकी जल जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

रातों को तो फ़ैल चाँदनी
है बस प्रीत का राग सुनाती
देहरी और सूने आँगन में
मैं ही आस का दीप जलाती
ऊषा की किरणों संग जिसको पलभर में है मिट जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

आस यही विश्वास यही कि
व्यर्थ नही मेरा जीवन
तिल तिल खुद को जला जला कर
किया अमर अपना यौवन
मेरे प्राण निराश न हो तुम, तमिस्रा से है बैर पुराना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

काश! कभी

काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

याद तुम्हारी वनफूलों सी
महकाती है अंतर्मन को
भावों की कोमल अंगड़ाई
बहकाती है कोमल तन को
काश! कभी अपनी पलकों से हम तेरा अर्चन कर लेते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

तेरी साँसों की वीणा पर
सजना चाहूँ सरगम बनकर
तेरे अंतस के आँगन में
बसना चाहूँ धड़कन बनकर
काश! कभी मेरे सपनोँ को तुम अपना अवलम्बन देते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

मेरे सपनोँ की नियति ज्यूँ
लहरों का तट से टकराना
हरपल टूटे पागल मन से
तेरे छल को प्रीत बताना
काश! कभी मेरी बाँहों में तुम अपना सब अर्पण करते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते…

गीत मेरे मीत

गीत नही समझो इनको, ये मेरे मन के मीत हैं।

चटक फागुनी रंग लिये कभी
शरद सा सकुचाते हैं
गर्मी का आतप दिखे कभी
सावन सा लहराते हैं
मौसम के आने जाने का दिखलाते ये रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

माटी की है गंध कभी तो
चूल्हे की है आग भी
चिड़ियों की चहचह है इसमें
रुनझुन पायल राग भी
जग में बहते जीवन का ये सुनवाते संगीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

हँसी लिए कभी भाभी की तो
कभी सास फटकार है
चाँद रात मनुहार पिया कभी
कनखी साजन प्यार है
नैनों से मिल नैनों में ही रचवाते ये प्रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं।

 

हम तुम

प्रिय चाँद बनो तुम रजनी के, मैं फूल बनी मुस्काऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना,मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥
तुम बाँह धरे हो प्रिय जबसे, उर उपवन सा महके मेरा।
हिय धड़कन में है ताल नई, अब अंग अंग दहके मेरा॥
तुम भँवरा बन गुंजन करना, मैं तितली बन इतराऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे…
तुमसे उजियाली भोर हुई, तुमसे है संझा मतवाली।
तुमसे भावों को रंग मिले,तुमसे जगमग जीवन पाली॥
तुम सागर से लहराना प्रिय, मैं नौका बन बलखाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना…
जग की सुंदरता है तुमसे, तुमसे ही जग है सब मेरा।
जीना है अब तो साथ मुझे, दृग द्वार बसेरा अब तेरा॥
तुम पंचम सुर का राग लिये,मैं सरगम बन सज जाऊँगी।
तुम रूप अनेक धरे हँसना, मैं प्रीत गंध बिखराऊँगी॥

साथी! अपना प्यार

साथी! अपना प्यार, लगे है नभ का तारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

सर्दी की तू धूप, लगे फागुन सी प्यारी।
धर के रूप अनूप, खिले तू हिय की क्यारी॥
मैं मरुथल हूँ थार, नदी की तू है धारा।
प्रेम लिए संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

मेरे मन की चाह, घटा बन तुम ही छाओ।
जीवन की हर राह, प्रेम सागर छलकाओ॥
मन से मन को हार, बसे हम दृग के कारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगें जीवन सारा॥

जीवन की हर श्वास, कहे है एक कहानी।
पूरी कर दो आस, बनो तुम मेरी रानी॥
जीवन मधुपल चार, प्यार का मैं हूँ मारा।
प्रेम लिये संसार, जियेंगे जीवन सारा॥

फूले फूल बसंत /

फूले फूल बसंत, प्रिये जब से तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
तुमसे ही दिनरात, महकती हिय की क्यारी।
सपनोँ की सौग़ात, लगे ये दुनिया प्यारी॥
हिय तो पंख पसार, गगन में उड़ता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
मीठी तेरी बात, हृदय में मिसरी घोले।
बनके पीपर पात, सरस मन मेरा डोले॥
कोयल से ले राग, गीत उर गाता जाये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
सतरंगी है साथ, खिले सुमनों सा प्यारा।
सुख दुःख सबके साथ, सजेगा जीवन प्यारा॥
नीरव काली रात, भोर स्वर्णिम ले आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥
फूले फूल बसंत, प्रिये जबसे तुम आये।
बरसाने को नेह, प्रीत के बदरा छाये॥

सावनी गीत

नभ ने अपने अमृत घट से, प्रेम अमिय छलकाया।
रिमझिम लड़ियाँ रूप धरे प्रिय, देखो सावन आया॥
खिली खिली है हरित वसन को, पहने तरुणी लतिका।
धुली धुली लगती है सारी, तरु आच्छादित पतिका॥
कोयल छेड़े राग पंचमी, मन भौरा भरमाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
फूलों से ले गंध प्रीत की, बहती है पुरवाई।
अंतस में मेरे बजती है, मधुर मिलन शहनाई॥
अलसाये नयनों में तेरे, सपनोँ ने घर पाया।
रिमझिम लड़ियाँ…
हरे हो रहे बाग़ लता वन, नदी बनी नखरीली।
दादुर झींगुर पिक की बोली, छेड़े तान सुरीली॥
हर्ष प्रीत का मधुमयी आँचल, धरती पर लहराया।
रिमझिम लड़ियाँ…

साथी मेरे

लहरें जो सागर से करती और हवायें मधुवन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

गीतों में छंदों सा तुम हो
अधरों पर सजते हरदम
अंतस के धड़कन सा तुम हो
श्वासों पर बजते थम थम
पायल जो पैरों से करती और कलाई कंगन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

प्रातकाल की आभा तुम हो
सृष्टि में जो जान भरे
चाँद रात की शोभा तुम हो
मन के जो संताप हरे
कलियाँ जो भौरों से करती और घटायें सावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से

वेद ऋचा से पावन तुम हो
मंत्र हो पूजा में मेरी
आस दीप सा जलते तुम हो
आती जब भी रात अँधेरी
मीरा जो कान्हा से करती और शिव गंगा पावन से
साथी मेरे वही प्रीत मैं तुमसे करती हूँ मन से…

बहता है बन प्राण प्रिये 

धरा-गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन के गान प्रिये।
मन से मन को जोड़ करे जो जगती से अनजान प्रिये।

पावस की रिमझिम बूंदों से, बहता सरिता में कलकल।
निर्झर के झर झर में घुल कर, छलके है ये छल छल छल।
बढ़ता जाता नित प्रतिदिन ये, निज से प्रिय के आनन तक,
भावों के इस प्रबल वेग से, मच जाती मन में हलचल।

पात डाल तरु लता तृणों में, बहता है बन प्राण प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत अधर जब छू जाते तब, चमके तन बन कर सोना।
हुलसित होती हिय की धरती महके मन का हर कोना।
दृग गागर सागर छलकाता, फूलों से ले के मधु जल,
प्यारा लगता है फिर जग में, चैन रैन का भी खोना।

लघुता को भी अमर करे जो, ऐसा ये वरदान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

प्रीत रीत में डूबी दुनिया,लगती है वैसी प्यारी।
घने तिमिर को हर लेती है, जैसे किरणें उजियारी।
मधुर मिलन से पुष्पित होती,मन उपवन की हर डाली,
गंगा मीरा राधा तुलसी, प्रेम सुधा की है क्यारी,

कान्हा की बंसी में बसता, बन भावों की खान प्रिये।
धरा गगन में प्रेम गूँजता, सुमधुर बन कर गान प्रिये।

स्मृतिशेष शिवांगी

(बहन की स्मृति में)

एक नाजुक थी कली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मन कनक सम वो सुहाई।
माघ में जब गोद आई।
उर्मियोँ से दीप्ति लेकर,
जग हृदय पर खूब छाई।
श्वास में सबके घुली वो।
झर गई है अधखिली जो॥

थी प्रथम कुरुक्षेत्र में वो।
नेह रखती नेत्र में वो।
छू गई सोपान पहला,
रुग्णता के क्षेत्र में वो।
चाँदनी मधु से जली वो।
झर गई है अधखिली जो।

मलयनिल जब बह रही थी।
ताप वो अति सह रही थी।
जूझती थी आस से पर
मृत्यु उसको गह रही थी।
हाथ नियति के तुली वो।
झर गई है अधखिली जो।

सेज पर लेटी सुहागन।
स्वप्न दृग में भर सुहावन।
बन गई निष्ठुर जगत से,
छोड़ कर सुत एक पावन।
मोड़ मुँह सबसे चली वो।
झर गई है अधखिली जो।

(कोई भरपाई नहीं है समय के पास अपनी क्रूरता की)

15 नवम्बर 2016

सुनो कवि!

सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।
सहला जाये जो तन मन को, मान लिखो मनुहार लिखो।

लिखो नदी क्यों बहती कलकल, कोयल कैसे गाती है।
कैसे करते शोर पखेरू, भोर किरण जब आती है।
बहका सहका मन क्यों होता, ऋतुओं के इतराने से,
क्यों खिलती हैं कलियाँ सारी, भ्रमरों के मुस्काने से।

छुअन लिखो तुम पुरवा वाली, बहती मस्त बयार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो।

शब्दों में तुम लिखो खिलौने, रंग भावना का लिख दो।
बालू मिट्टी से रचने का, ढंग अल्पना का लिख दो॥
लिख दो बच्चे क्यों रोते हैं, माँ का आँचल पाने को।
क्यों जगती सबकी तरुणाई, अम्बर में छा जाने को॥

करता है जो जड़ को चेतन, ऐसी मस्त फुहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

लिखो चाँदनी कैसे आकर, सोये ख्वाब जगाती है।
कैसे काली नीरव रजनी, मन को भय दिखलाती है॥
कैसे होती रात सुहावन, धड़कन सरगम बनती हैं।
संझा को अंतस में आकर, सुधियाँ कैसे ठनती है॥

मकरागति सूरज को कर के, आती मस्त बहार लिखो।
सुनो कवि! अब प्यार लिखो तुम, भावों का संसार लिखो॥

मैं प्यार चाहती हूँ

है रात आज काली, घनघोर है अँधेरा।
बेचैनियाँ हृदय में, करने लगी बसेरा॥
भीगी हुई हवायें, बंसी बजा रही हैं।
आँसू भरे नयन में, सपने सजा रही हैं॥
तुम दूर जा रहे हो, या पास आ रहे हो।
इतना मुझे बता दो, तुम क्यों सता रहे हो॥
प्रिय! प्रेम का सदा मैं, श्रृंगार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

मन में जगी उमंगें, प्रिय साथ हो हमारा।
मझधार में फंसे हो, या दूर हो किनारा॥
उर भाव की नदी में, संचार भाव भर दो।
हिमशीत से पलों में, अभिसार भाव भर दो॥
अपने अधर कमल से, संजीवनी पिला दो।
मृतप्राय हो रही मैं, नव प्राण पुंज ला दो॥
सौभाग्य पर तुम्हारे, अधिकार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ॥

ठहरी लगे धरा ये, आकाश घूमता क्यों।
दृग झील के कँवल को, ये चाँद चूमता क्यों॥
हर राह खिल रही है, गलियाँ महक रही क्यों।
बिन वात के बसंती, पीहू चहक रही क्यों॥
प्रिय! साथ से तुम्हारे, हर रात जगमगाती।
परिजात से महक ले, हर बात महमहाती॥
आकाश से धरा तक, विस्तार चाहती हूँ।
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ!!

पतझड़ की रात

रश्मियाँ शशि की गगन से, ओस मधु बरसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

झर रहे हैं पात सारे, तरु अकेले हैं खड़े।
खो गईं हैं कोयलें भी, शीत के पहरे पड़े॥
डालियाँ गुमसुम हुईं हैं, कण सजल सारे हुये।
पंखुरी चुपचाप झरती, स्वप्न भी खारे हुये॥

धुंध में लिपटी दिशायें, गीत अविरल गा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

शोभती है चाँदनी भी, दूब पर बन जल अभी।
झिलमिलाती यामिनी भी, लग रहीं निर्मल अभी॥
ये सुखद पल अब शिशिर का, दे रहा विश्वास है।
बाँध कर धरती गगन को, भर रहा इक आस है॥

तारिकाएं श्वेत आँचल, शून्य से ढलका रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रहीं॥

कब सवेरा हो रहा है, रात कब बीती कहो।
उर्मियाँ भी कह रही हैं, दूरियाँ प्रिय की सहो॥
याद बन कर हूक उठती, सेज पर सोई हुई।
भोर में लगती धरा ये, रात भर रोई हुई॥

आग बन कर ये हवायें, अब मुझे झुलसा रहीं।
पतझरी रातें शिशिर की, याद पिय की ला रही॥

थामते थे तुम प्रिये जब 

श्वेत होती मालती थी, चाँदनी बरसात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में॥

नींद में खोया जहां था कामना पर थी जगी।
अधमुँदे से नैन में प्रिय प्रीत अपनी थी पगी।
ताल ले कर श्वास से फिर बढ़ रही थी धड़कने,
चाह में पागल हृदय को भा रही थी ये ठगी।
मधु छुअन से कौंधती थी दामिनी प्रिय गात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में॥

मिट रही थीँ दूरियाँ सब, आ रहे थे पास हम।
आँजुरी में भर रहे थे साथ का विश्वास हम।
चाँद देता था गवाही तारिकाएं लिपि बनी,
अश्रु से मन भूमि पर प्रिय सींचते थे आस हम।
रैन जगती भोर तक फिर, भाव भींगे बात में।
थामते थे तुम प्रिये जब, हाथ आधी रात में।

छू अधर को तुम अधर से झांकते थे नैन में।
बोलते थे प्रियतमा तुम घोल कर मधु बैन में।
पूर्ण फिर दोनों हुये थे, प्रीत के अधिकार से
देह का अवलम्ब लेजब चैन पाये रैन में।
छा गये थे रंग प्यारे तरु लता हर पात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

खो गई सम्वेदना अब खो गये अहसास क्यों।
प्यार में भीगे हुये पल कर रहे परिहास क्यों।
यत्न सारे बह गये हैं क्यों समय की धार में,
दूरियाँ आ छीनती हैं विगत पल के हास क्यों।
उलझती थी कब सहजता प्रिय समय के घात में।
थामते थे तुम प्रिये जब हाथ आधी रात में।

ज़िन्दगानी

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेज दिनकर का भरो तुम।
धीर सागर का धरो तुम॥
चंद्र सम शीतल बनो तुम।
तरु बने जिद पर तनो तुम॥
ले नदी से फिर रवानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

छल कपट से दूर रहना।
मत किसी को शत्रु कहना।
मित्र बन संताप हरना।
राह में बढ़ हाथ धरना॥
भूल कर बातें पुरानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

राग हिय में तुम भरो सब।
प्रीत जीवन में करो सब॥
मन बनाओ भाव सुरभित।
छेड़ दे जो गीत मधुरित॥
भूल के निदियाँ सुहानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

चार दिन की जिंदगानी।
नित गढ़ो नूतन कहानी॥

तेरी यादें 

 

तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

रातों की नीदें हुई गायब
तारे गिनकर कटती रैन
दिन में भी आराम नहीं है
कर जाती संझा बेचैन
विरह से तपते मेरे मन को हौले से सहलाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

कोयल की बोली में लगता
छुपे हुये हैं तेरे स्वर
कंठ से उसके कंठ मिला फिर
गाने लगते मेरे अधर
मुरझाये से मन बगिया में बन बहार ये छाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं

प्रीत तुम्हारी धड़कन बनकर
साथ रहे हरदम पल पल
नदियों की लहरों में सरगम
रहती है जैसे कल कल
मरुथल में बदरी की रिमझिम साथ ये अपने लाई हैं
तेरे देश से आई हवायें यादें तेरी लाई हैं…

मन की सुन के मनमीत चुनी

तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मनकी सुनके मनमीत चुना कर बाँह पिया तुम ही धरते।

जब नैन मिले महि आप प्रिये खिल फूल उठा मन आंगन था।
चहकी धरती लगती सगरी हिय गूँजित कोकिल कानन था॥
बहती तब सौरभ वात लिए मनमीत सुनो रसिका मन था।
हँसती निरखूं लखि रूप पिया महका लहका तन पावन था॥
तुम याद रहे सब भूल गई नित प्रीत रचूँ तुमको गहते।
तुम दूर बसे…

भर भाव हिया निरखे तब थे बरखा बन थे मुझमे सरसे।
फिर चैन हरे तुम रैन पिया, बन चंद्र प्रभा चित पे बरसे॥
चित चोर सुनो मन पीर प्रिये जब दूर रहो तन ये तरसे।
अब आन मिलो पहिचान मिले बन गीत सजो रसना हरसे॥
कहती कब बात पिया हिय की रहती हँसती चुपके सहते।
तुम दूर बसे…

अब साथ जियें अब साथ मरें मत दूर करो मुझको मन से।
बिन बोल सुने कब चैन मिले बरसे बदरा नित नैनन से॥
तज के अब मैं सब दूर खड़ी नहि मोह रहा मुझको तन से।
अनमोल कहे पिय थे मुझको मत मोल करो अब साधन से॥
कहती रजनी तुम आन मिलो जग देख रहा सपने ढहते।
तुम दूर बसे प्रिय हो दृग से पर अंतस में तुम ही रहते।
मन की सुन के मन मीत चुनी कर बाँह पिया तुम ही धरते।

कौन यहाँ है अपना 

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

खेल मेल ये जग के सारे, केवल हैं इक माया।
नीर धार भी दे जाती है, पत्थर को इक काया॥
हँसती रहती दूर्वा हरदम, अलग पात तरु होते।
बिछड़ बिछड़ इक दूजे से सब, कितना कितना रोते॥
छूट गये सब संगी साथी, पीर हृदय है जपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

बांच कहाँ कब कोई पाये, नियती के ये लेखे।
जो होना है होता ही है, मूक हृदय बस देखे॥
सह जाता है घाव सभी मन, हठ करना कब जाने।
जीते जीते आ जाता है, मरना ये भी माने ॥
भूल गया तन शीतल छाया, याद रहा बस तपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

पाकर तुमको रोई थी मैं, खो कर तुमको रोई।
लगता है बरसों से मेरी, आँखें कब हैं सोई॥
पथ को देखूं आस करुँ मैं, पर सच को पहचानू।
जाकर आता है कब कोई,बातें ये मैं जानू॥
भूल गई हूँ नीत प्रीत मैं, सीख रही हूँ खपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना॥

कैसे मन का हाल कहूँ जब, टूट गया है सपना।
अब लगता है जग में मुझको, कौन यहाँ है अपना।

समय की गति

समय की गति बदलती जब,पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख,,उलट कर पाँव जाते हैं।

सुहानी भोर की किरणें, चमक लेकर नहीँ उगती।
सुनहरी सांझ की लाली, दमक देकर नहीं बुझती॥
गले मिलने बजारों से, बढ़े सब गाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब …

कहीं फीकी हुई होली, कहीं मद्धम दिवाली है।
कि रहते साथ सब फिर भी, मिले कोई न खाली है॥
ख़ुशी की चाह में भटके, नये सब ठाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नही कब सुख…

नयन से बात नयनों की, पुरानी हो गई शायद।
जियेंगें साथ जन्मों तक, कहानी हो गई शायद॥
लिये सब देह की चाहत, पलक की छाँव जाते हैं।
समय की गति बदलती जब, पलट हर दाँव जाते हैं॥
पता चलता नहीं कब सुख…

यादें

तेरी यादों के सूरज की, किरणों से जब जलती हूँ।
तब मैं छंदों में अपने मन के भावों को लिखती हूँ॥
कभी सवैयों कभी गीत औ, ग़ज़लों में सब कहती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

निशा निमंत्रण दे जाती हैं, आँखों में भर लाली को।
दीपक बन कर जलते रहना, फैलाना उजियाली को॥
सपनो की शैय्या पर झिलमिल, चंदा से तुम मिल आना।
भोर सुहानी आये जब तक, आँसू बन कर ढल जाना॥

शब्दों के अवगुंठन से मैं, सहज स्वंय को करती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ॥

गुलमोहर सी दहकी यादें, तन मन को दहकाती है।
फूलो से होकर सुरभित ये, आकुल उर बहकाती हैं॥
पुरवाई भी छू कर देती, तेरा ही आभाष प्रिये।
जल थल नभ सब मिलकर करते, मुझसे क्यों परिहास प्रिये॥

सूरज को शीतल लिख कर मैं, चंद्र प्रभा से चिढ़ती हूँ।
खुद से खुद की मन पीड़ा को, शब्दों से मैं हरती हूँ…

जाने कब??

जाने कब मन प्रमुदित होगा, मेघ गगन में छायेंगें।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

रिमझिम बूंदों की बारिश से, अंतस भीगा जायेगा।
प्रेम जलज मन नयनो में, सौरभ को बिखरायेगा॥
जाने कब कोयल कूकेगी, झींगुर शोर मचायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

सूख रही मन की सरिता अब, पंकिल जीवन धारा है।
सुमनों पर झिलमिल करती जो, बूँदें वही सहारा है॥
जाने कब पुरवा बहकेगी, विद्युत कब डरवायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगे॥

उर उमंग उन्मादित होगा, प्रेम लिए जब आओगे।
शीतल आलिंगन देकर प्रिय, प्रीत अंग सरसाओगे॥
जाने कब बदरा नभ आकर, मधु बूँदें बरसायेंगे।
जाने कब ये मेघदूत सब, तेरी छवि दिखलायेंगें॥

सावन

घिर रही काली घटायें, मधु धरा सरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

बाग़ में झूले पड़े हैं, मेघ अम्बर छा रहे।
बूँद रिमझिम है बरसती,देख सब हरसा रहे॥
बह रही पुरवा निगोड़ी, गीत कोयल गा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

हरित वसना बन धरा ये, सज गई नव रूप में।
बावली बन घूमती है, छनकती है धूप में॥
द्युति दमक कर मन धरा पर, मधु कहर बरसा रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद पिय की ला रही॥

भूल कब पाती प्रिये मैं, पावसी पल प्यार में।
आ रहे थे पास जब हम, प्रेम के संसार में॥
हो सुगंधित फूल बगिया, श्वास को महका रही।
सावनी ये ऋतु सुहानी, याद तेरी ला रही॥

रेशमी अहसास

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

मेदिनी भी खिलखिलाती, मद हवाओं से पिये।
चाँदनी भी है जलाती, ताप सूरज का लिये॥
पवन चूनर में सरसती, ले प्रिये आभास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

तन हुआ है दीप्ति कंचन, उर छिड़ा इक राग है।
आभ हीरक मन समाया, हिय बसा अनुराग है॥
फूल सब बहका रहे हैं, अधर पंकज हास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

दिन पखेरू बन गये हैं, स्वप्न सी हर रात है।
शब्द सारे खो रहे हैं, नयन से अब बात है॥
हो मुदित मन झूमता है, सुन सखी परिहास को।
अंग में खिलते हुये इस, प्रेम के मधुमास को॥

याद रखना तुम प्रिये इस, रेशमी अहसास को
अंग में खिलते हुये इस…

प्रेम पाती

पाँखुरी पर जब लिखूं मैं, प्रेम पाती भोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बह रही पुरवा सुहानी, घोलती है गंध को।
घोल कर फिर गंध को ये,बाँधती मधु बंध को॥
बंध कोई जुड़ गया जब, आस अन्तस् में जगे।
आस में डूबे सभी दिन, साथ प्रिय के ही पगे॥

बहकती जब सपन चूनर, वात के इस जोर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

झूमती हैं सब दिशायें, उर्मियोँ के प्यार से।
प्यार से धरती खिली फिर, मृदु छुअन मनुहार से॥
मृदु छुअन में कामना है, प्रीत की आराधना।
प्रीत मन्दिर में बसे तुम, पूर्ण करते साधना॥

गूँजती जब स्वर लहरियाँ, मधुमयी हर ओर से।
फूल पर पड़ती छलक तब, बूँद दृग दल कोर से॥

बातें करूँ सुनो मैं

बातें करूँ सुनो!! मैं, अपने उदास मन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

हर साँझ याद आये, पल साथ जो बिताये।
अमृत समझ गरल को, थी कण्ठ से लगाये॥
वो दंश सह रही हूँ, पीड़ा सुनो तपन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

जिसकी मधुर हँसी पर, दुनिया भुला रही थी।
बाहें पकड़ उसी की, खुशियाँ बुला रही थी॥
जलती विगत पलों से, मैं ताप बिन अगन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की।

यादें हुई पुरानी, बातें हुई पुरानी।
पर साथ चल रही, बीती हुई कहानी।
भूले न भूलती हूँ, मैं आँच उस छुअन की।
टूटे हुये सपन की, भीगे हुये नयन की॥

प्रीत का बिरवा

रोप दिया था प्रीत का बिरवा अपने मन के आँगन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

प्रेम नाम है इस पौधे का
सुन सखियाँ थी इठलाईं
लगी बताने गुन इसके सुन
मन ही मन मैं हरषाई

सहकर सारी धूप छांव ये बढ़ता जाये हर क्षण में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

नन्हा पौधा बड़ा हुआ यूँ
जैसे सूरज चढ़ता है
भोर लालिमा से संझा तक
रूप अनेको धरता है

नेह लदी सब शाखायें हैं भरे जो खुशियाँ दामन में
झूम झूम के लहराये ये अब की बरस के सावन में

डाल डाल कुसुमित मंजरियाँ
सौरभ का ही दान करे
अंग अंग बहकाये ऐसे
जैसे मद का पान करे

तरसायेगा भ्रमरों को अब रूप रंग लिए यौवन में
झूम झूम के लहराये ये अबकि बरस के सावन में…

तुम्हारी याद

सितारे जब चमकते हैं, तुम्हारी याद आती है।
कभी मुझको हँसाती है, कभी मुझको रुलाती है॥

पकड़ कर हाथ मेरा ये, नज़ारे क्यों दिखाये थे।
चले जाना तुम्हें जब था, गले फिर क्यों लगाये थे॥
दिलों का हाल आँखें ये, ज़माने से छुपाती हैं।
कभी मुझको…

तुम्हारे साथ की बातें, बनी कलियाँ चटकती है।
तुम्हारे साथ की खुशबू, हवायें ले मटकती हैं॥
गले लग चाँदनी मेरे, विरह के गीत गाती है।
कभी मुझको…

मिलोगे जब कभी हमदम, समय के पार आकर तुम।
महकते ख़्वाब में मेरे, भरोगे रंग लाकर तुम॥
चलूँगी साथ में दिल की, जहाँ तक राह जाती है।
कभी मुझको…

प्रेयसी

जीवन में रसधार तुम्हीं से, तुम हो अमृत धारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी!, अपना तन मन हारा॥

मेरे मधुमय जीवन की तुम, हो इक कविता प्यारी।
तनते तरु से मेरे मन पर, लिपटी लतिका न्यारी॥
तुम हो कुसुमित पुष्प प्रिये मैं, हूँ तेरा अनुरागी।
हृदय द्वार पर खिल तुम मेरे, बना रही बड़भागी॥

पायल की रुनझुन पर तेरे, न्यौछावर जग सारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन हारा॥

मलयानिल अलकों पर ढ़ोती, पलकें मद से भारी।
नयनों के शीतल झरने में, खोई दुनिया सारी॥
बाँध लिया कुन्तल में अपने, मेघों का मँडराना।
कटि के बल पर भूलीं नदियाँ, अपना तो बलखाना॥

कंगन की खनखन पर तेरे, रचूँ छंद मैं प्यारा।
सजल हृदय पर तेरे साथी, अपना तन मन वारा।

द्वार हृदय का खोलो

प्रिय प्रियवर प्रियतम तुम मेरे,द्वार हृदय के खोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

मैं धरती की तरुणाई तुम,उन्नत भाल दिवाकर।
रति की शोभा रूप लिए मैं, तुम हो ज्योत प्रभाकर॥
मन में बहती प्रेम नदी तुम, महुआरी मद घोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम लगते हो अलि के गुंजन,मैं कुसुमित सी क्यारी।
अधरों पर मधु चुम्बन पाकर, खिल जाती मैं प्यारी॥
बहती मैं बन वात सुरमयी, तरु बनकर तुम डोलो।
शुष्क कंठ है मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो॥

तुम तट हो पनघट के प्रिय मैं, हूँ पायल की छमछम।
मधुर मिलन के अपने पल में, साँसे चलती थमथम॥
मनभावों की किलकारी को, शब्दों से मत तोलो।
शुष्क कंठ हैं मौन अधर पर, नयनों से तो बोलो।

होते जब तुम पास प्रिये

जेठ की तपती छाया भी लगती मुझको मधुमास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

सूनी सुनी दुपहरिया में
नयन जोहते तेरी बाट
संझा में होकर के बेकल
भटके सुधियाँ घाट घाट
पछुआ भी लहरा कर भरती फागुन के रंग रास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

चंपा चमेली की खुशबू से
साँसे रहती पगी मेरी
रात चाँद अकुलाहट से
रहती आँखे जगी मेरी
आवारा बादल दे जाते सावन का आभास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

भोर अरुणिमा का सूरज जब
कण कण में आ ताप भरे
डाल डाल तब गाकर कोयल
मन के सब संताप हरे
चिड़ियों की चह चह बिखराती अधरों पर मधु हास प्रिये!
होते जब तुम पास प्रिये!

प्रेम श्रृंगार

आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आस का दीपक जला कर
गीत अधरों पर सजा कर
श्वास की लय में तुम्हारा नाम लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

नेह शब्दों में बसा कर
भावना को भी मिला कर
प्रेम में डूबा हुआ इक गीत लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ

आँधियों में मुस्कुरा कर
भग्न तारों को सजाकर
आने वाले कल का मैं इतिहास लिखना चाहती हूँ
आज मैं फिर प्रेम का श्रृंगार करना चाहती हूँ…

चाह तुम्हारी

जीवन में बस चाह तुम्हारी

मन से मन की नातेदारी
महके जीवन की फुलवारी
रात अँधेरी भी लगती है संग तेरे उजियारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

भरी भाव से हिय पिचकारी
रंगती है जो प्रीत हमारी
बाहों में तेरी पाती मैं अपनी दुनिया सारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी

जब भी मैं जीवन में हारी
करुण हो गई हर सिसकारी
सुधियाँ तेरी आ तब कहती मुझको प्राण प्यारी
जीवन में बस चाह तुम्हारी…!

मुस्कान

प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

साथ परस्पर हरदम करते
रहते भावों का श्रृंगार
आने वाले हरइक क्षण में
करते हैं ऊर्जा संचार
सम्बन्धों की बगिया में करती सौरभ दान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

चिरपरिचित इस जग में जब भी
लगूं खोजने मेरा कौन
झट आकर अन्तस् में मेरे
कर देती हो गुँजित मौन
जीवन के सारे दुःख से भटकाती है ध्यान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

अम्बर के आनन में जैसे
चँदा करता है विचरण
हँसी तेरी भी मुख पर तेरे
करती वैसे ही नर्तन
मन के मेरे सूनेपन में भर देती है गान
प्रिय! तेरे अधरों की मुस्कान

जेठ की दुपहरी

इस सुलगती दुपहरी से, मिल रही जो शाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

खग विहग सब आ रहे हैं, लौट अम्बर छोर से।
मालती भी झूमती है, खिल रही जो भोर से॥
गुलमुहर भी अब दहक प्रिय, छीनते आराम हैं।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

पात सारे हिल रहे हैं, कोयलें छुपती फिरें।
वात के सुन जोर से ही, दृग भँवर तत्क्षण तिरे॥
बाग़ में बन मन गिलहरी, घूमता अविराम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

तुम मिले थे जब प्रिये तब, तप्त मेरा रंग था।
था महीना चैत का वो, रुत रूमानी अंग था॥
छू गई तब प्रीत पागल, हिय हुआ बेकाम है।
बेकली मन में छुपाये, लग रही अभिराम है॥

हृदय वेदना

प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

गगन आसरा दे ना पाये
सागर में भी वो न समाये
हाय पीर बिछडन की अब बन नीर नयन से बहती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

हो गया सूना जीवन मेरा
सपनो का अब रहा न डेरा
जाते तेरे पग की ध्वनि अब बन लय धड़कन बजती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है

सुन के विरही मन की पुकारें
दर्द की राहें बाँह पसारे
काली नीरव तम भरी रजनी अब बन नागिन डसती है
प्रीत तुम्हारी सुधियों में बन हृदय वेदना जगती है…

दीप और मैं 

मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना।

किरण डूबती जब सँझा को
तब जगती मेरी तरुणाई
खुद हो जाती छिन्न भिन्न मैं
करता जब अँधियार लड़ाई
शर्वरी के गहरे साये में तय है एकाकी जल जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

रातों को तो फ़ैल चाँदनी
है बस प्रीत का राग सुनाती
देहरी और सूने आँगन में
मैं ही आस का दीप जलाती
ऊषा की किरणों संग जिसको पलभर में है मिट जाना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

आस यही विश्वास यही कि
व्यर्थ नही मेरा जीवन
तिल तिल खुद को जला जला कर
किया अमर अपना यौवन
मेरे प्राण निराश न हो तुम, तमिस्रा से है बैर पुराना
मैं दीये की वो बाती हूँ जिसको जल के है बुझ जाना

काश! कभी

काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

याद तुम्हारी वनफूलों सी
महकाती है अंतर्मन को
भावों की कोमल अंगड़ाई
बहकाती है कोमल तन को
काश! कभी अपनी पलकों से हम तेरा अर्चन कर लेते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

तेरी साँसों की वीणा पर
सजना चाहूँ सरगम बनकर
तेरे अंतस के आँगन में
बसना चाहूँ धड़कन बनकर
काश! कभी मेरे सपनोँ को तुम अपना अवलम्बन देते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते

मेरे सपनोँ की नियति ज्यूँ
लहरों का तट से टकराना
हरपल टूटे पागल मन से
तेरे छल को प्रीत बताना
काश! कभी मेरी बाँहों में तुम अपना सब अर्पण करते
काश! कभी ऐसा होता कि हम तुमको अपना कह लेते…

गीत मेरे मीत

गीत नही समझो इनको, ये मेरे मन के मीत हैं।

चटक फागुनी रंग लिये कभी
शरद सा सकुचाते हैं
गर्मी का आतप दिखे कभी
सावन सा लहराते हैं
मौसम के आने जाने का दिखलाते ये रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

माटी की है गंध कभी तो
चूल्हे की है आग भी
चिड़ियों की चहचह है इसमें
रुनझुन पायल राग भी
जग में बहते जीवन का ये सुनवाते संगीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं

हँसी लिए कभी भाभी की तो
कभी सास फटकार है
चाँद रात मनुहार पिया कभी
कनखी साजन प्यार है
नैनों से मिल नैनों में ही रचवाते ये प्रीत हैं
गीत नही समझो इनको ये मेरे मन के मीत हैं।

सूनी शाम

है कैसी ये शाम प्रिये!

दिन तो तप के बीत गया
भरा हुआ मन रीत गया
आस तेरे आने की फिर भी करती हूँ अविराम प्रिये!
है कैसी ये शाम प्रिये!

सुन कर कोयल की ये कूक
हृदय बीच उठती है हूक
कलरव भी अब इन चिड़ियों का देता कब आराम प्रिये!
है कैसी ये शाम प्रिये!

पेड़ों की ये छाँव सघन
दूर करे कब मन की तपन
प्रीत भरा मन जपता हरदम बस तेरा ही नाम प्रिये!
है कैसी ये शाम प्रिये!

विदा

ठहर! विदा तो बोल

मन की पीड़ा के पन्नों पर
असुअन की जो स्याही है
उससे अंतर की व्यथा को अब मुझ पर तू खोल
ठहर! विदा तो बोल

विरह वेदना तो आती है
मिलन भरे हर पल के बाद
जीवन की इस सच्चाई में रस मीठा तू घोल
ठहर! विदा तो बोल

भोर रश्मियाँ जब आती हैं
यादें तेरी बिखराती हैं
प्रीत पगी रातों का होता कब कोई है मोल
ठहर! विदा तो बोल

जाना तुमको है तो जाओ
मन के गागर को छलकाओ
भीगे मेरे नयन कोर को समझे तू बेमोल
ठहर! विदा तो बोल..

हुलसित हृदय अपार

धन्य हुई जबसे आये तुम इन नयनो के द्वार
प्रिय! हुलसित हृदय अपार

कुछ को देखा आते जाते
कुछ नैनो को तनिक न भाते
हिय के अम्बर में उड़ते हो तुम ही पंख पसार
प्रिय! हुलसित हृदय अपार

साँसें तेरी धड़कन बनके
भाव जानती सारे मनके
अंतस पट पर तेरी छवि को मैंने लिया उतार
प्रिय! हुलसित हृदय अपार

हुई मैं शापित तब तुम जाकर
आये हो बन देव यहाँ पर
तेरे साथ से पाया मैंने जीवन का आधार
प्रिय! हुलसित हृदय अपार

व्याकुल मेरे प्राण

कोकिल के कंठो में बसती, मधुर प्रीत की तान
प्रिय! व्याकुल मेरे प्राण

रात है पत्थर सपने चंदन
श्वासों का जो करते अर्चन
सुधियाँ प्रिय की रख जाती हैं सिरहाने मुस्कान
प्रिय! व्याकुल मेरे प्राण

प्रीत है पिंजर तन मन बन्दी
हरपल महके बन मकरंदी
अंधियारे पथ पर लाती ये किरणों का विहान
प्रिय! व्याकुल मेरे प्राण

प्रिये देव औ अर्घ्य है जीवन
भावों को करते हैं अर्पण
पंख बिना मन पा जाता है अंबर की उड़ान
प्रिय! व्याकुल मेरे प्राण

प्रेमपत्र

सुनो प्रिये ये पत्र समझना, है अभिव्यक्ति यही मन की।
शब्दों की माला में गूँथी, बातें सब अंतर्मन की॥
समझ नही पाती क्या दे दूँ, तुमको प्रिय मैं उद्बोधन।
छलक पड़े नयनों से सागर, सुनकर मेरा सम्बोधन॥

सुधियों में सुरभित रहती हैं, प्रथम मिलन की वो बातें।
कोकिल से गुँजित वो दिन थे, जुगनू से जगमग रातें॥
चपला जैसे अंतस चमके, तेरा हरदम मुस्काना।
मधुपूरित तेरे नयनो से, मद पी मेरा भरमाना॥

बात बात बिन बात हँसू मैं, सोचूं जब बंधन प्यारा।
सखियों से भी कब कह पाऊँ, जीवन अब तुम पर वारा॥
बिन रिश्तें के बँधी हुई मैं, जैसे चाँद चकोर बँधे।
बिन बंधन के जैसे नदियाँ, तटबन्धों के साथ सधे॥

संग तुम्हारे सुनो प्रिये तुम, मुखरित मेरा मौन हुआ।
बिना किसी साथी के जग में, पूर्ण बताओ कौन हुआ॥
प्रणय निवेदन है ये मेरा, तुम इसको स्वीकार करो।
निज मानस से हिय तक अपने, प्रिये प्रीत रसधार भरो॥

प्रेम प्रभा में रजनी डूबे, कुसुमित सारे दिवस करो।
एकाकी जीवन को तज कर, तुम मन का सन्ताप हरो॥
तुमको अर्पित तन मन सारा, विधि से अब क्या भय करना।
आस साथ विश्वास लिये तुम, हाथों को मेरे धरना॥

अँधियारा मन का हरना…
साथ सदा हरदम रहना…
सुनो प्रिये ये पत्र समझना, है अभिव्यक्ति यही मन की…

रंगून भाषण

मूक होकर सह रहे हम पीर क्यों।
बह रहे केवल बने हम नीर क्यों॥
माँ हमारी झेलती अपमान क्यों।
हम नहीं दे पा रहे सम्मान है क्यों॥
देशहित बढ़ कर गढ़ो मिल सब कहानी।
नाम कर दो देश के अपनी जवानी॥

तुम युवा बन यज्ञ में समिधा जलो।
देह पर रज भूमि का अपने मलो॥
काट सिर अर्पित करो सब मात को।
नष्ट कर दो शत्रु के हर घात को॥
खून में अपने भरो अब सब रवानी।
नाम कर दो देश के अपनी जवानी॥

आज गढ़ना मिल यहाँ इतिहास है।
बात ये सच है नही परिहास है॥
मांगती हमसे धरा बलिदान अब।
खून का करना पड़ेगा दान अब॥
मुक्ति कब किसको मिली केवल जुबानी।
नाम कर दो देश के अपनी जवानी॥

अब यहाँ आओ करो हस्ताक्षर।
खून से अपने लिखो मुक्ताक्षर॥
एक सागर लहु का अब तैयार हो।
डूब ब्रितानी जहां भव पार हो।
श्वास में भर वेग लो अपने तुफानी।
नाम कर दो देश के अपनी जवानी॥

रंगून के ‘जुबली हॉल’ में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया जिसमें उन्होंने कहा था –

“स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियों! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ ।

बसंत की ऋतु 

ये बसंत की ऋतु सखी! मन बहकाने आई है

फूलों ने भौरों पर अपने
सौरभ का जादू डाला
मस्त हुआ ये मौसम जैसे
पीली यौवन की हाला
गर्म हवाएं छूकर अब तन दहकाने आई है
ये बसंत की ऋतु सखी! मन बहकाने आई है

तरु शाखायें लदी हुई हैं
कोमल कोमल पात लिये
धरती भी अब झूम रही है
पीली पीली गात लिये
कोयल की मधुरिम बोली वन चहकाने आई है
ये बसंत की ऋतु सखी! मन बहकाने आई है

सरस मिलन ये दो ऋतुओं का
तन मन जिसमे नृत्य रता
देख के यौवन वसुधा का
आनंदित हो देह लता
बाहों की माला का ये चाह जगाने आई है
ये बसंत की ऋतु सखी!,मन बहकाने आई है…

बसंत

कोकिल के कंठो में छिपकर, नव बसंत तुम आये।
राग पंचमी से रंगो को, धरती पर बिखराये॥

नव पल्लव नव किसलय से अब महकी उपवन गलियाँ।
प्राण पुंज लेकर दिनकर से चटकी प्यारी कलियाँ॥
मंजरियों का रूप धरे तुम अमराई महकाये।
राग पंचमी से रंगो को धरती पर बिखराये॥

गुंजन करते भौरों के दल सुमनों को भरमाते।
यौवन का रस पी फूलों से फिरते हैं मदमाते॥
हवा मधुमयी हो बह बहकर, सबका मन बहकाये।
राग पंचमी से रंगों को धरती पर बिखराये॥

तीसी फूली सरसों फूले, महुआरी मद घोले।
पीत वसन को पहने धरती, कनिया बन कर डोले॥
लाल लाल टेशू अब खिल कर, सबका तन दहकाये।
राग पंचमी से रंगो को धरती पर बिखराये।

सरस्वती वंदना

वागेश्वरी रागेश्वरी सिद्धेश्वरी मृगलोचनी।
आ कंठ में मेरे बसो हे मात वीणा पाणिनी॥

तुम ज्ञान हो व्यवहार हो तुम हो ऋचा इक पावनी।
तुम से सकल ये सृष्टि है तुम हो घटा मनभावनी॥
सुंदर सुकोमल श्वेतवसना उज्जवला मृदुभाषिणी।
आ कंठ में मेरे बसो हे मात वीणा पाणिनी॥

तुम निर्मला हो पंकजा हो वेद की हो स्वामिनी।
तुम गीत हो तुम छंद हो तुम हंस की हो वाहिनी॥
हे गौरवर्णा! तुम सुभागी शांतिप्रिय तेजस्विनी॥
आ कंठ में मेरे बसो हे मात वीणा पाणिनी॥

हो बाँसुरी में तान बनकर शंख में भी वास है।
तुमसे जगत में माँ सदा से खिल रहा मधुमास है॥
भण्डार हो तुम सद्गुणों की मोद बुद्धि दायिनी।
आ कण्ठ में मेरे बसो हे मात वीणा पाणिनी॥

दिल्ली

भारत की पटरानी प्यारी, वैभववाली दिल्ली।
अंगारों पर लिखे कहानी,गौरवशाली दिल्ली॥

इसके उपवन में हर मौसम,खूब बहारें छाईं।
इसके यौवन ने आँगन में, तलवारें भी लाईं॥
कभी गुजरते तूफानों से, चीखी ये चिल्लाई।
कभी मधुर स्मित अंकन पा, झूम झूम इतराई॥
इतिहासों में अजर अमर है, मतवाली ये दिल्ली।
अंगारो पर लिखे कहानी, गौरवशाली दिल्ली॥

याद कहाँ कितने लोगों ने, कितना इसको लूटा।
पीकर इसके रूप की हाला,छोड़ गये सब टूटा॥
ले दिनकर का तेज खिली वो, ज्वार लिए तरुणाई।
महिधर का अभिमान अडिग वो,चँदा की अंगड़ाई॥
स्वंय शीश पर लिए पताका, महिमाशाली दिल्ली।
अंगारों पर लिखे कहानी, गौरवशाली दिल्ली॥

इंद्रप्रस्थ है नाम पुरातन, अभिमानो से पोषित।
सुंदरता ऐसी थी उसकी, रही सदा ही शोषित॥
युमना भी बहती है कल कल,आंसू उसके पी कर।
गण की बनी विधाता है अब, बंधन में वो जी कर॥
सम्मोहन का मंत्र लिए है, कंचनथाली दिल्ली।
अंगारो पर लिखे कहानी, गौरवशाली दिल्ली॥

सुनो सभी

सुभाष का प्रसार हो, धरा कला विहार हो।
रचो चरित्र कर्म से, सुनो सभी! सुधार हो।

समान दृष्टि भाव हो।
समाज से लगाव हो।
कुबुद्धि पंथ दूर हो,
मनुष्यता स्वभाव हो।
सुवास द्वार द्वार हो, सुभाव बुद्धि धार हो।
रचो चरित्र कर्म से, सुनो सभी! सुधार हो।

बढ़े चलो रुको नहीँ।
विपत्ति से झुको नहीं।
पुनीत प्राण पुंज है,
सुकर्म से चुको नहीं।
विधर्म राह हार हो,सुधर्म दिव्य सार हो।
रचो चरित्र कर्म से, सुनो सभी! सुधार हो।

अनन्त शक्तिमान हो।
सुयोग्य मर्म ध्यान हो।
विशिष्ट ज्ञान को लिए,
सुजीव दैव मान हो।
सुतीक्ष्ण सद् विचार हो, सुलेखनी प्रहार हो।
रचो चरित्र कर्म से, सुनो सभी! सुधार हो।

स्वामी विवेकानन्द

【शिकागो धर्म सम्मेलन,1893 में दिया गया भाषण】

अमरीकी भाई बहनो कह, शुरू किये जब उद्बोधन।
धर्म सभा स्तब्ध हुई थी, सुनकर उनका सम्बोधन॥
आया उस प्राचीन देश से, जो संतो की है नगरी।
पाया हूँ सम्मान यहाँ जो, भरी हर्ष से मन गगरी॥

मेरा है वो धर्म जिसे सब, कहते धर्मो की माता।
धरा गगन में होने वाली, हर हलचल की वो ज्ञाता॥
करता हूँ नत शीश सभी को, तृप्त हृदय स्वीकार करें।
हिन्द क्षेत्र का प्रतिनिधि हूँ मैं, सब मेरा आभार धरें॥

यहाँ उपस्थिति वक्ताओं को, धन्यवाद हूँ मैं देता।
मान दिया है पूरब को जो, उसे मुदित मन मैं लेता॥
सहिष्णुता है धर्म हमारा, कर्म हमारा सहिष्णुता।
मानस में जो बसता है वो, मर्म हमारा सहिष्णुता॥

ऐसा धर्म हमारा जिससे, सहनशील हम बन जाते।
सब धर्मो के जो हैं पीड़ित, उन्हें शरण हम दे पाते॥
सत्य मान हम सब धर्मो को, देते हैं सम्मान यहाँ।
खुले हृदय से स्वागत करते, कभी करें अपमान कहाँ॥

मुझे गर्व मैं उस संस्कृति से, जिसने सबको अपनाया।
शेष बचे पारसियों को भी, गले लगा कर बढ़वाया॥
उद्धरित करता श्लोक यहाँ इक, बचपन से जो सब गाते।
लाखों प्राणी प्रतिदिन जिसको, निर्मल मन से दोहराते॥

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव॥】

गीता का ये श्लोक मैं अद्भुत, सम्मेलन को बतलाऊँ।
नश्वर है ये सारी धरती, सबको ये है समझाऊँ॥
जैसे नदियाँ घट घट चल कर, मिल जाती हैं सागर से।
वैसे ही सब जीव अंत में, मिलते नटवर नागर से॥

ये यथा मां प्रपद्धन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वतर्मानुवर्तन्ते मनुषयाः पार्थ सर्वशः॥】

जो भी प्रभु की ओर बढ़ेगा, उसको गले लगायेंगें।
मार्ग कोई कैसा भी गढ़ ले, सब उन तक ही जायेंगें॥
विश्व एक परिवार हमारा, सबके स्वामी हैं ईश्वर।
ज्ञात उन्हें हैं कर्म सभी के, अंतर्यामी है ईश्वर॥

हठधर्मी सब राज कर चुके, बहुत दिनों तक धरती पर।
सिसक चुकी है मानवता भी, बहुत दिनों तक धरती पर॥
हिंसा उनका मूल धर्म है,नाश सभ्यतायें होती।
खून से जब वो नहलाते तब, चीख चीख धरती रोती॥

नाश करो अब दानवता का, मानवता तब हो विकसित।
असुर शक्तियाँ भय में डूबे, जन जन सारे हों शिक्षित॥
करता हूँ उम्मीद यही मैं, समय आ गया वो अब है।
एक है ईश्वर एक है धरती, धर्म सनातन ही सब है ॥

आज प्रात जो ध्वनि घंटे की, सम्मेलन में गूंजी थी।
देने को थी मान सभी को, सर्व धर्म से ऊँची थी॥
उस ध्वनि से ही कुंद करें सब, तलवारों की धारों को।
तोड़ लेखनी फेंक सभी दें, लिखती जो अंगारो को॥

धर्म को मानो, धर्म को पूजो, पर अंधे तुम नहीं बनो।
दानवता से बिना डरे सब, मानवता के लिए ठनो।
एक लक्ष्य साधो जीवन में, दिन प्रतिदिन फिर बढ़े चलो।
कटुता का हो सर्वनाश सब, नवपथ ऐसा गढ़े चलो॥【शिकागो धर्म सम्मेलन,1893 में दिया गया भाषण】

अमरीकी भाई बहनो कह, शुरू किये जब उद्बोधन।
धर्म सभा स्तब्ध हुई थी, सुनकर उनका सम्बोधन॥
आया उस प्राचीन देश से, जो संतो की है नगरी।
पाया हूँ सम्मान यहाँ जो, भरी हर्ष से मन गगरी॥

मेरा है वो धर्म जिसे सब, कहते धर्मो की माता।
धरा गगन में होने वाली, हर हलचल की वो ज्ञाता॥
करता हूँ नत शीश सभी को, तृप्त हृदय स्वीकार करें।
हिन्द क्षेत्र का प्रतिनिधि हूँ मैं, सब मेरा आभार धरें॥

यहाँ उपस्थिति वक्ताओं को, धन्यवाद हूँ मैं देता।
मान दिया है पूरब को जो, उसे मुदित मन मैं लेता॥
सहिष्णुता है धर्म हमारा, कर्म हमारा सहिष्णुता।
मानस में जो बसता है वो, मर्म हमारा सहिष्णुता॥

ऐसा धर्म हमारा जिससे, सहनशील हम बन जाते।
सब धर्मो के जो हैं पीड़ित, उन्हें शरण हम दे पाते॥
सत्य मान हम सब धर्मो को, देते हैं सम्मान यहाँ।
खुले हृदय से स्वागत करते, कभी करें अपमान कहाँ॥

मुझे गर्व मैं उस संस्कृति से, जिसने सबको अपनाया।
शेष बचे पारसियों को भी, गले लगा कर बढ़वाया॥
उद्धरित करता श्लोक यहाँ इक, बचपन से जो सब गाते।
लाखों प्राणी प्रतिदिन जिसको, निर्मल मन से दोहराते॥

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव॥】

गीता का ये श्लोक मैं अद्भुत, सम्मेलन को बतलाऊँ।
नश्वर है ये सारी धरती, सबको ये है समझाऊँ॥
जैसे नदियाँ घट घट चल कर, मिल जाती हैं सागर से।
वैसे ही सब जीव अंत में, मिलते नटवर नागर से॥

ये यथा मां प्रपद्धन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वतर्मानुवर्तन्ते मनुषयाः पार्थ सर्वशः॥】

जो भी प्रभु की ओर बढ़ेगा, उसको गले लगायेंगें।
मार्ग कोई कैसा भी गढ़ ले, सब उन तक ही जायेंगें॥
विश्व एक परिवार हमारा, सबके स्वामी हैं ईश्वर।
ज्ञात उन्हें हैं कर्म सभी के, अंतर्यामी है ईश्वर॥

हठधर्मी सब राज कर चुके, बहुत दिनों तक धरती पर।
सिसक चुकी है मानवता भी, बहुत दिनों तक धरती पर॥
हिंसा उनका मूल धर्म है,नाश सभ्यतायें होती।
खून से जब वो नहलाते तब, चीख चीख धरती रोती॥

नाश करो अब दानवता का, मानवता तब हो विकसित।
असुर शक्तियाँ भय में डूबे, जन जन सारे हों शिक्षित॥
करता हूँ उम्मीद यही मैं, समय आ गया वो अब है।
एक है ईश्वर एक है धरती, धर्म सनातन ही सब है ॥

आज प्रात जो ध्वनि घंटे की, सम्मेलन में गूंजी थी।
देने को थी मान सभी को, सर्व धर्म से ऊँची थी॥
उस ध्वनि से ही कुंद करें सब, तलवारों की धारों को।
तोड़ लेखनी फेंक सभी दें, लिखती जो अंगारो को॥

धर्म को मानो, धर्म को पूजो, पर अंधे तुम नहीं बनो।
दानवता से बिना डरे सब, मानवता के लिए ठनो।
एक लक्ष्य साधो जीवन में, दिन प्रतिदिन फिर बढ़े चलो।
कटुता का हो सर्वनाश सब, नवपथ ऐसा गढ़े चलो॥v

भगत सिंह

मेघ बन कर छा गये जो, वक्त के अंगार पे।
रख दिए थे शीश अपना, मृत्यु की तलवार पे॥
तज गये जो वायु शीतल, लू थपेड़ो में घिरे।
आज भी नव चेतना बन, वो नज़र मैं हैं तिरे॥

मुक्ति से था प्रेम उनको, बेड़ियाँ चुभती रहीं।
चाल उनकी देख सदियाँ, हैं यहाँ झुकती रहीं॥
मृत्यु से अभिसार उनका, लोभ जीवन तज गया।
आज भी जो गीत बनकर, हर अधर पर सज गया॥

तेज उनका था अनोखा, मुक्ति जीवन सार था।
इस धरा से उस गगन तक, गूँजता हुंकार था॥
छू सका कोई कहाँ पर, चढ़ गये जो वो शिखर।
आज भी इतिहास में वो, बन चमकते हैं प्रखर॥

आज हम आज़ाद फिरते, उस लहू की धार से।
चूमते थे जो धरा को, माँ समझ कर प्यार से॥
क्या करूँ कैसे करूँ मैं, छू सकूँ उनके चरण।
देश हित बढ़ कर हृदय से, मृत्यु का कर लूँ वरण॥

कर रही उनको नमन…
खिल रहा उनसे चमन..
छू सकूँ उनके चरण…

मेघ बन कर छा गये जो, वक्त के अंगार पे।
रख दिए थे शीश अपना, मृत्यु की तलवार पे॥
तज गये जो वायु शीतल, लू थपेड़ो में घिरे।
आज भी नव चेतना बन, वो नज़र मैं हैं तिरे॥

मुक्ति से था प्रेम उनको, बेड़ियाँ चुभती रहीं।
चाल उनकी देख सदियाँ, हैं यहाँ झुकती रहीं॥
मृत्यु से अभिसार उनका, लोभ जीवन तज गया।
आज भी जो गीत बनकर, हर अधर पर सज गया॥

तेज उनका था अनोखा, मुक्ति जीवन सार था।
इस धरा से उस गगन तक, गूँजता हुंकार था॥
छू सका कोई कहाँ पर, चढ़ गये जो वो शिखर।
आज भी इतिहास में वो, बन चमकते हैं प्रखर॥

आज हम आज़ाद फिरते, उस लहू की धार से।
चूमते थे जो धरा को, माँ समझ कर प्यार से॥
क्या करूँ कैसे करूँ मैं, छू सकूँ उनके चरण।
देश हित बढ़ कर हृदय से, मृत्यु का कर लूँ वरण॥

कर रही उनको नमन…
खिल रहा उनसे चमन..
छू सकूँ उनके चरण…

व्यथा गीत

जीवन क्षणभंगुर है अपना, तो फिर क्यों उत्साह नही।
पिघला दे जो नियत शिला को, ऐसी कोई आह नही।
आता है जब ज्वार पीर का, विपदा बढ़ती जाती है,
हृदय समेटे खुशियाँ फिर भी, होती किसको चाह नही।

नैनो में यदि अश्रु न आये, ऐसी करुण कहानी क्या।
पत्थर का जो रूप न बदले, ऐसा बहता पानी क्या।
जीवन तो बस वो जीवन है, जिसको जीे भर जी ले हम,
भय को अपना सखा बना ले, ऐसी भला जवानी क्या।

काट सके जो समय चक्र को, बनी अभी तलवार नहीं।
हर्ष पीर दोनों में बहता, आँसू का पर भार नहीं।
फूल शूल सब वन की शोभा, पतझड़ ही तो बस सच है,
आने वाले कल पर अपना, है कोई अधिकार नहीँ।

सुन्दर धरती सुन्दर अम्बर, सुन्दर ये संसार रचा।
ताल पोखरे नदियाँ झरने, सागर जैसा प्यार रचा।
रचने वाले तुमने जाने, क्या क्या जग में रच डाला,
पर जीवन सँग मृत्यु बना कर, दुख का क्यों आधार रचा।

भीष्म की प्रतिज्ञा

हाय! नियति की कैसी माया, क्या उसकी मनमानी है।
इक निषाद की पुत्री ने क्या, बात हृदय में ठानी है॥
व्याकुळ रहते पिता हमेशा, नित वो अश्रु बहाते हैं।
आह! पुत्र हूँ मैं हतभागी, व्यथा कहाँ कह पाते हैं॥

हे शुभ्रा! तुम कह दो अपनी, जो भी है इच्छा सारी।
हट जाए बदली विषाद की, घिरती आती जो कारी॥
निश्चय अपना अब तुम बदलो, पिता हृदय को हरसाओ।
कर स्वीकार विवाह निवेदन, अंतस आनन महकाओ॥

बातें सुन सब देवव्रत की, सत्यवती तब है बोली।
बन भी जाऊँ रानी लेकिन, रहेगी खाली ये झोली॥
तुम हो गंगा पुत्र सुनो ये, राज्य तुम्हारा ही होगा।
मेरे जाये पुत्रों का कब, यहाँ कभी कुछ भी होगा॥

बही व्यथा की तीक्ष्ण लहर इक, सुन के ये बातें सारी।
बोल उठे देवी तुमको मैं, एक वचन देता भारी॥
सूर्य चंद्रमा जब तक चमके, अटल रहेगी ये वाणी।
अटल घूमती धरती जैसे, जैसे बहता है पानी॥

पुत्रधर्म से बड़ा जगत में, कब कोई है धर्म हुआ।
काम पिता के जीवन आये, धन्य हमारा कर्म हुआ॥
साक्षी बन कर सुनो जगत् ये, सुन लो नभ जल के वासी।
नही बधेंगे सात वचन में, जीयेंगे बन वनवासी॥

डोली धरती डोला अम्बर, सुनकर प्रण की ये बातें।
समय चक्र ने चुपके से अब, कर दी हैं अपनी घातें॥
शांतनु सुन ये विकट प्रतिज्ञा, मन ही मन थे घबराये।
बोले दुःख की गहरी लहरी, साथ हर्ष के क्यों लाये॥

सुनो पुत्र ये कठिन तपस्या, जग में तुमको देगा मान।
जब तक चाहो मृत्यु न आये, देता हूँ मैं ये वरदान॥
शपथ एक ऐसा धारण कर, सत जीवन तुम पाओगे।
कभी हुआ कब होगा ऐसा, भीष्म तुम्हीं कहलाओगे॥

ऐच्छिक जीवन पाओगे
द्वेष कपट नहि लाओगे
भीष्म सदा कहलाओगो
सुनो पुत्र! ये कठिन तपस्या, तुम ही बस कर पाओगे…

रुक्मिणी राधा

सुन लो सुनलो प्यारों सुन लो, अप्रतिम कथा पुरानी है।
रीत प्रीत का ज्ञान मिलेगा, ऐसी उसकी वाणी है॥
पल पल जिससे पावन होगा, ऐसी कथा सुनाऊँगी।
सारे अपनों के जीवन में, खुशियाँ मैं बिखराऊँगी॥

राधा कान्हा इक पूरक थे, इनकी प्रीत सुहानी थी।
जीवन को जो दे दे गति इक, ऐसी प्रेम रवानी थी॥
बचपन का ये प्यार अनूठा, जीवन से भी प्यार था।
साथ कहाँ थे दोनों फिर भी, जीवन साथ गुजारा था॥

गये द्वारिका जब कान्हा तो, छूटा सारा खेला था।
हिय में उनके धड़कन जैसे, बसता पर सब मेला था॥
ग्वाल बाल सब छूटे उनसे, दुनियावी अब डेरा था।
कहने को थे दूर सभी पर, सबका वहीँ बसेरा था॥

राजभवन में कान्हा रहते, रुक्मिणी उनकी रानी थी।
बन बैरागन जीवन जीना, राधा मन में ठानी थी॥
दोनों का विश्वास अमर था, इनकी अमर कहानी है।
सुनकर जीवन धन्य करो तुम, सबको ही मनभानी है॥

राजपाठ में खोये कृष्णा,हिय में बसती राधा थीं।
कहने को सम्पूर्ण कृष्ण थे, राधा उनकी आधा थीं॥
रुक्मिणी हरदम सोचा करती, राधा में क्या ऐसा है।
रूप रंग क्या मेरा सारा, राधा के नहि जैसा है॥

रानी के इस द्वेष भाव पर, कृष्ण मंद मुस्काते थे।
राधा का कर कर के वर्णन, उनको बहुत खिझाते थे॥
रानी कान्हा को कब समझी, बातों को सच मानी थी।
मिले बिना राधा को वो, अपनी सौतन ठानी थी॥

वन वन पग से नापें राधा, कृष्ण नगर जब आईं थीं।
मिलना चाहूँ महाराज से, खबर शीघ्र भेजवाईं थीं॥
राधा का सुन नाम श्याम बस, सरपट दौड़े भागे थे।
तन का अपने ध्यान नही था, स्वंय, स्वंय से आगे थे॥

नयन मिले जब उन दोनों के, बदरी नैन समाई थी।
आँसू की उमड़ी जो नदियाँ, उनकी प्रीत कमाई थी॥
बिन बोले, बोले कान्हा प्रिय!, कैसा हाल बनाई हो?
खोज खबर बिन दिये कहाँ थी, मुझको बहुत रुलाई हो॥

गिरधारी इतने व्याकुल पर, राधा तो मुस्काती थी।
रानी ये सब देख देख कर, मन ही मन जल जाती थी॥
चीर फटी है वैरागन की, पैर विवाई फाटी है।
कान्हा के पर प्रीत भाव ने, सारी दूरी पाटी है॥

लिया हाथ में हाथ प्रिया का, अंतर्मन अकुलाया था।
राजभवन में लेके आये, हिय उनका हरषाया था॥
कैसा है ये प्रेम अनूठा, क्यों राधा ये प्यारी है।
आज रात्रि को जानूंगी मैं, रानी की तैयारी है॥

कृष्ण भवन में लगता मानो, वो ही दिवस दीवाली थी।
बात बात पर रोते दोनों, छाई पर खुशहाली थी॥
रात्रि भोज संपन्न हुआ फिर, सोने की तैयारी थी।
विदा बोल विश्रामभवन में, जाने की अब बारी थी॥

दिन भर के भावों से पलकें, होती जाती भारी थीं।
पुलकित मन से राधा की अब, सोने की तैयारी थी॥
तभी सेविका आ कर बोली, रानी मिलने आईं हैं।
कुछ विशेष है जिसको देने, वो खुद चलकर आईं हैं॥

राधा बोलीं घर है उनका, आज्ञा फिर क्या लेना है।
जो चाहें वो आकर दे दें, मुझको तो बस लेना है॥
रानी आगे बढ़ कर बोलीं, आज असल तय होना है।
तेरे मन में लिए श्याम के, कितना खाली कोना है॥

मंद मंद राधा मुस्काई, उस पल कुछ नहि बोली वो।
बात समझ कर सारी फिर वो, अधरों को हैं खोली वो॥
कोने की तो बात न जानू, जीवन उन पर वारा है।
श्वास श्वास की हर लहरी पर, उनका नाम पुकारा है॥

सुन कर बातें राधा की ये, रानी जल भुन जाती हैं।
गरम दूध का इक प्याला वो, दासी से मंगवाती हैं॥
फिर सम्मुख हो कर राधा के, बोली इसको पी जाओ।
श्वास एक मत तुम लेना फिर, मन में चाहे घबराओ॥

रानी की ये बातें सुनकर, प्याला अधर लगाया था।
एक श्वास में पी डाला सब, तनिक न जी घबराया था॥
हतप्रभ रानी चली गईं फिर, समझ कहाँ कुछ पाईं थी।
अजब प्रीत है इन दोनों की, खुद को खुद समझाईं थीं॥

सैय्या पर परमेश्वर लेटे,मंद मंद मुस्काते हैं।
उलझन में रानी को देखा, अपने पास बुलाते हैं॥
बोले रानी पांव दबा दो, पीर बहुत ही तारी है।
कल मिलना है राधा से अब, रात बहुत ये भारी है॥

देव चरण पर दृष्टि गई जब, रानी चीखी चिल्लाई।
छालों से था पैर भरा, औषधि हैं वो मँगवाई॥
बोली भगवन ऐसा कैसे, दुर्दिन कैसे छाये हैं।
पीर हो रही होगी भारी, छाले ये कब आये हैं॥

कान्हा बोले कुछ पल पहले, पैरों में छाले आये।
मेरे मन में जब राधा के, दर्द भरे नाले आये॥
रहती है वो अंतस मेरे, चरण चाह करती वो है।
पीर कभी जब उसको होती, नयनो से बहती वो है॥

सुनकर कृष्णा की ये बातें, रानी मन में डोली थीं।
एक श्वास में कह डाली सब, राधा से जो बोली थीं॥
परख प्रीत के कारण रानी, हुई शर्म से पानी थी।
राधा रानी और कृष्ण की, अद्धभुत प्रेम कहानी थी॥

राणा प्रताप 

मेवाड़ी माटी की गाथा, कर लो याद जुबानी।
राणा के निज रण कौशल की, अद्भुत ओज़ कहानी॥

टुकड़ों में था देश बँटा तब, मन अकबर ललचाया।
आधिपत्य की चाह लिए वो,युद्धभूमि में आया॥
जाना है अब क्षेत्र समर में, राणा मन में ठाने।
माटी से बढ़ कर कब कोई, बात यही वो जाने॥

हल्दीघाटी में वीरों का, रक्त बहा बन पानी।
राणा के निज रण कौशल की, अद्धभुत ओज कहानी॥

राणा ने हुंकार भरी जब, साथ मिले सब आये।
माटी के गौरव की खातिर, सबने हाथ मिलाये॥
तेग बढ़ा फिर हाकिम खां का,मन मन्ना हरसाये।
देशप्रेम में उन्मुख सबने, चढ़ बढ़ शीश कटाये॥

एकलिंग जयकार लिए फिर, लड़ गये रजस्थानी।
राणा के निज रण कौशल की, अद्भुत ओज कहानी॥

मन से थे सब प्रबल मुखर पर, संख्या बल में थे कम।
तार हुआ था माँ का आँचल, आँखें सबकी थी नम॥
खेल देख कर नियती का ये, राणा मन घबराया।
थके हुये चेतक ने भी तो, अपना धर्म निभाया॥

छू न सका राणा को कोई, चेतक वो बलिदानी।
राणा के निज रण कौशल की, अद्भुत ओज़ कहानी॥

छोड़ दिया रण इसीलिए था, जन्मभूमि को पाना।
अपना शीश कटा कर उनको, स्वर्ग नही था जाना॥
पैदल पैदल वन में भटके,खाई रोटी सूखी।
मातृभूमि को पाना है फिर, चाह यही थी भूखी॥

कायर कहने वाले सुन लो, राणा थे अभिमानी।
मेवाड़ी माटी की गाथा, कर लो याद जुबानी॥

तुम

पूर्णिमा की रात बन कर,तुम हृदय पर छा रहे।
चाँदनी का रूप धर कर, प्रीत तुम बरसा रहे॥
रात जाती कट नयन में, भोर मधु सरसा रही।
देख अपना प्रिय मिलन ये, मन कली हरसा रही॥

प्रीत पूरित छवि निरख के, हिय हरित उपवन हुआ।
कोकिला के कंठ सम प्रिय, पिपहिरी सा मन हुआ॥
शुभ्र् लगती चहुँ दिशायें, दृश्य सब रमणीय है।
प्रीत में डूबे हुये सब, लग रहे कमनीय हैं॥

मन कुमुदिनी खिल गई है, फूल सब सुरभित हुये।
मंजरी झूमी मगन हो, वात रस मुखरित हुये॥
बज रही है झम झमा झम, सज नुपुर प्रिय पाँव में।
झूमती हैं कल्पनायें, प्रीत के मधु छाँव में॥

यूँ लगा तुम आ गये हो, प्रिय बसंती रूप में।
खिल रही बन मेदिनी मैं, साथ तेरे धूप में॥
हो मधुर चिरकाल तक अब, हिय मिलन का खेल ये।
युग युगों तक रस भरे उर, प्रिय हमारा मेल ये॥

बरसात, याद और तुम 

रिमझिम पलछिन गिर रही, बाहर ये बरसात है।
नयनो से भी झर रही, रिमझिम दिन औ रात है॥
आकुल मन आहें भरे, व्याकुळ होते प्राण है।
तेरी सुधि बन दामिनी, लेती मेरी जान है॥

पंकिल जीवन बन गया, प्रीत कुमुद की आस में।
चुपके से करुणा हँसे, दुख के इस परिहास में॥
पुरवाई की चोट से, शिथिल पड़ा ये गात है।
यौवन का दिन ढ़ल रहा, लम्बा जीवन रात है॥

आँसू बन भाषा गये, अधर चढ़ा इक मौन है।
जग में अब लगता नही, मेरा अपना कौन है॥
आ जाओ प्रिय आज तुम, पा जाऊँ मुस्कान मैं।
जीवन कुसुमित बाग़ की, बन जाऊँ पहचान मैं॥

घुल जायें स्वर कोकिला, धड़कन की हर बात में।
हरियाली दिन सब लगे, झूमे चंदा रात में॥
मन मयूर बन बावरा, खुशियाँ बाँधें पाँव में।
बीते जीवन प्रेम के, प्रीत भरी मधु छाँव में॥

आ जाओ तुम साजना, सावन की बरसात में…

कृष्ण जन्म

युग युगों में एक युग था, कह रहे द्वापर जिसे।
इक नगर उस काल में था,सब कहें मथुरा उसे॥
दो नगर की है कथा ये, कह रही संसार से।
सुन जिसे हो धन्य सारे, लीजिये गुन प्यार से॥

शूरवंशी भूप थे इक, पुत्र उनका कंस था।
कर्म ऐसे थे लगे कि, पाप का वो अंश था॥
छीन कर गद्दी पिता की, डाल कारा में दिया।
न्याय का दीपक बुझा कर, घोर अपयश था लिया॥

इक बहन उसकी दुलारी, प्राण से प्यारी उसे।
देवकी था नाम जिसका, मानता हिय से जिसे॥
व्याह कर वसुदेव जिसको, द्वारिका लेकर चले।
हाय नियती का लिखा पर, टालने से कब टले॥

देवकी दुल्हन बनी थी, साथ में वसुदेव थे।
सारथि बन कंस बैठा, कब कहाँ कुछ भेव थे॥
देव वाणी तब हुई कि मूर्ख! सुन तू रुक जरा।
डोलता जिसको सुने नभ, डोलती सुन कर धरा॥

आठवां सुत देवकी का, काल बनकर आ रहा।
रूप धरकर वो अनूठा, मृत्यु तेरी ला रहा॥
काल की ये बात सुनकर, कंस व्याकुल हो गया।
मार दूँ वसुदेव को ही, धैर्य उसका खो गया॥

देवकी कर जोड़ कहती, तात! ऐसा मत करो।
प्राण का तुम दान देकर, आस जीवन की भरो॥
पुत्र से है भय तुम्हें तो, जन्मते लेना तुम्हीं।
आठवां सुत प्राप्त कर के, मुक्ति भी देना तुम्हीं॥

डाल कारा में बहिन को, कर दिया पहरा कड़ा।
मूर्ख पापी चूर मद में, भाग्य से लड़ने खड़ा॥
रोक पाया है भला कब, चाल कोई काल की।
चतुर्दिश में गूँजती है, मृदंग जिसके ताल की॥

दिन महीने बरस बीते, देवकी रोती रही।
कर्म को बस कोसती औ, सुत सभी खोती रही॥
आठवाँ सुत गर्भ आया, मुख मलिन उसका पड़ा।
बोलती वसुदेव से वो, भाग्य क्यों ऐसा लड़ा॥

मात कैसी हूँ प्रिये मैं, कर कहाँ कुछ पा रही।
तात को दे पुत्र अपने, पीर सहती जा रही॥
कब सुनेंगें प्रभु हमारे, कब मिलेगा न्याय भी।
कब हरेंगें कष्ट सारा, बढ़ रहा अन्याय भी॥

देवकी सुन धैर्य रख अब, दिख रहा अब काल है।
आ रहा जो गर्भ तेरे, गति लिये विकराल है॥
कष्ट सारे दूर होंगें, अब हमारे लाल से।
दुष्ट का भी अंत होगा, सुन सुदर्शन चाल से॥

अश्रु नैनो में समेटे, देवकी सोने चली।
हाय! जीवन की घड़ी ये, कब लगे उसको भली॥
कब दिखेगा मुक्त सूरज, ये हवा औ चंद अब।
कब बढ़ेगी गति समय की, हो गयी जो मंद अब॥

सिसकते दोनों पड़े थे, हार कर निज भाग्य से।
हो प्रगट अब कष्ट हर लो,कह रहे आराध्य से॥
इक अलौकिक दिव्य मानव, आ खड़ा सम्मुख हुआ।
तेज ऐसा था अनोखा, देख मन को सुख हुआ॥

चतुर्भुज था रूप जिनका, लग रहे भगवान थे।
देवकी वसुदेव दोनों,हो उठे हैरान थे॥
पाँव पर हैं गिर पड़े वो, बोलते प्रभु पीर सुन।
है हृदय में कष्ट भारी, रख न पायें धीर सुन॥

बोलते प्रभु आ रहा माँ!, गर्भ में बन लाल मैं।
धर्म की स्थापना को, बन रहा हूँ काल मैं॥
भाद्रपद की अष्टमी को, जन्म मेरा हो रहा।
इस तिथी से कंस का है, भाग्य जग में सो रहा॥

इस दिवस को गाँव गोकुल, हर्ष छायेगा सुनो।
नन्द के घर जन्म लेगी, योगिनी माया सुनो॥
पुत्र अपना रख वहां पर, साथ लाना तुम उसे।
कंस के निज हाथ में फिर, सौंप देना है जिसे॥

आ गया दिन वो सुहावन, देवकी बेहाल सी।
सह रही थी पीर भारी, हो रही है निहाल भी॥
पुण्य तिथि थी रोहिणी की, थी अँधेरी रात भी।
गरजती थीं सब दिशायें, हो रही बरसात भी॥

वेग युमना का बढ़ा था, सूझता कर को न कर।
अवतरित होते तभी प्रभु, बाल का है रूप धर॥
खुल गये फिर द्वार कारा,टूटते सब बंध भी।
आह! नियती गढ़ रही थी, अब नवल संबंध भी॥

सूप में रख पुत्र को निज, वसुदेव बढ़ते जा रहे।
देखकर विकराल यमुना,कुछ समझ कब पा रहे॥
पार कर जाऊँ इसे मैं, राह पर दिखती नही।
भाग्य से विपदा हमारे, हाय! क्यों मिटती नही ?

बाल भगवन पाँव से फिर, छू दिए सरि धार को।
वेग यमुना का हुआ कम, बस नमन प्रभु प्यार को॥
नन्द के घर पहुंच कर वो, पुत्र अपना रख दिये।
लौटते मथुरा को’ वापस, नंद पुत्री को लिए॥

कंस को जब ज्ञात होता, देवकी पुत्री जनी।
आ गया लेने उसे वो,भाग्य का समझे धनी॥
मार देता हूँ इसे मैं, काल मेरी है यही।
छूट कर माया उडी औ, बोलती वो भी वही।

सुन रे मूरख! इस धरा पर, पाप तूने है किया।
आ गया है काल तेरा, जनम उसने ले लिया॥
मार सकता है उसे यदि, मार कर तू देख तो।
देख सकता है यदि तो, देख नियती रेख को॥

हो गई अदृश्य कन्या, कंस पागल हो गया।
क्या करे क्या ना करे अब, धैर्य उसका खो गया॥
देवकी वसुदेव दोनों, बंद अब यूँ ही रहो।
काल को जब तक न मारूँ, दर्द सारे तुम सहो॥

ये कथा अब पूर्ण होती, कृष्ण के अवतार की।
सुन जिसे सब धन्य होते, है अमिट संसार की॥
धर्म के प्रसार की…
प्रेम के अभिसार की..

यूँ कथा है पूर्ण होती, प्यार ही बस प्यार की..

तुम्हारा पीठ

तुम्हारी पीठ
विश्व की सबसे प्रचीनतम
संस्कृति के उद्घोष की भूमि है

जिसपर मान्यताओं की ईटों से सभ्यताओं की दीवारें
विधिगत चुनी गई हैं

यहाँ पर
भिन्न भिन्न दायित्वों की समतल सड़कें
एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई यूँ बिछी हैं
कि सम्पूर्ण जीवन रीतियों के
सुनियोजित जाल में बंधा सा लगता है

तुम्हारी पीठ के मध्य में
स्थापित है
कुँए से जल निकालने की प्राचीन विधियाँ
जिनके किनारे पर स्थित है आकांक्षाओं के स्नानागार

ये एक नहीं
अपितु बहुचरण में जानती हैं
ओढ़ने, ओढ़ाने
बिछा ने और बिछ जाने की कलाएं

हाथी दांत की तरह मजबूत तुम्हारी पीठ
हो जाती है
मनकों सी हल्की
जब इसको छूता है कोई प्रेमिल स्पर्श

पीढियां गुजारती हैं
इनपर उकेरते हुए अपना नाम
सदियां थक जाती हैं इनपर से बुहारते हुए
न मिटने वाले काम

अविचलता
अडिग

स्वंय की पूर्णता के लिए ये सतत रहती हैं संघर्षरत

इनकी पहचान
प्रयाग के प्रशस्ति स्तम्भ सी है
जिस पर खुदा हुआ है
एक सम्पूर्ण जीवन वृत..

यहाँ फैले हुए हैं
यश अपयश के शिलालेख

ये वो तटबन्ध हैं
जो देते हैं नदियों को खुल कर बहने की आज्ञा
जिन्हें गाहे बगाहे लील भी जाती हैं वही नदियां

युद्ध में करनी होती हैं इसकी सुरक्षा
और प्रेम में
ये नाखूनों से होकर लहूलुहान
जानते हैं लिखना संकल्प पत्र
समर्पण का

ये धरती के विपरीत
जानते हैं आसमान को उठा लेना
तो आसमान के सम्मुख
ये देते हैं ओट धरा को

तुम्हारी पीठ पर
पाँव टिका कर हौसलों को मिलती है उड़ान

तुम्हारी पीठ पर
धूनी रमा नव किसलय
सीखते हैं हवा की सवारी

तुम्हारी पीठ
बस तुम्हारे लिए नही है आरामगाह,
जिसे जमीन से टिका तुम आँख में भरते हो आसमान

तुम्हारी पीठ
तुम्हारी प्रेयसी के लिए सागर का वो ओर छोर है
जिसे वो अपने दोनों बाँहों में भर
समझती हैं स्वंय को
धरा की अकूत संपदा की मालकिन, जो है

अमोल
अनमोल
अमूल्य

बताओ भला!

कौन सी स्त्री नही चाहेगी
यूँ सागर के हाहाकार को बाँध लेना…

【पुरुष सौंदर्य】

तुम्हारा कंधा

तुम्हारा कंधा
प्रभु की बनाई वो कील है
जिस पर टँगे हुए हैं कई लोगों की प्रत्याशाओं के झोले

फिर भी निर्द्वंद
तुम जानते हो ब्रह्मपुत्र की तरह बहना

हल हो या गांडीव
या हो उम्मीदों का बस्ता
ये सहजता से उठा लेता है सबका भार

ध्रुव की तरह अटल है इसपर किया जाने वाला विश्वास

बच्चे के लिए
ये हिमालय का उत्तुंग शिखर हैं
जहाँ पर बैठ वो समझता है स्वंय को भूपति
तो जननी के लिए है जनक के बाद की आश्वस्ति

पिता के लिए है ये भरोसा कि सुपोषित करेगा ये मेरा मान अपने कंधे पर

डेढ़ बित्ते का तुम्हारा कन्धा
तुम्हारी सहचरी के लिए गंगा का वो डेल्टाई क्षेत्र हैं
जहाँ फलते फूलते हैं उसकी इच्छाओं के सुंदर वन

तुम्हारे कंधे पर
फैली हुई हैं पर्वत श्रृंखलाएँ
जिनके पृष्ठ भाव में डूबता है सूरज
शीर्ष पर उगता है चन्द्रमा
और वक्ष स्थल पर बहती हुई नदिया सुनाती हैं जीवन राग

तुम अपने कंधे पर ढ़ोते हो धूप छाँव

इनके ही बल पर तुम
निर्जन में भी बसा लेते हो गाँव
इनके सामर्थ्य पर ही तुम्हारा विश्वास पाता हैं ठाँव

कोई रंग
कोई अलंकार
कोई शृंगार
इसकी विशिष्टता को नहीं कर सकता चिन्हित

इसकी बलिष्ठता ही इसका सौंदर्य है
जिसको नाँव बना
पार करते हैं तुम्हारे परिजन भव सागर

बेहिचक
बेधड़क
बिना रुकावट

अपने क्षणिक जीवन में
हर स्त्री चाहती है एक ऐसे ही पुरुष का साहचर्य
जिसके कंधे पर वो डाल कर अपने मन का बोझ,
हो सके निश्चिंत
जीवनपर्यंत….

【पुरुष सौंदर्य】

तुम्हारे होंठ 

तुम्हारे होंठ
मीठे जल के सरोवर हैं
जिनपर इच्छाओं की मछली डुबकी लगा
मन के समन्दर में कर जाती हैं प्रवेश

इनके तटबन्धों को
तुमने घेर लिया है कोरवां राशि की चट्टानों से
पर इनके परिक्षेत्र की भूमि होती है बड़ी उर्वरक

जिनपर उगती हैं
फलती और फूलती हैं
भावनाओं की केसर फुलवारियां

ऊपर से सख्त
नीचे से नरम प्रवृति वाले तुम्हारे होंठ जानते हैं
किसी भी मृत दिवस को
चूम कर जीवंत कर देना

और ये गढ़ते हैं प्रथम सोपान नव सृजन का

इनपर
किलकारी की लय है
जिसकी धुन पर झूमते हुए जीवन को लयकारी मिलती है…

इनपर बादलों का घर है
जिनकी बूंदें
चूम कर धरती को कर देती हैं हरी भरी

इनपर मरीचिकाओं का भी वास है
जिनकी तृष्णा में
कई मृगया खो देती हैं अपना धैर्य

ये जानते हैं
आकाश बन धरती पर झुक जाना
ये जानते हैं
जलधि बन नदी को स्वंय में समाहित कर लेना

कोई संकोच नही
कोई हिचक नही

क्योंकि इन्हें भलीभांति पता है
भाषा को कैसे दिया जाए व्यवहार

कृष्ण की मुरली हो
या बिस्मिलाह की शहनाई
ये सदियों से अपने घर में देते रहे हैं प्रेम को शरण

शहतूत से रससिक्त,धूसर, कन्हाई रंग में लिपटे
ये जानते हैं
चूम कर
झील की पीर को सजल कर देना
और छोड़ जाना एक मीठा खट्टा स्वाद

अविस्मरणीय
अनिवर्चनीय
अवर्णनीय

ऐसे होंठों पर
कौन स्त्री नही चाहेगी
अपने भार को टिका स्वंय से मुक्त होना…

【पुरुष सौंदर्य】

तुम्हारे हाथ

तुम्हारे हाथ
सृष्टि में जीवन की आश्वस्ति हैं

ये समृद्धि के द्योतक
सामर्थ्य के उद्घोषक हैं
ये जानते हैं कला, धूल से आभूषण बनाने की

सूर्य के सातों अश्वों के
मत्स्य रूप को
तुमने अपनी भुजाओं में दिया है निवास

शेषनाग के फण की शक्ति को
अपनी कलाई का कलेवा बनाये हुए तुम
नियंत्रित करते हो धरती की गति को..

तुम्हारी उँगलियों के पोर से
झरते हैं मधुमास
हथेलियों की थाप से बरसते हैं मेह

तुम्हारी दस उँगलियाँ
प्रतिबिम्बित करती हैं दस दिशाओं को
जिनके सौरष्ठ से धरती पाती है गुरुत्व

ये जानती हैं
लक्ष्मी और सरस्वती को एक ही डोर में बांध
गले की ताबीज बनाना..

मस्तिष्क के भी सारे तंतु
तुम्हारी हस्त रेखाओं के ही समिष्ट हैं

धन, धान्य, आभूषण से तुम्हें कब पड़ता है फर्क?

तुम्हारे पास तुम्हारे दो हाथ हैं
जिनके मूल में
स्वंय बसते हैं जगन्नाथ
जो बनाते हैं तुम्हें दुनिया का सबसे धनवान पुरुष

इनको जोड़ कर
संतुष्टि के लिए तुम करते हो प्रार्थना
और प्रेम के लिए
इनको फैला कर बन जाते हो याचक

इनकी ही माया से तुम हो पाते हो दृढ प्रतिज्ञ

ये ही बनाते हैं तुम्हें दीवार
जिनपर भित्ति चित्र बनाती हुईं कई रूपसियां
शूल में भी उकेर देती हैं फूल
दारिद्र्य में भी सहेज लेती हैं वैभव

कमजोर समय में तुम्हारे हाथ,जानते हैं गढ़ना आश्वस्ति

आश्वस्ति संबंधो की
आश्वस्ति प्रबंधो की
आश्वस्ति विश्वास की
आश्वस्ति प्रयास की

सुनो!

एक स्त्री को
इस मिथ्या जगत् में
भला और क्या चाहिए
यदि उसके हाथ में तुम्हारे हाथ जैसी आश्वस्ति हो….

【पुरुष सौंदर्य】

तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा चेहरा
सृष्टि के विशालतम स्वरूप का
लघु रूप है

जिसपर नदियों की तरह बिछी हुई भाव भंगिमाएं
जीवन की प्राणरेखा हैं

ललाट की सिलवटों में फैले बेबीलोन के झूलते बागीचे के नीचे
व्यवस्थति हैं
अलेक्जेंड्रिया के रौशनी घर

जिनकी पहरेदारी करती हैं धनु पिनाक सी भौहें

माया युगीन गर्वीले पत्थरों से निर्मित
तुम्हारे नासिका प्रदेश के प्रखर बिंदु पर
विराजित है कैलाश मानसरोवर जो सजल रखता है अनुभूतियों को

कर्ण द्वार तक फैले हुए सहारा के रण में
जाने कितनी मृग तृष्णाएं
पाती हैं पनाह

धूल के बवंडरों से घिरे आसमान के नीचे
होठों पर मिलती हैं
मीठे जल की बावड़ियाँ

जिनमें डुबकी लगाती इच्छाओं की मछलियाँ, उतर जाती हैं मन के गहरे समन्दर में

चैतन्य
उर्जित
अलौकिक

तुम्हारी इन्हीं मुख मुद्राओं पर लिखते हुए कविता सोचती हूँ

वो स्त्री ही क्या स्त्री
जिसने अपने प्रेमी के चेहरे पर
गुरुदत्त सा ताब न देखा…

【पुरुष सौंदर्य】

तुम्हारी आँखें

तुम्हारी आँखें
गांडीव की चढ़ी हुई प्रत्यंचा है
जो बिना भेदे लक्ष्य को
ढीली नही होतीं

यहीं से
निकलते हैं
कामदेव के बाण
जो जानते हैं भेदना हृदय को

इन्होंने चन्द्र कला से सीखा है लूटते हुए लुट जाने की कारीगरी

गढ़ते हुए कई मरुभ्रम
ये पोषित करती हैं मधु छल को
और भोगती हैं
स्वर्ग का सुख तब,
जब ये सूद के एवज में आँखों के ही द्वारा जाती हैं छली

शून्य का भार वहन किये
ये बनाती हैं पलकों को तुला
जिनपर तौल कर मौसमो को,
ये मतिभ्रम से बनाती हैं द्वार, निर्गुण मन तक जाने का

ये मोहननगर की तरह
दूसरे के विवेक क्षेत्र में रचती हैं वैभवशाली तिलिस्म

अद्भभुत
अप्रतिम

जिस स्त्री ने नही देखा इनके भीतर
वो क्या जाने
इनमे डूब के पार होने का रहस्य…

【पुरुष सौंदर्य】

 

 

 

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